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मोदी जी की जुबानी बदलती गई विमुद्रीकरण की कहानी

प्रवीण चक्रवर्ती,
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13 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विमुद्रीकरण पर एक बैठक की थी। प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए सात भाषणों को लेकर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण में नोटबंदी की कार्रवाई और लक्ष्य में परिवर्तन की कहानी सामने आती है।

 

500  और 1000 रुपए के नोटों को वापस लेने की घोषणा करने के लिए 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश दिया था। यह भाषण (अंग्रेजी में) 25 मिनट का था। प्रधानमंत्री ने अपने इस भाषण में ‘काले धन’ शब्द का इस्तेमाल 18 बार किया। इसी भाषण में  ‘जाली नोट’ या  जालसाजी या नकली जैसे शब्दों का इस्तेमाल पांच बार किया गया।

 

प्रधानमंत्री के भाषण से स्पष्ट  था कि  देश की लगभग 86 फीसदी मुद्राओं की अचानक वापसी के पीछे का मुख्य उदेश्य काले धन का अंत है। अगले दिन के अखबार में इसे  ‘काले धन के खिलाफ युद्ध’ करार दिया गया था। मोबाइल भुगतान सेवा मुहैया कराने वाली कंपनी पेटीएम  ने एक पूरे पृष्ठ के विज्ञापन के साथ निर्णय का स्वागत किया। इसके बाद प्रधानमंत्री जापान रवाना हो गए।

 

जब तक प्रधानमंत्री जापान से लौटे तब तक इस कदम को अंग्रेजी में ‘डिमॉनीटीइजेशन’ और हिंदी में ‘नोटबंदी’ का नाम दिया गया। और उस समय देश में युद्ध स्तर पर मुद्राओं का नियंत्रण में वितरण किया जा रहा था।

 

प्रधानमंत्री की निजी वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 13 नवंबर से 27 नवम्बर के बीच रेडियो पर आने वाले कार्यक्रम ‘मन की बात’ सहित प्रधानमंत्री ने नोटबंदी नीति पर देश भर में छह भाषण दिए हैं। सभी भाषण वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।

 

सभी भाषण के विश्लेषण के बाद, नोटबंदी की कार्रवाई और इसके उदेश्यों के बीच परिवर्तन का पता चलता है।  8 नवंबर, 2016 को जब विमुद्रीकरण की घोषणा की गई, तब अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने ‘काले धन’ शब्द का प्रयोग ‘जाली नोट’ की तुलना में चार बार ज्यादा किया है।

 

27 नवम्बर तक ‘डिजिटल/कैशलेस’ शब्द का इस्तेमाल ‘काले धन’ के बराबर, तीन बार किया गया है। हम बता दें कि यहां ‘जाली नोट’ का इस्तेमाल नहीं किया गया है। हम यह भी बताते चलें कि 8 नवंबर को दिए गए भाषण में ‘डिजिटल / कैशलेस’ जैसे शब्द का जिक्र नहीं किया गया था।

 

नीचे दिए गए चार्ट में पिछले तीन सप्ताह और सात भाषण के दौरान इस्तेमाल किए गए तीन टर्म – ‘काला धन’, ‘जाली नोट’ और ‘कैशलेस / डिजिटल भुगतान’ – के अनुपात का पता चलता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह पता चलता हैकि विमुद्रीकरण के कारणों का वर्णन करने के लिए प्रधानमंत्री ने भाषण में इन शब्दों का कितनी बार प्रयोग किया है। इससे प्रॉक्सी के रूप में यह समझा जा सकता कि इस बड़े कदम में पीछे प्रधानमंत्री क्या कारण मानते हैं।

 

प्रधानमंत्री के भाषण में  विशिष्ट शब्दों की आवृति 

 

चार्ट में पीली रेखा, प्रधानमंत्री के भाषण में इस्तेमाल हुए ‘कैशलेस / डिजिटल’ शब्द के प्रयोग को दर्शाती है। इस शब्द का जिक्र 8 नवंबर,2016 के भाषण एक बार भी नहीं किया गया है, जबकि 27 नवंबर, 2016 के भाषण में इसका अनुपात 73 फीसदी रहा है।

 

हरे रंग की रेखा ‘जाली नोट’ शब्द के प्रयोग को दिखा रही है। हम बता दें कि इसी अवधि के दौरान इस शब्द का अनुपात 22 फीसदी से शुन्य तक पहुंचा है। यह इस बात का संकेत है कि अब प्रधानमंत्री आतंकवाद के वित्तपोषण के कारण रूप में विमुद्रीकरण को नहीं देख रहे हैं।

 

काली रेखा ‘काले धन’ शब्द के प्रयोग को दर्शाती है। 8 नवंबर के भाषण में इस शब्द का 80 फीसदी का अनुपात देखा गया है, जबकि 27 नवंबर के भाषण में यह केवल 27 फीसदी ही रहा है। जाहिर है कि यह अब ‘काले धन के खिलाफ युद्ध’ नहीं रहा है। इससे अलग अब यह सभी कैशलेस अर्थव्यवस्था के लिए युद्ध हो गया है।

 

8 नवंबर से 27 नवम्बर आते-आते विमुद्रीकरण के पीछे का उदेश्य काले धन के उन्मूलन से कैशलेस होना हो गया है।

 

नागरिकों को कम नकदी उपयोग और डिजिटल लेन-देन के लिए आग्रह करना एक प्रशंसनीय उद्देश्य है और निश्चित रूप से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। लेकिन जब रातों-रात देश में चल रहे 86 फीसदी नोट अमान्य घोषित करने का निर्णय लिया गया, तब किसी के भी मन में इस कदम के पीछे मजबूत तर्क की उम्मीद होगी।

 

या तो प्रधानमंत्री का एहसास हो गया है कि काले धन को नष्ट करने के मूल उद्देश्य को पूरा नहीं किया जा सकता है या इस फैसले के पीछे पर्याप्त सोच ही नहीं थी।

 

(चक्रवर्ती आईडीएफसी संस्थान के तहत राजनीतिक अर्थव्यवस्था में वरिष्ठ फेलो हैं और इंडियास्पेंड के ट्रस्टी संस्थापक हैं। प्रधानमंत्री के भाषण के ट्रैन्स्क्रिप्शन में सहयोग- पूजा दास )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 05 दिसम्बर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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