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भारत के लिए सिंगल टाइम जोन की लागत 29,000 करोड़ रुपये, शिक्षा और वेतन को नुकसान

जी.वी. निलांबरी,
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Sunrise, Vembanad Lake, Kerala, India
 

चेन्नई: प्रत्येक शाम, सूरज देश के पूर्व की तुलना में पश्चिमी भारत में 90 मिनट से अधिक बाद में डूबता है, फिर भी पूरा देश एक ही टाइम जोन का अनुसरण करता है।

 

बाद में सूरज डूबने का मतलब है कि लोग ज्यादा समय तक जागते हैं, बच्चों के नींद में कमी होती है और उनकी पढ़ाई के प्रयासों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है, जैसा कि कॉर्नेल विश्वविद्यालय के एक रिसर्च स्कॉलर के एक नए अध्ययन में पाया गया है। देर से सोने के परिणामस्वरूप, बच्चों की प्राथमिक और मध्य विद्यालय पूरा करने की संभावना कम होती है और यह प्रभाव गरीब घरों में सबसे अधिक स्पष्ट है, जैसा कि ‘पुअर स्लीप: सनसेट टाइम एंड ह्युमन कैपिटल प्रोडक्शन’ नामक अध्ययन में बताया गया है। इस अध्ययन में टाइम जोन के तहत भारत के परिणामों का विश्लेषण किया गया है।  अध्ययन के लेखक मौलिक जगनानी ने एक ईमेल साक्षात्कार में इंडियास्पेंड को बताया, “बैक-ऑफ-द-एनवेलप अनुमान सुझाते हैं कि टाइम जोन की सीमाओं को नियंत्रित करने वाली मौजूदा नीति के कारण भारत को सालाना मानव पूंजी का लगभग 4.1 बिलियन डॉलर या लगभग 29,000 करोड़ रुपये या जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 0.2 फीसदी सहना पड़ रहा है।

 

कैसे काम करता है टाइम जोन?
 

 परंपरा के अनुसार,  हर टाइम जोन में 15 डिग्री देशांतर तक का अंतर है, जो समन्वय को सक्षम करने के लिए ( रेलवे और उड़ान सेवाओं के लिए ) दुनिया भर के देशों को 24 टाइम जोन में विभाजित करता है। ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, रूस, न्यूजीलैंड, मैक्सिको और ब्राजील जैसे कई देश अपने क्षेत्रों में कई टाइम जोन का उपयोग करते हैं। अफ्रीका और उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के कम से कम 70 देशों में दिन की रोशनी का बेहतर उपयोग करने के लिए डेलाइट सेविंग टाइम यानी दिन की रोशनी (डीएसटी) का उपयोग ( अपनी घड़ियों को आगे, आमतौर पर एक घंटे, गर्मियों में मानक से और सर्दियों में वापस ) किया जाता है।

 

कुछ देशों जैसे अमेरिका और फ्रांस के पास कई टाइम जोन और डीएसटी हैं। दुनिया में 70 देश न तो डीएसटी और न ही कई टाइम जोन का उपयोग करते हैं और भारत उनमें से एक है।

 

जल्दी सूर्योदय, देर से सूर्यास्त
 

भौगोलिक रूप से, भारत के पूर्व में अरुणाचल प्रदेश और गुजरात के पश्चिम में 30-डिग्री अनुदैर्ध्य अंतर है। यह एक जुड़वां टाइम-जोन सेटअप के लिए योग्य है।

 

आजादी से पहले, भारत में बड़े हिस्से में व्यापारियों को दिन के उजाले का उपयोग करने में मदद करने के लिए  दो टाइम जोन ( बॉम्बे टाइम और कलकत्ता टाइम ) थे।

 

हालांकि, जब स्वतंत्र भारत के लिए नीतियां बनाई गईं, तो सरकार ने एकल टाइम जोन के साथ, देशांतर 82.5º पूर्व और ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी) से 5.5 घंटे आगे जाने का फैसला किया।

 

देश भर में सभी संस्थान एकल भारतीय मानक समय यानी इंडियन स्टैंडर्ड टाइम (आईएसटी) का पालन करते हैं, भले ही सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग-अलग हो। उदाहरण के लिए, गुजरात में सूर्य सुबह 8 बजे से देर में उगता है, लेकिन वहां स्कूल सुबह 8.30 बजे से ही काम करना शुरू कर देते हैं, जब बच्चों के शरीर की घड़ियां दैनिक सौर चक्र में संरेखित नहीं होती हैं। वहीं, सूरज रात 8 बजे तक रहता है। (वर्ष के समय पर निर्भर करता है), फिर भी स्कूल और कार्यालय शाम 5.00-6.00 बजे तक बंद हो जाते हैं। अधिक प्राकृतिक प्रकाश और लोगों के जगे रहने की क्षमता यूं ही खत्म हो जाती है और देशव्यापी मानक समय का पालन करने के लिए उनसे समझौता किया जाता है।

 

चार क्षेत्रों में सूर्य अस्त और सूर्य उदय


 

दिन के उजाले में जब घड़ी कहती है कि यह सोने का समय है, तो शरीर की सर्कैडियन घड़ी ( जो सूर्य के साथ शरीर की लय का समन्वय करता है ) पर आधारित प्राकृतिक संकेत उलट जाते हैं। इससे बच्चों और वयस्कों में नींद की कमी हो सकती है, जैसा कि समझाने के लिए जगनानी ने पिछले शोध का हवाला दिया।

 

इंडिया टाइम यूज सर्वे से 1998-99 के लिए 24-घंटे के समय-उपयोग के आंकड़ों का उपयोग करते हुए, जगनानी ने बताया कि देर से सुर्यास्त के कारण नींद की कमी 30 मनट तक की हो सकती है।

 

दिन के उजाले की लागत
 

जगनानी ने कहा कि स्कूल में शैक्षिक परिणामों पर इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

 

उन्होंने कहा, “जब सूरज देर में अस्त होता है, तो बच्चे देर में सोते हैं; इसके विपरीत, उठने का समय सौर संकेतों द्वारा विनियमित नहीं होता है। नींद से वंचित छात्रों ने अध्ययन के प्रयास को कम कर दिया, एक मॉडल के अनुरूप जहां नींद उत्पादकता में वृद्धि है और प्रयास के सीमांत रिटर्न को बढ़ाता है। ”नींद पढ़ाई के प्रयास को अधिक उत्पादक बनाती है, लेकिन जैसा कि बाद में सूर्यास्त नींद की अवधि को कम करता है, यह बच्चों के अध्ययन के समय को कम करके, कम प्रभावी बनाता है। अध्ययन के अन्य निष्कर्षों में कहा गया है कि सूर्यास्त के समय में एक घंटे की देरी से बच्चों की नींद लगभग 30 मिनट कम हो जाती है, और प्राथमिक और मध्य विद्यालय की शिक्षा पूरी करने वाले बच्चों की संभावना कम हो जाती है। स्कूल में औसतन 0.8 साल का समय कम हो जाता है। इससे स्कूल में नामांकन में 11 फीसदी की कमी होती है, और छात्रों के गणित की परीक्षा के अंकों में काफी गिरावट आती है। आगे, वयस्कों के बीच, बाद में सूर्यास्त भी कम नींद और कम मजदूरी के साथ जुड़ा हुआ है, गरीबों के बीच एक प्रभाव अधिक दिखाई देता है, जैसा कि जगनानी कहते हैं।

 

 ” जो गरीब नहीं हैं, वे अपनी नींद का कार्यक्रम समायोजित करते हैं, जब सूरज बाद में अस्त होता है; नींद पर बाद में सूर्यास्त का नकारात्मक प्रभाव गरीबों के बीच सबसे अधिक स्पष्ट होता है, विशेषकर उस अवधि में जब परिवार गंभीर आर्थिक तंगी का सामना करते हैं। “

 

अध्ययन के अनुसार, बाद में स्कूल शुरू करने का समय बच्चों को बाद में होने वाले नुकसान की भरपाई करने में मदद कर सकता है, और नींद की कमी-अनुभूति संबंध को कम कर सकता है।

 

जगनानी कहते हैं कि सुबह 8.30 बजे के बाद स्कूलों की शुरुआत करने से टेस्ट स्कोर पर सूर्यास्त का प्रभाव लगभग 50 फीसदी तक कम हो सकता है, जैसा कि अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स द्वारा सिफारिश की गई है।

 

जगनानी कहते हैं, केवल आधे घंटे में आईएसटी को आगे बढ़ाने से सभी भारतीय राज्यों में एक साथ 2.7 बिलियन यूनिट बिजली की वार्षिक बचत होगी, जैसा कि ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज’ के  प्रोफेसर डीपी सेनगुप्ता और दिलीप आहूजा द्वारा रिसर्च ने स्थापित किया था। जगनानी ने कहा कि उनका अपना अध्ययन एक इष्टतम टाइम जोन या डीएसटी की सिफारिश नहीं करता है।

 
(जीवी नीलांबरी मद्रास विश्वविद्यालय में पत्रकारिता और संचार के मास्टर छात्र हैं, और इंडियास्पेंड के साथ इंटर्न हैं।)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 14 फरवरी, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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