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भारत में विरासत कानून में सुधार से अनजाने में कन्या भ्रूण हत्या और शिशु मृत्यु में बढ़ावा

तिश संघेरा,
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मुंबई: भारत के भेदभावपूर्ण और महिला विरोधी विरासत कानूनों में 20 वर्षों में हुए सुधार महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बढ़ाने में मदद कर सकता था। लेकिन एक नए अध्ययन के मुताबिक ऐसा प्रतीत होता है कि ये सुधार समाज में लंबे समय से बेटों के लिए तय वरीयता को कम करने में विफल रहे हैं।

 

2018 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, इसके बजाय, 1970 से 1990 के बीच कानून के इस तरह के बदलाव ने अनजाने में कन्या भ्रूण हत्या और उच्च महिला शिशु-मृत्यु दर को बढ़ा दिया है। इस अध्ययन में यदि पहला बच्चा एक लड़की है, तो दूसरे बच्चे के लिए परिवारों की इच्छाओं का विश्लेषण किया गया है।

 

निष्कर्षों को आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 द्वारा समर्थित किया गया है, जिसमें अनुमानित 6.3 करोड़ महिलाएं ( मोटे तौर पर यूके की आबादी ) भारत में गायब हैं।

 

अध्ययन में पाया गया है कि कानूनी सुधारों के बाद पैदा होने वाली लड़कियों के अपने पहले जन्मदिन तक पहुंचने से पहले 2-3 प्रतिशत अंक तक जीवित न रहने की संभावना थी।  और अगर पहली संतान लड़की है तो छोटी लड़की की मृत्यु की संभावना 9 प्रतिशत अंक ज्यादा थी। विधायी परिवर्तन, प्रसवपूर्व अल्ट्रासाउंड स्क्रीनिंग के आगमन के साथ मिलकर जो सेक्स-चयनात्मक गर्भपात को सक्षम करते हैं,  ने कन्या-भ्रूण हत्या की प्रथा को इस हद तक तेज कर दिया है कि कुल मिला कर लड़कियों के जन्म की संभावना 4 प्रतिशत अंक तक कम हो गई है।

 

अध्ययन किंग्स कॉलेज विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय और एसेक्स विश्वविद्यालय में शोधकर्ताओं द्वारा किया गया था और ‘जर्नल ऑफ़ डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स’ में प्रकाशित किया गया था। इसमें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (1991-92, 1998-9 और 2005-6) के तीन दौर के आंकड़े और ग्रामीण आर्थिक और जनसांख्यिकी सर्वेक्षण (आरईडएस) 2006 के आंकड़ों का उपयोग किया गया था।

 

शोधकर्ताओं ने पांच ‘प्रारंभिक सुधारक’ राज्यों ( केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक ) में रहने वाले परिवारों का अध्ययन किया, जहां 1970 और 1990 के बीच अलग-अलग तारीखों में महिलाओं और पुरुषों के लिए समान उत्तराधिकार अधिकारों की अनुमति देने के लिए ‘हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम- 1956’ में संशोधन किया गया है।

 

इनकी तुलना राज्यों में परिवारों के एक नियंत्रित समूह से की गई थी, जिन्होंने केवल 2005 में विरासत कानूनों में सुधार किया था, जब केंद्र सरकार ने देश भर में समान अधिकार अनिवार्य कर दिया था।

 

हालांकि पिछले अध्ययनों ने विवाह ‘बाजार’ में महिलाओं की स्थिति पर सुधार के प्रभाव की जांच की थी। यह पहली बार है जब शोधकर्ताओं ने पुत्र-वरीयता, कन्या भ्रूण हत्या और “बेटा-पक्षपाती प्रजनन व्यवहार को रोकने के व्यवहार” पर प्रभाव का विश्लेषण किया है।

 

पुत्रों को वरीयता, महिलाएं रहती हैं बेदखल

 

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत, बेटों को पैतृक संपत्ति का सीधा अधिकार था, जिसमें पिता द्वारा किसी तरह की विरासत न छोड़े जाने पर बेटियों को संपत्ति के दावों से बाहर रखा गया था। 1970 के दशक के बाद से, महिलाओं और महिलाओं की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने और पुरुष रिश्तेदारों पर निर्भरता कम करने के लिए विरासत कानून में बदलाव की मांग की गई।

 

बेटों के लिए पारंपरिक प्राथमिकता भी संभवत: कम होनी चाहिए, क्योंकि घर के हिस्से से समर्थित, बेटियां बुढ़ापे में माता-पिता की सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम होंगी। समान रूप से, इससे दहेज प्रथा के उन्मूलन की उम्मीद थी, जो एक बेटी के वित्तीय बोझ के रूप समझने का एक महत्वपूर्ण कारक है।

 

अध्ययन में पाया गया कि, इसके बजाय, सुधार के ‘अनपेक्षित’ प्रभाव दिखाई दिए, जो ‘लड़कियों के खिलाफ थे, क्योंकि परिवार के ढांचे और गठबंधनों को व्यवस्थित करने वाले सामाजिक मानदंडों ने कानून में बदलाव के साथ तालमेल नहीं रखा है।

 

अध्ययन में कहा गया है, “महिलाओं को विरासत के अधिकार देने से माता-पिता को बेटे के बजाय बेटी से ज्यादा खतरा होता है।” ऐसा इसलिए है, क्योंकि परिवारों को डर है कि लड़की को विरासत में मिली संपत्ति उनके ससुराल वालों के नियंत्रण में चली जाएगी।

 

भारत  के इंटरनेश्नल ग्रोथ सेंटर इंडिया प्रोग्राम के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् और कार्यक्रम निदेशक, प्रोनब सेन ने इंडियास्पेंड को समझाते हुए बताया कि “यदि आप हिंदू प्रणाली के तहत किसी महिला को संपत्ति हस्तांतरित करते हैं तो यह परिवार के बाहर उसके वैवाहिक घर में चली जाएगी।”

 

“विरासत कानून में बदलाव से इसलिए भी महिलाओं की आय में सुधार की संभावना नहीं है, क्योंकि महिला को उस नई संपत्ति का नियंत्रण मिलेगा- जिसे अब उसके वैवाहिक परिवार द्वारा अधिग्रहित किया गया है।”

 

अध्ययन में कहा गया है कि माता-पिता की ओर से एक बेटे की चाह लगातार जारी है, क्योंकि माना जाता है कि वह परिवार के लिए ‘कमाई’ और बाद में जिंदगी की देखभाल- दोनों में योगदान करेगा।

 

सम्पूर्ण सम्पत्ति से बेटे के बाहर निकालने से माता-पिता का जोखिम बढ़ जाता है, जो उनके भविष्य की देखभाल की गुणवत्ता पर प्रभाव डाल सकता है।

 

सेन कहते हैं, “एक प्रमुख कृषि घराने में, जमीन सबसे महत्वपूर्ण है।माता-पिता संपत्ति को विभाजित करने से बचना चाहते हैं, क्योंकि इससे जमीन की उत्पादकता कम होती है, क्योंकि भाई-बहनों के बीच साझा करने का एकमात्र तरीका संपत्ति को बेचना और आए पैसै को वितरित करना है।”

 

अध्ययन में कहा गया है कि सुधार के बाद भी विरासत में संपत्ति मिलने वाली महिलाओं के अनुपात में वृद्धि नहीं हुई है। हालांकि अब कानून महिलाओं को संपत्ति के लिए कानूनी दावे करने की अनुमति देते हैं, लेकिन बहुत कम ही ऐसा कोई कदम उठाते हैं,  क्योंकि इसे असामाजिक और विद्रोही माना जाता है।

 

एनजीओ ‘सेव द चिल्ड्रन ’ में बाल संरक्षण और लिंग सलाहकार , राधा चेलप्पा ने इंडियास्पेंड को बताया कि, ” परिवार एक करीबी ताना-बाना है। अगर संपत्ति के लिए मना किया जाता है तो लड़कियां माता-पिता और भाइयों के खिलाफ जाना और लड़ना नहीं चाहती हैं। पूरी दहेज प्रणाली कहती है कि बेटियों को पहले ही धन का हिस्सा दिया जा चुका है, इसलिए वे संपत्ति पर अधिकार नहीं रखती हैं।”

 

चेल्लप्पा ने कहा, “इसलिए यह सब केवल एक कानून के होने की बात नहीं है, यह इसके प्रभावी कार्यान्वयन की बात है। यह एक नागरिक कानून है, आपराधिक नहीं है और लड़कियों पर वास्तव में अदालत में जाने और उनके अधिकारों का उपयोग करने पर निर्भर करता है। फिलहाल, मुझे यकीन नहीं है कि ऐसा वास्तव में हो रहा है।”

 

लिंग-चयनात्मक जन्मों में वृद्धि, महिला शिशु मृत्यु दर अधिक

 

1980 के दशक में आयातित अल्ट्रासाउंड मशीनों ने परिवारों को अपने जन्म से पहले भ्रूण के लिंग की खोज करने में सक्षम बनाया, जिससे सेक्स-चयनात्मक गर्भपात या कन्या भ्रूण हत्या की प्रथा चली। नियंत्रण समूह के साथ तुलना में देखा गया कि जिन राज्यों में माता-पिता वंशानुगत कानूनों से अवगत थे और अल्ट्रासाउंड उपलब्ध था, वहां 4 प्रतिशत अंक तक लड़कियों के पैदा होने की संभावना कम थी, जब पहला जन्म लेने वाला बच्चा एक लड़की थी।

 

अध्ययन कहता है की, परिवारों ने अभी भी बेटों के लिए लंबे समय से जारी सामाजिक पसंद को दिखाया है। जन्म लेने वाली लड़कियों की संख्या में गिरावट की तीव्रता – जो “जैविक भिन्नता या धीमी गति से बदलते पर्यावरणीय कारकों के अनुरूप मानी जाने वाली सीमा के बाहर है”- विरासत कानूनों में बदलाव के लिए सुविचारित प्रतिक्रिया दिखाती है।

 

अध्ययन कहता है कि, चूंकि भ्रूण हत्या एक ‘ सोची-समझी और व्यवस्थित कृत्य’ है, यह “बेटियों के बजाय बेटों के लिए माता-पिता की वरीयताओं का एक अचूक उपाय” है।

 

जन्म के पूर्व सेक्स का पता लगा लेने के बाद लड़कियों को खत्म करने के अलावा, इस बात के सबूत हैं कि माता-पिता अपनी उपेक्षा से लड़कियों के खुद को दूर करते हैं, इस प्रकार विधायी सुधारों के बावजूद अपनी घरेलू संरचना में लड़कियां परिवार की पसंद नहीं होतीं।

 

सुधार के बाद और अल्ट्रासाउंड की सुविधा वाले राज्यों में, जहां पहला बच्चा एक लड़की थी, वहां दूसरी बच्ची की अपने पहले जन्मदिन से पहले मरने वाली की संख्या में 2-3 प्रतिशत की वृद्धि थी। अन्य अध्ययनों से पता चलता है कि अनचाहे बच्चों को न जन्म देने के लिए चिकित्सा उपचार तक न जाना और भोजन और पोषण को रोकना सामान्य तरीके हैं।

 

आर्थिक स्थिति के संदर्भ में, जो दोनों लिंगों की बराबरी करने के लिए किए गए विरासत में सुधारों के बावजूद यह पाया गया कि परिवार में लड़का हो पाने को सुनिश्चित करने के लिए परिवारों ने ‘प्रजनन क्षमता बढ़ाने’ ( बाद के उम्र में बच्चे जन्म देना ) के प्रयास किए हैं।

 

अध्ययन में पाया गया है कि जिन परिवारों में पहला बच्चा लड़का था, उनकी तुलना में ऐसे परिवार जहां पहला बच्चा लड़की थी, उनमें दूसरा बच्चा होने की संभावना 9 प्रतिशत अंक थी, ( नमूना औसत का 12 फीसदी ), जैसा कि अध्ययन से पता चलता है।

 

पिछले परिणामों के साथ संयुक्त रूप से यह अध्ययन सुझाव देता है कि सुधार के बाद और अल्ट्रासाउंड की उपलब्धता के वातावरण से विपरीत और इच्छित प्रभाव होने के बजाय अनजाने में ‘ बेटे के जन्म’ की इच्छा ज्यादा तीव्र है।

 

पितृसत्तात्मक मानदंड, पुत्रों को वरीयता

 

77 फीसदी भारतीय माता-पिता  पितृसत्तात्मक संरचना का पालन करते हुए, बुढ़ापे में अपने बेटों के साथ रहने की उम्मीद करते हैं, जहां बेटे शादी के बाद परिवार के घर में रहते हैं। जबकि बेटियां अपने ससुराल में शामिल होने के लिए पिता का घर छोड़ देती हैं। इस प्रथा के अनुसार, पैतृक भूमि पर रहने और काम करने के अलावा, बुढ़ापे में माता-पिता की देखभाल करने के लिए, माता-पिता की मृत्यु के बाद बेटे को आमतौर पर पुरस्कृत किया जाता है।

 

अध्ययन में कहा गया है कि माता-पिता को पैतृक संपत्ति के बराबर हिस्से को बेटों और बेटियों के बीच साझा करना चाहिए।

 

पुत्र की वरीयता यथास्थिति बनी हुई है, जो यह सुझाव देती है कि  ऐतिहासिक लिंग पूर्वाग्रहों को ठीक करने वाले कानून की तुलना में पितृसत्तात्मक परंपराएं माता-पिता पर एक मजबूत असर डालती हैं।

 

अध्ययन के अनुसार, सार्वजनिक पेंशन प्रणाली और सामाजिक सुरक्षा महत्वपूर्ण कारण है कि बेटे की प्राथमिकता आमतौर पर नहीं बदली है।

 

वर्तमान में भारत की 35 फीसदी से अधिक बुजुर्ग आबादी पेंशन पर नहीं हैं। साथ ही एक तिहाई, या 3.9 करोड़ के करीब ने पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा चक्र के बदले हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अप्रैल 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

आगे बढ़ने का रास्ता

 

लगातार पक्षपात के कारण, महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को कैसे कम किया जा सकता है और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को ऊंचा किया जा सकता है? पुणे विश्वविद्यालय में राजनीति विभाग और सार्वजनिक प्रशासन विभाग की प्रोफेसर, राजेश्वरी देशपांडे ने इंडियास्पेंड को बताया कि, “मुझे इस तरह के कानून की लंबे समय तक जरूरत या प्रभावशीलता पर संदेह नहीं है, लेकिन हमें सशक्तिकरण, शिक्षा और लक्षित सामाजिक कल्याण योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करने के लिए एक बहु-आयामी प्रयास की आवश्यकता है, जिससे समाज में वयस्क महिलाओं के लिए विभिन्न स्तरों पर काम हो सके। हालांकि, विधायी सुधार को संपत्ति के मुद्दे के रूप में देखा जाता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है ।  परिवार में लड़के को लेकर पक्ष में एक गहन अंतर्निर्मित आंतरिक पूर्वाग्रह है, जिसे संवेदनशील ढंग से हल करने की जरूरत है।”

 

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( संघेरा लेखक और शोधकर्ता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 23 फरवरी 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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