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भारत के एक गरीब राज्य में, बच्चों में कुपोषण को कम करने वाला एक पायलट प्रोजेक्ट सफल

इंडियास्पेंड टीम,
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बोकारो, झारखंड: 11 अगस्त, 2018 को झारखंड में बोकारो  के कुपोषण उपचार केंद्र (एमटीसी) में 25 साल की पूर्णिमा आई। दुबली-पतली पूर्णिमा के हाथों में 21 महीने का बेटा, गोरांगो मालाकार था। बच्चे का वजन महज 4.8 किलोग्राम था और वह ‘रेड जोन’ के भीतर था, जो गंभीर तीव्र कुपोषण का संकेत है।

 

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के ‘नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे- 2015-16’ (एनएफएचएस-4) के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है कि कुपोषित बच्चों ( स्टंड, वेस्टेड और कम वजन सहित ) के साथ भारत के टॉप पांच राज्यों में से एक झारखंड है।

 

झारखंड में, पांच वर्ष से कम आयु के करीब आधे बच्चे ( 45.3 फीसदी ) स्टंड हैं। इस संबंध में राष्ट्रीय औसत 38.4 फीसदी है। साथ ही झारखंड के करीब आधे बच्चे ( 47.8 फीसदी ) कम वजन के हैं। और इस आंकड़े के साथ कुपोषण के स्तर पर झारखंड केवल बिहार और मध्य प्रदेश से पीछे है, जैसा कि हमारे विश्लेषण से पता चलता है।  एनएफएचएस के अनुसार, झारखंड में शिशु मृत्यु दर प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 44 और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों का मृत्यु दर प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 54 का है, जबकि इस संबंध में राष्ट्रीय औसत 41 और 50 का है। झारखंड में, बच्चों में कुपोषण के मुख्य कारण तीव्र गरीबी, महिलाओं में उच्च अशिक्षा, कम उम्र की शादी, स्वच्छता की कमी, पोषण पर जागरूकता की कमी, पौष्टिक और पर्याप्त भोजन तक पहुंच की कमी, निवास स्थान और स्वदेशी स्थानीय भोजन की कमी और उचित स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है। खनिज संपन्न राज्य होने के बावजूद, झारखंड में भारत में सबसे अधिक गरीबी दर है – विश्व बैंक प्रोफाइल के अनुसार राज्य में 3.3 करोड़ में से 1.3 करोड़ गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं।  एक साल पहले, झारखंड सरकार ने गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) वर्ल्ड विजन इंडिया के साथ मिलकर एकीकृत बाल विकास योजना ( आईसीडीएस ) के माध्यम से एक पायलट परियोजना चलाई । यह राज्य सरकार द्वारा लागू एक केंद्र सरकार की योजना है, जिसका उद्देश्य बोकारो जिले के दो प्रखंडों में बच्चों में कुपोषण को कम करना है।

 

इंडियास्पेंड की जांच से पता चलता है कि डोर-टू-डोर बच्चों की स्क्रीनिंग, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने और लगातार समर्थन और निगरानी सहित परियोजना का दृष्टिकोण प्रभावी साबित हुआ, क्योंकि दोनों ब्लॉकों में 61 फीसदी कुपोषित बच्चे ठीक हो गए थे।

 

गरीबी कुपोषण का कारण बनती है, गरीबी की वजह से ग्रामीण झारखंड में कुपोषित बच्चे नहीं पहुंच पाते हैं स्वास्थ्य सेवा तक  
 
 

कुछ महीनों में दूसरी बार, पूर्णिमा के बच्चे ने रेड जोन में प्रवेश किया है। हरे, पीले और लाल क्षेत्रों में विभाजित एक मानक टेप का उपयोग करके उनके मध्य-ऊपरी बांह परिधि (एमयूएसी) को मापने के द्वारा बच्चों में कुपोषण का पता लगाया जाता है।12.5 और 26 सेमी के बीच एक एमयूएसी के साथ ग्रीन जोन कुपोषित बच्चों को दिखाता है। पीला क्षेत्र यानी येलो जोन मध्यम तीव्र कुपोषण का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें 12.5 और 11.5 सेमी के बीच एमयूएसी वाले बच्चे होते हैं। लाल क्षेत्र यानी रेड जोन के बच्चों में 11.5 सेमी से कम का एमयूएसी होता है, जिससे गंभीर तीव्र कुपोषण का पता चलता है और इमरजेंसी चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है।

 

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, जिन्होंने पूर्णिमा के बच्चे की बांह को मापा, उसने गोरंगो के लिए स्वास्थ्य के खतरे के बारे में उसे सचेत किया और उसे तत्काल बोकारो के एमटीसी में ले जाने की सलाह दी। बोकारो एमटीसी में 20 बेड हैं, लेकिन इंडियास्पेंड के दौरे के समय गोरंगो एकमात्र मरीज था। हालांकि, यह  कुपोषण के कम मामलों का संकेत नहीं है।

 

एमटीसी का दौरा कुपोषित बच्चों के कई माता-पिता के लिए एक अंतिम उपाय है, जो दिहाड़ी मजदूरी खोने से डरते हैं, जिन पर उनका परिवार निर्भर है। पूर्णिमा देवी को झारखंड-पश्चिम बंगाल सीमा पर स्थित अपने गांव से बोकारो एमटीसी तक 10 किमी की यात्रा करनी थी। दूसरों को जिला मुख्यालय तक पहुंचने के लिए 40 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। बोकारो एमटीसी में एक कर्मचारी निशा सिंह ने कहा, “अगस्त का मौसम बुवाई का मौसम है और कृषि श्रम की मांग बढ़ जाती है। माता-पिता एमटीसी का दौरा नहीं करना चाहते हैं और दिहाड़ी मजदूरी कमाने का मौका छोड़ देते हैं, भले ही उनके बच्चे कुपोषित हों। वे इसके बजाय अपने बच्चे को निकटतम आंगनवाड़ी केंद्र में ले जाते हैं और घरेलू उपचार आजमाते हैं और अक्सर विफल हो जाते हैं।”

 

पूर्वी बोकारो जिले में चंदनकियारी ब्लॉक के टेकोरा गांव की एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता छाया मुखर्जी ने इंडियास्पेंड को बताया कि दो-ढाई साल तक उन्होंने आंगनवाड़ी केंद्र में काम किया है। इस दौरान छाया कई ऐसी माताओं से मिलीं, जो एमटीसीएस में बच्चों को भर्ती करने के लिए तैयार नहीं थीं। अपने क्षेत्र में गंभीर कुपोषण वाले तीन बच्चों में से केवल एक बच्चा एमटीसी में भर्ती हुआ था। मुखर्जी ने कहा, “कुछ मां कुपोषण की गंभीरता को समझ नहीं पाती हैं, जबकि कई लोग काम छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं।”

 

एक मामले में, 25 वर्षीय कुसुम देवी ने अपने नौ महीने के बच्चे को एमटीसी में तभी लेकर आई जब वह बेहद कमजोर हो गया था। मुखर्जी ने कहा, “हमने बच्चे की स्थिति के बारे में उसे पहले ही सचेत कर दिया था, फिर भी वह एमटीसी नहीं आईं, क्योंकि यह केंद्र उसके गांव से 50 किमी दूर है और उसके पास जाने के लिए पैसे नहीं थे।”

 

कुसुम देवी (बीच में) अपने पति, और नौ महीने के कुपोषित बच्चे और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के साथ, जो उन्हें बोकारो के कुपोषण उपचार केंद्र में ले आई।

 

पूर्णिमा कहती हैं, “जब मांएं दिहाड़ी मजदूरी करती हैं, तो हर रुपया मायने रखता है। एमटीसी  कर्मचारी बच्चे के परिचर को प्रतिदिन 100 रुपये का मुआवजा प्रदान करते हैं, लेकिन यह सिर्फ भोजन के लिए पर्याप्त है। परिवार के बाकी सदस्य कैसे रह सकते हैं, जब कमाने वालों में से एक बच्चे की देखभाल कर रहा हो? ”

 

पूर्णिमा की इस हालत का मुख्य कारण गरीबी है। एक दूध पिलाने वाली मां को अपने और अपने बच्चे में कुपोषण से बचने के लिए सब्जियां, फाइबर और प्रोटीन खाने की ज़रूरत होती है, लेकिन पूर्णिमा घर पर बचा हुआ खाना खाती हैं। इंडियास्पेंड से बात करते हुए पूर्णिमा ने बताया कि “मैं, अपने गांव की हर औरत की तरह, आखिरी खाना खाती हूं। दिन में दो बार चावल और कुछ उबली हुई दाल।” उसके परिवार को पता है कि उसे बेहतर पोषण की आवश्यकता है लेकिन वह अधिक भोजन वहन नहीं कर सकती है। पूर्णिमा दिन भर काम में व्यस्त रहती हैं। सात लोगों के परिवार के लिए पानी लाना, खाना बनाना और कपड़े धोना..इसके बाद तो खुद की देखभाल के लिए मुश्किल से कोई समय बचता है।

 

झारखंड के गरीबी से जूझ रहे गांवों में ढेर सारी महिलाओं की कहानी पूर्णिमा की कहानी हो सकती हैं। यहां कई देखभाल करने वाली माताएं दिन भर में केवल दो समय भोजन पर रहती हैं और वे अल्पपोषित हैं, जिससे कुपोषित बच्चे पैदा होते हैं।

 

अशिक्षा और कम पोषण के बीच का रिश्ता बहुत नजदीक है। भारत की जनगणना 2011 बताती है कि झारखंड की आबादी का 76 फीसदी ग्रामीण इलाकों में रहता है, जबकि राष्ट्रीय औसत 31 फीसदी है। झारखंड में केवल 46.62 फीसदी ग्रामीण महिलाएं शिक्षित हैं, जबकि भारत में 62 फीसदी ग्रामीण महिलाएं शिक्षित हैं। एनएफएचएस के अनुसार 15-49 वर्ष की आयु की लगभग 67.3 फीसदी और ग्रामीण झारखंड में छह से 59 महीने की आयु के 71.5 फीसदी बच्चे एनीमिक हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत के लिए आंकड़े 53.1 फीसदी और 58.6 फीसदी हैं।

 

कई महिलाओं की शादी भी 18 साल से पहले हो जाती है, लगभग 14 साल की उम्र में, और उन्हें शिक्षित करना कम प्राथमिकता है। । झारखंड में लगभग 37.9 फीसदी महिलाएं कम उम्र में दुल्हन बनी हैं, जो देश में तीसरा सबसे ऊंचा स्तर है, जैसा कि एनएफएचएस डेटा पर हमारे विश्लेषण से पता चलता है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने बताया, “किसी भी नई मां से पूछें कि उनकी उम्र क्या है और इसका उत्तर ’25’ होगा। परिवार के सदस्य अपनी जन्म तिथि से अनजान हैं। आधार (केंद्र सरकार द्वारा संचालित विशिष्ट पहचान कार्यक्रम) में नामांकन करते समय, इनमें से कई माताओं ने 18 वर्ष की आयु का उल्लेख किया। मैंने व्यक्तिगत रूप से लड़कियों को 14 साल की उम्र में उन्हें विवाह के लिए स्कूल छोड़ते देखा है।” पूर्णिमा देवी ने भी अपनी उम्र 25 वर्ष ही बताई थी, जबकि दिखने में वह छोटी लग रही थीं।

 

अस्वास्थ्यकर स्थितियों के परिणामस्वरूप बीमारियों का प्रसार होता है, जो कुपोषण का एक और प्रमुख कारण है। लेकिन झारखंड के गांवों में स्वच्छता बहुत दूर है, जहां पीने के पानी शैवाल से भरे तालाबों से लाया जाता है।

 

झारखंड में आंगनबाड़ी केंद्र लड़ रहे हैं कुपोषण से, लेकिन कम स्टाफ और कम संसाधन

 

जबकि भारत में बाल और मातृ कुपोषण के कारण बीमारी का बोझ 1990 के बाद से कम हो रहा है। 2016 में भारत में कुल रोग भार के 15 फीसदी के लिए कुपोषण जिम्मेदार रहा है, जैसा कि इंडिया स्टेट लेवल डिजिज पहल, ‘इंडिया: हेल्थ ऑफ नेशनस स्टेट’ से पता चलता है।

 

राष्ट्रीय स्तर पर, एक दशक पहले की तुलना में 2015-16 में बच्चों की स्टंटिंग दर में 9.6 प्रतिशत की कमी देखी गई है, लेकिन झारखंड की सुधार दर 4.5 प्रतिशत थी, जैसा कि एनएफएचएस डेटा पर हमारे विश्लेषण से पता चलता है।

 

राज्य अनुसार भारत में स्टंटिंग दरें-2015-16

Source: National Family Health Survey 4 (2015-16)

 

21 नवंबर, 2017 को, झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ने घोषणा की कि वर्ष 2018  को राज्य के कुपोषण की समस्या का समाधान करने के लिए ’निरोग बाल वर्ष’ (स्वस्थ बाल वर्ष) के रूप में मनाया जाएगा। दास ने कहा, “इसका उद्देश्य झारखंड को अगले तीन से चार वर्षों में देश के शीर्ष 10 पोषित राज्यों में लाना है।”  हालांकि, झारखंड को उस लक्ष्य को पाने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना है। 19 अगस्त, 2018 को  राज्य की राजधानी रांची में खूंटी के एक निजी अस्पताल में एक बच्चे की मौत हो गई। एक सप्ताह के भीतर, 24 अगस्त को, रांची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में एक मां द्वारा त्यागे गए एक और बच्चे की मृत्यु हो गई। तीनों बच्चे कथित रूप से कम वजन के थे और कुपोषण से पीड़ित थे। झारखंड में कुपोषित बच्चों की उच्च संख्या सरकारी पोषण योजनाओं की प्रभावकारिता पर सवालिया निशान लगाते हैं। राज्य के सामाजिक कल्याण विभागों द्वारा संचालित और आईसीडीएस तक पहुंचने वाले अधिकांश बच्चों के संपर्क का बिंदु आंगनबाड़ी केंद्र इस राज्य झारखंड में कर्मचारियों और संसाधनों के संकट से जूझ रहे हैं।

 

बोकारो जिले के आंगनवाड़ी केंद्रों के पर्यवेक्षकों ने इंडियास्पेंड को नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कर्मचारियों की कम संख्या से उन पर क्या प्रभाव पड़ता है। “बोकारो जिले में 324 आंगनवाड़ी केंद्र हैं और कोई भी अच्छी तरह से सुसज्जित नहीं है,” एक पर्यवेक्षक ने खुलासा किया। “प्रत्येक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कम से कम 35 केंद्रों की प्रभारी हैं – प्रत्येक केंद्र एक दूसरे से बहुत दूर स्थित है और पक्की सड़कों से जुड़ा नहीं है, जिससे सेवा वितरण मुश्किल हो रहा है।” ग्रामीण बोकारो जिले में सड़कों की स्थिति और खराब है। पूर्णिमा देवी ने बताया कि बोकारो एमटीसी तक पहुंचने के लिए उन्हें 6 किमी से अधिक पैदल चलना पड़ा और दो बसें बदलनी पड़ीं।

 

चंदनकियारी ब्लॉक की आंगनवाड़ी पर्यवेक्षक रूपा कुमारी ने कहा, “बोकारो के टेकोरा गांव तक पहुंचने के लिए हमें 22 किमी से अधिक जंगल और खराब सड़कों से गुजरना पड़ता है। एक गांव से दूसरे गांव जाना काफी थकावट भरा काम होता है- “ संख्या में हम कुछ ही हैं लेकिन बहुत सारे बच्चों को हमारी सख्त जरूरत है। हम चाहते हैं कि हम उन सभी की मदद कर सकें।”

 

एक पर्यवेक्षक ने कहा कि पर्यवेक्षकों को अक्सर गांवों में यात्रा करने के लिए अपना पैसा खर्च करना पड़ता है। राज्य सरकार ने पिछले दो वर्षों से यात्रा भत्ता प्रदान नहीं किया है। न तो एमटीसी और न ही जिला मुख्यालय के पास बच्चों को ले जाने में सहायता करने के लिए वाहन उपलब्ध हैं।

 

फिर भी, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के पास भारी काम का बोझ है – माता-पिता को कुपोषण के प्रति संवेदनशील बनाने से लेकर एमटीसी में बच्चों को प्रवेश देने और माताओं और बच्चों को पर्याप्त पोषण प्रदान करने तक। एक कुपोषित बच्चे को दवा और अवलोकन के लिए कम से कम 15 दिनों के लिए एमटीसी में भर्ती कराया जाना चाहिए, लेकिन अधिकांश माता-पिता दो दिनों से अधिक समय तक रहने से इनकार करते हैं। क्योंकि वे ज्यादा दिन रहेंगे तो दिहाड़ी मजदूरी खो देंगे। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों में परिवार को 15 दिनों तक रहने के लिए परामर्श देना भी शामिल है। इस तरह के परामर्श के लिए उपलब्ध कर्मचारियों की बहुत ज्यादा कमी का परिणाम कुपोषित बच्चे झेलते हैं। क्योंकि यदि वे पूर्ण 15-दिवसीय उपचार में नहीं जाते हैं, तो लाभ की संभावना कम होती है।

 

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और झारखंड में परिवार कल्याण-संचालित राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के निदेशक कृपा नंद झा का कहना है कि कुपोषण पर अंकुश लगाने के कदमों में तेजी लाई जा रही है। झा ने कहा, “झारखंड में 88 फीसदी से अधिक बच्चों को डीवर्मिंग उपचार प्रदान किया जाता है, जबकि उनमें से 75 फीसदी को मौखिक निर्जलीकरण लवण दिया जाता है।”

 

राज्य के बाल कुपोषण संकट से निपटने के लिए चिकित्सा की खुराक पर ध्यान केंद्रित करने के लिए यह पर्याप्त नहीं है।  एक पायलट प्रोजेक्ट से पता चला है कि आईसीडीएस और आंगनवाड़ी केंद्र सुनिश्चित करना अच्छी तरह से सुसज्जित है और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना बाल कुपोषण से निपटने के लिए एक अधिक प्रभावी तरीका हो सकता है।

 

बोकारो में कुपोषण प्रबंधन पायलट परियोजना झारखंड के लिए रास्ता दिखाती है

 
 

बोकारो जिले के चंदनकियारी और चास ब्लॉकों में जनवरी से सितंबर 2017 के बीच चल रहे नौ महीने के ‘कम्यूनिटी बेस्ड मैनेजमेंट ऑफ एक्यूट मालन्यूट्रिशन’(सीएमएएम) पायलट प्रोजेक्ट बच्चों में कुपोषण के स्तर को कम करने में कारगर साबित हुआ।

 

सीएमएएम परियोजना को चलाने के लिए झारखंड राज्य पोषण मिशन ने वर्ल्ड विजन इंडिया (डब्ल्यूवी इंडिया) के साथ भागीदारी की-एक एनजीओ, जो सिस्टम को मजबूत बनाने, सहायक पर्यवेक्षण और पूरे भारत में स्वास्थ्य अधिकारियों के क्षमता निर्माण का अनुभव रखता है।

 

मध्य-ऊपरी बांह परिधि को मापने के आधार पर परियोजना ने कुपोषण के लिए हर दरवाजे पर जा कर जांच की। ‘डब्ल्यूवी इंडिया’ ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया, स्वयंसेवकों की भर्ती की और अभ्यास की निगरानी की। इसके बाद कार्यक्रम क्रमशः येलो और रेड जोन में पहचाने जाने वाले बच्चों के इलाज पर केंद्रित था, जिनमें क्रमशःमध्यम कुपोषण और गंभीर तीव्र कुपोषण थे।येलो जोन में 158 बच्चों में से 96 (61 फीसदी) कुपोषण से ठीक हो गए थे। रेड जोन में बच्चों को तुरंत एमटीसी भेज दिया गया।

 

डब्ल्यूवी इंडिया के तकनीकी विशेषज्ञ, ग्रेना पु. सेल्वी ने इंडियास्पेंड को बताया, “डब्ल्यूवी इंडिया की भागीदारी से पहले कुपोषण की संख्या कम रिपोर्ट की गई थी। संसाधनों की कमी और समय के कारण, जमीनी स्तर पर मौजूद सरकारी कर्मचारी कुपोषित बच्चों की पहचान करने में असमर्थ थे। “

 

 पु. सेल्वी कहते हैं, डब्ल्यूवी इंडिया के लगातार संगठनात्मक समर्थन ने दवाओं की एक स्थिर आपूर्ति, बच्चों के लिए तैयार चिकित्सीय भोजन और पॉइंट-टू-पॉइंट देखभाल सुनिश्चित की है। उन्होंने कहा कि आईसीडीएस कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकार के साथ अल्पकालिक सहयोग से सकारात्मक परिणाम मिले हैं।

 

बोकारो जिले के आंगनवाड़ी केंद्र में दीवार पर बनी पेंटिंग लोगों को चिकित्सीय भोजन के महत्व के बारे में बताती है।

 

बोकारो में राज्य के समाज कल्याण विभाग की प्रमुख सुमन गुप्ता ने इंडियास्पेंड को बताया कि सीएमएएम परियोजना मुद्दों की संबोधित करने में कामयाब रही। “इसने सरकार को कुपोषण की गंभीर स्थिति को समझाने में मदद की और इस तरह बच्चों को तत्काल देखभाल प्रदान की गई।” गुप्ता ने कहा कि सरकार संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने में सक्षम है।

 

 एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने बताया कि, “वर्ल्ड विजन ने हमें माताओं से संवाद करने के तरीके सिखाकर हमारी पेशेवर क्षमताओं को बढ़ाया। हम माताओं को स्वच्छता और खुद की देखभाल पर धीरे-धीरे ध्यान केंद्रित करना सिखा सकते हैं। यह प्रगति है। “

 
(यह लेख बाल स्वास्थ्य, शिक्षा और बाल संरक्षण पर रिपोर्टिंग पर WVI- LDV फैलोशिप का एक हिस्सा है)
 
यह लेख अंग्रेजी में 19 जनवरी, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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