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भारत की नई सरकार के लिए परिवर्तनकारी एजेंडा

इंडियास्पेंड टीम,
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New Delhi: Prime Minister Narendra Modi during the first cabinet meeting at the Prime Minister's Office, in South Block, New Delhi on May 31, 2019. (Photo: IANS/PIB)
 

31 मई, 2019 को नई दिल्ली में प्रधान मंत्री कार्यालय में पहली कैबिनेट बैठक के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी

 

  • किसानों के लिए 18,000 रुपये की मासिक आय या उनके वर्तमान औसत का 2.8 गुना, आधिकारिक बाजारों, भंडारण और प्रशीतन में वृद्धि।
  • 27-वर्षीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति को नया करना, वर्तमान में 79.2 फीसदी की बजाय यह सुनिश्चत करना कि 97 फीसदी स्कूल में दाखिला लिए छात्र हाई स्कूल तक रहे।
  • श्रम कानूनों को सुधारना, ताकि 4 करोड़ छोटे उद्यमों का, जो दस से कम श्रमिकों को काम पर रखते हैं, विस्तार हो सके।
  • एक स्वतंत्र पर्यावरण संरक्षण एजेंसी, जो भारत के शहरों में ( विश्व स्तर टॉप 20 प्रदूषित हवा वाले स्थानों में से 14 शहर भारत के हैं।) जहरीले पानी और जहरीली हवा को साफ कर सके

 

भारत के 42 फीसदी भू-भाग को सूखा प्रभावित घोषित करने के साथ, कृषि संकट गहरा हो रहा है, और इसलिए हमारी सिफारिशें खेती पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे समय में जब देश 45 वर्षों में सबसे खराब बेरोजगारी का सामना कर रहा है, ढेर सारे लोग जमीन से दूर हो रहे हैं।

 

सृजित की जाने वाली नौकरियों के लिए, विशेषज्ञ श्रम सुधारों पर ध्यान देने की सलाह देते हैं, ताकि छोटे, असंगठित उद्यम नौकरशाही के हस्तक्षेप या आवश्यकताओं के बिना विस्तार पा सकें। ऐसे असंगठित उद्यम वर्तमान में भारत के 92 फीसदी कार्यबल को रोजगार देते हैं।

 

इस कार्यबल के लिए और अधिक योग्य होने के लिए, हम शिक्षा प्रणाली में बदलाव की सलाह देते हैं, जिसकी विफलता हाई स्कूल तक लगभग तीन-चौथाई छात्रों को बनाए रखने में विफल रहने से शुरू होती है और शिक्षा की गुणवत्ता में जारी रहती है जो लाखों लोगों को रोजगार के लिए बेतैयार छोड़ देती है।

 

हमारा अन्य ध्यान जीवन की गुणवत्ता पर है, जो श्रम उत्पादकता से संबंधित है: भारत के शहरों में दुनिया की कुछ सबसे जहरीली हवा है, और देश का लगभग 70 फीसदी पानी प्रदूषित है और 60 करोड़ ( 2018 सरकार के टैंक रिपोर्ट के अनुसार ) “उच्च-से-चरम” तक पानी के संकट का सामना करते हैं।

 

हमारे आठ-क्षेत्र विश्लेषण:

 

कृषि: आधारभूत संरचना, आय

 


 

  • देश में अधिक भंडारण और प्रशीतन सुविधाओं में निवेश करना, जहां एक तिहाई खेत उत्पाद उनकी कमी के कारण खराब हो जाते हैं।
  • मंडियों की संख्या ( कृषि उपज बेचने के लिए अधिकृत बाजार ) देश भर में 7,600 से 42,000 तक बढ़ाना, ताकि 5 किमी के दायरे में एक मंडी हो।
  • सरकार को अपने स्वयं के कार्यक्रमों, जैसे फसल बीमा, के बारे में किसानों को जागरूक करने की आवश्यकता है, जिसका उपयोग केवल उन फसलों के बारे में बताया जाएगा, जिन्हें बीमा की आवश्यकता है।

 

कृषि को अधिक लाभकारी बनाने के लिए प्रमुख सुझावों में से एक यह है कि किसानों को दिए जा रहे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की फिर से गणना की जाए, वह मूल्य जिस पर सरकार कृषि उपज खरीदती है। लेकिन, जैसा कि खाद्य-नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा कहते हैं, “अगर ऐसा किया जाता है, तो भी 6 फीसदी से अधिक किसानों को फायदा नहीं होगा।“

 

वह सही हैं; यह 2015 की रिपोर्ट उस डेटम का समर्थन करती है।

 

शर्मा ने किसानों को 18,000 रुपये प्रति परिवार के हिसाब से ‘सुनिश्चित आय पैकेज’ देने की सिफारिश की है। वह कहते हैं, “आय पैकेज, मासिक औसत आय पर एक टॉप-अप के रूप में एक कृषि परिवार को जिले द्वारा प्राप्त करना चाहिए।”

 

2017 के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय किसान की औसत आय प्रति वर्ष 77,976 रुपये या 6,498 रुपये प्रति माह है, जिसे सरकार 2022 तक दोगुना करना चाहती है।

 

2019 के अपने चुनावी घोषणा पत्र में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 258 करोड़ रुपये के कृषि निवेश का वादा किया है, जो 2018-19 के बजट से 75 फीसदी अधिक है। 2012 और 2015 के बीच, भारत ने कृषि पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.4 फीसदी से अधिक का निवेश नहीं किया, जो 60 फीसदी या 77 करोड़ लोगों का समर्थन करता है।

 

इस निवेश को निर्देशित करने के कई तरीके हैं: वर्तमान 35 फीसदी खेतों से सिंचाई की पहुंच बढ़ाना – भाजपा का घोषणा पत्र दिसंबर 2019 तक सभी खेतों तक सिंचाई का वादा करता है जो एक असंभव कार्य लगता है; या एक देश में भंडारण और प्रशीतन सुविधाओं में सुधार जहां 2013 की रिपोर्ट के अनुसार उपज का 30 फीसदी खराब हो गया है।

 

2016 में भारत के प्रमुख कृषि उत्पादों की फसल की कटाई और कटाई के बाद 92,651 करोड़ रुपये नुकसान का अनुमान लगाया गया था, जैसा कि पांच घटक में से तीन ( पैक हाउस, पकने वाले चैंबर और रेफर वाहन ) कोल्ड चेन में लगभग धन के बिना बने रहे, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 11 अगस्त 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

 

मंडियों, या कृषि उपज मंडियों के विस्तार पर भी नया निवेश किया जा सकता है, जो उचित मूल्य और किसानों को तत्काल रिटर्न की पेशकश करने वाले हैं, शर्मा ने कहा, देश भर में 7,600 से 42,000 तक वृद्धि की जानी चाहिए ताकि वर्तमान में 464-किमी औसत अंतर की बजाय 5 किमी के दायरे में एक मंडी हो है।

 

भारतीय सांख्यिकी संस्थान के आर्थिक विश्लेषण इकाई में प्रोफेसर मधुरा स्वामीनाथन कहते हैं, “सरकार को प्याज और टमाटर जैसी सब्जियों के लिए ‘सुनिश्चित और स्थिर मूल्य’ प्रदान करने की आवश्यकता है। “स्वामीनाथन ने कहा, “हमें नई तकनीकों और योजनाओं के बारे में किसानों को जागरूक करने की जरूरत है। फसल बीमा जैसी योजना से लोगों को तभी फायदा होगा जब उन्हें सूचित किया जाएगा कि किन फसलों को बीमा की जरूरत है। और सरकार को सही समय पर हस्तक्षेप करने की जरूरत है।”

 

अहमदाबाद के इंडियन इंस्ट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में सेंटर फॉर मैनेजमेंट इन एग्रीकल्चर के प्रोफेसर और चेयरपर्सन, सुखपाल सिंह ने कहा, “अब जबकि अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकार चुनी गई है, तो उसे प्रमुख विपणन सुधार (किसानों को पारिश्रमिक मूल्य, इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग सुविधाएं, कृषि प्रसंस्करण सुविधाएं और फसल बीमा को बढ़ावा देना) करना चाहिए।”

 

अर्थव्यवस्था: नौकरियां, शहर, सुधार

 


 

  • 100 नए शहर जो कृषि से बाहर जाने वाले लाखों लोगों को रोजगार देंगे।
  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के माध्यम से आधारभूत संरचना और सेवा क्षेत्र में नौकरियां पैदा करना।
  • भूमि और श्रम कानूनों में सुधार, उनमें निहित संघर्षों को दूर करना, ताकि उद्योग अधिक श्रमिकों को काम पर रख सकें।

 

1 जून, 2019 को जारी राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के आंकड़ों के अनुसार, भारत की बेरोजगारी दर 45 साल में सबसे उच्च स्तर पर है।

 

एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार, बेरोजगारी शिक्षित लोगों में सबसे अधिक है। महिलाओं में 17 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्रों में 20 फीसदी पुरुषों के पास नौकरी नहीं है।

 

तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के इकोनॉमिक रिसर्च फेलो अनुपम मनूर कहते हैं, “हमारे सामने सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी है। हमें सालाना कम से कम 1.4-1.5 करोड़ नौकरियों की आवश्यकता है, लेकिन हम केवल 15 लाख नौकरियां ही बना पा रहे हैं। यह बहुत बड़ा अंतर है।”

 

ग्रामीण पुरुष युवाओं (15-29 वर्ष की आयु) की बेरोजगारी दर 2011-12 में 5 फीसदी से बढ़कर 2017-18 में 17.4 फीसदी हो गई। एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार, इसी आयु वर्ग की ग्रामीण महिलाओं के लिए यह दर 2011-12 में 4.8 फीसदी से बढ़कर 2017-18 में 13.6 फीसदी हो गई है।

 

रोजगार पाने वाले अधिकांश लोग ग्रामीण भारत से आएंगे, जिनके भारत के श्रमबल में कृषक और खेतिहर मजदूरों की हिस्सेदारी आधे से अधिक है और जीडीपी के 16 फीसदी से अधिक का योगदान नहीं करते हैं। इन लाखों को नए शहरों में समायोजित करने की आवश्यकता होगी, और पुराने शहरों को बुनियादी ढांचे के विस्तार की आवश्यकता होगी।

 

मनूर कहते हैं, “हमारे यहां जरूरत से ज्यादा लोग कृषि कर रहे हैं, और यह प्रच्छन्न बेरोजगारी का एक रूप है। समाधान शहरीकरण और औद्योगीकरण है।”

 

भाजपा के घोषणापत्र में वादा किया गया है, उदाहरण के लिए, 50 शहरों में मेट्रो और प्रमुख टियर 1 (100,000 से अधिक लोगों) और टियर 2 (50,000 से 99,999 लोग) शहरों में पाइपिंग कुकिंग गैस, जिनमें से 34 हैं, मनूर ने सुझाव दिया कि सरकार को 100 नए शहर बनाने की इसकी आवश्यकता होगी।

 

‘द इकनॉमिक टाइम्स’ ने 13 दिसंबर, 2018 को बताया कि जमीन अधिग्रहण में मुश्किल होने के बावजूद यह आसान नहीं होगा: इंफ्रास्ट्रक्चर प्रॉजेक्ट्स पर फोकस के बावजूद 453 प्रॉजेक्ट्स जमीन अधिग्रहण की समस्याओं के कारण अटके हुए थे।

 

धीमी गति से निवेश, विकास में गिरावट और खराब ऋणों के बढ़ने के समय ये चुनौतियां सामने आती हैं। फरवरी 2019 में इंडियास्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2017 और मार्च 2018 में भारतीय बैंकिंग में सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) 8 लाख करोड़ रुपये और 10.3 लाख करोड़ रुपये थीं, ,जैसा कि बड़े कर्जदारों के एनपीए में हिस्सेदारी बढ़ गई।

 

मनूर कहते हैं, “हम उपभोग और सरकार के खर्चों के कारण वृद्धि देख रहे हैं न कि निवेश के कारण। यह टिकाऊ नहीं है।”

 

बेंगलुरु के थिंक टैंक, इंस्टीट्यूट फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज के पूर्व निदेशक, आर एस देशपांडे कहते हैं, “सरकार को मनरेगा कार्यक्रम के माध्यम से आधारभूत संरचना और सेवा क्षेत्र में नौकरियां पैदा करने की जरूरत है। भूमि और श्रम कानूनों के बीच का टकराव कम हो, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

 

Bharatiya Janata Party Manifesto: A Deconstruction
Issue Promises And Reality
Agriculture “Doubling farmer income by 2022. [Currently Rs 6,498 per month]”
Pradhan Mantri Kisan Samman Nidhi (Prime Minister’s farmer recognition scheme) aims for 120 million “small and marginal” farmers–with less than 2 hectares of land–to get Rs 6,000 per year as minimum income support.
“Rs 25 lakh crore investment in rural development (including agriculture and irrigation) till 2022. [The 2018-19 budget provided Rs 14.34 lakh crore]”
Achieve 100% irrigation [Currently, 34.5% of farmland is irrigated]
“Digitisation of land records.[86% of land records nationally computerised]”
“Nal se jal, or water from the tap; piped water to every household by 2024.[Currently, 15% of rural homes have piped water]”
Education “200 centrally run Kendriya Vidyalayas (KVs) and Navodaya Vidyalayas (NVs).[The government opened 93 KVs and 32 Jawahar Navodaya Vidyalayas JNVs between 2014-15 and 2017-18]”
“50% increase in engineering, law, science and management seats.[There are 5,523 engineering colleges]”
Child care “Increase the capacity of the national creche programme three times by 2022, with a special focus on the needs of parents employed in the unorganised sector. [There were 290,925 creches in 2017]”
“Reduce malnutrition by at least 10% over the next five years, doubling the rate of reduction of malnourishment. [38.4% of Indian children are stunted, 51.2% of women are anemic]”
“Increase the honorarium of ASHA and anganwadi workers–women and childcare assistants. [Currently the honorarium is Rs 4,000 per month]”
“33% reservation for women in parliament and state assemblies through a constitutional amendment. [14% of MPs are women in the newly elected Lok Sabha]”
Health Telemedicine and diagnostic laboratories in health and wellness centres by 2022 to ensure quality primary medical care to the poor. [There were 8,030 health and wellness centres in February 2019]
One medical college for every three parliamentary constituencies. One medical college or post graduate medical college in every district by 2024. To start with, 75 such medical institutes will be set up by 2022.
“Double the number of MBBS and specialist doctors by 2024. [There were 1 million registered allopathic doctors in 2017, each doctor served 11,039 people, against the World Health Organization norm of 1 per 1,000]”
“Full immunisation for all children and pregnant women by 2022.[62% of children under two received all the vaccines, and 89% of mothers were immunised against neonatal tetanus in 2015-16]”
“Eliminate tuberculosis” [India has 2.74 million tuberculosis cases, highest in the world, accounting for 27% of global burden]”
Governance Simultaneous elections in Centre and states
Rashtriya Gram Swaraj Yojana (national rural self-governance scheme) to enhance skills of members of local government institutions.
Fast-track courts at all levels of judiciary. [Currently, there are 708 fast-track courts]
Environment “Treat 100% of waste water from towns along Ganga and increase the flow of water. [Currently, 48% of wastewater is treated; 149 dams, 107 barrages and weirs impede the river]”
Achieve 175 GW of renewable energy by 2022. [Currently, about 78 GW]
“Convert the National Clean Air Plan into a mission and focus on 102 most polluted cities; reduce air-pollution levels in each of the mission cities by at least 35% over the next five years.”
Infrastructure Capital investment of Rs 100 lakh crore in infrastructure by 2024
“60,000 km of new national highways over the next five years, doubling length by 2022. [India had 132,499 km of national highways in March 2019, adding 6,864 km each year on average between 2014 and 2018]”
Double the number of functional airports from 101 by 2024
Double port capacity by 2024

Sources: Bharatiya Janata Party, 2019; IndiaSpend research

 

स्वच्छता: घोषणाओं और दावों से परे

 


 

  • जिन घरों में शौचालय बनाने के लिए सरकारी अनुदान नहीं मिला, उन्हें अब मिलना चाहिए।
  • गांवों, कस्बों और राज्यों को खुले में शौच से मुक्त करने से परे प्रमाणित करने के लिए, सरकार को अब लोगों को शौचालय का उपयोग करने पर ध्यान देना चाहिए।
  • नागरिकों को शौचालय के गड्ढों के बारे में शिक्षित करने पर ध्यान देने की जरूरत है कि वे पांच साल में भरते हैं, दो महीने में नहीं, और यह कि कोई भी उन्हें खाली कर सकता है, न कि केवल अनुसूचित जातियों द्वारा किए जाते हैं।

 

स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) – ग्रामीण वेबसाइट के अनुसार, 99 फीसदी से अधिक भारतीय घरों में अब शौचालय हैं और 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को “खुले में शौच मुक्त” (ओडीएफ) घोषित किया गया है। भारत को स्वच्छ बनाने के मिशन ने 2019 तक पांच वर्षों में 9.1 करोड़ शौचालयों को जोड़ा, जिससे शौचालय की पहुंच 39 फीसदी से बढ़कर 99 फीसदी हो गई है, जैसा कि सरकार ने दावा किया है।

 

थिंक टैंक, रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कंपैसिनट इकोनॉमिक्स, के रिसर्च फेलो, आशीष गुप्ता ने 2019 के अध्ययन में पाया, “अब सरकार के पास शौचालय के उपयोग को बढ़ावा देने का समय है।” हालांकि, शौचालयों के निर्माण में वृद्धि हुई है फिर भी उत्तर भारत में 44 फीसदी लोग अभी भी खुले में शौच करते हैं।

 

यह लगभग तय है कि अक्टूबर 2019 तक ( राष्ट्रीय एसबीएम समय सीमा ) भारत को ओडीएफ घोषित किया जाएगा। लेकिन ओडीएफ घोषित क्षेत्रों में कई घरों में स्पष्ट रूप से शौचालय नहीं हैं, या काम नहीं कर रहे हैं, जैसा कि FactChecker ने 2018 में बताया है (यहां और यहां देखें)। सितंबर 2018 में रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरात में ओडीएफ घोषित किए गए 120 गांवों के एक तिहाई घरों में शौचालयों तक पहुंच नहीं है, जैसा कि सरकारी लेखा परीक्षक, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने सितंबर 2018 में रिपोर्ट किया है।

 

सरकार को यह स्वीकार करने की आवश्यकता है कि स्वच्छता ‘एक सतत प्रक्रिया’ है और ऐसे कार्यक्रमों के साथ जारी होते है जो नागरिकों को शौचालयों के निर्माण और उपयोग पर शिक्षित करते हैं। गुप्ता ने कहा, “हम जानते हैं कि राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्य खुले में शौच मुक्त घोषित किए गए हैं, जिनमें एसबीएम गतिविधियां नहीं हैं।”

 

उदाहरण के लिए, शौचालय के गड्ढों को कैसे खाली किया जाएगा, इसके बारे में चिंताएं हैं। गुप्ता ने कहा कि उत्तर प्रदेश में, सरकार यह बताने में “सफल” रही है कि पांच साल में गड्ढे भरते हैं, न कि महीने में नहीं, जैसा कि लोगों ने सोचा था।

 

गुप्ता ने कहा, “यह समय है कि वे (सरकार) बताएं कि गड्ढों को किसी के द्वारा भी खाली किया जा सकता है। यह बहुत अच्छा होगा अगर (प्रधानमंत्री) मोदी कलंक को कम कर सकें, और सुरक्षित अपघटन का संदेश फैला सकते हैं।”

 

स्वास्थ्य: अधिक धन, धन का बेहतर उपयोग

 


 

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा खर्च को जीडीपी के 1.4 फीसदी से 2.5 फीसदी तक बढ़ाने के लिए फंड।
  • राज्यों द्वारा केंद्रीय हेल्थकेयर फंड के उपयोग में सुधार: पांच साल से 2016 तक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के फंड का केवल 32 फीसदी खर्च किया गया था।

 

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के पब्लिक हेल्थ फेलो ओमन सी कुरियन कहते हैं, नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती हेल्थकेयर के लिए फंडिंग की होगी।

 

“यह व्यापक रूप से ज्ञात है कि हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा निधि को जीडीपी के कम से कम 2.5 फीसदी तक बढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन पिछले एक दशक में सरकारें केवल जीडीपी के 1.3 फीसदी से 1.4 फीसदी तक ही पहुंच पाई हैं,” उन्होंने कहा।

 

यह फंडिंग महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में दुनिया के सबसे अधिक स्टंट बच्चे हैं ( उम्र की तुलना में कम कद ) और देश की असफल प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा और अतिरक्त तृतीयक देखभाल बचपन के कुपोषण के संकट से निपटने में असमर्थ है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जनवरी 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

मेडिकल जर्नल के लैंसेट में प्रकाशित नवंबर 2017 के संपादकीय में कहा गया है, “जब तक भारत में केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य को गंभीरता से नहीं लेती है, जैसा कि कई अन्य राष्ट्र करते हैं, भारत अपनी राष्ट्रीय या वैश्विक क्षमता को पूरा नहीं कर सकेगा।”

 

विश्व बैंक के अध्यक्ष जिम योंग किम ने जून 2016 में नई दिल्ली दौरा के दौरान कहा था “आधार रेखा यह है कि यदि आप श्रमबल में 40 फीसदी स्टंट बच्चों की संख्या के साथ भविष्य की अर्थव्यवस्था में प्रवेश करते हैं तो, आप प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम नहीं होंगे।”

 

सरकार के लिए एक और चुनौती राज्यों को केंद्रीय वित्त पोषण के उपयोग में सुधार करना है, जिसका एक अनुपात अप्रयुक्त रहता है।

 

सरकार के ऑडिटर, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा 2017 के ऑडिट के अनुसार, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) की धनराशि पांच साल से 2016 के बीच, वित्त वर्ष 2016 में 29 फीसदी तक बढ़ गई थी, जिसमें देरी और इन फंडों के हस्तांतरण में देरी भी शामिल थी। 2005 में शुरू किया गया एनएचएम, भारत का सबसे बड़ा स्वास्थ्य कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा को सार्वभौमिक पहुंच प्रदान करना है। इसके प्राथमिक मिशनों में से एक मातृ और बाल स्वास्थ्य में सुधार और संचारी और गैर-संचारी रोगों को नियंत्रित करना है।

 

मातृ मृत्यु के वैश्विक बोझ का 17 फीसदी भारत में है, 2016 में 61 फीसदी मौतों के लिए गैर-संचारी रोग जिम्मेदार था, कुष्ठ और मलेरिया जैसी संचारी रोगों को नियंत्रित किया जाना बाकी है और 2011-12 में 5.5 करोड़ भारतीय स्वास्थ्य का खर्च वहन नहीं कर पाने के कारण गरीबी में चले गए हैं।

 

“स्वास्थ्य एक राज्य का विषय है, इसलिए जब स्वास्थ्य सेवा की बात आती है तो सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को शामिल करने वाले केंद्र और राज्यों के बीच व्यापक सहमति होनी चाहिए,” कुरियन ने कहते हैं।

 

उदाहरण के लिए, आयुष्मान भारत पहल की बीमा योजना, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना परसहमत होने के बावजूद, सितंबर 2018 में लॉन्च होने के बाद से पिछले कुछ महीनों में कई राज्यों ने राजनीतिक कारणों से बाहर रहना पसंद किया है, “इससे अनावश्यक देरी होती है और विशेष रूप से गरीब घरों में पहुंच को प्रभावित करता है, ”कुरियन ने कहा।

 

कुछ 24 लाख भारतीय हर साल उपचार योग्य परिस्थितियों में मर जाते हैं, अध्ययन किए गए 136 देशों के बीच भारत की सबसे खराब स्थिति है, जैसा कि 2018 में द लांसेट में प्रकाशित एक रिपोर्ट से पता चलता है।

 

खराब देखभाल गुणवत्ता स्वास्थ्य सेवा की अपर्याप्त पहुंच से अधिक मौतों की ओर ले जाती है – 2016 में देखभाल की खराब गुणवत्ता के कारण 16 लाख भारतीयों की मृत्यु हो गई, जैसा कि सितंबर 2018 में इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में बताया गया है।

 

महिला: राज्य का अधिक समर्थन

 


 

  • ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं की शिक्षा, कौशल और डिजिटल और वित्तीय साक्षरता तक पहुंच होनी चाहिए।
  • सरकार को आश्रय गृहों और अदालत के बुनियादी ढांचे के लिए बजट में वृद्धि करनी चाहिए।
  • महिलाओं को अपने काम के स्थानों पर और काम करने के लिए अपने आवागमन पर सुरक्षित महसूस करना चाहिए।

 

2019 एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार, छह वर्षों से 2018 तक, 15-29 वर्ष की आयु की ग्रामीण महिलाओं की बेरोजगारी 8.8 प्रतिशत अंक बढ़ी है। शिक्षित ग्रामीण महिलाओं के लिए, बेरोजगारी दर 2004-05 और 2011-12 के बीच 9.7 फीसदी से 15.2 फीसदी तक रही, जो 2017-18 में 17.3 फीसदी थी।

 

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की एक शाखा, सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट द्वारा प्रकाशित सितंबर 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, 11 साल से 2015 तक वेतन वाले कर्मचारियों में महिलाओं की हिस्सेदारी घट रही है। कृषि में, महिलाओं की हिस्सेदारी में छह प्रतिशत अंक की गिरावट हुई है, यह आंकड़ा 2004 में लगभग 35 फीसदी से गिर कर 2015 में 29 फीसदी हुआ है। वहीं,विनिर्माण में यह चार प्रतिशत अंक की गिरावट हुई है, आंकड़ा 2004 में 26 फीसदी से घट कर 2015 में 22 फीसदी हुआ है।

 

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर जयति घोष कहती हैं, “सरकार को कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी में गिरावट को रोकने के लिए कदम उठाना चाहिए।” उनके सुझावों में निम्नलिखित बातें शामिल हैं: कार्य की स्थिति में सुधार, अधिक सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार, न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि और ग्रामीण और शहरी-रोजगार योजनाओं में सुधार।

 

मार्च 2018 में ‘वर्ल्ड बैंक साउथ एशिया’ के उपाध्यक्ष एनेट डिक्सन ने कहा, “जीडीपी के 17 फीसदी पर, भारतीय महिलाओं का आर्थिक योगदान वैश्विक औसत से आधे से भी कम है, और चीन में 40 फीसदी की तुलना में प्रतिकूल है। अगर भारत की 50 फीसदी महिलाएं कार्यबल में शामिल हो सकती हैं, तो भारत अपनी वृद्धि को 1.5 प्रतिशत अंक प्रति वर्ष तक बढ़ा सकता है। ”

 

अगर सरकार अतिरिक्त प्रयास करे तो ऐसा हो सकता है। विशेषज्ञों ने कार्यबल में महिलाओं की गिरावट के दो अवरोधों का हवाला दिया: दृष्टिकोण और बुनियादी ढांचा अंतराल।

 

बेंगलुरु के थिंक टैंक पब्लिक अफेयर्स सेंटर की कार्यक्रम अधिकारी अपर्णा शिवरामन ने कहा, “सुरक्षित परिवहन, अच्छी कामकाजी परिस्थितियों और सभ्य रोजगार पर सरकार का ध्यान होना चाहिए।” “इसके अतिरिक्त, ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को शिक्षा, कौशल, साथ ही साथ डिजिटल और वित्तीय साक्षरता तक पहुंच प्रदान करनी चाहिए। यह कार्रवाई योग्य ज्ञान उन्हें रोजगार के बेहतर अवसरों तक पहुंचने और उनका उपयोग करने में मदद करेगा। ”

 

शिक्षा: ड्रॉप-आउट दरों में सुधार, गुणवत्ता में सुधार

 


 

  • स्कूल स्तर पर दर से मिलान करने के लिए उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ाना।
  • राज्य के सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के लिए धन में वृद्धि, जो 50 फसीदी से अधिक छात्रों को कवर करती है।
  • बड़े बजट, हाशिए के समुदायों की शिक्षा के लिए समर्थन और विशेष योग्यता वाले बच्चे और महिलाओं की उच्च शिक्षा।

 

विशेषज्ञों ने कहा कि सरकार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि भारतीय बच्चे स्कूलों में रहें। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2015-16 में 97 फीसदी बच्चों का दाखिला प्राइमरी स्कूल में कराया गया। यह दर, जिसे सकल नामांकन दर कहा जाता है, ग्रेड IX और X में 79.2 फीसदी और ग्रेड XI और XII 56 फीसदी तक गिर जाता है।

 

बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली एक एनजीओ, चाइल्ड राइट्स एंड यू की सीईओ, पूजा मारवाहा बताती हैं, “सरकार को मुख्य रूप से यह सुनिश्चित करने पर ध्यान देना चाहिए कि बच्चे प्री-स्कूल से हाई स्कूल तक की अपनी शिक्षा पूरी कर सकें।”

 

“जब तक हम छात्रों को उच्च शिक्षा तक स्कूलों में रख नहीं पाते हैं, तब तक हम पूर्ण रूप से जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग करने में सक्षम नहीं होंगे,” ओआरएफ की रिसर्च फेलो अंतरा सेनगुप्ता कुछ ऐसी ही बातें कहती हैं।

 

‘यूनाइटेड नेशन डिपार्टमेंट ऑफ इकोनोमिक एंड सोशल अफेयर्स’ की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश 15 से 24 वर्ष आयु के युवाओं की दुनिया में सबसे बड़ी आबादी है ( 24.1 करोड़ या सभी भारतीयों का 18 फीसदी ) – और चीन के 16.94 करोड़ से आगे है।

 

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि अपने कुल बजट के प्रतिशत के रूप में उच्च शिक्षा पर भारत का खर्च काफी हद तक स्थिर बना हुआ है, जो कि 12 साल से 2018-19 के औसत 1.47 फीसदी के आसपास है। 2017-18 के अखिल भारतीय सर्वेक्षण के अनुसार, देश के 18- से 23 वर्ष के 70 फीसदी से अधिक बच्चों को उच्च शिक्षण संस्थान में दाखिला नहीं दिया जाता है।

 

शिक्षा को गरीबी उन्मूलन से मजबूती से जोड़ा गया है। 2014 में ‘यूनेस्को’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि औसतन, शिक्षा का एक साल 10 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह कामकाजी आबादी को अवसरों के बैंड को बढ़ाकर शोषण से बचाता है, स्वास्थ्य में सुधार करता है, आय संबंधी असमानताओं को कम करता है और आर्थिक प्रगति को बढ़ाता है।

 

मारवाहा कहती है, “शिक्षा का विस्तार करने के लिए, सरकार को प्री-प्राइमरी कक्षाओं (नर्सरी और बालवाड़ी) और उच्च माध्यमिक कक्षाओं (ग्रेड IX से XII) को शामिल करने के लिए शिक्षा के अधिकार का विस्तार करने की आवश्यकता है।”

 

31 मई, 2019 को एक शिक्षा समिति द्वारा शिक्षा मंत्रालय को सौंपी गई नई शिक्षा नीति, 2019 में तीन से 18 वर्ष तक के बच्चों को शामिल करने के लिए आरटीई अधिनियम का विस्तार बताया गया है। इस नीति को जनता से प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए जारी किया गया था। आम जनता से प्रतिक्रिया मिलने के बाद, और राज्य सरकारों से सलाह लेने के बाद, नीति को सरकार द्वारा अंतिम रूप दिया जाएगा, जैसा कि मंत्रालय से एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है।

 

सेनगुप्ता ने कहा कि यह नीति, जब पारित होगी तो शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति की जगह लेगी, जिसे 1986 में बनाया गया था और 1992 में संशोधित किया गया था। शैक्षिक सुधारों के लिए रोडमैप तय करने के लिए ‘स्पष्ट, निर्धारित लक्ष्य’ के साथ एक नई, व्यापक नीति महत्वपूर्ण है।

 

सेनगुप्ता ने कहा कि भारत को राज्य के सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता में सुधार करने की आवश्यकता है, जहां 50.7 फीसदी छात्र अध्ययन करते हैं।

 

मारवाहा ने समावेशी शिक्षा की आवश्यकता पर भी जोर दिया। नई सरकार को पारंपरिक रूप से हाशिए वाले समूहों, जैसे लड़कियों, दलित, आदिवासी और अन्य बच्चों और विशेष क्षमताओं वाले बच्चों के लिए संसाधनों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

 

सेनगुप्ता ने कहा कि भारत को उच्च शिक्षा में लैंगिक अंतर को भी दूर करना होगा। भारत के शीर्ष विश्वविद्यालयों में एक तिहाई से अधिक छात्र महिलाएं नहीं हैं, जैसा कि टाइम्स हायर एजुकेशन (टीएचई) ने मई 2019 की रिपोर्ट में बताया है।

 

वन और भूमि: स्थानीय अधिकारों और कानून की रक्षा करना

 


 

  • महिलाओं की पूर्ण भागीदारी के साथ सामुदायिक वन संसाधनों को संचालित करने के लिए ग्राम सभाओं के अधिकार को मान्यता देना और उनकी रक्षा करना।
  • वनों का प्रबंधन करने के लिए ग्राम सभाओं को फंड जो ज्यादातर वन विभागों द्वारा नियंत्रित की जाती हैं।
  • ग्राम सभाओं के कानून और अधिकारों का उल्लंघन करके वन भूमि को स्थानांतरित न करें; उनकी स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति का सम्मान करें।

 

वन अधिकार अधिनियम, जिसने 2006 में वन-निवासियों के भूमि अधिकारों को वैध बनाया, कम से कम 20 करोड़ भारतीयों के अधिकारों और आजीविका के लिए महत्वपूर्ण है ( ब्राजील की जनसंख्या जितना ) जिनमें से 9 करोड़ (45 फीसदी) आदिवासी हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 20 मार्च, 2019 की रिपोर्ट में बताया है।

 

यही कारण है कि एफआरए को लागू करना नई सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार( जिनमें महिलाओं के अधिकार शामिल हैं, विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह- सबसे कम विकास सूचकांकों के साथ – विस्थापित समुदायों, खानाबदोश और पशुचारक लोगों को बसाया जाना चाहिए, जैसा कि एफआरए पर काम करने वाले गैर-लाभकारी संगठनों का एक नेटवर्क कम्युनिटी फॉरेस्ट रिसोर्स- लर्निंग एंड एडवोकेसी के सदस्य तुषार दास कहते हैं।

 

फरवरी 2018 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हुई अदालतों की सुनवाई के दौरान आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा नहीं करने के लिए भाजपा सरकार की आलोचना की गई है, जिनके वनवासियों के दावों को संबंधित राज्य सरकारों ने खारिज कर दिया था। बाद में आदेश को रोक दिया गया।

 

दास कहते हैं, “इस आदेश ने एफआरए को और कमजोर कर दिया। उन्होंने कहा कि प्राथमिकता के आधार पर, सरकार को एफआरए के तहत सभी भूमि-शीर्षक दावों की समीक्षा करना चाहिए ताकि भूमि के अधिकार को बहाल किया जाए।

 

कम से कम 40 मिलियन हेक्टेयर वन भूमि ( भारत के 50 फीसदी से अधिक वन क्षेत्र, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के क्षेत्रफल से अधिक है ) एफआरए और वन-निवासियों और जनजातियों के अधिकारों और आजीविका से संबंधित मुद्दों द्वारा शासित है। कम से कम 170,000 गांव, सभी भारतीय गाँवों में से एक चौथाई, एफआरए के तहत अधिकारों के लिए पात्र हैं, जैसा कि हमने बताया है।

 

पर्यावरण: कई संकटों के लिए एक नया नियामक

 


 

  • सरकार को पर्यावरण मंत्रालय से अलग एक स्वतंत्र पर्यावरण नियामक या स्वतंत्र पर्यावरण संरक्षण एजेंसी की स्थापना करनी चाहिए, जो एक तरह का विवेक रखने वाला हो।
  • सरकार को तटीय और महासागर मुद्दों को नियंत्रित करने वाले कानूनों को सरल बनाना चाहिए और उन पर एक साथ विचार करना चाहिए।

 

“एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम, जो नई सरकार को उठाना चाहिए, वह भारत के पर्यावरण मंत्रालय को चुस्त-दुरूस्त करना है”, जैसा कि एक पर्यावरण वकील और भारत के पहले पर्यावरण कानून फर्म, एनवायरो लीगल डिफेंस फर्म (ईएलडीएफ) के संस्थापक संजय उपाध्याय कहते हैं।

 

उपाध्याय ने कहा, “हम एक लंबे समय से एक स्वतंत्र पर्यावरण नियामक या स्वतंत्र पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के बारे में बात कर रहे हैं, जो मंत्रालय के ऊपर है और इसमें अंतरात्मा की भूमिका है। देश में पर्यावरण शासन की बंद-दरवाजा वाली, किसी की सलाह न मानने वाली आधिकारिक-संचालित छवि को बदलनी होगी।”

 

10 में से आठ भारतीयों ने जहरीली हवा में सांस लेते हैं। 2017 में 12 लाख भारतीयों की मौत जहरीली हवा से हुई है। यह आंकड़ा उसी वर्ष तपेदिक, डायरिया, निमोनिया और मलेरिया के कारण मरने वालों की संख्या से अधिक है। सरकार 100 से अधिक भारतीय शहरों की पहचान सबसे प्रदूषित शहर के रुप में की है, फिर भी संकट गहराता है।

 

2019 में, तीन साल के विचार-विमर्श के बाद, सरकार ने एक त्रुटिपूर्ण राष्ट्रीय कार्यक्रम की घोषणा की, जिसमें 2022 तक 20-30 फीसदी तक वायु प्रदूषण को कम करने के लिए स्पष्ट क्षेत्रीय लक्ष्यों और समयरेखा का अभाव है।

 

उपाध्याय ने कहा कि भारतीय शहरों में वायु प्रदूषण और जल निकायों के प्रदूषण के मुद्दे पर “तत्काल ध्यान देने और कार्रवाई करने” की आवश्यकता है।

 

सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग की जून 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का पानी इसी तरह संकट में है, जिसका 70 फीसदी प्रदूषित है, उस समय जब 60 करोड़ लोग ‘गंभीर रूप से’ पानी के संकट का सामना कर रहे हैं।

 

भारत की 7,500 किलोमीटर की तटरेखा के साथ एक और संकट सामने आया है – अहमदाबाद और कोलकाता के बीच की दूरी का लगभग साढ़े तीन गुना – देश के पूर्व और पश्चिम में लगभग समान रूप से विभाजित। इसके साथ नौ राज्य, दो केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) और दो द्वीप प्रदेश हैं। देश के 1.28 बिलियन लोग, 560 मिलियन या 43 फीसदी इन तटीय प्रदेशों में रहते हैं।

 

भारत के तटों पर रहने वाले लाखों लोगों को खतरा है, जैसा कि भारत ने 1990 और 2006 के बीच 26 वर्षों में अपनी तटीय रेखा का 33 फीसदी क्षरण खो दिया है, जैसा कि जुलाई 2018 में नेशनल सेंटर फॉर कोस्टल रिसर्च (सीसीआर) द्वारा चेन्नई में जारी एक रिपोर्ट से पता चलता है जो भारत की तटरेखा में बदलाव को मैप करता है।

 

सीसीआर की रिपोर्ट के अनुसार, मानव निर्मित गतिविधियों ( जैसे कि बढ़ते निर्माण, नदियों के नुकसान, रेत के खनन और मैन्ग्रोव का विनाश ) और प्राकृतिक परिवर्तन जैसे कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्राकृतिक कारण भारत के तटों को नुकसान हो रहा है।

 

“अब तक हम यहां और वहां सरकारी सूचनाओं के साथ छेड़छाड़ करते रहे हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है,” उपाध्याय ने कहा, “एक समग्र दृष्टिकोण” का आग्रह करते हुए, तटीय विनियमन क्षेत्र अधिनियम के सरलीकरण के साथ शुरू हुआ, जो 17 सालों से 2018 तक से अधिक बार 76 बार संशोधित किया गया है।

 

भारत के पर्यावरण को बेहतर रूप से संरक्षित किया जाना चाहिए, लेकिन पर्यावरण मंजूरी प्रक्रियाओं को सरल बनाने की आवश्यकता है। उपाध्याय ने कहा, “अनुपालन को गैर-अनुपालन से सस्ता होना पड़ता है। वर्तमान में, यह दूसरा तरीका है। जब तक आप अनुपालन को सस्ता नहीं करते हैं और अधिक व्यापक-आधार वाले लोग प्रक्रिया को दरकिनार करने के अन्य तरीके खोजने जा रहे हैं।”

 

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 06 जून, 2019 को indiaspend.com प्रकाशित हुआ है।

 

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