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भारत के सांसदों / विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों में सजा की दर छह फीसदी

श्रेया रमन,
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Kolkata: BJP supporters at party chief Amit Shah's rally at Kolkata's Mayo Road on Aug 11, 2018. (Photo: Kuntal Chakrabarty/IANS)
 

मुंबई: अब मिजोरम, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश चुनाव के लिए तैयार हैं । अगले साल भारत में आम चुनाव होने हैं लेकिन आपराधिक रिकॉर्ड से सांसदों और राज्य विधायकों को डरने की कोई जरूरत महसूस नहीं हो रही है। केंद्र द्वारा सुप्रीम कोर्ट को प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक भारत के सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों में से 6 फीसदी से ज्यादा में सजा नहीं मिली है।

 

3,884 ऐसे मामलों, जिसमें सजा के रुप में चुनाव लड़ने पर छह साल का प्रतिबंध लगता है, में से 38 को दोषी बताया गया था और 560 को बरी किया गया था। यह जानकारी केंद्र ने 11 सितंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट को दी है।

 

विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले

Source: Centre’s affidavit in Supreme Court, dated September 11, 2018

 

29 राज्यों में से 18 और सात केंद्र शासित प्रदेशों में से दो में विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के लिए कोई सजा नहीं थी। इन आपराधिक मामलों में हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, घृणित भाषण और आपराधिक धमकी शामिल हैं। केरल में 147 बरी और  8 को सजा, तमिलनाडु में 68 बरी और  3 को सजा और बिहार में 48 बरी और किसी को सजा नहीं। उड़ीसा में 10 को सजा,  केरल में 8 को और उत्तर प्रदेश में 5 को सजा मिली है।

 

दो साल पुराने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान जो हलफनामा दिया गया था,  उसमें आपराधिक मामलों में दोषी राजनेताओं के लिए आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। 14 दिसंबर, 2017 को, अदालत ने केंद्र को आदेश दिया कि वे इस तरह के मामलों से निपटने के लिए 12 विशेष अदालतें स्थापित करें और 1 मार्च, 2018 से काम करना शुरू किया जाए। 7.8 करोड़ रुपये के बजट के साथ आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में दो विशेष अदालतें स्थापित की गईं। अन्य 19 राज्यों और एक संघ शासित प्रदेश को लंबित मामलों को तेजी से ट्रैक करने के लिए कहा गया था।

 

मार्च की समय सीमा के छह महीने बाद, इन मामलों में से 40 फीसदी (1,233) को विशेष अदालतों में स्थानांतरित कर दिया गया, जिनमें से 136 (11 फीसदी) में निर्णय सुनाया गया था। हस्तांतरित 89 फीसदी (1,097) मामले लंबित हैं।

 

विशेष अदालतों में एमपी, एमएलए के खिलाफ लंबित मामले

जिन राज्यों के बीच लंबित मामलों की सबसे ज्यादा संख्या थी और जहां विशेष अदालतें स्थापित की गई थीं, उनमें बिहार (249) का नाम सबसे उपर है ।  इसके बाद पश्चिम बंगाल (226) और केरल (233) का स्थान रहा है।

 

केरल और पश्चिम बंगाल में, प्रत्येक में केवल एक-एक मामले का निपटारा किया गया है। उत्तर प्रदेश में, जिसमें सबसे ज्यादा मामले (565) थे, विशेष अदालत ने 21 अगस्त, 2018 को काम करना शुरू कर दिया है। तमिलनाडु में, जहां विधायकों के खिलाफ 402 मामले दर्ज किए गए थे, विशेष अदालत के लिए अधिसूचना 6 सितंबर, 2018 को जारी की गई थी।

 

विधायकों के खिलाफ मामले

Source: Centre’s affidavit in Supreme Court, dated March 12, 2018
*Data for Maharashtra and Goa sourced from Centre’s affidavit in Supreme Court, dated September 11, 2018

 

इन मामलों को तेजी से ट्रैक किया जाना चाहिए, खासतौर पर चार राज्यों (मिजोरम, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश ) और लोकसभा चुनाव जो अगले आठ महीनों के दौरान होना है, जैसा कि एक संस्था, ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) के नेशनल कोऑर्डिनेटर मेजर जनरल अनिल वर्मा (सेवानिवृत्त) ने इंडियास्पेंड को बताया है।  2014 में, एडीआर ने नेशनल इलेक्शन वॉच (एनईडब्लू) के साथ मिलकर1,200 गैर-सरकारी संगठनों के एक ऐसे अभियान में हिस्सा लिया, जो चुनावी सुधारों पर काम कर रहे थे। इस दौरान 2014 के लोकसभा चुनावों में 543 विजेताओं के 542 के आत्म-शपथ शपथ पत्रों का विश्लेषण किया  और पाया कि गैर-आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की तुलना में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के जीतने की संभावना दोगुनी थी।

 
आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार के जीतने की संभावना 13 फीसदी थी, जबकि गैर-आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के जीतने की संभावना 5 फीसदी थी।
 

 वर्मा कहते हैं, “लोगों को लगता है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले विधायक काम को लेकर नौकरशाहों या सरकार के निचले स्तर के कर्मचारियों पर ज्यादा दवाब बना सकते हैं। हालांकि ग्रामीण इलाकों में लोग आपराधिक मामलों को ज्यादा महत्व नहीं देते हैं। वे सोचते हैं, ‘अगर वह अपना काम पूरा कर लेता है, तो ठीक है, हम उसके लिए वोट देंगे। “

 
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि दोषी विधायकों के लिए रेप्रिज़ेन्टटिव्स ऑफ पीपुल्स एक्ट (1951) में जो प्रावधान है, वह पर्याप्त नहीं हैं। याचिकाकर्ता और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने इंडियास्पेंड को बताया कि छह साल तक प्रतिबंध पर्याप्त नहीं है।
 

 उपाध्याय कहते हैं, “अन्य सिविल सेवकों की तुलना में विधायकों के लिए रेखा और बड़ी खींची जानी चाहिए। सिविल सेवकों को उस समय निलंबित कर दिया जाता है, जब पुलिस उनके खिलाफ चार्जशीट दर्ज करती है और  केवल अदालत से बरी होने के बाद ही वापस काम शुरु करते हैं। लेकिन बलात्कार, अपहरण, हत्या और घृणास्पद भाषण सहित कई मामले दर्ज होने के बावजूद इतने सारे राजनेता पदों पर बने रहते हैं। ” अप्रैल 2018 में एडीआर द्वारा किए गए एक विश्लेषण में पाया गया कि 48 विधायकों पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के लिए आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे। अप्रैल 2018 में जारी एक अन्य रिपोर्ट में पाया गया कि 58 विधायकों पर नफरत भरे भाषणों को लेकर मामला दर्ज है।

 
( श्रेया रमन विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 19 सितंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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