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रैगिंग की घटनाओं में 75 फीसदी वृद्धि

चैतन्य मल्लापुर,
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मुंबई: लोकसभा में प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2013 और 2017 के बीच विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को पिछले पांच वर्षों में छात्र रैगिंग की 3,022 शिकायतें मिलीं हैं।

 

रैगिंग की घटनाओं की रिपोर्टिंग वर्ष 2013 में 640 से 41 फीसदी बढ़कर वर्ष 2017 में 901 हुई है। वर्ष 2016 में 515 रैगिंग की घटनाएं हुईं थीं और एक वर्ष में 75 फीसदी  की वृद्धि हुई है।

 

कोलकाता से एक बेहद शर्मनाक रैगिंग की घटना की सूचना मिली, जहां 17 मई, 2018 को सेंट पॉल कॉलेज के पहले वर्ष के एक छात्र को सीनियर छात्रों ने कथित रूप से निर्वस्त्र किया और यातना दी थी, जैसा कि ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने 2 जून, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, “अपमानित महसूस करते हुए, पीड़ित ने कथित तौर पर अपने जीवन को समाप्त करने करने का असफल प्रयास किया।”

 

वर्ष 2013 और 2017 के बीच, देश के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य, उत्तर प्रदेश में अधिकतम शिकायतें (15 फीसदी या 461) मिली थीं। वर्ष 2017 में राज्य में कम से कम 143 शिकायतों की सूचना मिली थी, जो कि पिछले पांच वर्षों में किसी भी राज्य द्वारा दर्ज सबसे ज्यादा आंकड़ा है।

 

भारत भर में रैगिंग की घटनाओं की रिपोर्ट, 2013-17

Source: Lok Sabha

 

उत्तर प्रदेश के बाद, सबसे ज्यादा घटनाएं मध्य प्रदेश (357), पश्चिम बंगाल (337), उड़ीसा (207) और बिहार (170) से रिपोर्ट की गई हैं।

 

रोकने के प्रयासों के बावजूद रैगिंग

 

1 जनवरी, 2015 और 27 मार्च, 2018 के बीच प्राप्त 2,041 शिकायतों में से, 338 मामलों में निलंबन सहित 871 मामलों में छात्रों को दंडित किया गया है, जैसा कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय के राज्य मंत्री सत्य पाल सिंह ने लोकसभा को 2 अप्रैल, 2018 को एक जवाब में बताया है।

 

मंत्री ने कहा कि 2009 में यूजीसी ने रैगिंग के खतरे को रोकने के लिए नियम बनाए थे। नियम में निलंबन, थोड़े समय के लिए निष्कासन और यहां तक ​​कि दोषी छात्रों को सदा के लिए संस्थान से हटाना शामिल है।

 

11 अगस्त, 2017 को प्रकाशित भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य एक अध्ययन के मुताबिक, “1970 के दशक में रैगिंग पर प्रतिबंध और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दो बार((वर्ष1999 और वर्ष 2006)) के हस्तक्षेप के बाद रैगिंग को खत्म करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए, लेकिन पाया गया है कि संस्थानों में रैगिंग जारी है और इस अधिनियम को गंभीर और हल्के में विभाजित करके न्यायसंगत बना दिया जाता है। “

 

कानपुर के ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ में नए छात्रों को धमकाने और उनके साथ बुरा बर्ताव करने की वजह से कम से कम 22 छात्रों को पिछले साल निलंबित कर दिया गया था, जैसा कि द टाइम्स ऑफ इंडिया ने 22 सितंबर, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

पिछले साल एक और घटना में, पहले वर्ष के छात्र के साथ रैगिंग करने के आरोप में भुवनेश्वर में पुलिस ने इंजीनियरिंग के दो छात्रों को गिरफ्तार किया था, जैसा कि 12 सितंबर, 2017 को ‘द बिजनेस स्टैंडर्ड’ की रिपोर्ट में बताया गया है।

 

रैगिंग छात्रों को वास्तविक दुनिया के लिए तैयार करता है?

 

सुप्रीम कोर्ट के मनोविज्ञान-सामाजिक अध्ययन में भाग लेने वाले लगभग 40 फीसदी छात्रों ने स्वीकार किया कि उनके साथ रैगिंग हुआ था, जबकि 33 फीसदी ने रैगिंग में आंनद लेने की बात कही है। लगभग 45 फीसदी छात्रों ने कहा कि वे शुरुआत में खराब महसूस करते थे, लेकिन बाद में महसूस किया कि यह ठीक था।

 

लगभग 36 फीसदी छात्रों ने महसूस किया कि रैगिंग ने उन्हें बाहरी दुनिया की कठोरता से निपटने के लिए तैयार किया है।

 

रैगिंग प्रथाओं से संबंधित प्रश्नों पर 187 छात्रों के साथ साक्षात्कार से सामने आए विषय। आंकड़े साक्षात्कार की संख्या को दर्शाते हैं, जिससे वे विषय सामने आए।

 

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Source: University Grants Commission

 

जबकि 40 फीसदी छात्रों ने महसूस किया कि इससे कॉलेजों में दोस्त बनाने में मदद मिली।  28 फीसदी छात्रों ने कहा कि इससे कॉलेज जीवन मजेदार बनता है। 30 फीसदी से अधिक छात्रों ने कहा कि इससे वे नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए।

 

कम से कम 84 फीसदी छात्रों ने कहा कि जब उनका रैगिंग हुआ तब उन्होंने शिकायत नहीं की थी। 41 फीसदी ने कहा कि उन्हें विश्वास नहीं था कि अधिकारी सीनियर छात्रों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे ? 38 फीसदी छात्रों ने कहा कि वे अपने करियर को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते थे।

 

अध्ययन में पाया गया है कि रैगिंग छात्रों पर दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक और नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

जिनका रैगिंग न किया गया, उन छात्रों की तुलना में रैगिंग से गुजरे छात्रों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं जैसे अवसाद, चिंता, आत्मघाती विचार, आत्महत्या के प्रयास, और आत्म-मूल्य के निम्न स्तर का सामना करना पड़ता है।

 

(मल्लापुर विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 12 जून, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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