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भारत का 42 फीसदी भूमि क्षेत्र सूखे की चपेट में, चुनावी वर्ष में खेती की हालत बद्तर

अंगरिका गोगई और भास्कर त्रिपाठी,
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बेंगलुरू और नई दिल्ली: भारत का लगभग 42 फीसदी भूमि क्षेत्र सूखे का सामना कर रहा है और 6 फीसदी में असाधारण रूप से सूखा है। पिछले साल सूखे की स्थानिक सीमा से चार गुना ज्यादा है। यह जानकारी सूखा निगरानी मंच, ड्रॉट अर्ली वार्निंग सिस्टम ( डीईडब्लूएस ) से 26 मार्च, 2019 को समाप्त सप्ताह के आंकड़ों से मिली है।

 

आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों, राजस्थान, तमिलनाडु और तेलंगाना में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। ये राज्य 50 करोड़ लोगों के घर हैं, यानी  देश की लगभग 40 फीसदी आबादी यहां रहती है।

 

जबकि केंद्र सरकार ने अभी तक कहीं भी सूखा घोषित नहीं किया है, वहीं आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान की राज्य सरकारों ने अपने कई जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है।

 

‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ (आईआईटी-गांधीनगर) के एसोसिएट प्रोफेसर और डीईडब्लूएस के डेवलपर विमल मिश्रा ने इंडियास्पेंड को बताया, “मानसून में देरी है और उससे पहले, अगले दो या तीन महीने में इन क्षेत्रों में से कई में मुश्किलें होने वाली हैं।”

 

मौजूदा स्थिति के लिए असफल मानसून पहला कारण है। पूर्वोत्तर मानसून, जिसे पोस्ट-मॉनसून वर्षा ’(अक्टूबर-दिसंबर) के रूप में भी जाना जाता है, भारत को 10-20 फीसदी वर्षा प्रदान करता है, उसमें 2018 में 127.2 मिमी की लंबी अवधि के सामान्य से 44 फीसदी की कमी थी, जैसा कि इंडिया मीटीअरलाजिकल डिपार्टमेंट (आईएमडी) के आंकड़ों  से पता चलता है। इसके साथ ही दक्षिण-पश्चिम (एसडब्ल्यू) मानसून (जून-सितंबर) में वर्षा की कमी हुई, जो भारत को 80 फीसदी वर्षा प्रदान करता है। 2018 में यह 9.4 फीसदी तक कम हो गया – 10 फीसदी कमी की उस सीमा के करीब, जब आईएमडी सूखा घोषित करता है। मिश्रा ने कहा, 2017 एक अपवाद वर्ष है, लेकिन भारत ने 2015 के बाद से हर साल बड़े पैमाने पर सूखे को झेला है। जैसा कि, अल नीनो 2019 में दक्षिण-पश्चिम मानसून पर मंडरा रहा है, इस वर्ष (मार्च-मई) प्री-मानसून वर्षा भी कम रहा है। अल-नीनो के प्रभाव से प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह गर्म हो जाती है, इससे हवाओं का रास्ते और रफ्तार में परिवर्तन आ जाता है जिसके चलते मौसम चक्र बुरी तरह से प्रभावित होता है। आईएमडी के आंकड़ों के अनुसार, 1 मार्च से 28 मार्च, 2019 के बीच भारत में दीर्घकालिक औसत से 36 फीसदी कम वर्षा हुई है। दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्र में सबसे कम, 60 फीसदी से अधिक की कमी दर्ज की गई।

 

कम वर्षा ने देश भर के जलाशयों में जल स्तर को कम कर दिया है। पांच महीने से 22 मार्च 2019 तक देश के 91 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध पानी की मात्रा 32 प्रतिशत तक कम हो गई है। पांच महीनों में, दक्षिणी राज्यों के 31 जलाशयों में, जल स्तर 36 प्रतिशत कम हो गया है।

 

सूखे से कृषि संकट बढ़ सकता है। भूजल निष्कर्षण बढ़ सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में पलायन बढ़ सकता है और इससे आगे राज्यों के खेतों, शहरों और उद्योगों के बीच जल टकराव बढ़ सकता है।

 

इसके बावजूद, केंद्र सरकार द्वारा 2016 में जारी किया गया नवीनतम सूखा मैनुअल सूखा घोषित करने की प्रक्रिया को लंबा और कठिन बना देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस नतीजे के साथ तो सूखा अधिकारिक तौर पर अघोषित रह सकता है। इसका मतलब है कि राहत के उपाय जैसे कि पेयजल आपूर्ति, रियायती डीजल और सिंचाई के लिए बिजली, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा) के तहत बीमित कार्य के दिनों की संख्या में वृद्धि नहीं की जाएगी और आगे चुनाव के कारण सरकारी स्वीकृति और कार्रवाई में देरी हो सकती है।

 

सूखे से पांच प्रभावित क्षेत्रों -आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान – में  सूखे के प्रभाव पर छह रिपोर्ट वाली श्रंखला में यह पहली रिपोर्ट है।

 

सूखे की अधिकता और गंभीरता

 

डीईडब्ल्यूएस के अनुसार सूखे से जूझ रहे देश के हिस्सों को छह श्रेणियों में बांटा जाता है- असाधारण रूप से सूखा, अत्यधिक सूखा, गंभीर रूप से सूखा, मध्यम सूखा, असामान्य रूप से सूखा और कोई सूखा नहीं।

 

देश का लगभग 6 फीसदी भू-भाग वर्तमान में असाधारण रूप से सूखे की श्रेणी में है, जो कि पिछले साल के इसी समय में 1.6 फीसदी क्षेत्र का लगभग चार गुना है। सूखे के अत्यधिक और असाधारण श्रेणियों में पूरे देश का 11 फीसदी क्षेत्र है, जो कि मार्च 2018 में 5 फीसदी क्षेत्र के दोगुना से अधिक है, जैसा डीईडब्लू के आंकड़ों से पता चलता है। बारिश, अपवाह और मिट्टी की नमी के आधार पर डीईडब्लू अपडेट प्रदान करता है – मानकीकृत वर्षा सूचकांक (एसपीआई), मानकीकृत अपवाह सूचकांक (एसआरआई), और मानकीकृत मिट्टी नमी सूचकांक (एसएसआई), से इसे मापा जाता है। देश भर से दैनिक अपडेट प्रदान करने के साथ, यह एक अल्पकालिक, सात दिन का पूर्वानुमान भी प्रदान करता है।

 

सूखा कैसे घोषित किया जाता है….

ड्राउट मैनेजमेंट-2016 के लिए तय मैनुअल दो कारकों को सूखे का संकेत मानता है:

– वर्षा विचलन (ह्रास) की सीमा

– परिणामी शुष्क वर्तनी

सूखे की सीमा का आकलन करने के लिए, निम्नलिखित प्रभाव संकेतकों का अध्ययन किया जाता है: कृषि, रिमोट सेंसिंग, मिट्टी की नमी और जल विज्ञान। प्रत्येक प्रभाव सूचक में स्थिति की गंभीरता के विभिन्न स्तर होते हैं।

गंभीर रूप से सूखाग्रस्त के रूप में वर्गीकृत किए जाने के लिए, इन चार में से कम से कम तीन को सूखे का संकेत देना चाहिए। मध्यम सूखे की स्थिति में, कम से कम दो (वर्षा के अलावा) को अवश्य देखना चाहिए। यदि केवल एक प्रभाव सूचक (वर्षा के अलावा) की जांच की जाती है, तो क्षेत्र को सूखा-प्रभावित नहीं माना जाता है।

एक बार संकेतक ‘मध्यम’ या ‘गंभीर’ सूखा दिखाते हैं, राज्य सरकार जमीन पर एक नमूना सर्वेक्षण करती है। यदि रिपोर्ट ‘गंभीर’ श्रेणी का सूखा बताती है, तो शमन और राहत के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (एनडीआरएफ) को सहायता का एक ज्ञापन सौंपा जाता है।

 

सूखे का सामना करने वाले भारतीय राज्य

Source: Drought Early Warning System

 

26 मार्च, 2019 को सूखा झेलने वाले क्षेत्र

Source: Drought Early Warning System

 

पिछली शताब्दी के वर्षा के आंकड़ों से संकेत मिलते हैं कि भारत ने हर आठ या नौ साल में भयंकर सूखे का सामना किया है।

 

आईआईटी-इंदौर और आईआईटी-गुवाहाटी द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित सितंबर- 2018 के पेपर में कहा गया है कि भारत में हर पांच में से तीन जिले यानी 60 फीसदी सूखे के लिए तैयार नहीं हैं।  अध्ययन किए गए 634 जिलों में से 241 (38 फीसदी) में ‘ड्राउट रिज़िल्यन्ट’ पाया गया।

 

इन 634 जिलों में से कम से कम 133 हर साल सूखे का सामना करते है। उनमें से अधिकांश छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान में हैं। अध्ययन में कहा गया है कि हाइड्रोक्लिमेटिक गड़बड़ी से निपटने के लिए पानी का उपयोग कुशलतापूर्वक कैसे किया जाता है।

 

अध्ययन में यह भी पाया गया कि 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल 10 में 50 फीसदी से अधिक ‘ड्राउट रिज़िल्यन्ट’ क्षेत्र था।

 

56.74 फीसदी के साथ तमिलनाडु सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। इसके बाद आंध्र प्रदेश (53.43 फीसदी) और तेलंगाना (48.61 फीसदी) का स्थान रहा है, जबकि कर्नाटक (17.38 फीसदी) और केरल (19.13 फीसदी) सूची में सबसे नीचे थे। उत्तरपूर्वी राज्यों में, 20.72 फीसदी पर असम में सबसे कम लचीले क्षेत्र का प्रतिशत था।

 

भारत में सूखा-प्रवण जिले

Soure: Indian Institute of Technology, Indore and Guwahati

 

कम बारिश

 

2018 के दक्षिण-पश्चिम  मानसून के बाद से भारत में औसत से कम बारिश हुई है। जून-सितंबर की बारिश 9 फीसदी कम रही और अक्टूबर-दिसंबर की बारिश के बाद 44 फीसदी की कमी है। जनवरी 2019 और 15 फरवरी, 2019 के बीच, सर्वेक्षण किए गए कुल 660 जिलों के 23 फीसदी में बारिश नहीं हुई, जो मार्च में सामान्य से 46 फीसदी नीचे थी, जैसा कि आईएमडी के आंकड़ों से पता चलता है। मिश्रा ने कहा कि यह अपने आप में असामान्य नहीं है, लेकिन पिछले साल की कमी के साथ, इसने स्थिति को गंभीर बना दिया है।

 

वर्षा के अभाव वाले क्षेत्रों में लोग जलाशयों का उपयोग करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। दक्षिणी राज्यों में 31 जलाशयों में, पानी की उपलब्धता कुल क्षमता का 25 फीसदी है, जो नवंबर 2018 में क्षमता के 61 फीसदी से पांच महीनों में 36 प्रतिशत अंकों से नीचे चला गया है।

 

91 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध पानी -कुल क्षमता का प्रतिशत


 
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
 

 शोधकर्ताओं का कहना है कि, जलवायु परिवर्तन सूखे के प्रभावों को बढ़ा रहा है। जलवायु परिस्थितियां, जिनके कारण 1870 के दशक में सूखा और अकाल का सामना करना पड़ा, समान रुप से सूखे को बद्तर बना सकती है। अगर ग्लोबल वार्मिंग की वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखा जाता है, जैसा कि अमेरिका के वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी (डब्ल्यूएसयू) में ‘स्कूल ऑफ एन्वायर्नमेंट’ में सहायक प्रोफेसर दीप्ति सिंह ने एक पेपर, ‘क्लाइमेट एंड द ग्लोबल फैमिल ऑफ 1876-78’ में कहा है, जिन्होंने 1875 और 1878 के बीच भारत में महा सूखे का अध्ययन किया था। सिंह ने इंडियास्पेंड से कहा, “आज, हम 1870 के दशक की तुलना में बहुत गर्म दुनिया में रहते हैं। गर्म जलवायु के कारण सूखे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।” उन्होंने कहा कि 1876-77 और 2015-16 के दौरान सूखा बहुत मजबूत और लंबे समय तक चलने वाले एल निनोस द्वारा ट्रिगर किया गया था। हालांकि, अल नीनो स्थितियों से बदलाव के बावजूद, भारत में 2016 के बाद भी सूखा जारी है, जो मेरे लिए ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव का एक संकेत है।”

 

2018 में भारत के कुछ हिस्सों में सूखे के साथ केरल और कर्नाटक में बाढ़ आ गई है। जबकि तमिलनाडु और ओडिशा को क्रमशः चक्रवात गाजा और तितली का सामना करना पड़ा है।

 

 ये चरम मौसम की घटनाएं बढ़ते वैश्विक तापमान के साथ जुड़ा है। अक्टूबर 2018 में जारी किए गए और जनवरी 2019 में संशोधित किए गए जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की रिपोर्ट कहती है, “मानव गतिविधियों के कारण पूर्व-औद्योगिक काल (1800) से, पृथ्वी 1 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हो गई है। यदि ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 ° C की वृद्धि पर नहीं रोका जाता है, तो इससे दुनिया के कुछ हिस्सों में भारी वर्षा होगी और साथ ही अन्य भागों में लगातार और तीव्र सूखा पड़ेगा।

 

बढ़ते तापमान के कारण मॉनसून पैटर्न में बदलाव भारत के कई हिस्सों में सूखे और बाढ़ को अधिक सामान्य बना देगा। 2013 में विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, उत्तर-पश्चिमी भारत के  झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में ज्यादा सूखे की संभावना है।

 ‘एन्वायर्नमेंटल साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित 2015 के एक अध्ययन में कहा गया है कि गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदी के घाटियां, जो 65 करोड़ से अधिक लोगों की सेवा करते हैं, सूखा और बाढ़ दोनों देखेंगे।

 
कृषि अर्थव्यवस्था भुगत रही है खामियाजा

 

भारत की 50 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है और 50 फीसदी से अधिक खेती योग्य क्षेत्र बारिश के पानी पर निर्भर है। चल रहे सूखे से सबसे कठिन झटका कृषि अर्थ व्यवस्था को लग सकता है, विशेष रूप से सरकारी कार्यक्रम ( जैसे कि कृषि बीमा और सिंचाई संरचना ) लड़खड़ा रहे हैं। ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज’ (टीआईएसएस)  को ‘स्कूल ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज’ में ‘नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट’ के चेयर प्रोफेसर आर. रामकुमार ने इंडियास्पेंड को बताया कि किसानों पर प्रभाव के अलावा, भूमिहीन खेतिहर मजदूर रोजगार खो देंगे। उन्होंने कहा, “वैसे भी कृषि मजदूरों को साल में मुश्किल से 150-160 दिन का काम मिलता है और यह सूखा इसे और भी बदतर बनाने वाला है।” हालांकि, किसानों से बैंकों द्वारा लिए गए ऋण का एक छोटे प्रीमियम के भुगतान पर बीमा किया जाता है, जो फसल खराब होने की स्थिति में मुआवजे का हकदार है। अनौपचारिक साहूकारों से कर्ज लेने वाले किसान बुरी फसल की मार झेलते हैं, जैसा कि ‘इन्स्टिटूट फॉर सोशल एंड इकोनोमिक चेंज’ ( आईएसईसी ) में सहायक प्रोफेसर और कृषि जल प्रबंधन के विशेषज्ञ, ए. वी. मंजूनाथ कहते हैं।

 

हालांकि, अप्रत्याशित मौसम के खिलाफ फसलों का बीमा करने के लिए केंद्र सरकार की योजना, प्रधानमंत्री बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) को अल्प भुगतान करने और केवल बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए आलोचना की गई है, जैसा कि Factchecker.in ने 26 फरवरी, 2019 को बताया था।

 

 रोजगार को बढ़ावा देने वाली संस्था, बेसिक द्वारा आठ भारतीय राज्यों में किए गए एक सर्वेक्षण के आधार पर 20 अगस्त, 2018 को प्रकाशित पीटीआई की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि खराब क्रियान्वयन के अलावा, सर्वेक्षण करने वाले केवल 29 फीसदी किसानों को पीएमएफबीवाई के बारे में पता था। इनमें से केवल 12.9 फीसदी को ही फसल बीमा मिल सका। किसानों ने फसल बीमा का लाभ उठाने के लिए कई तरह की चुनौतियों का हवाला दिया।

 

फसल बीमा का लाभ


 

फसल उत्पादन में शामिल बहुत कम परिवार अपनी फसलों का बीमा कर रहे थे, जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण-2018 में बताया गया है। गेहूं और धान के मामले में ( सबसे लोकप्रिय फसलों में से दो ) 5 फीसदी से कम कृषि परिवारों ने अपनी फसलों का बीमा कराया था।

 

बीमा कंपनियों द्वारा प्राप्त प्रीमियम और किसानों को दिए गए मुआवजे के बीच का अंतर दो वर्षों में लगभग 16,000 करोड़ रुपये था, जैसा कि ‘द वायर’ ने नवंबर 2018 में बताया है। 2016-17 में, लगभग 5.7 करोड़ किसान योजना में शामिल हुए थे, लेकिन अगले वर्ष, 84 लाख (14 फीसदी) ने इसे छोड़ दिया था।

 

रामकुमार ने कहा कि सूखे का असर उन क्षेत्रों में कम हो सकता है, जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन भारत में कुल कृषि क्षेत्र का शुद्ध सिंचित क्षेत्र केवल 34.5 फीसदी है, जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में भी बताया गया है।

 

2014 में, जब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सत्ता में आई, सरकार ने वादा किया कि वह प्रधानमंत्री कृषि सिचाई योजना (पीएमकेएसवाई) के तहत 2019 तक 99 सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करेगी। हालांकि, इनमें से 74 अभी भी फील्ड नहरों के बिना हैं, जैसा कि दिसंबर 2018 में ‘द टेलीग्राफ’ की रिपोर्ट से पता चलता है।

 

 नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की 2018 में जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (एआईवीपी) के तहत लाई गई 16 राष्ट्रीय जल परियोजनाओं में से केवल पांच पर काम चल रहा था। शेष 11 पर काम शुरू होना बाकी है। इस देरी के कारण इन 11 परियोजनाओं के लिए 224.54 करोड़ रुपये की लागत में वृद्धि हुई है, जबकि पांच चालू परियोजनाओं से प्राप्त सिंचाई क्षमता केवल 37 फीसदी है, बिना किसी पेयजल या बिजली उत्पादन व्यवस्था के।

 

इंडियास्पेंड ने 25 फरवरी, 2019 को बताया कि कैग ऑडिट ने 2017 के अंत तक एक दशक के लिए 118 प्रमुख से मध्यम सिंचाई परियोजनाओं का नमूना लिया और पाया कि उनमें से 84 के लिए लागत 120,772 करोड़ रुपये थी, जो 72 राफेल लड़ाकू जेट खरीदने के लिए पर्याप्त है।

 

201 बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में से 70 फीसदी पूरी नहीं हुईं और 55.5 फीसदी सिंचाई लक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ, जनवरी 2019 में जारी एक अन्य कैग रिपोर्ट में कहा गया है। छोटी योजनाओं से प्राप्त सिंचाई क्षमता भी कम थी – लक्ष्य का 22 फीसदी।

 

 ‘साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, ‘रिवर एंड पिपल’ (एसएएनडीआरपी) के कोर्डिनेटर हिमांशु ठक्कर ने कहा, “बड़ी जल परियोजनाओं से कोई लाभ नहीं होता है। सिंचाई परियोजनाएं, नदी जोड़ो परियोजनाएं, बड़ी पनबिजली और अन्य ऐसी बड़ी परियोजनाएं और कार्यक्रमों के ढेर सारे उदाहरण हैं, जो मददगार नहीं हैं। ये वास्तव में भूजल की कमी को बिगाड़ते हैं।”

 

दूसरी ओर, सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाने से उत्तर कर्नाटक में सूखे के प्रबंधन में मदद मिली है, जिससे कोलार और चिक्काबल्लापुर जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्रों में कृषि को सक्षम किया गया है,जैसा कि आईएसईसी के मंजूनाथ बताते हैं। उनका कहना है कि इन परियोजनाओं को बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि सतह का पानी तेजी से गायब हो रहा है।

 

 सूक्ष्म सिंचाई क्षमता के साथ, भारत के अनुमानित 69.5 mha में से केवल 7.73 मिलियन हेक्टेयर (mha) के पास वास्तव में यह है, ड्रिप इरीगेशन 3.37 mha और स्प्रिंकलर सिंचाई 4.36 mha से अधिक, जैसा कि 25 जून, 2018 में इंडियास्पेंड ने बताया है।

 
सूखा प्रेरित प्रवास
 

 मार्च 2018 में जारी, ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज’ (सीएसडीएस) द्वारा किए गए अध्ययन में किसानों से उनकी सबसे बड़ी समस्याओं के बारे में पूछा गया तो 13 फीसदी ने बाढ़ / सूखा, 11 फीसदी ने कम उत्पादकता और 9 फीसदी ने सिंचाई बताया। यह अध्ययन 18 राज्यों के 137 जिलों के 274 गांवों से मिली प्रतिक्रियाओं पर आधारित था।

 

हालांकि, अध्ययन में शामिल 79 फीसदी लोग अपनी आय के मुख्य स्रोत के रूप में कृषि पर निर्भर थे। 62 फीसदी ने कहा कि वे शहर में अच्छी नौकरी के लिए खेती छोड़ देंगे।

 

बैंगलोर और चेन्नई के बीच दक्षिणी इलाके आंतरिक प्रवास के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र बनने जा रहे हैं, जैसा कि वर्ल्ड बैंक की 2018 रिपोर्ट, ‘ग्राउंडस्वेल:प्रिपियरिंग फॉर इंटरनल क्लाइमेट माइग्रेशन’ में कहा गया है।

 

बेंगलुरु की झीलों के आसपास प्रवासियों के जीवन का अध्ययन करने वाले  अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय (एपीयू) में इकॉलोजिस्ट और सस्टेंबिलिटी के प्रोफेसर हरिनी नागेंद्र कहते हैं, “बेंगलुरु में ज्यादातर प्रवासी बेलगाम, धारवाड़, रायचूर और गुलबर्गा जैसे उत्तरी कर्नाटक के जिलों से आते हैं, जो सूखे का सामना कर रहे हैं।”

 

उन्होंने बताया कि, “उन स्थानों पर जहां ये प्रवासी हैं, खेती घटते जल संसाधनों के साथ खत्म हो रही है।”

 

विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक उप-सहारा अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका में 14.3 करोड़ से अधिक जलवायु प्रवासी होंगे, अकेले दक्षिण एशिया से लगभग 4 करोड़ या 28 फीसदी होंगे।

 

पानी की गुणवत्ता और उपलब्धता पर शोध करने वाले विश्व बैंक के एक अर्थशास्त्री सेबेस्टियन गेल डेसबोरो ने कहा है, “जब देश जलविद्युत पर बहुत भरोसा करते हैं तो सूखे का कारण बिजली भी हो सकता है। भारत को अपनी बिजली का 17 फीसदी जल विद्युत से प्राप्त होता है। जब हम महामारी पर विज्ञानियों की बात सुनते हैं, तो वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि पानी की कमी से बीमारी फैलती है, क्योंकि साफ रहने के लिए लोगों के पास पानी की कमी है।” वैसे भारतीय शहर खुद पानी की कमी का सामना कर रहे हैं – बेंगलुरु, नई दिल्ली, चेन्नई और हैदराबाद सहित लगभग 21 शहरों 2020 तक भूजल की कमी होगी, जिससे 10 करोड़ लोग प्रभावित होंगे, जैसा कि जून 2018 में नीति आयोग द्वारा प्रकाशित कम्पाजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स (सीडब्ल्यूएमआई) में कहा गया है। सीडब्ल्यूएमआई के अनुसार, कुल मिलाकर, 60 करोड़ भारतीय ( या आधी आबादी ) अत्यधिक जल तनाव का सामना करते हैं। 75 फीसदी घरों में पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है और 2030 तक, 40 फीसदी आबादी को पीने के पानी की कोई सुविधा नहीं होगी।

 
भूजल गायब

 

भारत में भूजल द्वारा लगभग 65 फीसदी सिंचाई की आपूर्ति और 85 फीसदी पेयजल आपूर्ति का समर्थन किया जाता है, जैसा कि साउथ एशिया ग्राउंडवाटर फोरम (एसएजीएफ) ​​की कार्यवाही पर एक मसौदा रिपोर्ट में कहा गया है। विश्व बैंक द्वारा अंतर्राष्ट्रीय जल संघ और भारत सरकार की साझेदारी में बुलाया गया फोरम राजस्थान के जयपुर में 1-3 जून, 2016 को आयोजित किया गया था।

 

एपीयू के नागेंद्र कहते हैं कि सूखा भूजल के निष्कर्षण को बढ़ा सकता है। नागेंद्र बेंगलुरु के उदाहरण से बताते हैं कि बोरवेल में 800 फीट की गहराई पर भी पानी नहीं मिलता है, और आमतौर पर गहरे बोरवेल में आर्सेनिक और फ्लोराइड संदूषण की संभावना अधिक होती है। बड़े  और खुले कुएं पूरी तरह से सूख गए हैं। उन्होंने कहा कि खुले कुओं को बारिश के पानी से रिचार्ज किया जा सकता है, लेकिन बोरवेल नहीं कर सकते।

 

देश के कई हिस्सों में पानी की कमी भारत में अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को बढ़ावा दे सकती है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 6 जून, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। इन संघर्षों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी विवाद है।
  • कृष्णा नदी का विवाद आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना के बीच है।
  • गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच नर्मदा नदी का विवाद है।
  • रावी और ब्यास नदी का विवाद हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के बीच है।
  • तिब्बत में निकलने वाली 10 प्रमुख नदियों के जल वितरण के लिए भारत और चीन के बीच विवाद है।

प्रभावी जांच, प्रबंधन और निगरानी

 

राज्य सरकारों द्वारा सूखे की आधिकारिक घोषणा में देरी के कारण मौजूदा सूखे की स्थिति काफी हद तक नजरअंदाज की गई है। भारत में तेजी से भूजल की कमी, औसत बारिश में गिरावट और शुष्क मानसून के दिनों में वृद्धि को देखते हुए, यह न केवल अभी के सूखे के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए भी, जैसा कि 2018 के आर्थिक सर्वेक्षण ने स्वीकार किया है। कर्नाटक जैसे राज्यों ने दिसंबर 2016 में आए नवीनतम सूखा प्रबंधन मैनुअल का विरोध किया है और कहा है कि इससे सूखे की गंभीरता को स्थापित करना मुश्किल है और यह केंद्र के ‘राष्ट्रीय आपदा राहत कोष’ (एनडीआरएफ) से मिलने वाली सहायता को काफी कम कर देगा।

 

मैनुअल कई मापदंडों का आकलन करने के लिए बाध्य करता है, जिसके आधार पर एक क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित किया जा सकता है और उसे ‘गंभीर’, ‘मध्यम’ या ‘सामान्य’ श्रेणी दी जा सकती है। आईआईटी-गांधीनगर और डीईडब्लूएस के मिश्रा ने कहा कि डेटा इकट्ठा करना और इसका विश्लेषण करना वास्तव में मुश्किल है।

 

मापदंडों में वर्षा, मिट्टी की नमी, कृषि, जल विज्ञान, और फसलों की स्थिति शामिल है, जो आगे मापदंडों में उप-विभाजित हैं। राज्य सरकारों को लगता है कि इस तरह की विस्तृत और श्रमसाध्य प्रक्रिया को जल्दी से पूरा करना मुश्किल है।

 

मिश्रा कहते हैं, “नतीजन,अधिकांश राज्य कार्रवाई करते हैं और सूखे की घोषणा तब करते हैं, जब फसल खराब होने की घटनाएं होती हैं और भूजल तालिका कम हो गई है। यह तब है जब आप सूखे के प्रभावों को देखना शुरू करते हैं और यह बहुत अधिक देर से होता है। ”

 

इसके अलावा, कभी-कभी पूरे राज्य में सूखा नहीं होता है, लेकिन छोटे क्षेत्रों में, जो अक्सर राज्य के 10 फीसदी या 20 फीसदी क्षेत्र असाधारण रूप से गंभीर सूखे का सामना करते हैं।

 

ऐसे मामलों में, केंद्र एक सीमित क्षेत्र में सूखे की गंभीरता को नजरअंदाज करता है और राज्य को राष्ट्रीय आपदा कोष से कोई सहायता नहीं मिलती है। मिश्रा मानते हैं कि सूखे के प्रबंधन और हैंडलिंग में ‘एक प्रतिमान बदलाव’ की जरूरत है।

 

प्रारंभिक चेतावनी के लिए एक प्रणाली के अलावा, कम से कम सूखाग्रस्त राज्यों में, एक मजबूत कार्यप्रणाली के साथ मजबूत संकेतकों को चित्रित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “जब प्रत्येक जिले में निरंतर निगरानी होती हैछह रिपोर्ट की श्रृंखला में यह पहली रिपोर्ट है।और कुछ जिले अनियमितताओं को दिखाना शुरू करते हैं, तो आपको आसानी से जानकारी मिल जाती है।”

 

( गोगोई 101Reporters से जुड़े संवाददाता हैं और त्रिपाठी इंडियास्पेंड के साथ प्रमुख संवाददाता के रुप में जुड़े हैं।)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 3 अप्रैल, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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