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भारत वन रेंजरों के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक देश

प्रेरणा बिंद्रा,
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असम के डिब्रू सैखोवा नेशनल पार्क में वन कर्मचारी। पार्क का एक बड़ा हिस्सा कुछ महीनों से जलप्लावित है, जिससे वनकर्मियों को गश्त लगाने में कठिनाई हो रही है। दूर-दराज के दुर्गम इलाकों में, भारत के वन रेंजरों को शिकारियों, तस्करों, जंगल की आग और जंगली जानवरों से खतरे का सामना करना पड़ता है।

 

धर्मजगढ़ (छत्तीसगढ़) और नई दिल्ली: 20 फरवरी, 2017 को, रेंज वन अधिकारी (आरएफओ) दौलत राम लेडर अपनी पत्नी पुष्पा के साथ हर रात की तरह भोजन के बाद चाय पी रहे रहे थे कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में लेडर धर्मंगगढ़ वन विभाग में लेलुंगा में तैनात थे।

 

लेजर ने दरवाजा खोला और आए हुए लोगों से बातचीत के लिए बाहर आए। एक घंटे बाद, उनका मृत शरीर, उनके घर से 40 गज की दूरी पर, स्थानीय पुलिस थाना (चौकी) के पास पाया गया।

 

एक महीने पहले, लेडर ने एक ट्रैक्टर जब्त कर लिया था, जो कि केलो नदी से अवैध रूप से खनन पत्थरों को ले जा रहा था। केलो महानदी की एक सहायक नदी है जो लेलुंगा रिजर्व वन के बीच से बहती है। यह ट्रक किसी दिलो कुमार का था।

 

उप-मंडल अधिकारी चक्रप्रानी शर्मा कहते हैं, “कुमार ने पिछले महीने लेडर को बार-बार धमकी दी थी। लेकिन लेडर निडर था। वह एक ईमानदार अधिकारी थे, जो राजनीतिक दबाव के आगे कभी नहीं कभी झुकते थे।”

 

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छत्तीसगढ़ में लेलुंगा रिजर्व वन के बीच से बहने वाले केलो नदी से अवैध रूप से खनन किए गए पत्थरों से भरे ट्रक को रेंज वन अधिकारी दौलत सिंह लेडर ने जब्त किया था। कहते हैं, इसी वजह से फरवरी, 2017 में रेंज वन अधिकारी दौलत सिंह लेडर की हत्या कर दी गई थी।

 

लेडर की हत्या अकेली घटना नहीं है। भारत वर्तमान में वन रेंजरों के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक देश है। 2017 में, भारत में काम पर रहते हुए  29 रेंजरों की मौत हुई है। इंटरनेशनल रेंजर फेडरेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस संबंध में कांगो का लोकतांत्रिक गणराज्य (17) और थाईलैंड (8) दूसरे और तीसरे स्थान पर रहा है।

 

फेडरेशन के मुताबिक, 2012-17 के बीच, भारत में रेंजरों की मौत की करीब 31 फीसदी हिस्सेदारी है । 526 में से 162 । वैश्विक स्तर पर उच्चतम होने के अलावा, यह सूची में शामिल अगले पांच देशों की संयुक्त संख्या से केवल एक कम है। ये पांच देश कांगो, थाईलैंड, केन्या, यूएसए और दक्षिण अफ्रीका हैं।

 

वन रेंजरों की मौत वाले देश, 2012-17

भारत ने 2012 और 2016 में सबसे अधिक मौतों (34) और 2013 में सबसे कम मौतों की संख्या (19) दर्ज की है।

 

भारत में वन रेंजरों की मौत, 2012-17

जंगल, वन्यजीवन, नदियों, और अन्य प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रणालियों और संसाधनों की रक्षा करते समय भारत में फ्रंटलाइन वन कर्मचारियों को शिकारियों, अवैध खनिकों, लकड़ी के तस्करों और अतिक्रमणियों द्वारा निशाना बनाया जाता है।

 

रेंजरों का काम क्यों है महत्वपूर्ण?

 

रेंजरों का काम भारत की पारिस्थितिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। पर्यावरण और वन मंत्रालय (एमओईएफ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जिन वनों की वे रक्षा करते हैं, वे भारत के ग्रीनहाउस गैसों के 11.25 फीसदी को अवशोषित करते हैं। तकनीकी रूप से यह ‘पारिस्थितिक तंत्र सेवा’ कहलाता है, इसका मूल्य 6 लाख करोड़ रुपये (120 बिलियन डॉलर) होगा।

 

फिर भी, भारत भर में हमारी जांच से पता चला है कि रेंजर पुराने उपकरण, बिना किसी आपातकालीन चिकित्सा सहायता और सुरक्षा प्रणालियों के बिना काम करते हैं और रोजाना खतरों से जूझते हैं।

 

हाल ही में 15 मई, 2018 को, वन गार्डों द्वारा काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में अवैध मछली पकड़ने को रोकने की कोशिश करने पर हाथापाई की गई और उन्हें घायल किया गया।

 

2011-2014 के बीच की अवधि में भारत में 72 वन रेंजरों की मौत हुई। इंटरनेशनल रेंजर फेडरेशन के अध्यक्ष और द थिन ग्रीन लाइन फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक शॉन विलमोर ने इंडियास्पेंड को ईमेल पर बताया, ” दुनिया में होने वाली रेंजरों की मौत की सबसे ज्यादा दर वाले देशों में से एक भारत भी है।”

 

‘रेंजर्स’ में वर्दीबद्ध सेवा, या वन विभाग के फ्रंटलाइन स्टाफ, भारत के जंगलों और वन्यजीवन की रक्षा के लिए प्राधिकृत प्राधिकरण शामिल है। वनों में काम करने के खतरों में से एक जंगली जानवरों द्वारा आकस्मिक हमला है। हालिया उदाहरण नागाराहोल टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर एस माणिकंदन थे, जो 3 मार्च, 2018, विश्व वन्यजीव दिवस पर जंगल की आग को बुझाने की कोशिश कर रहे थे तो उसी वक्त एक हाथी ने मार डाला।

 

हमलावरों के निशाने पर रेंजर ही क्यों?

 

इसका जवाब इस तथ्य में निहित है कि वे भारत के जंगलों की रक्षा करते हैं जिसमें इसके स्थलीय क्षेत्र का लगभग 20 फीसदी हिस्सा शामिल है ( आंकड़े विवादित हो सकते हैं ) और उनमें प्राकृतिक संसाधन शामिल हैं: वन्यजीव, लकड़ी, खनिजों, रेत, और पत्थरों। ये सभी तेजी से दुर्लभ हो रहे हैं और बेशकीमती बन रहे हैं।

 

लेडर द्वारा जब्त किए गए चट्टानों की कीमत ज्यादा नहीं थी, 20,000 रुपये से ज्यादा नहीं।  लेकिन मामूली खनिजों में अवैध कारोबार भी करोड़ों का हो जाता है।  निर्माण उद्योग और सड़क निर्माण में उपयोग के लिए उन चट्टानों को बजरी चिप्स या गिट्टी में तोड़ा जाता है।

 

संरक्षक मितू गुप्ता, जो 18 वर्षों तक छत्तीसगढ़ में काम कर रही हैं, कहती हैं कि, सैकड़ों अवैध पत्थर क्रशर धर्मजीगढ़ और रायगढ़ के आसपास काम कर रहेहैं। उनका आरोप है कि स्थानीय माफिया और राजनेताओं की शह पर ये काम होता है।

 

गुप्ता कहते हैं कि, “हालांकि, रेगिस्तान और बजरी / पत्थरों जैसे छोटे खनिजों का निष्कर्षण केंद्रीय और राज्य कानूनों के साथ-साथ अदालत के फैसले, अवैध निष्कर्षण और बाजारों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। इस क्षेत्र में कोयला परिवहन के लिए भारी सड़क और रेलवे का विस्तार होना है, और ठेकेदार इसे ‘अवैध ढंग से ‘ खरीदना पसंद करते हैं क्योंकि यह सस्ता है। “

 

“हमारे जंगल खुले खजाने हैं, लूटने के लिए खुले हैं…”

 

महाराष्ट्र वन विभाग के रवींद्र सिंह जचपेले एक और विस्मृत नायक हैं। इन्होंने गोंडिया जंगलों की रक्षा के लिए अपना जीवन दे दिया, जो नवेगांव-नागजीरा (महाराष्ट्र) और कान्हा (मध्य प्रदेश) बाघ भंडार के बीच एक महत्वपूर्ण गलियारा बनाते हैं। यह मूल सागौन जंगलों के अंतिम शेष इलाकों में से एक है।

 

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महाराष्ट्र के गोंडिया वनों के हिस्से की रक्षा करने के प्रभारी रवींद्र सिंह जचपेले ने एक महत्वपूर्ण बाघ गलियारे में  पेड़ों की अवैध कटाई के लिए अपराधियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की। कुछ दिनों बाद जचपेले की हत्या कर दी गई थी।

 

20 मई, 2017 को नियमित गश्त पर रहते हुए, जैचपेले ने गलियारे में पेड़ों की अवैध कटाई देखी और अपराधियों को बुक किया। कुछ दिनों बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। पेड़ काटने वाले लोग हत्या के लिए संदिग्ध हैं।

 

सैंगक्चूएरी एशिया संपादक और सैंगक्चूएरी नेचर फाउंडेशन के संस्थापक बिट्टू सहगल कहते हैं, “हमारे जंगल खुले खजाने हैं, लूटने में आसान हैं। हालांकि, हम अपने बाघों से प्यार करते हैं लेकिन उनके लिए कुछ ही प्रयासों को महसूस करते हैं। “

 

लुप्तप्राय लाल सैंडर्स पेड़ की रक्षा करना एक और जोखिम भरा काम है। दक्षिण पूर्व और पश्चिम एशिया में तैयार किए गए वाद्य यंत्रों के लिए यह सबसे जरूरी लकड़ी मानी जाती है। इसकी लकड़ी काला बाजार में 2 करोड़ रुपये (  293,900 डॉलर) प्रति टन से अधिक में बिकती है। 2013 में पूर्व आंध्र प्रदेश में इस लकड़ी की तस्करी रोकने की कोशिश करते हुए तीन वन कर्मचारियों मारे गए थे।

 

नवी मुंबई के कलवा वन विभाग में अतिक्रमण के कारण वन गार्ड बुद्धजी जाधव  को 14 जुलाई, 2014 को जान से हाथ धोना पड़ा। अचल संपत्ति, उद्योग और कृषि सहित अवैध अतिक्रमण वन विनाश का सबसे बड़ा चालक है। अप्रैल 2016 में संसद में पूर्व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा बताए गए आंकड़ों के मुताबिक 1.89 मिलियन हेक्टेयर वन भूमि- 18,900 वर्ग किमी या गोवा के लगभग पांच गुना आकार पर अतिक्रमण किया गया है।

 

यदि अतिक्रमण वनों को नष्ट कर रहा है, तो अवैध वन्यजीव व्यापार प्रजातियों के विलुप्त होने का कारण  हैं। युनाइटेड नेशन ऑफिस ऑन ड्रग्स एंड क्राइम के अनुसार लाभ के मामले में हथियार और दवाओं की तस्करी के साथ वन्यजीव अपराधों को भी स्थान दिया गया है, और सालाना 8-10 बिलियन डॉलर के बीच लाभ कमाया जाता है।

 

शोधकर्ता नंदिनी वेल्हो, जिन्होंने कई साल अरुणाचल प्रदेश के पाक्के टाइगर रिजर्व, में बिताया है, वन गार्ड पीडी माजी की कहानी सुनाते हैं: “वह पाक्के में शिकार प्रयासों के विरोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, और उन्हें अप्रैल 2007 में शिकारियों ने गोली मार दी थी। पार्क निर्देशक ताना तापी के शब्दों में, ‘ऐसा था जैसे हम एक कर्नल खो गए, केवल पाक्के के लिए लड़ने से उनकी मौत हो गई। ‘ “

 

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वन गार्ड पीडी माजी को अप्रैल 2007 में शिकारियों ने गोली मार दी थी। माजी अरुणाचल प्रदेश के पाक्के टाइगर रिजर्व में शिकार को रोकने में सबसे आगे थे।

 

ओडिशा में, 2 मई, 2018 को कुलिधा वन्यजीव अभयारण्य में सशस्त्र शिकारियों द्वारा किए गए हमलों की वजह से विभागीय वन अधिकारी विश्वराज पांडा को अपने कर्मियों के लिए पुलिस से सुरक्षा मांगनी पड़ी। पांडा ने इंडियास्पेन्ड को बताया कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ था, “पिछले महीने में, दो अलग-अलग घटनाओं में नौ वन कर्मचारी घायल हो गए हैं।”

 

रेत माफिया से खतरे

 

रेत पर लड़ाई दुनिया भर की कहानी है, लेकिन इस पर सबसे खतरनाक लड़ाई भारत में हो रही है, जैसा कि वायर्ड में इस मार्च 2015 की रिपोर्ट में कहा है।

 

तेजी से हो रहे निर्माण कार्यों के लिए भारत हर साल 500 मिलियन मीट्रिक टन रेत खोदता है ( जो कंक्रीट का मुख्य घटक है ) और यह केवल कानूनी रूप से दर्ज संख्या है, इससे परे की कहानी बहुत खतरनाक है।

 

अवैध रूप से खनन की गई रेत की मात्रा के लिए कोई आधिकारिक आंकड़े नहीं हैं, लेकिन 2015-16 में मामूली खनिजों के अवैध खनन के 19, 000 से अधिक मामलों में रेत, बजरी और पत्थर शामिल हैं। रेत के लिए इस मांग की लागत वे लोग महसूस करते जो राष्ट्रव्यापी नदियों से अवैध रेत खनन रोकने की कोशिश करते हैं।

 

मार्च 2016 में ,राष्ट्रीय चंबल वन्यजीव अभयारण्य की यात्रा के दौरान, खबरें आई कि वन गार्ड  नरेंद्र शर्मा को मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में अभयारण्य में अवैध रूप से परिचालन करने वाले रेत खनिकों द्वारा मार दिया गया था। फरवरी 2018 में, मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में रेत माफिया द्वारा भारतीय वन सेवा अधिकारी अभिषेक तोमर पर हमला किया गया था, जैसा कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने 9 फरवरी, 2018 को बताया है। रिपोर्ट में कहा गया कि जब तोमर ने एक ट्रैक्टर ट्रॉली पर रेत देककर हस्तक्षेप किया, तो उन लोगों ने उनक ऊपर ट्रैक्टर चढ़ाने की कोशिश की। सौभाग्यशाली थे कि वह बच गए।

 

विचार मंच ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ में शोधकर्ता कांची कोहली कहती हैं, “हाल के दिनों में रेत खनन सबसे बड़ी पारिस्थितिकीय आपदाओं में से एक है।”

 

“रेत खनन को नियंत्रित करने के लिए पर्यावरण मंत्रालय के 2016 के दिशानिर्देश स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि अत्यधिक निष्कर्षण नदियों, डेल्टा, तटीय और समुद्री प्रणालियों पर बुरा प्रभाव डाल रहा है और ये सभी नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरनाक हैं। “

 

रेत के निष्कर्षण से नदी के किनारे और समुद्र तटों के पतन भी होते हैं जो विशेष रूप से यहां रहने वाले प्रजातियों के लिए घातक हैं। इस कारणों के वजह से घडियाल, एक प्राचीन मगरमच्छ प्रजाति, के विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है।  

 

अधिकांश रेंजरों को खतरनाक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है!

 

जंगल की रक्षा में लगे लोग अक्सर तनावपूर्ण जीवन जीते हैं। धमकी उनके लिए नई बात नहीं होती।चंबल नदी के किनारे पर देवरी चौकी, मोरेना (मध्य प्रदेश) के कर्मचारियों ने रेत माफिया के आतंक के बारे में बात की। जब डंपर्स को रोकने का प्रयास किया जाता है तो वे बदला तो लेते ही हैं।

 

लेडर के सहयोगियों ने कहा कि लेडर को निशाने पर लेने के लिए वे लोग कुछ भी कर सकते थे, क्योंकि लेडर ने अपनी निगरानी के दौरान लकड़ी, कोयले, रेत और पत्थरों की अवैध तस्करी को निडरता से रोक कर रखा था। छत्तीसगढ़ सरकार से प्राप्त रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि 2012-17 के बीच लेडर द्वारा किए गए दौरे से 9.65 करोड़ रुपये (1.41 मिलियन डॉलर) का राजस्व हुआ है।

 

बिलासपुर जिले के लेडर के बैचमेट और आरएफओ सुनील बच्चन कहते हैं, “काम के दौरान खतरे असामान्य नहीं हैं, लेकिन इनसे हम हार नहीं मानते।” लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि लेडर की हत्या से वे हिल गए हैं।

 

वर्ल्डवाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) और रेंजर्स फाउंडेशन एशिया (आरएफए), दोनों एनजीओ द्वारा 2016 के एक सर्वेक्षण के मुताबिक 63 फीसदी से कम रेंजरों को खतरनाक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है। सर्वेक्षण में यह भी पता चला है कि स्थानीय समुदायों द्वारा 20 फीसदी से अधिक रेंजरों को धमकी दी गई है।

 

संरक्षित क्षेत्र मानवीय गतिविधियों जैसे कि चराई, लकड़ी काटने और मामूली वन उपज के संग्रह के लिए प्रतिबंधित हैं , जो व्यावसायिक निष्कर्षण और भूमि से बाहर रहने वाले स्थानीय निवासियों में लगे आपराधिक तत्वों के साथ टकराव का कारण बन सकते हैं।

 

इन टकरावों का अक्सर अर्थ यह है कि कर्मचारी का समुदाय के साथ तनाव का रिश्ता है। उदाहरण के लिए,  अथगढ़ (ओडिशा) में हाथियों को ट्रैक करने वाले मानव-हाथी संघर्ष मिटिगेशन स्क्वाड के सदस्यों ने फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले जानवरों की सुरक्षा के लिए ग्रामीणों की नाराजगी झेलने की बात की।

 

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में कलगढ़ भाग से ऐसी एक घटना की सूचना मिली, जहां ग्रामीणों ने मार्च 2011 में एक कैजड तेंदुए को घेर लिया।उसे मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगाने की साजिश थी। तेंदुए को बचाने की कोशिश करने वाले कर्मचारियों पर भी मिट्टी का तेल डाला गया था।

 

वैश्विक स्तर पर, 2-3 रेंजर्स हर हफ्ते ड्यूटी पर मर जाते हैं!

 

दुनिया भर में, पर्यावरण संघर्ष की संख्या और तीव्रता बढ़ रही है। प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करने वाले लोगों द्वारा पर्यावरण रक्षकों की हत्या ( स्थानीय लोग, पत्रकार, संरक्षणवादी, वैज्ञानिक ) वैश्विक प्रवृत्ति भी बन रही है।

 

रेंजर्स इस लड़ाई में सबसे ज्यादा निशाने पर हैं। दो से तीन रेंजर्स हर हफ्ते फ्रंटलाइन ड्यूटी पर अपना जीवन खो देते हैं, पिछले दशक में 1,000 से ज्यादा मारे गए हैं, जैसा कि शॉन विलमोर ने दिसंबर 2016 में ‘द गार्जियन’ में लिखा था। शिकारियों ने लगभग 70 फीसदी की हत्या कर दी थी ।

 

रेंजर्स अफ्रीका में विशेष रूप से कमजोर हैं, जहां वन्यजीवन की हत्या निरंतर जारी है।  केन्या के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक में दुनिया के 800 पर्वत गोरिल्ला के आखिरी निवास विरुंगा राष्ट्रीय उद्यान दुनिया में सबसे खतरनाक संरक्षण परियोजनाओं में से एक है। पार्क में और उसके आस-पास कई सशस्त्र विद्रोही गुट हैं। यह शिकारियों और अवैध लकड़ी के तस्करों का भी गढ़ है।

 

पिछले दो दशकों में, विरुंगा राष्ट्रीय उद्यान में 175 रेंजरों की मौत हो गई है। हाल ही में, 11 मई, 2018 को, रेंजर रातुल कटुम्वा को बंदूकधारियों ने मार दिया था, जब उन्होंने अपहरण किए गए ब्रिटिश पर्यटकों को बचाने की कोशिश की थी।

 

पाकिस्तान में, रिश्वत लेने से इनकार करने पर अवैध लॉगर्स द्वारा फौजदार मोहम्मद अक्रम की हत्या कर दी गई थी।

 

खतरों की कम पहचान

 

हालांकि, वे लगातार निशाने पर हैं और मारे जा रहे हैं,  फिर भी उनकी नौकरी के लिए समाज में उनकी बहुत कम मान्यता और सम्मान है। आवश्यक उपकरण या प्रशिक्षण के लिए भी प्रावधान नहीं है। रेंजर्स फेडरेशन द्वारा पूरे एशिया में सर्वेक्षण किए गए चार में से तीन कर्मचारियों ने कहा कि उनके पास अपनी सुरक्षा के लिए उचित हथियार और सुविधाएं नहीं हैं। बहुतों को नौकरी के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया गया है।

 

वन कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ बातचीत से पता चलता है कि भारत में वे और भी खराब हाल में हैं । वे हर दिन जिन खतरों से सामना करते हैं, उससे लड़ने में वे समर्थ नहीं हैं। वे शायद ही कभी सशस्त्र होते हैं और जब वे होते हैं, तो उन्हें पुराने .12 बोर्स और .303 राइफल्स दिया जाता है, जो न तो विश्वसनीय और न ही उपयोगी हैं। यदि गश्त के लिए वाहन और नौकाएं हैं, तो उन्हें चलाने के लिए पर्याप्त ईंधन नहीं है। अक्सर, ठेके के श्रमिकों को समय पर मजदूरी नहीं मिलती है। फंड में देरी होती है या फंड उचित रूप से आवंटित नहीं होता।

 

वन्यजीवन के लिए राष्ट्रीय बोर्ड के सदस्य के रूप में, इस लेखक ने 6 जून, 2013 को एक बैठक के दौरान एमओईएफ के कर्मचारियों के कल्याण के लिए एक नीतिगत रिपोर्ट जमा किया था। उसमें रेंजरों द्वारा नियमित रूप से सामना की जाने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया था। खराब संचार सुविधाओं के साथ दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में काम करना और आपात स्थिति के मामले में तत्काल चिकित्सा सहायता नहीं, जैसे बिंदुओं पर उस रिपोर्ट में बात की गई थी।

 

उस बैठक में, यह भी कहा गया था कि भारत भर में लगभग 30 फीसदी कर्मचारियों की कमी है। झारखंड में पलामू जैसे कुछ रिजर्व क्षेत्र में, पिछले एक दशक में यह कमी लगभग 90 फीसदी रही है और हाल ही में कुछ सुधार हुआ है।

 

इस तरह की कमी नतीजे विनाशकारी हो सकते हैं। मार्च 2017 में दक्षिण बंगाल के लालगढ़ में, बाघ की निगरानी करते हुए दो कर्मचारी अपने वाहन में सो गए, जिससे उनकी दम घुटने से मौत हो गई।

 

वन रेंजरों की मौत पर भी सिस्टम में कोई बदलाव नहीं दिखता

 

चोट या मौत के मामले में, वन अधिकारी आमतौर पर परिवार की मदद या चिकित्सा सहायता प्रदान की मांग करते हैं। उन्हें रेंजर एसोसिएशन, एनजीओ और व्यक्तियों के योगदान से सहायता मिलती है। गैर सरकारी संगठन, जैसे कि डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और वन्यजीवन ट्रस्ट ऑफ इंडिया, बीमा योजनाएं और फ्रंटलाइन वन कर्मचारियों के लिए सहायता प्रदान करते हैं। तमिलनाडु में कुछ पार्क-काजीरंगा (असम), पेरियार (केरल), कान्हा (एमपी) और अन्नामलाई ने अपने कर्मचारियों के लिए जीवन और चिकित्सा बीमा की नपहल की है। यह टाइगर रिजर्व क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए एक छोटा सा प्रोत्साहन है।

 

लेकिन राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल संजय पाठक ने स्वीकार किया कि, “फ्रंटलाइन वन कर्मचारियों के लिए संस्थागत पैन-इंडिया लाइफ या हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम” नहीं है। टाइगर रिजर्व को अपनी वार्षिक योजनाओं में ऐसे प्रावधान करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है, जिसे एनटीसीए द्वारा वित्त पोषित किया जा सके।

 

इन खतरों को पहचानते हुए, एमओईएफ ने सितंबर 2013 में वन्यजीव के लिए राष्ट्रीय बोर्ड के सुझाव पर फ्रंटलाइन वन कर्मचारियों के कल्याण के लिए एक समिति गठित की थी। दिसंबर 2013 को एक बैठक में( जिसमें इस संवाददाता ने भाग लिया था ) रेंजर भर्ती, पोस्टिंग और पदोन्नति को नियंत्रित करने और आवास और चिकित्सा सुविधाओं, बीमा योजनाओं, कर्तव्यों के तर्कसंगतता और कठिनाई भत्ता जैसे कल्याणकारी उपायों पर विचार करने के लिए एक नीति का प्रस्ताव दिया गया था।

 

चार साल बाद, अधिकारियों ने स्वीकार किया कि ” आगे कोई कदम नहीं उठाए गए हैं”।

 

इसमें एक और महत्वपूर्ण तत्व गायब है।समाज से प्रेरणा, समर्थन और प्रशंसा। आमतौर पर गैर सरकारी संगठनों द्वारा सहायता प्राप्त कुछ पार्क प्रबंधन, अपने कर्मचारियों को प्रेरित करने के लिए कदम उठाते हैं । ये कदम हैं, साहस, अनुकरणीय समर्पण आदि के लिए पुरस्कार ।

 

पाक्के टाइगर रिजर्व ने फील्ड स्टाफ को प्रेरित करने के लिए ” कैमरे में कैद सर्वश्रेष्ठ तस्वीरों” के लिए सार्वजनिक मतदान प्रतियोगिता के साथ एक कदम आगे बढ़ाया है। पाक्के में एक प्रतीक्षित शाम में, वरिष्ठ अधिकारी, कर्मचारी, शोधकर्ता और स्थानीय लोग एक साथ मिलते हैं, भोजन करते हैं और खेल खेलते हैं। पुरस्कार योग्य कर्मचारियों को पुरस्कार दिए जाते हैं।

 

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अरुणाचल प्रदेश में पाक्के बाघ रिजर्व वन के कर्मचारी करो तैयम द्वारा ली गई एक गुस्लाए बाघ की इस तस्वीर ने 2013 में ‘फर्स्ट कैमरा ट्रैपिंग कंप्टीशन’ में पहला पुरस्कार जीता था।

 

इंडियास्पेंड द्वारा समाधान के कुछ रास्ते
 

    • फ्रंटलाइन कर्मचारियों को अच्छी तरह से सुसज्जित और प्रेरित रखने के लिए एक औपचारिक ढांचा बनाया जाए। इसमें सुरक्षात्मक गियर के प्रावधान, कर्तव्य के घंटों का तर्कसंगतकरण और दूरस्थ वन क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए कठिनाई भत्ता शामिल होगा।

 

    • जब रेंजर का परिवार अलग रहता है तो आवास, शिक्षा और चिकित्सा सुविधाओं के लिए एक अलग ‘परिवार कल्याण नीति’ हो।

 

    • वन अधिकारियों के स्तर तक वन कर्मचारियों के लिए जीवन और चिकित्सा बीमा व्यवस्थित करें।

 

    • वन क्षेत्रों / कर्तव्य क्षेत्र के भीतर पर्याप्त आवास और सुरक्षा सुनिश्चित करें।

 

    • फ्रंटलाइन वन कर्मचारियों के लिए भर्ती, पोस्टिंग, पदोन्नति, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण को नियंत्रित करने के लिए एक नीति तैयार करें। यह देरी के प्रचार के कारण कर्मचारियों की कमी और प्रेरणा की कमी के मुद्दों को संबोधित करेगा।

 

    • प्रोत्साहन और पुरस्कारों के माध्यम से अपने काम को पहचानकर फ्रंटलाइन कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ावा दें।

 

 

(बिंद्रा वन्यजीवन राष्ट्रीय बोर्ड की पूर्व सदस्य और  ‘द वैनिशिंग: इंडिया वाइल्ड लाइफ क्राइसिस’ की लेखिका हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 26 मई, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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