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भारत में विकास पर वोट न देने की संभावना ज्यादा- अध्ययन

बनिता चाको,
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बेंगलुरु: एक हालिया अध्ययन के अनुसार, भारतीय मतदाता विकास या नीतियों के आधार पर वोट नहीं देते हैं। 2019  का चुनाव इस बात की पुष्टि करता है।

 

बेरोजगारी से लेकर कृषि संकट तक और देश आर्थिक संकट से जूझ  रहा है, फिर भी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 56 फीसदी सीटें जीतकर भारत में सत्ता हासिल की है।

 

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्कॉलर तनुश्री द्वारा किए गए अध्ययन, “डू सिटीजन्स एनफोर्स अकाउंटिब्लिटी फॉर पब्लिक गुड्स एंड प्रोविजन्स?” में भारत के 90 फीसदी आबादी वाले 14 राज्यों में चुनाव परिणाम पर ध्यान दिया गया है। इसने 1998 और 2017 के बीच राज्य और केंद्रीय चुनावों के परिणाम से प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के प्रदर्शन को जोड़ा है।

 

अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सरकार ने पीएमजीएसवाई  नाम से एक फ्लैगशिप कार्यक्रम 2000 में शुरू किया था। 2018 तक, इस कार्यक्रम के परिणामस्वरूप 5,50,000 किलोमीटर से अधिक सड़कें ग्रामीण भारत में 280 लाख करोड़ रुपये की लागत से बनी है।

 

अध्ययन के मुताबिक, गांवों में जब कार्यक्रम सफलतापूर्वक लागू किया गया, और कनेक्टिविटी, प्रगति और सार्वजनिक सुविधाओं तक बेहतर पहुंच बनी, तो भी मतदाताओं ने उसी सरकार को वापस वोट नहीं दिया। उदाहरण के लिए, 1998 से 2003 के बीच, राजस्थान में कांग्रेस सरकार ने राज्य भर में 13,634.43 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया। फिर भी, 2003 के चुनावों में, कांग्रेस ने 9.6 फीसदी की औसत वोट हिस्सेदारी खो दी और राजस्थान में भाजपा सत्ता में आई।1999-2004 के बीच, अविभाजित आंध्र प्रदेश में शासन करने वाली  तत्कालीन तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने, 8167.56 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया। हालांकि, 2004 के चुनाव में, टीडीपी ने अपना वोट शेयर 7.3 फीसदी तक गंवा दिया और कांग्रेस सत्ता में आ गई।

 

गोयल ने अपने अध्ययन में बताया है, “मेरे अनुभवजन्य विश्लेषण से पता चलता है कि जब दुनिया के सबसे बड़े ग्रामीण सड़कों के प्रावधान कार्यक्रम ने 200,000 से अधिक भारतीय गांवों को सभी मौसम की सड़कें प्रदान की थीं, जिनमें से अधिकांश में पक्की सड़कों की कमी थी और पूरे साल बाजार की पहुंच की सख्त जरूरत थी फिर भी सड़कों का चुनावी प्रभाव, समय, स्थान और चुनावी स्तर के लिए शून्य था। बहुत कम बार परिणाम सकारात्मक या नकारात्मक होते हैं। चुनावी प्रभाव के लिए वे बहुत ज्यादा कमजोर और असंगत हैं।”

 

गोयल ने इसे विस्तार से समझाया है, “ पीएमजीएसवाई को भारत में नीतिगत वोट की मौजूदगी या अनुपस्थिति का पता लगाने के लिए चुना गया था, क्योंकि सड़कें सार्वजनिक रूप से अच्छी तरह दिखाई देती हैं और मतदाता के लिए निरीक्षण और मूल्यांकन करना आसान है। इसके अलावा, वहां सबूत है कि पीएमजीएसवाई लोगों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, और कृषि और सार्वजनिक सेवाओं तक बेहतर पहुंच बनाता है।”

 

2019 के आम चुनावों से पहले के चुनाव प्रचार के महीनों में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के उल्लेख में लगातार गिरावट आई है। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने द इंडियन एक्सप्रेस में एक टिप्पणी में उल्लेख किया कि चुनाव अभियान ने नीतियों पर बहस को छोड़कर सब कुछ बार-बार देखा। प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता में आने के बाद विकास का वादा किया था। लेकिन उन्होंने, विकास की बजाय कांग्रेस पार्टी, उसके अध्यक्ष और उनके परिवार के खिलाफ आरोपों पर ध्यान केंद्रित किया।

 

मोदी के रिपोर्ट कार्ड नामक लेखों की एक श्रृंखला में, Factchecker.in ने भाजपा सरकार की फ्लैगशिप परियोजनाओं जैसे ग्रामीण विद्युतीकरण कार्यक्रम, ग्रामीण नौकरियों योजना और स्वच्छ भारत मिशन का आकलन किया था। गोयल के अनुसार, ऑक्सफोर्ड अध्ययन में लोकतंत्र के लिए गंभीर निहितार्थ हैं। “…अगर मतदाता नीतिगत प्रावधान के प्रति अनुत्तरदायी रहते हैं, सार्वजनिक माल के प्रावधान के लिए चुनावी प्रोत्साहन या सेवा वितरण में सुधार, समय के साथ कम हो सकता है और इससे इन महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के परित्याग या खराब कार्यान्वयन की संभावना हो सकती है,” जैसा कि उसने एक ब्लॉग पोस्ट में कहा है।

 

पार्टियों की ओर से सत्ता के लिए भुगतान

 

गोयल ने पीएमजीएसवाई से विस्तृत, निम्नतम-स्तरीय सड़कों के डेटा का उपयोग किया और सड़कों के कार्यक्रम की लगभग पूरी अवधि के लिए इसे लगभग 11,000 चुनावी दौड़ ( संसदीय और विधानसभा ) को कवर करने के लिए राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय निर्वाचन क्षेत्रों में एकत्र किया गया।

 

शोधकर्ता ने तर्क दिया है कि यदि सड़कों के लिए जवाबदेही नहीं देखी जाती है,तो “यह संभावना नहीं है कि हम इसे अन्य नीतियों के लिए ऑब्जर्व करते हैं”। गोयल कहते हैं, “सामान्य सामाजिक और आर्थिक कल्याण के लिए उनके लिंक को देखते हुए, सड़कों को व्यापक रूप से, भारतीय संदर्भ में “सक्षमता का संकेत” माना जाता है।

 

धारवाड़ में कर्नाटक विश्वविद्यालय के पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर, हरीश रामास्वामी वोट और शिक्षा के विकास के बीच के रिश्ते को कुछ इस तरह से देखते हैं, “भारतीय लोकतंत्र के बारे में एक तर्क यह है कि यह अशिक्षा के कारण पनपता है। चुनावी घोषणा पत्र केवल 1-2 फीसदी मतदाताओं द्वारा पढ़ा जाता है।”

 

हालांकि, गोयल ने अपने अध्ययन में उच्च शिक्षा और सूचना की बेहतर उपलब्धता के साथ मतदाताओं की अधिक जवाबदेही की संभावना का पता लगाया है। उन्होंने पाया कि योजना के बारे में जागरूकता और यहां तक ​​कि सड़क निर्माण के दृश्यमान सबूत भी राष्ट्रीय और राज्य दोनों चुनावों में मतदाताओं को प्रभावित नहीं करते हैं। जानकारी इस कार्यक्रम के लिए एक बाधा नहीं है, लेकिन इसका चुनावी प्रभाव शून्य बना हुआ है।चूंकि नागरिक नीति के प्रदर्शन पर वोट नहीं देते हैं, इसलिए राजनीतिक दलों को भारतीय संदर्भ में लाभ नहीं मिलता है। गोयल के अनुसार, इसके विपरीत, यह “असंगतता का नुकसान” या “शासन की लागत” के परिणामस्वरूप होता है।

 

उन्होंने कहा, “सत्ताधारियों को विपक्षियों की तुलना में अधिक लाभ है क्योंकि वे अपनी नीतियों का उपयोग क्षमता को अधिक प्रभावी ढंग से संकेत देने के लिए कर सकते हैं,जबकि विपक्ष ऐसा नहीं कर सकता है। हालांकि अगर नागरिक  प्रदर्शन को ध्यान में नहीं रखा जाता है, तो सत्ताधारी इस तुलनात्मक लाभ को नहीं पाते है।”

 

2019 चुनावों के लिए इसका क्या मतलब है?

 

गोयल ने कहा, “यह चुनाव किसी नीतियों के आधार पर नहीं लड़ा गया। ‘यह मायने नहीं रखता कि पिछले पांच वर्षों में सरकार ने कैसा प्रदर्शन किया है और यही वजह है कि मोदी राष्ट्रवाद और हवाई हमलों जैसी चीजों के बारे में बोलते हैं। देखिए कि 2014 से 2019 तक बीजेपी का भाषण कैसे बदल गया। तब यह विकास और हिंदुत्व का मिश्रण था, लेकिन अब यह केवल पहचान और जाति में बदल गया है। ”

 

इसलिए यदि विकास चुनावी रूप से फायदेमंद नहीं है तो किसी सरकार को सड़कों के निर्माण में समय और धन क्यों लगाना चाहिए? थिंक टैंक ‘तक्षशिला’ के इकोनोमिक रिसर्च फेलो अनुपम मयूर कहते हैं, “सड़कों का निर्माण मदद नहीं कर सकता है, लेकिन उन्हें ये प्रदान नहीं करना, बहुत नुकसान पहुंचा सकता है।

 

“लोग केवल सड़कों पर नहीं, विभिन्न कारकों के लिए मतदान करते हैं”

 

जैन यूनिवर्सिटी के प्रो-वाईस चांसलर और एक थिंक-टैंक, लोकनीति नेटवर्क के राष्ट्रीय कोर्डिनेटर, संदीप शास्त्री ने कहा कि लोगों को सड़कों पर वोट न देने के अन्य कारण भी हो सकते हैं,“कई स्थानों पर, लोग सड़कों के निर्माण के लिए अपनी भूमि और खेतों को खो देते हैं और उन्हें अपर्याप्त मुआवजा भी मिल सकता है। इसके अलावा, पीएमजीएसवाई एक केंद्र पोषित योजना है जो राज्य सरकार द्वारा लागू की जाती है और लोग यह नहीं जानते हैं कि परियोजना के लिए श्रेय किसे देना है। “

 

शास्त्री ने मतदान के लिए एक महत्वपूर्ण पैरामीटर के रूप में सड़कों की प्रतिनिधित्वशीलता पर भी सवाल उठाया। “हमको यह भी देखना होगा कि लोगों के प्रिज्म से विकास के निर्माण ब्लॉक क्या बनते हैं। सड़कें केवल एक ही कारक है और लोग वोट करते समय कई कारकों पर विचार करते हैं, जैसे बेरोजगारी और मूल्य वृद्धि।”

 

अपने पेपर में, गोयल ने इस संभावना से इंकार किया कि संसद के दोनों सदस्यों और विधान सभा के सदस्यों की उपस्थिति से त्रुटि हो सकती है। उन्होंने भ्रष्टाचार की चिंताओं के कारण नागरिकों को सड़कों के प्रावधान के लिए सरकार के पक्ष में नहीं होने की संभावना से भी इनकार किया। उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा है, “मुझे पता है कि नागरिक सड़कों की गुणवत्ता में भिन्नता का जवाब नहीं देते हैं: वे न तो अच्छी गुणवत्ता वाली सड़कों को पुरस्कृत करते हैं और न ही खराब गुणवत्ता के लिए दंडित करते हैं।”

 

इसके विपरीत, शास्त्री ने कहा कि पार्टियों का विकास रिकॉर्ड दूसरे तरीके से मायने रखता है। उन्होंने समझाया कि “लोकतांत्रिक लड़ाई धारणा की लड़ाई है। 2014 में मोदी का अभियान कांग्रेस के गैर-प्रदर्शन पर मजबूत था। वे सत्ता में आए क्योंकि वे उस धारणा का निर्माण कर सके। विपक्षी के लिए, सत्ताधारियों पर हमला करने के लिए विकास एक उपकरण बन जाता है।”

 

“भावनात्मक फलक’ पर वोट डाले जाते हैं…”

 

अगर भारतीय विकास के लिए क्या वोट नहीं देते हैं तो फिर किस बात पर मतदान करते हैं? गोयल की राय है कि यह जाति है। वह कहती हैं, “लेकिन यह कहना सही नहीं है कि उनकी पसंद नासमझी या गैर-जानकारी के है। जाति भारतीय सामाजिक और राजनीतिक जीवन में एक केंद्रीय भूमिका निभाती है। जबकि यह विकास और नीति के लिए खराब परिणाम हो सकता है, इसका सीधा सा मतलब है कि मतदाता अन्य चीजों की परवाह करता है।”

 

शास्त्री ने कहा कि आज जाति को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है: “जाति को एक प्रधान पहचान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक आधुनिक राजनीतिक पहचान है जिसका उपयोग लाभ लेने के लिए किया जाता है। लोग जाति के आधार पर भी मतदान करते हैं क्योंकि उनके जीवन के अनुभव समान हैं। ”

 

कर्नाटक विश्वविद्यालय के रामास्वामी ने बताया कि जाति की तुलना में भावनात्मक आधार पर वोट अधिक डाले जाते हैं। उन्होंने कहा, “वे जाति के आधार पर मतदान करते हैं लेकिन यह एक छोटा प्रतिशत है। शेष वोट एक निश्चित तरीके से हैं क्योंकि वे भावनात्मक रूप से स्थानांतरित हो गए हैं और यही कारण है कि पार्टियां राष्ट्रवाद या राम मंदिर के बारे में बात कर रही हैं। प्रत्येक पार्टी अपने लाभ के लिए भावनात्मक रुप से खेलने की कोशिश करती है। ”

 

तक्षशिला के मनूर ने कहा कि, मतदाता वरीयता को जरूरतों के पदानुक्रम के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें शीर्ष पर व्यक्तिगत लाभ, उसके बाद सामुदायिक लाभ और अंत में  सार्वजनिक वस्तुओं से लाभ है। यदि लाभ बिखरे हुए हैं, तो मतदाता इसे व्यक्तिगत लाभ के रूप में नहीं देखता है। “मतदान के समय अधिकांश मतदाताओं के लिए,नव-निर्मित सड़कों के बारे में  बल्कि व्यक्तिगत लाभ के लिए सोचते हैं। यही कारण है कि एक चुनावी चक्र में, राजनीतिक दल आरंभिक वर्षों में सार्वजनिक वस्तुओं को उपलब्ध कराने की दिशा में काम करते हैं और अंत में मतदाताओं को मुफ्त में लुभाते हैं। मुफ्त साड़ी, लैपटॉप, पैसा जो वोट जीतने में मदद करता है।

 

(चाको, पत्रकारिता में पोस्ट-ग्रैजुएट हैं और  बेंगलुरु में माउंट कार्मेल कॉलेज में एसिसटेंट प्रोफेसर हैं और साथ ही इंडियास्पेंड के साथ इंटर्न के रुप में जुड़े हुए हैं।)

 

यह लेमूलत: अंग्रेजी में 25 मई, 2019 को  indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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