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यूपी की लड़ाई में घृणा की राजनीति और शहरी आकांक्षा का टकराव

रेवती लाउल,
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2020

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गौतम बुद्ध नगर (उत्तर प्रदेश): भारत की राजधानी से 56 किमी पूर्व में सुतयाना गांव में स्थित मैदान से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कार्यकर्ताओं से भरी हुई सफेद एसयूवी लोगों के चहरे पर धूल उड़ाती हुई निकलती है।

 

गौतम बुद्ध नगर की प्रकृति आधे शहरी से ज्यादा नहीं है, दिल्ली के उपनगर नोएडा में आईटी कंपनियों और कांच के भवनों की भरमार है। सुतयाना, संसदीय क्षेत्र के दूसरे छोर पर, सिकुड़े हुए खेतों और पूर्व किसानों का एक गांव है, जहां कुछ अपनी जमीन बेचकर खुश थे और कुछ ने विरोध किया था, जब सरकार ने 2011 में एक एक्सप्रेसवे बनाने के लिए इसे हासिल करने की कोशिश की थी। हाल ही में, एक नए हवाई अड्डे सहित विभिन्न सरकारी परियोजनाओं पर नोएडा और जेवर शहर के आसपास के गांवों में भी कुछ ऐसा ही देखने मिलता है।

 

 

हाल ही में मार्च के दिन, प्रदर्शनकारी और पार्टी कार्यकर्ता गौतम बुद्ध नगर निर्वाचन क्षेत्र में केंद्रीय संस्कृति मंत्री और बीजेपी सांसद महेश शर्मा  की चुनावी रैली के लिए एकत्र हुए थे। 59 वर्षीय शर्मा ने 2014 में 50 फीसदी वोट हासिल किए थे । समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी थे,दोनों के बीच  23.37 फीसदी वोट का अंतर था। शर्मा ने उस पिछले परिणाम को दोहराने की उम्मीद की।

 

यह बीजेपी युवा मोर्चे का कार्यक्रम था। कह सकते हैं कि युवा कार्यक्रम था और कुछ ज्यादा ही शोरगुल था। दोपहर के 12:20 बज रहे थे, किसी भी मिनट में मंत्रीजी के आने की उम्मीद थी। कार्यक्रम में 2,500 लोगों ( जिनके लिए पर्याप्त कुर्सियां, माइक्रोफोन, मेगाफोन और पोस्टर की व्यवस्था की गई थी ) थी, लेकिन वहां 50 से अधिक लोग मौजूद नहीं थे।

 

एक और एसयूवी घूमते हुई आई और बगल के एक गांव से एक नेता ने प्रवेश किया। उनके आगे ड्रम लिए, चमकदार कपड़ों में एक लड़का था। उसने जोर से ढोल बजाना शुरु किया और मुख्य रुप से वोटरों को आकर्षित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लेकर चिल्लाना शुरु किया – “मोदी जी की जय हो”

 

सत्ता में रही दक्षिणपंथी हिंदू पार्टी, जो एक बार फिर भारत के सबसे महत्वपूर्ण राजनीति के मैदान में भारी संख्या में अपने लिए मत की अपील कर रही है, उस पर छह आलेखों की श्रृंखला का यह पहला आलेख है। देश के 543 लोकसभा क्षेत्रों में से 80 उत्तर प्रदेश से हैं, यानी लोकसभा के सदस्यों का 14 फीसदी। राज्य में 79.7 फीसदी हिंदू और 19.2 फीसदी मुस्लिम हैं। जनगणना 2011 के अनुसार, यूपी वह स्थान है जहां 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के साथ पहली बार हिंदू अधिकारों को लेकर जमीन तैयार हुई थी और अयोध्या में राम मंदिर बनाने का आंदोलन शुरू हुआ। प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से भारत के इस दूसरे सबसे गरीब राज्य में वोट कैसे डाले जाते हैं… जाति धर्म से कैसे मुकाबला करेगी  या फिर दोनों के संयोजन से  यह निर्धारित होगा कि किसे भारत का सबसे बड़ा वोट बैंक मिले। 2019 के अभियान के दौरान यूपी के दिल के माध्यम से हमारी यात्रा आपको चुनावी गणित के पीछे की कहानियों को सामने लाएगी। हम राज्य में धर्म और जाति से जुड़े मुद्दों को पेश कर रहे हैं और नौकरियों के लिए उत्सुक मतदाता कैसे प्रतिक्रिया दे रहे हैं, उस पर बात करेंगे।

 

गौतम बुद्ध नगर: एक बीजेपी बस्ती

2017 विधानसभा चुनाव

Gautam Buddh Nagar–84.6% Hindu–is crucial to the story of UP.

 

गौतम बुद्ध नगर ( 84.6 फीसदी हिंदू ) यूपी के नब्ज को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

यह यूपी के सबसे नए निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है, जिसे 1997 में गाजियाबाद और बुलंदशहर के कुछ हिस्सों काटकर बनाया गया था। यह एक औद्योगिक केंद्र है। यूपी की दूसरी सबसे बड़ी जिला अर्थव्यवस्था (लखनऊ के बाद), और इसके शहरी चेहरे, नोएडा को राज्य के लाखों लोगों को नौकरी के लिए अवसर देने के लिए बसाया गया था।

 

राज्य को उन अवसरों का एहसास होना चाहिए, क्योंकि इसके पास देश में सबसे ज्यादा कार्य करने वाले लोगों की आबादी है। करीब 20 करोड़,  ब्राजील की आबादी के बराबर,  जो कि यूपी की तुलना में 35 गुना बड़ा है। लेकिन हॉंगकॉंग की तुलना में इसकी अर्थव्यवस्था आधी है, जो गौतम बुद्ध नगर की तुलना में छोटा क्षेत्र है।

 

ये अवसर महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यूपी में भारत की दूसरी सबसे बड़ी प्रजनन दर है, जिसका मतलब है कि इस राज्य में युवा लोग जुड़ते रहेंगे। इसका मतलब है कि इसकी जनसांख्यिकीय लाभांश ( एक युवा आबादी से होने वाली आर्थिक वृद्धि ) का फायदा उठाने के लिए इसकी खिड़की लगभग 2050 तक “पूरी तरह से खुली” होने की संभावना है, जैसा कि ‘यूनाइटेड नेशन पॉपुलेशन फंड’ की ओर से 2018 के एक अध्ययन से पता चलता है।

 

2017 के ‘इंटरनेश्नल लेबर ऑर्गेनाइजेशन’ के एक अध्ययन में कहा गया है, “अपनी विशाल क्षमता के साथ, उत्तर प्रदेश को कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में श्रम बल के लिए वैतनिक नौकरियों के साथ विकास रास्ते पर चलने की आवश्यकता होगी।”

 

सुतयाना गांव में इक्ट्ठा हुए बीजेपी के वफादारों ने भी स्वीकार किया कि इस चुनाव और पिछले चुनाव के बीच,  उनके सरकार ने ग्रामीण संकट को कम करने के लिए कम ही काम किया है। असली सवाल था – इससे उनके मतदान पर कोई फर्क पड़ने वाला है या नहीं।

 
हिंदू बनाम मुस्लिम को छोड़कर, कोई अन्य मुद्दा नहीं

 

यूपी में भारत की सबसे बड़ी युवा (15-24) आबादी है, जो 4 करोड़ से अधिक है, जो कि महाराष्ट्र से लगभग दोगुना है। अंडर-डेवलपमेंट, और रोजगार की कमी ने संयुक्त रुप से पिछले दो दशकों में जाति की राजनीति का एक आधार बनाया है। इस मिश्रण में अब धर्म की भी जगह है। केंद्रीय मंत्री शर्मा ने,  2014 के चुनाव में जीत और मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के एक साल बाद, इस निर्वाचन क्षेत्र में पहली भीड़ लींचिंग भी देखा था। गौतम बुद्ध नगर के दादरी खंड के एक गांव में 28 सितंबर, 2015 को मोहम्मद अखलाक की हत्या कर दी गई थी, क्योंकि उग्र भीड़ का मानना ​​था कि उसने गौ मांस का सेवन किया है।

 

2014 के बाद से, यूपी में गाय से संबंधित घृणा अपराधों में 11 लोग मारे गए हैं, उनमें से 73 फीसदी मुस्लिम हैं, जो किसी भी भारतीय राज्य में इस तरह के हमलों में सबसे ज्यादा है, जैसा कि FactChecker.in द्वारा चलाए गए डेटाबेस से पता चलता है।

 

अब इस चुनावी मौसम में, उसी निर्वाचन क्षेत्र के एक अन्य गांव में एक छोटे से भाजपा कार्यालय में, एक पार्टी नेता ने नाम न छापने की शर्त पर, बीजेपी के आधिकारिक अभियान, ‘सबका साथ, सबका विकास’ पर टिप्पणी की। उन्होंने बताया, “हमारे पासे हिंदू मुस्लिम के अलावा जीतने के लिए कोई और मुद्दा नहीं है ।”

 

यह कहने वाला व्यक्ति मूल रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से था। एक बार, उनके सीधे और साफ बोलने के कारण चुनाव लड़ने के लिए टिकट पाने से रोक दिया था। अब, वह आरएसएस के संस्थापक – केबी हेगड़ेवार और उनके तत्काल उत्तराधिकारी, एमएस गोलवलकर के पोस्टरों के सामने, एक छोटे से पार्टी कार्यालय में बैठे थे। बीजेपी नेता ने कहा, “मैं दिल की गहराईयों से चाहता हूं कि अब की मोदी सरकार न हो।”

 

लेकिन पहले से ही कई ऐसी चीजों का ढेर था, जिसे स्वीकारने से वह नीचे आया। इसमें 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद को तोड़ना और उसके बाद के दशकों में गौतम बुद्ध नगर में उनकी पार्टी की विभाजनकारी धार्मिक राजनीति शामिल थी।

 

अखलाक और उसके बाद

 

पिछले चुनाव में, महेश शर्मा ने समाजवादी पार्टी के अपने प्रतिद्वंद्वी को 23.37 फीसदी के अंतर से हराया था। एक साल बाद, दादरी के बिसाहड़ा गांव में, मोहम्मद अखलाक की हत्या कर दी गई। अखलाक की लींचिंग के बाद, शर्मा ने कहा था: “यह (हत्या) उस घटना (गौ हत्या) की प्रतिक्रिया के रूप में हुई।”

 

स्थानीय राजपूत बस्ती में, गली के सामने  एक बड़ा बिजली ट्रांसफार्मर है। 28 सितंबर, 2015 की रात को गांव के लाउडस्पीकर से एक घोषणा की गई थी कि पास में एक बछड़े का शव मिला है। ट्रांसफार्मर कहीं से भी मुस्लिम पड़ोस के पास नहीं था, जहां अखलाक रहते थे, लेकिन इस इलाके में, ‘गाय बचाओ अभियान’ मजबूत भावनात्मक मुद्दा था।

 

जिस गली में अखलाक की हत्या हुई थी, उस गली में संजय राणा अपने घर के बाहरी आंगन में बैठे थे। उनके बेटा विशाल अखलाक की हत्या के आरोपी 17 युवकों में से एक है। विशाल को दो साल के लिए जेल भेज दिया गया था। राणा कहते हैं, “वह एक स्वाभाविक घटना थी। नहीं होनी चहिये थी, हो गई। “

 

 उनका बेटा जमानत पर बाहर है, लेकिन उसे आरोपों से बरी नहीं किया गया है। राणा ने एक पिता के रूप में अपनी निराशाजनक बातें बताईं। उन्होंने कहा कि यह चाल बीजेपी की नहीं, बल्कि विपक्ष की थी, जिसने अखलाक की हत्या को राजनीतिक रंग में बदल दिया।

 

राणा ने कहा, “जो गौमांस पाया गया था उसे बकरे का मांस कह कर, एक तरह से सरकार की छवि खराब करने की कोशिश की गई। ”

 

राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, असदुद्दीन ओवैसी, वृंदा करात… वे राणा की नजर में असली अपराधी थे। यह बीजेपी के चुने हुए प्रतिनिधि, मंत्री शर्मा थे, जो शांति बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे।

 

राणा के घर के बाहर, शांति नहीं थी, केवल तनाव और क्रोध था।

 

बिसाहड़ा गांव का माहौल ऐसा ही था । जैसे ही यह रिपोर्टर संकरी गली से बाहर निकला तो हत्या स्थल के पास पुलिस फ्लैग मार्च पर थी। उनमें से 80 से अधिक लोगों ने क्षेत्र में गश्त लगाई, क्योंकि होली पास थी और, जैसा कि राणा के रिश्तेदारों ने समझाया था, क्षेत्र के लोगों को समझाने की आवश्यकता थी कि हिंसा न करें।

 
 

चुनाव हो या न हो, बिसाहड़ा जैसे गौतम बुद्ध नगर के बड़े इलाके, अब ध्रुवीकृत हैं।

 
 

एक हिंदू राष्ट्र… यह कुछ और कैसे हो सकता है?

 
 

बिसाहड़ा में खुले में, एक सीमेंट मिक्सर काम कर रहा था। एक सार्वजनिक मैदान की चाहरदीवारी का काम चल रहा था । यह एक छोटा, स्थानीय उपक्रम था, जिसे पुरुषों के एक समूह ने ‘मोदी सरकार के विकास’ के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश की थी।

 

जब उनसे पूछा गया कि क्या वे भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो उन्होंने इस रिपोर्टर को देखा और लगभग नाराज भाव से पूछा: “आप भी यह सवाल कैसे पूछ सकते हैं? यह किस तरह का नकारात्मक प्रश्न है? क्या किसी और तरीके से कुछ होने की कोई संभावना है? ”

 

साफ था कि लोग असहज थे,  इसलिए रिपोर्टर अपनी टैक्सी को गांव के दूसरी तरफ, मस्जिद के आसपास की बस्ती की तरफ ले गया। वहां लगभग 30 मुस्लिम परिवार रहते हैं। लीचिंग के बाद, अखलाक का परिवार गांव से बाहर चला गया था। वहां हमें एक व्यक्ति मिला, जिसने सर पर टोपी पहन रखी थी। इससे पहले कि हम उनसे कुछ पूछते, उसने एक सांस में कहा, “हम सब यहां ठीक हैं, हमें कोई समस्या नहीं है, हम सभी बहुत खुश हैं।”

 

अखलाक की हत्या के दो साल बाद, ध्रुवीकरण से भाजपा के लिए फिर परिणाम सामने आए।

 

 2017 में राज्य के चुनावों में, नोएडा और दादरी के विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ रहे विधायक, जो कि इस लोकसभा सीट का हिस्सा हैं, ने क्रमशः 40.89 फीसदी और 30.2 फीसदी के बड़े मार्जिन से जीत हासिल की, जो कि लीचिंग से पहले 2014 में लोकसभा चुनाव में महेश शर्मा की 23.37 फीसदी की बढ़त से एक पर्याप्त टक्कर है। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि यूपी में जाति का गणित काम करता है।

 

गौतम बुद्धनगर, यूपी


 

हालांकि सरकार ने जातिगत जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया है। विभिन्न रिपोर्टें राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय और पंचायत के आंकड़ों का उद्धरण देती हैं। वह बताती है कि 40 फीसदी से अधिक यूपी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से बना है, जिन्होंने परंपरागत रूप से समाजवादी पार्टी को वोट दिया है, जिसे स्थानीय स्तर पर यादव-मुस्लिम पार्टी के रूप में भी जाना जाता है।

 

लेकिन गौतम बुद्ध नगर जैसे कई निर्वाचन क्षेत्रों में हिंदू वोटों के एकीकरण ने भाजपा की मदद की, जिसे पहले उच्च जाति के हिंदुओं के लिए जगह जाना जाता था। ओबीसी से कुछ सहित अन्य जातियों से वोट आए।

 

ध्रुवीकरण, ऐसा प्रतीत होता है कि, पार्टी की पारंपरिक जाति गणित में मदद करेगा।इस बार, हिंदू मुद्दों और मोदी पर बात करने के बीजेपी के नए प्रयासों के बावजूद, यह अधिक कठिन हो सकता है। महेश शर्मा वापस जाओ गौतम बुद्ध नगर का एक हिस्सा, जो मुस्लिमों के गौमांस खाने की बात से आश्वस्त नहीं था, वह है जेवर, जहां किसानों से अधिग्रहित की जाने वाली भूमि पर एक नया हवाई अड्डा प्रस्तावित है।

 

बीजेपी ने 2017 के राज्य चुनाव में जेवर को नोएडा और दादरी की तुलना में बहुत कम अंतर से जीता था – बढ़त 10.49 फीसदी थी। तब से, निर्वाचन क्षेत्र के विभिन्न भागों में किसानों का विरोध प्रदर्शन और तेज हो रहा है।

 

मंत्री शर्मा द्वारा गोद लिए गए कचेरा नामक गांव में, किसानों ने साइन बोर्ड लगाए, जिसमें लिखा गया था: “महेश शर्मा का दत्तक गांव- इस गांव में बीजेपी को आने की सख्त मनाही है।”

 

 वे दुखी थे कि उनकी खड़ी फसल हवाई अड्डे के लिए नष्ट किए जाएंगे। और जब उन्होंने अपने सांसद को मदद के लिए बुलाया, तो कोई नहीं आया। सरकार ने कहा कि किसानों के पास जमीन का मालिकाना हक नहीं था, जिसे एक निजी कंपनी ने अधिग्रहित किया था।

 

गौतम बुद्ध नगर और बीजेपी पर नजर रखने वालों में चारों ओर असंतोष और गुस्सा था। वे भी गुस्से में थे, जिन्होंने पिथली बार शर्मा को वोट दिया था। लोग सोच रहे थे कि क्या उन्हें चुनाव लड़ने के लिए टिकट मिलेगा।

 

लेकिन 12 फरवरी, 2019 को पुलवामा(जम्मू और कश्मीर) में 40 से अधिक केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवानों की हत्या करने वाले आतंकवादी कार बम ने लहर को बदल दिया है, जैसा कि कुछ कार्यकर्ताओं ने बताया है।

 

शर्मा को टिकट मिल गया। “जहां विकास विफल हो गया, ध्रुवीकरण काम करेगा’, ये विचार थे दादरी के एक पार्टी कार्यकर्ता  राधाचरण के, जो चार दशकों से बीजेपी और आरएसएस के साथ हैं।

 

राधाचरण ने कहा, “पुलवामा का काफी असर है। पहले की स्थिति को हम कमजोर मानते थे। पुलवामा ने चीजों को थोड़ा बदल दिया है।” राधाचरण कभी कम्युनिस्ट थे। उन्होंने मार्क्सवादी शब्दों में फार्मलैंड अधिग्रहण की बात की: एक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने कैसे काम किया, किसानों को कैसे निकाला गया।

 

फिर भी, वह अपने पूर्व सहयोगियों के साथ बाहर हो गए, 1979 में पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह के साथ गठबंधन किया, और जल्द ही बीजेपी के साथ हो गए। राधाचरण उस जटिल मैट्रिक्स का प्रतिबिंब है जिसे बीजेपी और संघ परिवार की विस्तारित शाखा ( हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों का परिवार जो आरएसएस के प्रति निष्ठा रखता है ) बनाता है। वह 1992 में बाबरी मस्जिद के विनाश का विरोध कर रहे थे, लेकिन यह भी महसूस किया कि उसने अपने सभी अंतर्निहित विरोधाभासों के साथ जीत का पक्ष चुना था। कई मायनों में, इन भागों में राजनीति हमेशा विचारों या विचारधाराओं के मेल से नहीं होती है। यह अक्सर जीतने वाली टीम को चुनने के बारे में है।

 

व्यापार करने की कीमत

 

27 साल से अधिक का ध्रुवीकरण, बाबरी से लेकर दादरी तक और अब पुलवामा तक, गौतम बुद्ध नगर की रैंक और फाइल के बीच अलग-अलग तरीके से जड़ ले चुका है, जैसा कि नाम न छापने की शर्त पर बीजेपी के एक अधिकारी ने समझाया है।

 

उस शख्स ने बताया कि दो अलग-अलग मौकों पर, उन्होंने हिंदुत्व (हिंदू राष्ट्रवादी) संगठनों में युवकों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी, जो उनकी अपनी पार्टी से संबंधित थे। उन्होंने मुस्लिमों पर दोष लगाने के लिए रात में मुस्लिम इलाकों से लगे हिंदू देवताओं की मूर्तियों को तोड़ा था।

 

वापस महेश शर्मा की सुतयाना में रैली की बात करें तो, दोपहर के 2 बजे थे। शर्मा 12.20 बजे आने वाले  थे। एक युवा नेता ने नवंबर 2016 में मोदी द्वारा 86 फीसदी भारत की मुद्रा को अमान्य करने वाले नोटबंदी के लाभ के बारे में एक शानदार भाषण दिया।

 

दर्शकों में से कुछ ने सीधा चेहरा रखने की कोशिश की। दूसरे चेहरे से हंसी रोक नहीं सके। “नोटबंदी ने तो मुझे बेरोजगार बना दिया “एक युवक ने कहा। उन्होंने जिन पांच कंपनियों के लिए काम किया था, उनमें से दो में काम बंद हो गया था।

 

उसने कहा कि, ” अगर मैं कुछ भी कहूंगा, तो मुझे बाहर निकाल दिया जाएगा और मुंह बंद करने के लिए कहा जाएगा।” यह महसूस होते ही कि उसने पार्टी के सहयोगियों के सामने अपनी बात कही है, उन्होंने फौरन कहा: “प्रधानमंत्री द्वारा घोषित कई योजनाओं में बिचौलियों द्वारा पैसा खाया जाता है।”

 

अर्थव्यवस्था की मंदी को लेकर अपने ही सरकार से निराश होने के बावजूद, यह व्यक्ति शर्मा की रैली के लिए आया था। उसने महसूस किया कि यही वह जगह है, जहां अगर उसे लगे तो वह बिजिनस कर सकता है।

 

बीजेपी के एक समर्थक ने कहा: ” यह चुनावी मौसम है, जोड़-तोड़ तो होगी है।”
 

यह एक गर्म दिन था, और पीछे एक मेज पर एक पानी निकालने की मशीन थी। अब तक, इसके चारों ओर प्लास्टिक के गिलास का ढेर लग चुका था। मंच पर, युवा नेताओं ने प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान सहित कई दूसरे अभियानों पर बात की।

 

विरोधी बनाम विरोधी

 

शर्मा की रैली में भाजपा के एक समर्थक ने कहा, “इस सीट पर जाति एक बड़ा कारक होगा।” उन्होंने फिर अपनी कही बातों को समझाया, “महेश भाई यूपी के लिए एक बाहरी व्यक्ति हैं। वह राजस्थान से हैं। और एक बड़ी बाहरी आबादी है (नोएडा में) जो उन्हें वोट देगी और जो स्थानीय जाति के कारकों को कम करेगी। ”  स्थानीय जातिगत कारकों से उनका तात्पर्य गुर्जरों से था, जो कि यूपी में हिंदू हैं और जो विपक्षी दल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के गुर्जर उम्मीदवार को वोट दे सकते हैं। पार्टी के एक कार्यकर्ता ने एक शख्स दिलीप कुमार स्वामी, जो जो बीजेपी समर्थक थे  और मूल रूप से राजस्थान के चूरू के थे और नोएडा में बस गए थे, उनका परिचय कराते हुए कहा, “ये डबल एमए है।  “स्वामी ने परिचय दिया और पूरा गणित बताया। उन्होंने  विपक्षी खेमे के तीन समुदायों जाटवों (दलितों के रूप में आमतौर पर जाने जाते हैं), मुस्लिम और गुर्जर तथा 33 अन्य जातियां जो बीजेपी का समर्थन कर रही हैं, उनका जिक्र करते हुए कहा कि ” यह 3-33 की लड़ाई है।”

 

इस गणित और अपनी पार्टी के समर्थन के बावजूद, स्वामी सतर्क थे और उन्होंने पार्टी लाइन के खिलाफ असंतोष व्यक्त किया। स्वामी ने कहा, “कोई मंदिर नहीं बनना चाहिए।” “और हमें एक मजबूत लोकतंत्र के लिए एक मजबूत विपक्ष की आवश्यकता है, लेकिन यहां अमित शाह जो भी कहते हैं, वही होता है।”

 

इसके बाद स्वामी ने प्रधानमंत्री की प्रशंसा के साथ अपनी पार्टी की स्पष्ट आलोचना से खुद को दूर कर दिया। उन्होंने मोदी की जाति ‘तेली’ के बारे में एक कहावत पेश की। “बावन बनिया, त्रेपन तेली।

 

(यदि व्यापारी के मस्तिष्क का आकार 52 है, तो तेली की संख्या 53 है) जब मोदी की मृत्यु हो जाएगी तो यहां तक ​​कि उनके सिर को भी संरक्षित किया जाएगा, वह भी मूल्यवान होगा, ”स्वामी ने कहा।

 

सभी लोग प्रसन्न थे। आस-पास के दर्शकों ने ताली बजाई। इसने मंत्री के इंतजार की एकरसता को दूर कर दिया।एक उत्साही समर्थक ने कहा कि मोदी के सिर को ‘सुरैया’ की तरह संरक्षित किया जाएगा,उनकी आवाज़ बहुत मीठी थी। उनके सिर को यह देखने के लिए संरक्षित किया था कि उसके पास किस तरह की वोकल कोर्ड है। किसी को शायद यह महसूस नहीं हुआ कि शायद 1960 के दशक के किसी मुस्लिम अभिनेत्री-गायिका से प्रधानमंत्री की तुलना की सराहना नहीं करेंगे।”

 

सच होते हैं कुछ सपने

 

नोएडा के एक कैफे में, मयंक मिश्रा नामक एक बीजेपी इटर्न गौतम बौद्ध नगर के शहरी हिस्से से बहुत खुश था। एक साल पहले, वह अपने सपने के लिए जरूरी 87,000 रुपये खोजने के लिए संघर्ष कर रहा था। उसे पत्रकारिता में ग्रैजुएशन की डिग्री चाहिए थी। उनके पिता बेरोजगार थे, और उनकी मां एक स्थानीय स्कूल में हिंदी पढ़ाती है। कई बैंकों ने उसे ठुकरा दिया या कहा कि उसे सैलरी स्लिप जमा करने की जरूरत है, जिसमें उसके माता-पिता को कम से कम 25,000 रुपये महीने की कमाई हो।

 

आरएसएस के एक सदस्य मिश्रा ने अप्रैल 2018 में पता चला कि बीजेपी की युवा शाखा या युवा मोर्चा का राष्ट्रीय इंटर्नशिप कार्यक्रम है। वह चुने जाने वाले 150 में से एक था। उनकी पृष्ठभूमि और पैसे की कमी के कारण उसे अपमानित भी होना पड़ा, लेकिन बाद में  उसे पहचाना गया। उन्हें लगने लगा कि एक दिन, वह मंत्री शर्मा की तरह उठेंगे, जिन्होंने नोएडा में एक छोटे क्लिनिक के साथ एक डॉक्टर के रूप में शुरुआत की और अब अस्पतालों के मालिक थे और केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य थे।

 

उन्होंने कहा, “मैं अपने आप को मजबूत करना चाहता हूं। इतना मजबूत कि कोई मुझे दबा न सके।”

 

उन्हें अपनी इंटर्नशिप में सौंपा गया काम, इस संकल्प का परीक्षण था। उन्हें स्वच्छ भारत अभियान डिजाइन करने के लिए कहा गया। उन्होंने कहा, “मैं इस बारे में थोड़ा अजीब महसूस कर रहा था, कि मुझे सड़कों पर झाड्रू लगाना था।”

 

मिश्रा और उनका परिवार झारखंड में रहता है, जो यूपी की तुलना में एक गरीब राज्य है, लेकिन वे लोग ‘उच्च’ जाति के हैं। यह ‘निम्न’ जातियों का काम करना मुश्किल था। उन्होंने कहा, “मैंने सोचा कि मैं एक ऐसे क्षेत्र को चुनूंगा, जो जहां मैं रहता हूं वहां से काफी दूर हो और सुबह 4:30 बजे निकल जाऊं, जब कोई नहीं देख रहा होता है।”  आखिरकार, वह अपने साथी इंटर्न के साथ एक सार्वजनिक पार्क में गए। यह एक बड़ी सफलता थी।मयंक ने इस तथ्य से सफलता को मापा कि जैसे ही उन्होंने पार्क को साफ किया, वीडियो और तस्वीरों लीं। उन्हें ट्वीट और रीट्वीट किया तो ट्विटर पर 1,700 लोगों ने फॉलो किया था।  इसके तुरंत बाद, उनकी फोटो और प्रोफाइल इंटरनेट पर थी। गूगल खोज पर, उनका नाम “बीजेपी नोएडा” के लिए सबसे ऊपर दिखाई दिया, जो उस क्षेत्र के विधायक, पंकज सिंह, जो भारत के गृह मंत्री, राजनाथ सिंह के पुत्र हैं, उनसे भी ऊपर था।

 
केसरिया रंग के बिना  बढ़ जाती है असहमति
 

इस बीच, जेवर में, गौतम बौद्ध नगर के दूसरे छोर पर, जहां नवंबर 2018 में मंत्री शर्मा को जिले के लिए एक हवाई अड्डा बनाने की आधिकारिक मंजूरी मिली, उन्होंने महसूस किया है कि ग्रामीण क्षेत्र को शहरी में बदलना जटिल है।

 

जब भूमि अधिग्रहण किया जाता है,एक व्यक्ति का सपना दूसरे के लिए दुःस्वप्न है, जैसा कि किसानों के साथ जेवर में था। 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत किसानों को उनकी जमीन लेने के लिए मुआवजा देने का फार्मूला लागू किया गया था। एक ग्रामीण क्षेत्र में, किसान जमीन के “सर्कल रेट” के चार गुना मुआवजे के हकदार हैं (न्यूनतम मूल्य जिस पर राज्य सरकार के राजस्व विभाग द्वारा निर्धारित भूमि बेची जा सकती है)। एक शहरी क्षेत्र में, किसानों को मुआवजे के रूप में सर्कल दर का केवल दो गुना मिलता है। शुरुआत में, समाजवादी पार्टी की सरकार थी, जब अधिग्रहण शुरू हुआ, जिससे किसानों में विरोध भड़का। तत्कालीन सरकार ने 2013 में पूरे निर्वाचन क्षेत्र को शहरी घोषित किया, इसलिए किसानों को मुआवजे के रूप में चार नहीं, बल्कि केवल दो बार सर्किल रेट मिला। लेकिन जब 2017 में बीजेपी सरकार, ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ ने समाजवादी पार्टी को सत्ता से हटाया तो भी कुछ नहीं बदला। जिन किसानों की ज़मीन दृष्टिगत रूप से ग्रामीण थी, उन्हें कम शहरी मुआवजे का भुगतान किया गया था। जब इन नाराज किसानों में से कई लोगों विरोध प्रदर्शन शुरू किया, तो क्षेत्र के बीजेपी विधायक किसानों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलाने के लिए ले गए, जिन्होंने मुआवजे को दो गुना से ढाई गुना सर्किल रेट में बदल दिया।

 

विधायक धीरेंद्र सिंह ने कहा, “किसानों के पास शिकायत करने के लिए कुछ नहीं है”। एयरपोर्ट का मतलब होगा प्रगति, विकास, अस्पताल और उपभोक्ता।

 

इतने सालों और इतने सारे चुनावों में, मतदाताओं और उम्मीदवारों ने एक सिनिसिज़म विकसित किया है। इसलिए, जो लोग शर्मा की रैली के लिए मुड़े थे, वे अपने दांव लगाते हुए दिखाई दिए, जीतने के दावे करते दिखाई दिए। लेकिन पहले उन्हें आकलन करना था कि क्या वह जीत सकते हैं।

 

3.20 बजे तक खबर आई कि शर्मा रैली में नहीं आएंगे। पार्टी प्रबंधकों ने जल्दी से एक और नेता को माला पहनाया और रैली को सफल घोषित किया। ढोल वाला चला गया। आखरी एसयूवी के जाने के साथ मैदान में केवल प्लास्टिक के ग्लास बचे हुए थे।

 
(लाउल एक स्वतंत्र पत्रकार और फिल्म-निर्माता हैं। वह ‘द एनाटॉमी ऑफ हेट’ के लेखक हैं, जो ‘वेस्टलैंड / कॉन्टेक्स्ट’ द्वारा दिसंबर 2018 में प्रकाशित किया गया है।)
 
यह उत्तर प्रदेश में हिंदू मतों को समझने के लिए छह आलेखों की श्रृंखला का पहला आलेख है।
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 30 मार्च, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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