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भारत में ड्रग-प्रतिरोधी टीबी रोगियों के निदान में होती है देरी

कश्यप रायबागी,
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मुंबई: भारत में ड्रग-प्रतिरोधी टीबी (डीआर-टीबी) के रोगियों के निदान में देरी होती है। वे सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली दोनों से अलग-अलग उपचार के तरीके और निजी स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र में अलग-अलग प्रदाताओं से समान उपचार के अलग-अलग लागत का सामना करते हैं। यह जानकारी, एक वैज्ञानिक पत्रिका ‘पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस’ (पीएलओएस) में प्रकाशित जनवरी- 2019 के एक अध्ययन में दी गई है।  2017 में,  टीबी के मामले में दुनिया में भारत की सबसे अधिक (27 फीसदी) हिस्सेदारी थी और वैश्विक स्तर पर सभी टीबी के मामलों में चौथाई से अधिक, करीब 27 लाख की संख्या थी। साथ ही, 32 फीसदी मौतों का (421,000) का कारण ( टीबी से होने वाली सभी मौतों में से एक तिहाई ) यह बीमारी रही है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जनवरी 2019 की रिपोर्ट में बताया है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के नेशनल एंटी-ट्यूबरकुलोसिस ड्रग रेजिस्टेंस सर्वे2016 के अनुसार अनुमानित 2.79 लाख नए टीबी रोगी सालाना जुड़ते हैं।  भारत में ड्रग-प्रतिरोधी टीबी के मामलों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी (24 फीसदी) भी है,  यानी एक या अधिक पहली पंक्ति की दवाओं के लिए प्रतिरोधी मरीज का इलाज अधिक सामान्य, दवा-संवेदनशील टीबी के लिए किया जाता है।

 

2017 में भारत में लगभग 135,000 डीआर-टीबी मरीज थे, जिनमें से 124,200 (92 फीसदी) को बहु-दवा प्रतिरोधी टीबी था। पीएलओएस अध्ययन के अनुसार, बाद में, 31,547 (25.4 फीसदी) में बड़े पैमाने पर दवा-प्रतिरोधी (एक्सडीआर) और 1,615 (1.3 फीसदी) एक्सडीआर-टीबी मरीज थे। निदान और उपचार का अंतराल छोड़ते हुए 2017 में, भारत में केवल 39,009 या 28 फीसदी डीआर-टीबी मामलों का निदान किया गया था और केवल 35,950 या 26 फीसदी का इलाज किया गया था, जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है।  सेंट्रल टीबी डिवीजन की इंडिया टीबी रिपोर्ट-2018 के अनुसार, मुंबई जैसे बड़े महानगरीय शहरों में डीआर-टीबी के मामलों की ज्यादा हिस्सेदारी है। इसका मुख्य कारण है कि 2011 की जनगणना के अनुसार मुंबई की 1.24 करोड़ आबादी में से लगभग 42 फीसदी लोग स्वास्थ्य सेवाओं की खराब पहुंच के साथ झुग्गियों में भीड़-भाड़ की स्थिति में रहते हैं। इन बड़े शहरों में स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं और नैदानिक ​​सुविधाओं की बड़ी संख्या है, और उपचार और लागत दोनों के दृष्टिकोण अलग-अलग होते हैं। भारत डीआर-टीबी मामलों की बढ़ती संख्या के इलाज और निजी उपचार सुविधाओं को विनियमित करने की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है, जैसा कि पीएलओएस के अध्ययन में कहा गया है। अध्ययन का उद्देश्य उपचार की मांग करते समय डीआर-टीबी रोगियों की समस्याओं को उजागर करना है। टीबी निदान में देरी के कारणों को समझने के लिए, पीएलओएस ने अपने स्वास्थ्य की मांग व्यवहार (एचएसबी) की जांच करने के लिए मुंबई में 46 डीआर-टीबी रोगियों के बीच एक सर्वेक्षण किया। पीएलओएस अध्ययन के अनुसार, एचएसबी का आकलन लोगों की प्राथमिकताओं को समझने और स्वास्थ्य देखभाल के संबंध में निर्णय लेने और विभिन्न स्वास्थ्य स्थितियों में उपचार की मांग के समय के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में तेजी से पहचाना जाता है। अध्ययन के अनुसार एचएसबी को बेहतर परिणामों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य अभ्यास और स्वास्थ्य सेवा वितरण मॉडल को संरेखित करना आवश्यक है। पीएलओएस ने उपचार के विकल्प, या रास्ते की जांच की, जिसका डीआर-टीबी रोगियों ने अपने एचएसबी को परिभाषित करने के अनुसरण किया।

 

टीबी के लक्षणों की पहचान कम
 

 बातचीत में शामिल हुए कई रोगियों को उनके पड़ोस, कार्यस्थलों और परिवारों में टीबी से प्रभावित अन्य लोगों के बारे में पता था। हालांकि, उनमें लक्षणों को पहचानने और इलाज की तलाश में तत्परता की कमी थी। अध्ययन में कहा गया है कि, इनकार, भय और शक्तिहीनता की स्थिति में, रोग से जुड़े कलंक ने भी रोगियों को छोड़ देने के मामलों में योगदान दिया है।

 

खांसी, बुखार, थकान और भूख में कमी जैसे सामान्य लक्षण मरीजों में संदेह पैदा नहीं करते थे कि उन्हें टीबी हो सकती है। यहां तक ​​कि पहले से टीबी के लिए इलाज किए गए रोगियों को इस तरह के लक्षणों से सतर्क रहने के लिए अवगत नहीं कराया गया था।

 

 एक मरीज को लगा कि उसके खांसी, सांस फूलना और भूख कम लगना मुख्य रूप से बारिश में बाहर निकलने के कारण होता है। डॉक्टर के पास जाने पर ही उसे टीबी का पता चला।

 

बातचीत में शामिल एक अन्य रोगी को 2014 में बीमारी का पता चला। उन्हें पिछली सर्दी में खांसी और हल्का बुखार हुआ था, जो आम सर्दी के लक्षण थे। अध्ययन में देखा गया कि जिन रोगियों को पहले टीबी हुआ था, उन्हें फिर से उपचार से गुजरने के डर से, यह स्वीकार करने में देरी लगी कि उन्हें यह बीमारी फिर से हुई है।  नजदीक के प्रदाता और नजदीक की सुविधाएं पहली पसंद  चुने हुए रोगी के लिए टीबी देखभाल के रास्ते लगभग हमेशा एक पड़ोस स्वास्थ्य देखभाल सेवा के साथ शुरू हुए, जो कि एक अपंजीकृत चिकित्सक, एक नगरपालिका स्वास्थ्य केंद्र, एक निजी एलोपैथिक चिकित्सक या आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध या होम्योपैथी (आयुष) जैसे वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के चिकित्सक हो सकते हैं, जैसा कि अध्ययन में पाया गया है। यह बड़े पैमाने पर सुविधा के कारण था और उनके समुदाय में आदर्श एचएसबी था।

 

मरीज अपनी परिचित और सुविधा के लिए पड़ोस के निजी क्लिनिक में जाना पसंद करते थे, क्योंकि ये क्लीनिक काम के घंटों के बाद भी शाम को खुले होते थे। सरकारी सुविधाओं की तुलना में अधिक सुलभ और यहां इलाज कराने में आसानी होती थी।

 

टीबी के शुरुआती लक्षण, जो गंभीर नहीं थे, उन्हें अक्सर ‘साधारण’ के रूप में देखा जाता था। ऐसे ’सामान्य’ लक्षणों वाले रोगियों के लिए सामान्य बात थी कि वे इलाज के लिए परिवार के डॉक्टर के पास जाएं। मरीजों ने कहा कि नगर निगम की सुविधाओं में जाने से पैसे खर्च होते हैं और पूरा दिन लग जाता है। एक मरीज ने कहा, हमें नगरपालिका के माध्यमिक देखभाल अस्पताल तक पहुंचने के लिए सुबह जल्दी जाने की जरूरत है, जहां वे हमें दो टैबलेट देते हैं और अगले दिन फिर से आने के लिए कहते हैं, लेकिन अस्पताल तक एक ऑटो रिक्शा का किराया 70-80 रुपये है।

 

रिपोर्ट के सह-लेखक यतिन ढोलकिया ने इंडियास्पेंड को बताया, “यदि आप रास्ते और दूरियों को देखते हैं, तो रोगी पहले लक्षण के साथ उन प्रदाता के पास जाते हैं, जो घर के सबसे करीब है, ताकि कम दूरी की यात्रा करनी पड़े। लेकिन आमतौर पर सुविधाओं और स्थानीय स्तर पर खराब बुनियादी ढांचे की कमी है, जहां व्यक्ति निवास करता है। “

 

ढोलकिया कहते हैं, ” प्रदाता के पास जानकारी होनी चाहिए और उसे प्रशिक्षित होना चाहिए। डायग्नोस्टिक एल्गोरिदम, जिसका वर्तमान में पालन किया जा रहा है उस संबंध में जानकारी होनी चाहिए। ढोलकिया आगे कहते हैं, “लोगों को उपचार तक पहुंचने के लिए लंबे समय की यात्रा नहीं करनी चाहिए । सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र तक पहुंचने की कोशिश करते समय ऐसा अधिक होता है। “

 

“यह इसलिए है क्योंकि वे एक स्थान पर (रोगी) का निदान करते हैं और उन्हें दूसरे को संदर्भित करते हैं, जहां रोगी निवास करता है। कुछ मामलों में, लोगों ने 20-22 दिनों में 200 किमी से अधिक की यात्रा की है। यह सब निदान में देरी का कारण बनता है और तपेदिक के संचरण को बढ़ाता है। “

 

ढोलकिया ने कहा, “मरीजों के प्रकार के आधार पर विभिन्न प्रकार की यात्राएं करनी होती हैं, जो प्रदाता (सार्वजनिक या निजी) तक पहुंचती हैं, चाहे वह रोगी दवा-संवेदनशील या दवा-प्रतिरोधी टीबी से पीड़ित हो और रास्ते में पहुँचाने वाले प्रदाताओं की संख्या हो। एक डीआर-टीबी रोगी ने 184 किमी (1.6 परीक्षण और 182.8 स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं की यात्रा के लिए) की यात्रा की। सात अलग-अलग प्रदाताओं से मिलने के बाद उन्होंने उपचार शुरू करने तक 166 दिन बिताए। ”

 

निदान में आमतौर पर देरी
 

 साक्षात्कार किए गए 55 फीसदी रोगियों ने कहा कि उन्होंने इलाज में देरी का सामना किया है। स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं ने रोगियों के साथ औसतन छह मिनट बिताए और उनका इतिहास-लेखन अपूर्ण था।  पीएलओएस अध्ययन में कहा गया है कि, इस तरह की देरी से बचा जा सकता था अगर ये प्रदाता मरीजों के साथ थोड़ा और समय बिताते, विस्तृत केस हिस्ट्री लेते और उच्च टीबी के बोझ वाले इलाकों से आने वाले रोगियों में टीबी के लक्षणों की तलाश करते।

 

निदान प्राप्त करने से पहले मरीजों को कई प्रदाताओं / स्वास्थ्य सुविधाओं और प्रयोगशालाओं का दौरा करना पड़ा। एक डॉक्टर, जिसने पहले से ही टीबी के लिए एक मरीज का इलाज किया था, वह यह पता वकरने में विफल रहा कि वह फिर से टीबी से पीड़ित था। लगभग एक वर्ष के बाद ही जब सार्वजनिक क्षेत्र के सुविधा केंद्र तक वह कई बार गया तो उन्हें एक्सडीआर-टीबी का पता चला।

 

ढोलकिया ने इंडियास्पेंड को बताया कि, “ जिन रोगियों से बातचीत की गई, उनमें डीआर-टीबी उपचार का निदान और आरंभ करने के लिए औसत समय 87 दिन था। सबसे छोटी अवधि एक महीने की थी और आठ महीनों की सबसे लंबी थी। दवा के प्रति संवेदनशील टीबी के लिए अवधि टीबी और उपचार के पिछले इतिहास के आधार पर 28 से 42 दिनों तक थी। ”

 

साक्षात्कार किए गए मरीजों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में विश्वास भी व्यक्त किया। अध्ययन में एक मरीज के माता-पिता को उल्लेख करते हुए कहा गया है कि “सरकार ने टीबी पर व्यापक शोध किया है और ऐसी दवाएं हैं जो टीबी का इलाज करती हैं। यह (टीबी) अब कोई खतरा नहीं है। ”

 

मरीजों ने अक्सर ‘बेहतर’ दवा की उम्मीद  में स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं को बदला।

 

एक ही भौगोलिक क्षेत्र के किसी भी दो रोगियों के बीच उपचार के समान रास्ते नहीं थे, यहां तक ​​कि अगर वे एक ही सुविधाओं पर उपचार शुरू और समाप्त कर चुके थे, जैसा कि अध्ययन में बताया गया है।

 

कुछ रोगियों ने प्रदाताओं को बदल दिया था, क्योंकि वे दो या तीन दिनों में बेहतर नहीं हुए थे। कई मामलों में, रोगियों ने प्रदाताओं को बदल दिया क्योंकि उनके पास इंतजार करने या बेहतर होने के लिए इंतजार का धैर्य नहीं था। उन्हें काम पर वापस जाने, पैतृक गांवों में पारिवारिक काम को देखने या स्कूल जाने और परीक्षा की तैयारी करने की जरूरत थी। अध्ययन में कहा गया है कि मरीजों ने उम्मीद थी कि अगला डॉक्टर उन्हें बेहतर बनाने के लिए ‘कारगर’ दवाई देगा।

 

उपचार के रास्ते अक्सर पेचीदे
 
 

निदान और उपचार प्रक्रियाएं अक्सर खतरनाक थीं, जो रोगियों को भ्रमित करती थीं। उन्हें यह समझ में नहीं आता था कि अलग-अलग स्थानों पर और एक ही समय में एक ही परीक्षण से गुजरने के लिए उन्हें क्यों कहा गया? उन्हें क्यों अलग-अलग सुविधाओं की ओर संदर्भित किया गया और क्यों गंभीर हालत में भी कमजोर उन्हें उपचार में परिवर्तन के लिए कहा गया?

 

अध्ययनकर्ताओं ने कहा कि प्रदाताओं के बीच रोगी की आवाजाही को कम करने और इस तरह से मरीजों का इलाज को लेकर सक्रियता को बढ़ावा देने के लिए, रेफरल सिस्टम को नए सिरे से तैयार करने की जरूरत है। इसमें डीआर-टीबी के निदान और उपचार में सरल प्रक्रिया शामिल होगी।

 

नगर निगम ग्रेटर मुंबई (एमसीजीएम) ने टीबी के प्रभावी उपचार के लिए निजी क्षेत्र को एकीकृत करने का निर्णय लिया और इसलिए 2014 में सार्वजनिक निजी इंटरफ़ेस एजेंसियों (पीपाआईए) की शुरुआत की।

 

नेविगेशन और सुविधा में आसानी के लिए मुंबई में मरीजों ने अक्सर एक विशिष्ट सुविधा के लिए जाना चुना। हालाँकि सभी प्रदाताओं और किसी विशेष क्षेत्र से रोगियों द्वारा पहुंची गई सुविधाएं एकीकृत प्रणाली के हिस्से के रूप में कार्य नहीं करती थीं। ऐसा इसलिए था क्योंकि पीपीआईए ने अपने नेटवर्क में लागू किए गए वार्डों में केवल 41 फीसदी मैप किए गए डॉक्टरों और केमिस्टों को लिया था।  एक मरीज निजी प्रदाता पीपीआईए नेटवर्क का एक हिस्सा था, इसलिए उसे डीआर-टीबी का पता चला और एक महीने के भीतर सही सार्वजनिक क्षेत्र की सुविधा के लिए भेजा गया। लेकिन एक अन्य रोगी के लिए, छह अलग-अलग प्रदाताओं और विभिन्न सुविधाओं का दौरा करने के बाद, एक्सडीआर-टीबी का निदान करने में उसे छह महीने लग गए।

 
लागत और भुगतान के लिए अलग-अलग नदरिया भी जटिल निदान और उपचार की वजह
 

 मरीजों को लागत और भुगतान की दुविधाओं का भी सामना करना पड़ा, क्योंकि कोई भी दो सुविधाएं समान रूप से संचालित नहीं होती हैं। उदाहरण के लिए, नैदानिक ​​परीक्षणों के लिए सीधे एक निजी प्रयोगशाला के पास जाने में  पैसे की लागत है लेकिन एमसीजीएम के पीपीआईए नेटवर्क से गुजरने पर परीक्षणों के आधार पर

परीक्षण मुफ्त किए गए या वहां सब्सिडी थी।

 

मरीजों को स्पष्ट जानकारी नहीं थी कि कौन सी सुविधाएं या प्रदाता मरीजों को मुफ्त या रियायती दरों पर सेवा देते हैं।

 

निजी क्षेत्र में डीआर-टीबी के लिए इलाज किए जा रहे कई रोगियों को इलाज रोकना पड़ा या सार्वजनिक क्षेत्र में जाना पड़ा, क्योंकि वे इलाज का खर्च नहीं उठा सकते थे।

 

कुछ मामलों में, डीआर-टीबी का पता चलने के बाद प्रदाता ने मरीजों को कहा कि मुफ्त इलाज प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में जाना बेहतर होगा।

 

अध्ययन ने एक रोगी के रूप में उद्धृत करते हुए बताया कि, “मैं नियमित रूप से दवाओं पर 4,000 रुपये खर्च कर रहा था। मैं गांव से आया था और इतने पैसे नहीं थे। इसके बाद किसी ने सुझाव दिया कि मैं सरकारी सुविधाओं में जाऊं, जहां मुझे मुफ्त इलाज मिलेगा।”

 

ढोलकिया ने बताया कि, “हमने रोगियों की लागत का आकलन नहीं किया है। हालांकि डीआर-टीबी के निदान की लागत 2,500 रुपये से लेकर 18,000 रुपये तक होती है, जो किए गए परीक्षणों के आधार पर होती है। इसके अतिरिक्त, आवधिक परीक्षण, एक्स-रे और डॉक्टरों के परामर्श शुल्क की लागत लगती है। प्रतिकूल दवा घटनाओं और प्रतिक्रियाओं के प्रबंधन के लिए आकस्मिक यात्रा और पोषण पूरक लागत और दवाओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए। ” उन्होंने आगे कहा, “यदि आवासीय क्षेत्रों के करीब एक छत के नीचे सुविधाएं रखी जाती हैं, और यदि डॉक्टरों को उचित निदान और उपचार प्रबंधन उपकरणों में प्रशिक्षित किया जाता है, तो रोगियों के लिए लागत में कमी आएगी। सरकार मरीजों के लिए यात्रा लागत का समर्थन नहीं करती है। ”

 

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत निजी स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र को साथ लाए और विनियमित किए बिना टीबी को समाप्त नहीं कर सकता है। यह पूछे जाने पर कि क्या इस अध्ययन में पाए गए पैटर्न भारत की स्थिति का प्रतिनिधित्व कर रह थे, तो ढोलकिया ने कहा, “जहां कहीं भी एक बड़ा (अनियमित) निजी क्षेत्र है, वहां निदान में देरी हो रही है। जब तक निजी क्षेत्र सार्वजनिक-स्वास्थ्य प्रणाली के साथ काम नहीं करता है, तब तक समस्याएं होंगी। यह अन्य देशों के लिए भी सही है।”

 

 

मॉन्ट्रियल के मैकगिल विश्वविद्यालय में एपडेमॉलजी के प्रोफेसर प्रो मधुकर पई ने इंडियास्पेंड को बताया, “ इस अध्ययन और इसी तरह के पहले हुए अध्ययनों का समान निष्कर्ष है कि डीआर-टीबी रोगियों के लिए पेचीदा रास्ते हैं। दवा प्रतिरोधी टीबी के निदान और उपचार के लिए कठिन रास्ता है। “

 

पई ने कहा, “चूंकि लगभग 80 फीसदी भारतीय निजी / अनौपचारिक स्वास्थ्य सेवा चाहते हैं, इसलिए भारत निजी स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े बिना टीबी को समाप्त नहीं कर सकता है।  मुंबई, पटना और मेहसाणा में अनुभव बताता है कि निजी प्रदाताओं को सफलतापूर्वक टीबी देखभाल की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए और निजी तौर पर इलाज के दौरान रोगियों को मुफ्त सरकारी सामान (जैसे ड्रग्स सहित) और लाभ (जैसे पोषण की खुराक) से जोड़ा जा सकता है। भारत को ऐसे निजी प्रदाता जुड़ाव मॉडल तैयार करने, निजी क्षेत्र से सूचना (टीबी निदान के) बढ़ाने और निजी क्षेत्र में देखभाल की गुणवत्ता में सुधार करने की आवश्यकता है।”

 
( कश्यप इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं। )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 21 फरवरी, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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