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लोकसभा के आंकड़े बताते हैं कि बीजेपी में कांग्रेस से कम वंशवाद नहीं

तिश संघेरा,
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Gandhinagar: Congress President Rahul Gandhi with party leaders Manmohan Singh and Priyanka Gandhi during a party rally in Gandhinagar, on March 12, 2019. (Photo: IANS)

( गांधीनगर: पार्टी की एक रैली के दौरान पार्टी नेता मनमोहन सिंह और प्रियंका गांधी के साथ कांग्रेस अध्यक्ष रहुल गांधी )

 

पिछले दो दशकों में भारतीय जनता पार्टी ( बीजेपी ) के निर्वाचित सांसदों में इंडियन नेशनल कांग्रेस के समान ही ‘वंशवाद’ दिखता है। यह जानकारी 1952 में भारत की पहली संसद के बाद से सभी 4,807 सांसदों के जीवन के बारे में जानकारी वाले नए डेटासेट पर किए गए हमारे विश्लेषण में सामने आई है। 1999 से, कांग्रेस के पास लोकसभा के लिए चुने गए 36 राजवंशीय सांसद हैं और 31 के आंकड़ों के साथ बीजेपी ज्यादा पीछे नहीं है। 1999 में, 13 वीं लोकसभा की शुरुआत में, 8 फीसदी सांसद या तो पूर्व सांसदों द्वारा मैदान में उतारे गए थे या फिर उनके साथ विवाह के बंधन में बंधे थे और इस संबंध में बीजेपी के लिए आंकड़े 6 फीसदी थे।  वंशवादी राजनेताओं का सबसे समान घनत्व 2009 में था जब कांग्रेस और भाजपा में क्रमशः 11 फीसदी और 12 फीसदी राजवंश से चुने गए थे।

 

1999 के बाद, कांग्रेस और बीजेपी “तुलनात्मक रूप से वंशवादी” पार्टियां हैं।


 

भारत की स्वतंत्रता के बाद से कांग्रेस सबसे लंबे समय तक सत्ता में रही, पार्टी में नेहरू-गांधी परिवार की प्रमुख स्थिति ने कांग्रेस को भारतीय राजनीति में भाई-भतीजावाद की पहचान दी। हालांकि, हार्वर्ड विश्वविद्यालय, अमेरिका और जर्मनी के मैनहेम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा संकलित आंकड़ों पर इंडियास्पेंड विश्लेषण के अनुसार, सभी प्रमुख दलों में राजनीतिक वंशवाद सामान्य हैं।

 

 हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पीएचडी के कैंडिडेट  और डेटासेट संकलित करने वाले शोधकर्ताओं में से एक सिद्धार्थ जॉर्ज ने इंडियास्पेंड को बताया, ” यह दिलचस्प है कि वंशवाद कैसे अलग-अलग पार्टियों में है। यदि आप सिर्फ मीडिया पर केंद्रित हैं, तो आप इस परिदृश्य तक नहीं आएंगे।”

 

जॉर्ज कहते हैं, “बीजेपी युवा पार्टी (कांग्रेस के मुकाबले) है, लेकिन सांख्यिकीय और उम्र के नियंत्रण के हिसाब से तुलनात्मक रूप से वंशवादी है। ” “ इस आलेख के लिए ‘ वंशवाद’ के तहत जिन राजनेताओं को संदर्भित किया गया है, वे हैं, जिनके, माता , पिता या पति या पत्नी उन्हें लोकसभा तक लेकर आए हैं। इसलिए डेटासेट विस्तारित परिवार जैसे चचेरे भाई या ससुराल वालों को नहीं लेता है। यदि कोई सांसद राज्य विधानसभा या राज्यसभा स्तर पर किसी का रिश्तेदार है, तो वह इसे भी नहीं लेता है। इसलिए आंकड़े भारत के निर्वाचित लोगों के बीच राजनीतिक राजवंशों के वास्तविक घनत्व को कम आंकते हैं, हालांकि, “बेटे, बेटी और पति / पत्नी के बीच आप 75 फीसदी से अधिक वंशवादी रिश्तों को लेते हैं” जैसा कि जॉर्ज बताते हैं।

 

छोटे और क्षेत्रीय दलों में भी प्रमुख परिवारों के हाथों में सत्ता है। वास्तव में, उन परिवारों ने हाल के दिनों में सत्ता में जबरदस्त भागीदारी को देखा है।

 

 2009 में चुने गए जम्मू और कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के तीन सांसदों में से दो राजनीतिक वंश थे-फारूक अब्दुल्ला और मिर्जा महबूब बेगम। इसका मतलब है कि पार्टी में राजनीतिक वंश का अनुपात 67 फीसदी था। यह किसी भी पार्टी से ज्यादा है। इसी अवधि के दौरान, राष्ट्रीय लोकदल के 40 फीसदी सांसद वंशवाद के दायरे में थे और शिरोमणि अकाली दल के 25 फीसदी राजनेता अपने राजनीतिक वंश के सहारे ही राजनीति के मैदान में थे।

 

शक्ति में राजनीतिक वंश से अधिक संख्या के साथ अक्सर छोटे दल भी वंशवादी


 

बीजेपी और कांग्रेस के बीच समानता

 

कांग्रेस के प्रमुख के पद पर, गांधी परिवार की प्रमुख भूमिकाएं ही कारण है कि पार्टी भाई-भतीजावाद के आरोपों का खामियाजा भुगतती है और इसलिए नहीं कि यह बहुत अधिक वंशवादी है, जैसा कि यूके के लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस, में विदेश नीति के लिए एक थिंक-टैंक एलएसई आइडिया के रिसर्च एसोसिएट अर्जुन चावला ने बताया है। चावला ने कहा, “अभी बीजेपी एंटी-डायनस्ट कार्ड खेल सकती है, क्योंकि उनके वंश कम दिखाई देते हैं और आपके पास एक ही परिवार के भीतर पीढ़ी दर पीढ़ी शीर्ष नेतृत्व नहीं है।” चावला ने यह भी कहा कि बीजेपी के पास बेहतर पीआर मशीनरी भी है, जो उसी आधार पर हमला करने पर अपने बचाव के लिए छलांग लगा सकती है।अमित शाह जैसे बीजेपी नेताओं का एक परिवार द्वारा “55 साल” और मोदी के नेतृत्व में “55 महीने” के बीच लाइनें खींचने के साथ वंशवादी राजनीति को फिर से राष्ट्रीय बातचीत में बहुत आगे लाया जा रहा है। पिछले सप्ताह फेसबुक पर प्रकाशित एक ब्लॉग पोस्ट में, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सुझाव दिया कि कांग्रेस का “वंशवादी चरित्र” पार्टी की गिरावट का कारण बन रहा है, जबकि इसी समय दावा किया जा सकता है कि बीजेपी भारत में तीन “प्रमुख गैर-वंशवादी दलों में से एक है।”  पार्टी के भीतर और प्राधिकरण के वरिष्ठ स्तरों पर राजनीतिक वंशों के नेताओं को जगह देने ( जैसे कि कैबिनेट मंत्री मेनका गांधी और पीयूष गोयल, जिनके पिता पार्टी के कोषाध्यक्ष और मां तीन बार राज्य विधायक थीं ) के बावजूद भाजपा 2014 के चुनाव प्रचार में इस तरह सफल, विरोधी-वंशवादी बयानबाजी करती दिख रही है। चावला कहते हैं कि यह एक स्मार्ट कदम है, “क्योंकि वे सफलतापूर्वक लोगों को इस बात के लिए गुस्सा दिलाने में सफल हो गए हैं जो इस विचारधारा को तोड़ते हैं कि खून के रिश्ते और आपके नाम का अंतिम शब्द आपके लिए परिणाम का निर्धारण करते हैं।” चावला कहते हैं कि, “अब नीति की बारीकियों या सत्ता में बीजेपी के समय के रिपोर्ट कार्ड पर कम बातचीत होती है,  लेकिन पुराने बायनेरिज जैसे काम-दार बनाम नाम-दार -एक चतुर और प्रेरक रणनीतिक दांव है। “

 
आधुनिक दौर की वंशवाद’ राजनीति
 

2009 में 15 वीं लोकसभा में ’वंशवाद’ चरम पर था, जिसमें राजनेताओं के परिवारों से 53 सांसद शामिल थे, कुल निचले सदन का 9.5 फीसदी। 2014 में यह अनुपात 8.6 फीसदी तक गिर गया था, लेकिन डेटा संसदीय सीटों पर होने वाले राजनीतिक वंशों के अनुपात में बढ़ोतरी का रुझान दिखाते हैं।  15 साल पहले 1994 की तुलना में 2014 में करीब दोगुनी हो गई है संख्या।

 

लोकसभा में तेजी से फैल रहा है वंशवाद


 

एक ओर यह अस्वाभाविक है कि समय के साथ, राजनीति में प्रवेश करने वालों में उन लोगों की बढ़ती संख्या होगी, जिनके पूर्वज भी उसी पेशे में सक्रिय थे, जिसे हार्वर्ड विश्वविद्यालय के जॉर्ज ने “समय का विशुद्ध यांत्रिक कार्य” कहा था। फिर भी, कुछ परिवारों में राजनीतिक सत्ता केंद्रित होने का असर एक चिंता का विषय है।

 

नई दिल्ली स्थित थिंक-टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में फेलो राहुल वर्मा बताते हैं, “ऐसा नहीं है कि राजनीति में वंशवाद स्वाभाविक रूप से खराब या असामान्य है। लेकिन इसका मतलब है कि हमारे राजनीतिक प्रतिनिधि नागरिक जिम्मेदारी से बहुत दूर हो गए हैं। हमारे पास कुछ ऐसे लोग हैं जो हमारे कानूनों को कुछ खास के पक्ष में तिरछा कर रहे हैं, और यह किसी भी लोकतंत्र के लिए बुरा है।”

 

इंडियास्पेंड ने 26 मार्च, 2019 को बताया था कि हाल ही में सर्वेक्षण में शामिल एक तिहाई लोगों ने माना था कि राजनेता वास्तव में इस बात की परवाह करते हैं कि आम लोग क्या सोचते हैं । 58 फीसदी ने कहा था कि चुनाव के बाद वास्तव में कुछ भी नहीं बदलता है।

 

कई देशों ने जैसे कि अमेरिका और जापान से फिलीपींस और इंडोनेशिया ने एक ही परिवार के सदस्यों को अपने उच्चतम कार्यालयों में चुना है, इसलिए भारत कुछ अलग नहीं है। वास्तव में, दुनिया भर में राजनीति एक अत्यधिक वंशवादी व्यवसाय है। 2018 के इस अध्ययन के अनुसार, मेडिकल और कानून जैसे अन्य कुलीन प्रोफेशन की तुलना में उस व्यक्ति के लिए राजनीति में प्रवेश करने की संभावना 110 गुना अधिक है, अगर उसके पिता  राजनेता हैं।

 

वर्मा ने कहा कि युवा देश होने के नाते राजनीति में वंशवाद के एक निश्चित स्तर की उम्मीद की जा रही है और सत्ता संभालने वाले राजनीतिक परिवार अभी भी कुछ समय तक सक्रिय रह सकते हैं। उन्होंने कहा कि, “एक बार जब आप कहते हैं कि लगभग 100 वर्षों में 20-25 चुनाव हैं, तो आप इस प्रवृत्ति को कम होते देखने की उम्मीद करेंगे। आप इसके एक उदाहरण के रूप में अमेरिका को देख सकते हैं और भविष्य में हम भी इस दर में गिरावट देखने की उम्मीद करेंगे।”

 

इन चुनावी प्रक्रिया के भीतर, प्रमुख राजनीतिक परिवार, जैसे अब्दुल्ला, बादल और पटनायक, पार्टियों की उम्मीदवार सूचियों पर अपनी जगह देखना जारी रखते हैं। स्थापित परिवारों में वंशवाद पनपने का एक कारण, अपने कार्यकाल में धन का लाभ उठाने की अदम्य लालसा भी है।

 

चुनाव लड़ना बुरी तरह से महंगा हो गया है, और लगातार खर्च बढ़ता जा रहा है। 2014 में, प्रमुख दावेदार 1 करोड़ रुपये से 16 करोड़ रुपये के बीच खर्च कर रहे थे, वैधानिक सीमा से लगभग 50 गुना। टिकट को लेकर निवेश का जोखिम वंशानुगत राजनीति में कम होता है। इसका मतलब है कि वंशवादी उम्मीदवार राजनीतिक दलों के लिए एक आकर्षक विकल्प है। लोकसभा चुनाव में सफल निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या कम हुई है। यह 1957 में 42 के शिखर से गिर कर 2014 में 3 से ज्यादा नहीं है, जो चुनाव लड़ने की बढ़ती लागत का भी एक नतीजा है, जैसा कि एलएसई आइडिया के चावला ने बताया है- “भारत में वंशवाद की राजनीति का कारण बहुत अधिक संरचनात्मक है।”

 
भारत के सबसे गरीब राज्यों ने राजनीतिक वंशों से अधिकांश को चुना, ज्यादातर बीजेपी में
 

 भारत के सबसे बड़े और सबसे गरीब राज्य, उत्तर प्रदेश में 1952 से लोक सभा के लिए चुने गए वंशवादी लिंक के साथ, 51 राजनेता थे। ये आंकड़े किसी भी राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा हैं। बिहार राजनीतिक वंशों के 27 प्रतिनिधि के साथ है, फिर पंजाब और पश्चिम बंगाल, प्रत्येक के लिए आंकड़ा 10 है।

 

उत्तर प्रदेश भारत का सबसे ज्यादा वंशवादी राज्य


 

उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहां नेहरू-गांधी परिवार की सभी चार पीढ़ियों ने अपने निर्वाचन क्षेत्रों को अपने कब्जे में कर रखा है। भाजपा के पास सत्ता में सबसे ज्यादा राजनीतिक वंश से हैं। यूपी के  राजनीतिक वंशों में 51 में अनुमानित 17 बीजेपी से हैं, जबकि 15 से अधिक कांग्रेस (छह कांग्रेस के तहत, एक पूर्ववर्ती गुट, और नौ वर्तमान कांग्रेस के तहत), और चार बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) से हैं। बिहार में, राज्य में सत्ता में रहे सभी राजनीतिक वंशों में से कांग्रेस केवल आधे (12) का प्रतिनिधित्व करती है, इसके बाद भाजपा में चार और जनता पार्टी में तीन राजनीतिक वंश से थे। पश्चिम बंगाल और पंजाब दोनों में, अपने संबंधित क्षेत्रीय दलों में राजनीतिक वंशों से सबसे अधिक प्रतिनिधि हैं। अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस में तीन और पंजाब के शिरोमणि अकाली दल में चार का आंकड़ा है। यूपी राजनीतिक वंशों की सूची में सबसे ऊपर है और इसका शुद्ध कारण इसका आकार हो सकता है और यह तथ्य कि वर्तमान में 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से 80 राज्य में हैं, जिससे राजनीतिक वंशों से आए लोगों के चुने जाने की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि, पश्चिम बंगाल में 42 निर्वाचन क्षेत्र हैं, जो बिहार (38) से चार अधिक है, फिर भी 1952 के बाद राजनीतिक वंशों से लगभग तीन गुना कम का चुनाव किया है।

 

उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और पंजाब में राजनीतिक वंशवाद का पार्टीवार ब्रेकडाउन

चावला कहते हैं कि, इस बात पर सीमित अध्ययन हुआ है कि कुछ राज्य दूसरों की तुलना में राजनीतिक वंशों से अधिक लोगों का चुनाव क्यों करते हैं। यूपी और बिहार में राजनीतिक वंशवाद को हमलोग ज्यादा देखते हैं तो इसका एक कारण जातिगत राजनीति की संरचना भी हो सकती हैं,  जहां बार-बार मतदान करने वाला परिवार विशिष्ट समुदायों या आर्थिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है।

चावला ने कहा, “उत्तर प्रदेश और बिहार में जाति-आधारित राजनीति और वंशवादी राजनीति के बीच उच्च स्तर का संबंध है । यहां अक्सर आपके पास एक नेता होता है जो उस समुदाय के प्रतिनिधित्व को आगे ले जाता हुआ दिखाई देता है और एक पूरा समुदाय तब उस नेता के वंशज के साथ खुद अपनी पहचान को जोड़ कर देखता है।”

 

मुलायम सिंह यादव ने 1992 में यूपी आधारित समाजवादी पार्टी की स्थापना की। बाद में उस पार्टी की ओर से उनके बेटे अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने।

 

जाति-आधारित राजनीति का यह एक उदाहरण है जो एक विशेष परिवार से जुड़ा है। आगामी चुनावों के लिए पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया है।

 

हालांकि यूपी और बिहार में वंशवाद और जाति आधारित मतदान की उच्च घटनाओं के बीच एक लिंक का सुझाव देना संभव हो सकता है, पिछले तीन लोकसभा टर्म में, दलितों (सबसे निचली जातियों) और आदिवासियों (स्वदेशी आदिवासियों) ने राजनीतिक वंशों के गठन में अगड़ी जातियों को पीछे छोड़ दिया है, जैसा कि न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कंचन चंद्रन ने अपनी किताब ‘डेमोक्रेटिक डायनेस्टीज: स्टेट, पार्टी एंड फैमिली इन कंटेम्परेरी इंडियन पॉलिटिक्स’ में बताया है। इस संबंध में स्क्रॉल ने अपनी इस रिपोर्ट में बताया है। 2014 में, अगड़ी जातियों से संबंधित 27.23 फीसदी से अधिक सांसद वंशवाद के दायरे में नहीं थे जबकि इस संबंध में अनुसूचित जाति के लिए आंकड़े 8.4 फीसदी और अनुसूचित जनजाति के लिए आंकड़े 16.67 फीसदी थे।1952 के बाद से, राजनीतिक वंशवाद के राज्य-वार विश्लेषण से कोई स्पष्ट उत्तर-दक्षिण विभाजन नहीं उभरता है, बल्कि यह प्रतीत होता है कि राजनीति एक पारिवारिक व्यवसाय है।इसी समय, हालांकि, कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (संघ शासित क्षेत्रों) में कोई राजनीतिक वंश नहीं था मुख्य रूप से पूर्वोत्तर राज्यों और गोवा, जहां अपवाद के रूप में विश्वजीत राणे हैं। राणे वर्तमान में गोवा की भाजपा नीत राज्य सरकार में एक कैबिनेट मंत्री हैं और वे गोवा के एक पूर्व मुख्यमंत्री प्रतापसिंह राणे के बेटे हैं (जिसे डेटा सेट में शामिल नहीं किया गया है। पूर्वोत्तर राज्यों में, असम एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसने राजनीतिक राजवंशों का अनुभव किया है और अधिकांश राजनीतिक वंशों वाले राज्यों की रैंकिंग में आठवें स्थान पर आता है।

 

सबसे लंबे समय तक राज करने वाले राजनीतिक वंश
 

1952 के बाद सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले सांसद सोमनाथ चटर्जी राजनीतिक वंश से थे, जिन्होंने लोकसभा में कुल 10 कार्यकाल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के साथ नौ और 2004 में हाउस स्पीकर के रूप में अपना आखिरी कार्यकाल निभाया।

 

उनके पिता एनसी चटर्जी ने पश्चिम बंगाल के बर्दवान लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का तीन बार प्रतिनिधित्व किया था- पहली, तीसरी और चौथी लोक सभा के दौरान। उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में सोमनाथ चटर्जी ने उनकी जगह ली थी।

 

 टॉप 10 सबसे लंबे समय तक काम करने वाले राजनीतिक वंशों में से तीन में कांग्रेस से हैं, इसके बाद बीजेपी से दो और राष्ट्रीय लोक दल और भारतीय नवशक्ति पार्टी जैसे छोटे दल से एक-एक है।

 

टॉप 10 सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले ‘राजवंश’ राजनेता

Source: New dataset compiled by researchers from Harvard University, US, and the University of Mannheim, Germany

 

सबसे लंबे समय तक सेवारत राजवंशों में से 40 फीसदी को संसद में अपनी सीट विरासत में मिली है – वे उनके पिता, माता या पति या पत्नी के रूप में एक ही निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए थे। सत्ता में क्रमिक पीढ़ियों की प्रत्येक अखंड श्रृंखला की औसत अवधि 10 टर्म या मोटे तौर पर 40-50 वर्ष है।

 

 क्या लंबे समय तक राजनीतिक वंशों का एक निर्वाचन क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, यह निर्धारित करना कठिन है। 2018 के इस अध्ययन के अनुसार, कम से कम शुरुआती चरणों में, एक राजनीतिक वंश की स्थापना की इच्छा राजनेता को अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। आम आदमी पार्टी ने अपने ही दल के भीतर वंशवाद के विकास से बचने के लिए नेता अरविंद केजरीवाल के प्रयास से परिवार के सदस्यों को एक ही निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया है।  भारत की निर्वाचन प्रणाली को नियंत्रित करने वाले कानूनों में बदलाव के कहने की बजाय वर्मा कहते हैं, “यह बहुत जरूरी नहीं कि सही दृष्टिकोण हो। लोकतंत्र में चीजों पर प्रतिबंध लगाना एक अच्छी बात नहीं है। इसका मतलब है कि आप किसी को उन अपराधों के लिए दंडित कर रहे हैं जो उन्होंने नहीं किए हैं। “लेकिन अगर आप अपनी राजनीति को अधिक पारदर्शी बनाते हैं, तो यह अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करेगा और अच्छे काम के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। ” वर्मा इलेक्शन फायनेंस कैंपन में बड़े बदलाव के साथ चुनावी नामांकन को अधिक जवाबदेह बनाने की बात करते हैं, जिससे बहुत अधिक अमीर और वंशवादी उम्मीदवारों की संख्या को कम करने में मदद मिले। वह कहते हैं, “यह सभी पार्टियों में होना चाहिए। एक बार इन क्षेत्रों में सुधार किया जाए तो हम एक अधिक खुला राजनीतिक वातावरण बना सकते हैं। ”

 

( संघेरा लेखिका और शोधकर्ता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 29 मार्च 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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