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भारत में जज से लेकर श्रमिकों तक यौन उत्पीड़न का दंश

नमिता भंडारे,
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यातायात अदालत में हमेशा भीड़ रहती है और किसी भी मजिस्ट्रेट, पुरुष या महिला के लिए काम निपटाना कोई आसान काम नहीं है। छोटे-मोटे यातायात जुर्माने पर भी वकीलों से गालियां सुनने को मिलती हैं। जब उन्होंने मामूली यातायात अपराध के लिए एक प्रतिकूल आदेश पारित किया, तो युवा महिला मजिस्ट्रेट, अपने खिलाफ खुले अदालत में पुरुष वकील द्वारा किए गए मौखिक हमले के लिए तैयार नहीं थी। खुले कोर्ट में वह वकील हिंदी में चिल्लाया, “तेरी औकात क्या है? तेरी चड्डी फाड़ के रख दूंगा।”

 

उनके अंदर से एक आवाज आई और उन्होंने एफआईआर दर्ज करा दी। लेकिन दो महीने बाद भी चार्जशीट दाखिल नहीं हुई थी। अन्य जजों और वकीलों ने विनम्रता से कहा था कि वह इस तरह के मुकदमे में ‘शर्म’ का सामना कैसे करेगी?  उन लोगों ने सलाह दी कि ‘सुलह’ करना  बेहतर होगा।

 

लेकिन महिला मजिस्ट्रेट ने हार नहीं मानी है। भले ही मामला लगभग दो साल से चल रहा हो। सीनियर वकील वृंदा ग्रोवर को एमीस क्यूरी नियुक्त किया गया है । हर कोई समाधान निकालने की कोशिश कर रहा है, जिससे कम से कम मैजिस्ट्रेट की गरिमा की कुछ हद तक रक्षा तो हो।

 

नई दिल्ली: ऐसा नहीं है कि आप प्रभावशाली हैं तो आप यौन उत्पीड़न से बच जाएंगें। अभिनेता से मजिस्ट्रेट तक कोई भी इससे अछूता नहीं है। हॉलीवुड के मोगुल हार्वे वेन्स्टीन को इस बात का श्रेय देना चाहिए, जिन्होंने घर और कार्यस्थल पर हर रोज की यौन उत्पीड़न को दर्शाया।

 

निचली अदालतों में वकील अनादर से बात कर सकते हैं। अश्लील और व्यक्तिगत टिप्पणी पास कर सकते हैं, सीधे तौर पर जजों से नहीं लेकिन इतनी दूरी से कहते हैं कि महिला जजों के कानों तक आवाज सुनाई जा सके, जैसा कि एक महिला जज ने नाम न बताने की शर्त पर बताया है।

 

उन्होंने बताया कि, “हम में से अधिकांश इसे अनदेखा करते है।”  जब वे बोलते हैं या शिकायत करते हैं, तो महिला मैजिस्ट्रेट को अक्सर बार और यहां तक कि उनके पुरुष सहयोगियों द्वारा ‘समझौता’ कर लेने की सलाह दी जाती है। अक्सर मात्र माफी  मांग लेने के बाद मामले को रफा दफा कर दिया जाता है। एक महिला मजिस्ट्रेट ने बताया कि, “मुझे नहीं मालूम कि न्यायाधीशों को यौन उत्पीड़न की शिकायतें रिपोर्ट करने के लिए कोई मंच है भी या नहीं। पुरुष न्यायाधीश भी समाज का एक हिस्सा हैं। उच्च न्यायालयों में इस तरह की घटनाओं के प्रति वे संवेदनशील नहीं हैं। “वर्ष 2014 में, मध्य प्रदेश के जिला और सत्र न्यायालय में एक महिला न्यायाधीश ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एस के गंगाले के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की समिति ने उनके खिलाफ “अपर्याप्त सबूत” पाया था।

 

अप्रैल 2015 में, 58 राज्य सभा के सांसदों ने गंगेले के महाभियोग की मांग पर हस्ताक्षर किए और तत्कालीन राज्यसभा अध्यक्ष हामिद अंसारी ने तीन विधिवेत्ताओं के दल को नियुक्त किया, जिसने इस साल सितंबर में उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस बीच, महिला न्यायाधीश ने 2014 में अपनी नौकरी छोड़ दी।

 

दिल्ली के वकील वृंदा ग्रोवर कहती हैं, “अगर महिला न्यायाधीशों की ऐसी स्थिति है, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि महिला वकीलों की स्थिति कैसी होगी। युवा महिला वकील विशेष रूप से कमजोर होती हैं, क्योंकि कानूनी पेशा वरिष्ठ या अनुभवी वकील द्वारा सलाह पर आधारित होते हैं। किन चैंबर को अनदेखा करना है, वे जल्द ही सीख जाते हैं। “

 

ग्रोवर की बात से इस समस्या की गंभीरता का पता चलता है। कम से कम वकीलों के लिए यौन उत्पीड़न की शिकायतों का समाधान करने के लिए दिल्ली में जिला और उच्च न्यायालयों के लिए एक आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) का गठन किया गया है।

 

ग्रोवर कहती हैं, “न्यायिक अधिकारियों, वकीलों और अदालत के कर्मचारियों के रूप में बड़ी संख्या में महिलाओं की बढ़ती उपस्थिति ने अदालतों में महिलाओं की उपस्थिति को सामान्य बनाने में भी मदद की है।”

 

ग्रोवर कहती हैं, “निश्चित रूप से, हम में से कुछ को नारीवादी कार्यकर्ताओं के रूप में चिह्नित किया गया है लेकिन पेशे में सभी की व्यापक समझदारी बनने के लिए समानता और गरिमा की धारणा को समय लगेगा। “

 

ग्रोवर बीते दिनों की बात करती हैं। अस्सी के दशक में जब उन्होंने काम करना शुरु किया तो बहुत कम महिलाएं आपराधिक कानून के पेशे में थी। ग्रोवर बताती हैं, “मुझे हर तरह की यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। पुरुष वकीलों द्वारा मेरे टेबर पर प्यार के नोट गिराने से लेकर जबरदस्ती मुझे छू कर निकलने तक। एक बार तो एक व्यक्ति ने कार से मेरे घर तक मेरा पीछा किया दिलचस्प बात यह है कि मैंने क्लाइंट द्वारा कभी यौन उत्पीड़न का सामना नहीं किया है, बल्कि पुरुष सहयोगियों द्वारा सामना करना पड़ता है। “

 

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का कोई डेटा नहीं

 

कानूनी पेशे में महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है। महिलाएं आईटी सेक्टर, एविएशन उद्योग में शामिल हो रही हैं और फायर बिग्रेड में काम कर रही हैं तो ऐसा लग सकता है कि महिलाएं रुढ़िवादी परंपराओं को तोड़ रही हैं और ज्यादा से ज्यादा संख्या में कार्यस्थल में प्रवेश कर रही हैं।

 

लेकिन वास्तविकता यह है कि इसका उल्टा हो रहा है और दो दशकों में भारत की महिला श्रम बल की भागीदारी 34.8 फीसदी से घटकर 27% फीसदी हो गई है, जो पाकिस्तान के बाद दक्षिण एशिया में सबसे कम है।

 

हमारी राष्ट्रव्यापी जांच से पता चलता है कि इसका कारण परिवार की बाधाओं से लेकर अवैतनिक देखभाल जैसे कामों का बोझ है। क्या कार्यबल की भागीदारी और यौन उत्पीड़न के बीच कोई संबंध है? चूंकि यौन उत्पीड़न के मामलों में वृद्धि हुई है और महिलाओं को रोजगार के नक्शे में गिरावट जारी है तो इस सवाल का भी औचित्य है।

 

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के सामाजिक और कानूनी पहल पर डॉक्टरेट की थीसिस लिखने वाली एक शोधकर्ता अनघा सरपोतदार कहती हैं, “इस संबंध में कोई अध्ययन मौजूद नहीं है, इसलिए यौन उत्पीड़न और महिला श्रम शक्ति भागीदारी के बीच एक संबंध स्थापित करना मुश्किल है।” हमारे पास एकमात्र सबूत वास्तविक घटना है।

 

रेबेका जॉन, एक वरिष्ठ वकील जिन्होंने यौन उत्पीड़न के अधिक मामलों पर काम किया है, कहते हैं कि जिन लोगों ने भी शिकायत की है, वह किसी भी जांच के परिणाम से खुश नहीं है। कुछ अवसाद में चले गए। कुछ को खुद से घृणा होने लगी और कुछ ने तो स्वंय को मारने की भी कोशिश की।

 

एक टीवी चैनल की युवा समाचार एंकर आत्महत्या के प्रयास से बच गई, लेकिन उनके शक्तिशाली नियोक्ताओं ने यह सुनिश्चित किया कि उन्हें मीडिया में कहीं और नौकरी नहीं मिलेगी। वह अब किसी और पेशे में दूसरे शहर में काम करती है।

 

एक महिला शोधकर्ता ने फरवरी 2015 में अपने टीईआरआई के तत्कालीन बॉस, आर के पचौरी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी और आज तक नौकरी छोड़ न्याय का इंतजार कर रही हैं।

 

29 अक्तूबर, 2017 को प्रकाशित, इंडियास्पेंड को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि उन्हें अपने ऑफिस के केबिन में जाने से भी डर लगता था।

 

वकील सोनल मट्टू कहती हैं, “कई महिलाएं इसलिए नौकरी से बाहर हो जाती हैं क्योंकि टीम में उनके खिलाफ बातें बननी शुरु हो जाती है, जिसे सहना उनके लिए असहज बन जाता है।” मट्टू कई आंतरिक शिकायत समितियों (आईसीसी) में शामिल हैं और दिशानिर्देशों को बनाने, प्रशिक्षण देने और शिकायतों को हल करने में मदद करती है।

 

मट्टू आगे कहती हैं, “कुछ शिकायत करने की बजाय नौकरी छोड़ देती हैं। और इसका कारण जानने की कोशिश की गई तो जवाब कुछ ऐसे होते थे जैसे मैं बहुत कनिष्ठ थी, वह बहुत वरिष्ठ था,  मुझ पर कौन विश्वास करेगा या फिर पता नहीं था कि किस के पास जाना है या फिर प्रतिष्ठा खोने का डर था।”

 

भारतीय राष्ट्रीय बार एसोसिएशन (आईएनबीए) द्वारा 6,047 कर्मचारियों का जनवरी 2017 के सर्वेक्षण ( भारत में अब तक का सबसे बड़ा आयोजन ) में पाया गया है कि यौन उत्पीड़न के शिकार सभी अलग पृष्ठभूमि, उम्र और व्यवसायों से आए थे। अपराधी विक्रेताओं, आपूर्तिकर्ताओं, प्रबंधकों, पर्यवेक्षकों और जाहिर है, सहयोगी हो सकते हैं। और यौन उत्पीड़न अश्लील प्रतिक्रियाओं से लेकर किसी प्रकार की यौन मांग तक हो सकती है।

 

आईएनबीए के सर्वेक्षण में पाया गया कि 70 फीसदी महिलाओं ने यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट नहीं की है।

 

वर्ष 2010 में,  सेंटर ऑफ ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया में पाया गया कि पांच शहरों के आईटी और बीपीओ सेक्टरों में 19 से 45 साल के बीच 600 में से 88 फीसदी महिलाओं ने यौन उत्पीड़न का सामना किया है।

 

200 महिला प्रबंधकों में लगभग 44 फीसदी ( जिनमें से 144 स्नातकोत्तर और उपरोक्त थे और  निजी संगठनों में कार्यरत थे ) ने कहा कि उन्होंने अपने स्वयं के कार्यस्थलों में यौन उत्पीड़न के मामले के बारे में सुना है, जबकि 15 फीसदी ने कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से इसका अनुभव किया है, जैसा कि इकोनोमिकल एंड पलिटकल वीक्ली की जून 2017 के अध्ययन में बताया गया है।  यह अध्ययन आईआईएम (लखनऊ) के साथ अम्बेडकर विश्वविद्यालय के महिला और लिंग अध्ययन विभाग के पूर्व प्रोफेसर पूनम सहगल और दिल्ली में रिसर्च स्कॉलर आस्था डैंग द्वारा आयोजित किया गया था। अध्ययन छोटा होने के बावजूद, इन महिलाओं के साथ विस्तृत साक्षात्कारों से पता चलता है कि कार्यस्थलों पर उनको दिक्कतों का सामना करना पड़ा है।

 

महिलाओं द्वारा रिपोर्ट की गई यौन उत्पीड़न में व्यवहार से लेकर (स्तब्ध होने वाले पाठ संदेश भेजना, उन्हें अपने कमरे में आमंत्रित करना, काम के लिए बाहर ट्रीप के दौरान ‘एक-दूसरे को बेहतर जानना’) मौखिक रुप (अंतरंग विवरणों पर चर्चा करना) तक शामिल है। कम से कम 23.3 फीसदी ने शारीरिक उत्पीड़न का अनुभव किया।

 

पर्यवेक्षकों की तुलना में सहयोगियों और समर्थकों के अपराधी होने की संभावना ज्यादा थी। अधीनस्थों द्वारा उत्पीड़न कम से कम था, कम से कम इस अध्ययन में शामिल किए गए लोगों के बीच। ऑफ-साइट्स, ऑफिस पार्टी और फील्ड ट्रिप्स के दौरान यौन उत्पीड़न की घटनाएं ज्यादा देखी गई हैं।

 

अनुभव किए गए यौन उत्पीड़न के प्रकार

Source: Sexual Harassment at Workplace, Experiences of Women Managers and Organisations, Punam Sahgal, Aastha Dang, published in Economic & Political Weekly, June 2017.Note: Sample size: 30 of 200 women managers private organisations who faced harassment

 

Source: Sexual Harassment at Workplace, Experiences of Women Managers and Organisations, Punam Sahgal, Aastha Dang, published in Economic & Political Weekly, June 2017.Note: Sample size: 30 of 200 women managers private organisations who faced harassment

 

महिलाओं ने यह भी कहा उन्हें घटना से ज्यादा ‘शिकायत तंत्र’ से निपटना ज्यादा तनावपूर्ण लगा। अक्सर यह पाया गया कि उत्तरदाता इस बात से अनजान थे कि प्रक्रिया कैसे काम करती थी और इसके अलावा, सबूत-आधारित न्याय प्रणाली भी बोझिल थी।

 

रिपोर्ट कहती है कि जब संगठन ऐसे गुनाहगारों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, तो भी कार्यवाही करने की प्रवृति  लाज रखने के अभ्यास के रूप में होती है न कि यौन उत्पीड़न के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के रुप में।

 

घरेलू श्रमिक कभी यौन उत्पीड़न की शिकायत क्यों नहीं करते ?

 

जब वह एक घर में काम करती थी तो बुजुर्ग से दिखने वाले दादाजी उसके पीछे लग जाते । उसके पीछे-पीछे चलते, जब वह पोंछा लगाती तो उसे पीछे से पकड़ लेते और कभी-कभी तो रात को जब वो सो रही होती तो उसके कमरे के दरवाजे पर दस्तक भी देते थे।

 

जब परिवार के बाकी सदस्य बाहर जाते तो वो घर में रुकने का बहाना बना लेते । क्योंकि वह उनके घर में ही रह कर घरेलू कार्य करती थी तो उनके पास बचने का रास्ता नहीं था। वह कहती हैं कि यह एकदम नर्क जैसा था। उसकी उम्र केवल 15 साल है।

 

कचरा बिनने वाले छह लोगों के परिवार में से उस एक ने कहा “मुझे पैसे और नौकरी की सख्त ज़रूरत थी”। अब भी वह अपने परिवार की मुख्य कमाने वाली है। वह अपनी मां को भी नहीं बता सकती थी। वह कहती है, “वह क्या करती? मुझे पैसे उन्हें भेजने थे । पिता की मृत्यु के बाद पैसा कमाना और जरुरी हो गया था।” जब उसने अपनी जगह किसी अन्य काम करने वाली को वहां भेजा तो वह ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सकी। वह बताती हैं, “वह गंदा बूढ़ा आदमी उसे भी परेशान करता था।”

 

उसने उन बुजुर्ग व्यक्ति से कहा कि अगर वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आए तो वो शिकायत करेगी। इस बात पर उन्होंने अपने मजबूत नेटवर्क होने का धौंस दिखाया। बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा कि वे बहुत से लोगों को जानते हैं और उसे चोरी के इल्जाम में फंसा देंगे। पुलिस किस पर भरोसा करेगी?

 

आखिरकार एक साल के बाद जब अपनी नौकरी छोड़ी तो उनके नियोक्ता ने नोटिस के बदले 2,000 रुपए काट लिए।

 

वर्ष 2013 में, यौन उत्पीड़न के खिलाफ व्यापक राष्ट्रव्यापी विरोध के बाद, संसद ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम बनाया था। यह कानून, राजस्थान सरकार की राज्य सरकार द्वारा कार्यरत एक सामाजिक कार्यकर्ता के सामूहिक बलात्कार के बाद, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी किए गए विशाख निर्देशों के बाद कानून 16 साल बाद आया था।

 

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न पर चर्चा कार्यालय या कॉर्पोरेट सेटिंग तक ही सीमित है। फिर भी, भारत की लगभग 94 फीसदी रोजगार वाली महिलाएं अनौपचारिक क्षेत्र में काम करती हैं, जिनमें से लगभग 20 फीसदी कस्बों और शहरों में काम करती हैं। इन महिलाओं में से करीब आधी अपने परिवारों की एकमात्र आय स्रोत हैं। ट्रेड यूनियनों में सिर्फ 7.5 फीसदी पंजीकृत हैं।

 

सेक्टर के अनुसार, कहां-कहां से मिली शिकायतें

Source: Sexual Harassment at Workplace, January 2017, Indian National Bar Association

 

कागज पर, यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानून को सभी तरह की नौकरियों में महिलाओं की रक्षा के रूप में देखा जाता है। यहां तक ​​कि असंगठित क्षेत्र में भी। लेकिन जमीनी  वास्तविकता बहुत अलग है

 

पीआरआईए ( सोसाइटी फॉर पार्टिसिपेट्री रिसर्च इन एशिया )की सीनियर प्रोग्राम मैनेजर, नंदिता प्रधान भट्ट कहती हैं, “एक घरेलू कार्यकर्ता कैसे साबित करेगी कि वह नियोजित है? रोजगार का प्रमाण क्या है? पहचान पत्र केवल सहाधिकार में कुछ को दिया जाता है कार्ड केवल इस बात का संकेत देता है कि उन्हें पुलिस की मंजूरी मिली है और इसलिए, काम करने के लिए सुरक्षित हैं। “

 

पीआरआईए और मार्था फैरेल फाउंडेशन द्वारा आयोजित नई दिल्ली में घरेलू श्रमिकों के लिए यौन उत्पीड़न पर अक्टूबर, 2017 में एक कार्यशाला में, महिलाओं ने हर रोज यौन उत्पीड़न की सीमा के बारे में बताया।

 

पुरुष नियोक्ता उनकी उपस्थिति में अश्लील साहित्य देखते हैं या अश्लील साहित्य खुला छोड़ देते हैं। कुछ लोग तौलिया में बाथरूम से बाहर आ जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी है तो महिलाओं को काम करते हुए घूरते हैं और शारीरिक हमला भी होता है।

 

कभी-कभी अपराधी मालिक नहीं होता है, लेकिन अन्य पुरुष स्टाफ होते हैं जहां वे काम करते हैं। वे कहती हैं, “अपराधियों में सुरक्षा गार्डों की संख्या ज्यादा है।”

 

कानून के तहत,  श्रमक्षेत्र की सभी महिलाएं यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कर सकती हैं। इसमें असंगठित क्षेत्र में कार्यरत महिलाएं  भी हैं, जो कृषि में और घरेलू श्रमिक के रूप में काम करती हैं।ये महिलाएं स्थानीय शिकायत समिति के साथ शिकायत दर्ज कर सकती हैं, जो कि हर जिले में एक जिला अधिकारी द्वारा गठित की जाती है। एक स्वंयसेबी संस्था, मार्था फैरेल फाउंडेशन के अनुसार,  दिल्ली में केवल दो ऐसी समितियां बनाई गई थीं। गुडग़ांव के मिनी सचिवालय में केवल एक बनाई गई थी, जैसा कि भट्ट ने कहा है।

 

भट्ट सवाल उठाती हैं, “एक घरेलू कार्यकर्ता कैसे जिला मुख्यालय तक जा कर शिकायत दर्ज कराने के बारे में सोच सकती हैं? जब उसका निवास स्थान और काम की जगह कभी-कभी एक-दूसरे से काफी दूरी पर हो सकते हैं। उन्हें इस बारे में कोई जानकारी भी नहीं होती है कि वह किससे शिकायत कर सकती है और कैसे कर सकती है? “

 

आश्चर्यजनक है कि  अभी तक कोई  औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं की गई है। इनमें से अधिकांश महिलाएं ऐसी होती हैं, जो अपने परिवार की मदद के लिए नौकरी करती हैं, जब तक वे यौन उत्पीड़न सहन कर सकती हैं, करती हैं। और जब चीजें सहन से बाहर होती हैं तो नौकरी छोड़ देती हैं।

 

ज्यादातर मामलों में, महिलाएं ऐसी घटनाएं अपने परिवारों को भी बताने से भी कतराती हैं।भट्ट कहती हैं, “मैं एक भी घरेलू कार्यकर्ता के बारे में नहीं जानता जिसने कभी यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई है और न्याय प्राप्त किया है।”

 

घरेलू कार्यकर्ता, विशेष रुप से महिला घरेलू कार्यकर्ता शहरी भारत के अनऔपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों का प्रगतिशील वर्ग है, जैसा कि 2010 की  एक गैर लाभकारी संस्था जागोरी की रिपोर्ट डोमेस्टिक वर्कर्रस – कंडिशनस, राइट्स एंड रेसपांस्बिलिटिज में बताया गया है।

 

वर्ष 2004-05 में शहरी भारत में 3.05 मिलियन घरेलू कार्यकर्ता थे। यह संख्या 1999-2000 की तुलना में 222 फीसदी ज्यादा था। रिपोर्ट कहती है कि इस वृद्धि संबंध कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से निर्माण एवं सेवा आधारित अर्थव्यवस्था में हुए बदलाव से है।

 

यह घरेलू कार्यकर्ताओं की सेना है जिसने कई मध्यम वर्गिय परिवार की महिलाओं को बाहर जा कर काम करने के लिए सक्षम बनाया है। यह घरेलू कार्यकर्ता कम आय और करीब बिना किसी नौकरी की सुरक्षा ( यौन उत्पीड़न के खिलाफ भी नहीं ) के खाना बनाने, सफाई करने और घर के अन्य काम करने में मदद करती हैं।

 

‘किसी को नहीं पता कि इस संबंध में क्या करना चाहिए’

 

करीब 17 सालों तक श्यामा ( बदला हुआ नाम ) एक प्रकाशन हाउस के मानव संसाधन विभाग के साथ काम किया है। जब  किसी विदेश प्रकाशन कंपनी ने इसे अधिगृहित किया तो उसकी नौकरी की प्रोफाइल बदल गई और उसने प्रबंध निदेशक को रिपोर्ट करना शुरू कर दिया। श्यामा ने उनके संबंध में अफवाहें सुनी थी, लेकिन तब ध्यान नहीं दिया था।

 

इसका पता तब चला जब श्यामा ने उनके साथ करना शुरु किया। वह कई घंटे उनके साथ बैठ कर बातें करता रहता और ऐसी बातें जिनका काम से कुछ लेना-देना नहीं होता। वह कहता, “मैं तुम्हारा मेंटर हूं। तुम मुझे कुछ भी बता सकती हो। एक आदमी के रूप में, मैं तुमको खुशी प्रदान कर सकता हूं।” वह श्यामा को अपनी ‘प्रोफेशनल वाइफ’ बुलाता। उसने उन्हें हस्तमैथुन करने की सलाह दी।

 

श्यामा को मुंबई कार्यालय स्थानांतरित किया गया। उसने श्यामा को वेलेंटाइन कार्ड भेजा।

 

तब श्यामा ने फोन पर होने वाली बातचीत को रिकॉर्ड करना शुरु किया। अगर काम के सिलसिले में उन्हें बाहर यात्रा करना पड़ता तो श्यामा अपने लिए अलग हवाई जहाज की टिकट लेती। ऑफिस की पार्टी में उन्होंने शराब पी और नशे की हालत में दुर्व्यवहार किया गया। उन्होंने हेड ऑफिस में शिकायत की। जुलाई 2016 में, कंपनी ने आईसीसी का गठन किया गया जिसके बाद श्यामा में दो पृष्ठ की औपचारिक शिकायत की। सबूत के तौर पर फोन रिकॉर्डिंग और वेलेंटाइन कार्ड को सौंप दिया। उसके पक्ष में आठ गवाह थे।

 

आईसीसी ने फैसला सुनाया कि कोई यौन उत्पीड़न नहीं हुआ है, लेकिन ‘कार्रवाई’ करने का वादा किया।

 

लेकिन कार्रवाई करने की बजाय कंपनी ने श्यामा से सारा काम ले लिया। श्यामा ने ग्लोबल सीईओ से सारे मामले की जांच दोबारा कराने की अपील की। उनसे उनकी कार पार्किंग की जगह ले ली गई। जो लोग श्यामा को काम में रिपोर्ट करते थे, उनसे उन्हें रिपोर्ट न करने के लिए कहा गया। उन्हें अब किसी मीटिंग में नहीं बुलाया जाता था। वे बिना किसी काम के नौ घंटे ऑफिस में बैठा करती।  

 

इस साल मार्च में जब उन्होंने इस्तीफा दिया तो उन्हें पूरे पैसे भी नहीं दिए गए।

 

श्यामा कहती हैं, “जब कार्यस्थल पर आपके साथ यौन उत्पीड़न होता है तब आप जिस मानसिक स्थिति से गुजरते हैं यह कोई समझ नहीं सकता है। और जब आप मेरी तरह सिंगल होते हैं तो लोग कहते हैं…अच्छा….इसने ऐसा पैसों के लिए किया होगा। कानूनी व्यवस्था बहुत बोझिल है। वकीलों के लिए आप बस एक केस ही हैं। ”

 

वह आगे कहती हैं, “कोई जागरूकता नहीं है। आपको निर्देशित या मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं है। पेशे के भीतर, आपको एक ‘समस्या-निर्माता’ के रूप में ब्रांडेड किया गया है और कोई भी आपको कोई भी काम नहीं  देगा। लगभग 20 वर्षों के बाद प्रकाशन के क्षेत्र में मेरा कैरियर खत्म हो गया है। लेकिन मैं इसे लड़ूंगी और अब कानून की डिग्री की पढ़ाई भी कर रही हूं ताकि मैं इसे तार्किक अंत तक ले जा सकूं और न्याय प्राप्त कर सकूं।”

 

यौन उत्पीड़न की शिकायतों का बढ़ता ग्राफ

Source: Reflections on the State of Women Safety in the Workplace quoting National Commission for Women, EY’s Fraud Investigation & Dispute Services and FICCI, March 2017

 

इस महिला को सुनने के बाद  यह समझना मुश्किल नहीं है कि इतने सारे लोग एक सार्वभौमिक अनुभव के रूप में क्यों चुप हैं? महिलाएं पांच कारणों से रिपोर्ट दर्ज नहीं कराती हैं। यह सुनिश्चित नहीं है कि उत्पीड़न के तहत क्या चीजें शामिल हैं , शिकायत प्रक्रिया में विश्वास की कमी, प्रतिशोध का डर, एक भरोसा कि वह अपने दम पर स्थिति को संभाल सकती है और सामाजिक कलंक।

 

मुख्यतः महिलाएं कार्यस्थलों के भीतर शक्ति या प्रभाव संबंधों की वजह से नहीं बोलती हैं। एक महिला किसी बॉस द्वारा यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट करती है, तो उसका कैरियर निश्चित रूप से प्रभावित होगा, जैसा कि सरपोतदार बताती हैं। वह कहती हैं, “यौन उत्पीड़न की प्रकृति ऐसी है कि उत्पीड़न करने वाला आमतौर पर शिकायतकर्ता से अधिक शक्तिशाली होता है। यही कारण है कि बहुत से महिलाएं नौकरी छोड़ देती हैं। ”

 

रेबेका जॉन कहती हैं, क्या कोई ऐसी महिलाओं की गिनती रख रहा है जिन्हें बोलने कि हिम्मत करने के कारण नौकरी छोड़ना पड़ता है? कोई डेटा नहीं है। लेकिन मैं ऐसे तीव्र और अत्यधिक उत्पीड़न वाले मामलों के बारे में जानती हूं, जहां महिलाएं काम पर वापस नहीं जाना चाहती हैं।

 

जॉन कहती हैं, महिलाएं जो कानूनी अधिकारों पर जोर देती हैं उन्हें नकारात्मक भावनाओं के साथ देखा जाता है। “उनके पास आवश्यक योग्यता हो सकती है, लेकिन नौकरियों को खोजने में सक्षम नहीं हैं।”

 

अपराध के रुप में दर्ज यौन उत्पीड़न

Source: National Crime Records Bureau 2015 and 2014

 

‘सिक्यूरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया’ द्वारा गठित किए गए विनियमन को सूचिबद्ध कंपनियों की आवश्यकता है, ताकि प्राप्त यौन उत्पीड़न शिकायतों की कुल संख्या का पता लगाया जा सके।

 

वर्ष 2016-17 के लिए, विप्रो ने कुल 116 मामलों की रिपोर्ट की है, इनफोसिस में 88, और टीसीएस में 65 मामले दर्ज किए गए हैं। बैंकों में, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में 21 मामले और कोटक महिंद्रा में 19 मामले दर्ज किए गए हैं। टाटा स्टील में 26, भारती एयरटेल में पांच और महिंद्रा एंड महिंद्रा में चार मामले दर्ज हुए हैं।

 

कानून के अनुसार, 10 कर्मचारियों से अधिक वाली कंपनियों के पास चार सदस्यों की आईसीसी होनी चाहिए। जिनमें से एक बाहरी सदस्य किसी महिलाओं के क्षेत्र में काम करने वाली एनजीओ से होना चाहिए। कंपनी कर्मचारियों को जानकारी देने और तंत्र प्रणाली की प्रक्रिया के संबंध में जागरुकता फैलाने के लिए भी जिम्मेदार है।

 

मट्टू कहती हैं, “शुरुआती वर्ष कानून के साथ मात्र अनुपालन थे, मनोवृत्ति में चिन्ह लगाना जैसे।लेकिन हाल के दिनों में मैंने देखा है कि कंपनि जागरुकता फैलाने में जुटी है। इससे अनुपालन और आसान होता है। कंपनि अब प्रशिक्षण में पैसे निवेश करने और अधिक जावाबदेही के लिए अपने कर्मचारियों तक तीसरे पक्ष  पहुंच बनाने के लिए तैयार हैं।“

 

सरपोतदार कहती हैं, “लेकिन सरकार की निगरानी ढीली है। ऑनलाइन शिकायतों के लिए तंत्र जरुर है लेकिन सरकार नियोक्ता की तरह काम करती है न कि मॉनिटर की तरह। निजी क्षेत्र और शिक्षण संस्थान में विशेष रुप से कोई निगरानी नहीं होती है।”

 

7 नवंबर 2017 को, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने अपने शिकायत तंत्र का विस्तार किया है। इसके तहत सरकारी क्षेत्रों के साथ निजी क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है। सरपोतदार कहती हैं, “आईसीसी के प्रदर्शन की निगरानी के लिए यह सरकार की ओर से प्रयास नहीं दिखते हैं, लेकिन यह महिला राष्ट्रीय आयोग के ऑनलाइन शिकायत तंत्र की तरह अप्रभावी नहीं होना चाहिए। ”

 

वैश्विक स्तर पर #MeToo अभियान महिलाओं के साथ बड़े स्तर पर हुए यौन उत्पीड़न का खुलासा करता है। जॉन कहती हैं, “यह दर्शाता है कि समस्या उससे भी बड़ी है जितनी हम इसे स्वीकारने को इच्छुक हैं। और दुखद यह है कि किसी को पता नहीं है कि इस संबंध में क्या करना है। ”

 

भारतीय महिलाओं का श्रमबल से बाहर होने के कारणों पर देश भर में चल रही हमारी पड़ताल का यह छठा लेख है।

 

पहले के लेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

 

क्यों भारतीय कार्यस्थलों में कम हो रही है महिलाओं की संख्या –

 

नौकरी पर महिलाएं : हरियाणा की एक फैक्टरी में उम्मीद के साथ परंपरा का टकराव

 

घरेलू कामों के दवाब से महिलाओं के लिए बाहर काम करना मुश्किल, मगर अब बदल रही है स्थिति

 

भारत की शिक्षित महिलाएं ज्यादा छोड़ रही हैं नौकरियां

 

हिमाचल प्रदेश की महिलाएं क्यों करती हैं काम: एक जैम फैक्टरी के पास है इसका जवाब

 

(भंडारे पत्रकार हैं और दिल्ली में रहती हैं। वे अक्सर भारत के उन लैंगिक के मुद्दों पर लिखती हैं, जिनका सामना समाज कर रहा होता है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 18 नवंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। हमसे respond@indiaspend.org पर संपर्क किया जा सकता है। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार रखते हैं।

 
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