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भारत में 5 वर्ष के भीतर के बच्चों में मृत्यु दर वैश्विक औसत के बराबर

तिश संघेरा,
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भारत में 5 वर्ष के भीतर के बच्चों की मृत्यु दर अब वैश्विक औसत के बराबर है। प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 39 मौतें, लेकिन शिशुओं और नवजातों की मौतों की संख्या ( और भारत के गरीब पड़ोसियों के प्रदर्शन ) से संकेत मिलता है कि नवजात स्वास्थ्य से निपटना एक नई चुनौती है, जैसा कि एक नई रिपोर्ट में भी बताया गया है।  वर्ष 2012 से, पांच वर्ष की आयु के भीतर मरने वाले बच्चों की संख्या में 30 फीसदी की गिरावट हुई है। ये आंकड़े 1.4 मिलियन से 989, 000 तक हुए हैं। इसी अवधि में, शिशु मृत्यु (अपने पहले जन्मदिन से पहले अपना जीवन खोने वाले ) में 26 फीसदी (1.09 मिलियन से 802,000) और नवजात मौतों (पहले 28 दिनों में मृत्यु) में 22 फीसदी (779,000 से 605,000) की गिरावट हुई है।  ये आंकड़े भारतीय बच्चों के लिए जीवन के पहले वर्ष में निरंतर उच्च मृत्यु दर का संकेत देते हैं। ये यूनाइटेड नेशन्स इंटर एजेंसी ग्रुप की ओर से बाल मृत्यु दर अनुमान के अनुसार 18 सितंबर, 2018 को जारी एक रिपोर्ट के निष्कर्ष हैं। इस निष्कर्ष तक पहुंचने में यूनाइटेड नेशन चिल्ड्रन्स फंड, विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक भी शामिल थे। बच्चों में दस्त और निमोनिया का उपचार, खसरा और टेटनस टीकाकरण और अस्पताल में संस्थागत जन्म में वृद्धि, के साथ बाल मृत्यु के लिए सबसे आम जोखिम कारकों पर ध्यान देने के बाद बाल मृत्यु की संख्या में कमी आई है, जैसा कि वैश्विक जर्नल ‘द लैन्सट’ में प्रकाशित 2017 के पेपर से पता चलता है।  2017 में भारत में शिशु मृत्यु दर प्रति 1,000 जीवित जन्मों में 32 की थी, जबकि वैश्विक औसत 12 था। नवजात मृत्यु दर में भी अंतर है – भारत के लिए प्रति 1,000 जीवित जन्म पर 24 और वैश्विक औसत 18।  पांच वर्ष से कम उम्र में मृत्यु दर के बीच लिंग अंतर और भी कम हो गया है। पुरुषों की तुलना में, महिलाओं में मृत्यु दर केवल 2.5 फीसदी ज्यादा होने के साथ, यह आंकड़े पुरुषों के लिए प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 39 मौतें और महिलाओं के लिए 40 मौतें हैं।

 

2012 से यह 7.5 प्रतिशत अंक कम है जब अंतराल 10 फीसदी था। पुरुषों के लिए प्रति 1000 जीवित जन्म पर 54 मौतें और महिलाओं के लिए 59 मौतों का आंकड़ा था।

 

हालांकि, भारत में शिशु मृत्यु दर जैसे स्वास्थ्य संकेतकों पर राज्यों के बीच बड़ी असमानता, है। स्वास्थ्य देखभाल और स्वच्छता स्तर तक पहुंच में भी असमानता का उच्च स्तर दिखता है।

 

गोवा और केरल जैसे कुछ समृद्ध राज्यों में यूरोपीय देशों के समान शिशु मृत्यु दर है, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे कम आय वाले राज्यों में युद्ध और आपदा से प्रभावित अफगानिस्तान और हैती की तरह दर है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने जुलाई, 2018 की रिपोर्ट में भी बताया है।  बाल मृत्यु दर को अक्सर आबादी के स्वास्थ्य प्रतिबिंब के रूप में देखा जाता है, साथ ही सामाजिक और आर्थिक विकास के स्तर को निर्धारित करने में भी बाल मृत्यु दर की भूमिका होती है। युवा बच्चों में मौत की संख्या बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल, पर्याप्त पोषण और स्वच्छ पानी और स्वच्छता तक पहुंचने की क्षमता को इंगित कर सकती है।

 

भारत और इसके पड़ोसी

 

हालांकि, भारत में अब पांच वर्ष की आयु के भीतर का मृत्यु दर (प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 39) वैश्विक औसत से मेल खाता है। दक्षिण एशिया के तीन देशों में पहले से ही इस आंकड़े से कम दरें है, जो इस महत्वपूर्ण विकास संकेतक पर भारत से बेहतर प्रदर्शन करते हैं।  भारत के $ 1,939 की तुलना में कम प्रति व्यक्ति आय के साथ बांग्लादेश और नेपाल (प्रति व्यक्ति आय क्रमश: $1,546 और $835 ) में बाल मृत्यु दर क्रमश: 32 और 34 हैं, जबकि भारत के लिए यह आंकड़े 39 हैं। श्रीलंका, जो 9 की दर से दक्षिण-एशियाई रैंकिंग में सबसे ऊपर है, वहां प्रति व्यक्ति आय भी सबसे अधिक है- $ 3,790। वर्ष 1990 में, बांग्लादेश और नेपाल में पांच वर्ष की आयु के भीतर मृत्यु दर भारत से अधिक था ( क्रमश: 144 और 140, जबकि भारत में 126) लेकिन 2000 में भारत में पांच वर्ष की आय़ु के भीतर मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 88 थीं, जबकि बांग्लादेश में प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 84 और नेपाल में 83 मौतें दर्ज की गई थीं।

 

दक्षिण एशिया में पांच वर्ष की आयु के भीतर मृत्यु दर, 2012 से 2017


 

इन्हीं तीन देशों में सबसे कम शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) भी है।  हालांकि, भारत ने 2012 से दक्षिण एशियाई देशों के बीच आईएमआर की सबसे बड़ी कमी (27 फीसदी) के साथ सबसे बड़ा सुधार दिखाया है। पांच साल की अवधि में, भारत की आईएमआर में 27 फीसदी गिरावट हुई है, 2012 में प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 44 मौतों से 2017 में 32 हुआ है। इसके बाद 26 फीसदी की कमी के साथ अफगानिस्तान 18 फीसदी के साथ बांग्लादेश, 17 फीसदी के साथ नेपाल और 11 फीसदी के साथ पाकिस्तान का स्थान रहा है। श्रीलंका का आईएमआर पहले से 2012 में 8 की दर से अब तक नहीं बदला है।

 

दक्षिण एशिया शिशु मृत्यु दर, 2012-17


 

इसी तरह, श्रीलंका ने प्रति 1000 जीवित जन्मों की 6 मौतों पर असाधारण रूप से कम नवजात मृत्यु दर को बनाए रखा है, जो 18 के वैश्विक औसत और दक्षिण एशिया के किसी भी अन्य देश से काफी आगे है।

 

भारत की नवजात दर, 2012 के बाद से 22 फीसदी की कमी हुई (बांग्लादेश के 25 फीसदी की कमी के बाद दूसरी सबसे ज्यादा कमी), 24 के  वैश्विक औसत से अधिक है।

 

दक्षिण एशिया में नवजात मृत्यु दर, 2012-17


 
स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़ी चुनौतियां
 

अध्ययनों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि, समृद्ध परिवारों के बच्चों की तुलना में सबसे गरीब परिवारों के बच्चों की पांच वर्ष की आयु के भीतर मरने की संभावना दोगुनी होती है। यही तथ्य उन बच्चों की लिए भी है जिनकी माताओं में कोई माध्यमिक या उच्च शिक्षा नहीं है।

 

भारत में, एनीमिया की उच्च दर (राष्ट्रीय स्तर पर गर्भवती महिलाओं का 50 फीसदी प्रभावित), कम पोषण स्तर (23 फीसदी माताओं कम वजन वाले हैं) और अधिक बोझ वाली सरकार और निजी स्वास्थ्य सुविधाएं स्वस्थ बच्चों को जन्म देने में चुनौती का हिस्सा हैं।  संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्यों के हिस्से के रूप में, भारत 2030 तक प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 25 मौतों की मृत्यु दर को कम करने के लिए वचनबद्ध है। भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल में 2025 तक 23 का लक्ष्य निर्धारित किया है।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रसव के समय देखभाल की गुणवत्ता में सुधार और स्थितियों को संभालने से नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य में सुधार की उम्मीद। स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने और अस्पतालों में अधिक जन्म सुनिश्चित करने स्थितियां सुधरेगी। साथ ही अगर स्वास्थ्य सेवाओं में प्रशिक्षित कर्मचारियों की संख्या बढ़ जाए तो परिणाम सकारात्मक होंगे।

 
( संघेरा लेखक और रिसर्चर हैं । इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 20 सितंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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