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वाराणसी में हवा पर ध्यान नहीं, इस ग्रह पर सबसे बद्तर वायु होने की सूची में यह पवित्र नगरी

भास्कर त्रिपाठी,
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नई दिल्ली: इस ग्रह में सबसे जहरीली हवा वाराणसी की है लेकिन वाराणसी ने वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए बहुत कम काम किया है। अपनी हवा को स्वच्छ बनाने की इसकी ज्यादातर योजना कागजों पर ही है। यह जानकारी ‘लेट मी ब्रीथ ’ नामक एक संस्था द्वारा किए गए अध्ययन में सामने आई है।

 

भारत के सबसे पवित्र शहर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र में, शहरी स्थानीय निकाय, वन विभाग और यातायात पुलिस सहित कम से कम 10 सरकारी एजेंसियों  को वायु प्रदूषण के स्तर पर अंकुश लगाने का काम सौंपा गया है और ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि बुनियादी डेटा भी एकत्र किया गया है। यहां पिछले 9 वर्षों में 2.4 गुना ज्यादा प्रदूषित हवा यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन ( डब्लूएचओ ) के मानदंड से लगभग 10 गुना ऊपर है।

 

स्थानीय प्रशासन के लिए सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्रश्नों की एक श्रृंखला पर आधारित इस अध्ययन के अनुसार काम के बारे में पूछे जाने पर प्रदूषण से लड़ने की जिम्मेदारी सौंपे गए विभाग कचरे को जलाने और वायु-प्रदूषण कानूनों का उल्लंघन करने वाले वाहनों की संख्या के बारे में जानकारी नहीं दे सके।

 

यह अध्ययन 2016 में ‘सेंटर फॉर एन्वायर्नमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट’ ( सीईईडी ), ‘इंडियास्पेंड’ और ‘केयर 4 एयर’ द्वारा ‘वाराणसी चोक्स’ नाम के एक रिपोर्ट का फॉलो-अप है, जिसका यह निष्कर्ष है कि वायु प्रदूषण की समस्या दिल्ली तक सीमित नहीं है और यह पता चला है कि वाराणसी में वर्ष 2015 में एक भी दिन अच्छी हवा नहीं थी।

 

भारत की सबसे पवित्र नदी गंगा के तट पर स्थित वाराणसी 12 लाख लोगों का घर है और डब्लूएचओ के आंकड़ों के अनुसार, 2016 के बाद से, वायु प्रदूषण के मामले में भारत की राजधानी दिल्ली से आगे निकल गई है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 9 मार्च, 2019 की रिपोर्ट में बताया है।

 

19 मई, 2019 को होने वाले आम चुनावों के साथ, वाराणसी दुनिया भर के 4,300  शहरों की सूची में (2018 में) तीसरे स्थान पर था, जहां इस ग्रह की सबसे प्रदूषित हवा थी। उत्तर प्रदेश का कानपुर और फरीदाबाद सूची में वाराणसी से आगे है। अध्ययन में कहा गया है कि, वाराणसी के पड़ोस में पुनर्निर्माण पर मोदी का ध्यान से विध्वंस और निर्माण कार्य से उत्पन्न धूल के कारण प्रदूषण का स्तर बढ़ा है।

 

कागज पर योजनाएं

 

वाराणसी की हवा जहरीली बनी हुई है। शहर में औसत पीएम 2.5 का स्तर 25 महीने से जनवरी 2019 तक 104 ³g / m  दर्ज किया गया है। यह राष्ट्रीय वार्षिक सुरक्षित स्तर 40 /g / m³ से अधिक है और डब्लूएचओ के 10 µg/m³ के मानक से 9.4 गुना अधिक है।

 

कोयला, केरोसिन, पेट्रोल, डीजल, बायोमास, गोबर और कचरे को जलाने से उत्सर्जित पीएम 2.5 -मानव बालों की तुलना में लगभग 30 गुना महीन होता है। ये कण फेफड़ों में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे दिल का दौरा, स्ट्रोक, फेफड़े का कैंसर और श्वसन संबंधी रोग हो सकते हैं। डब्लूएचओ के अनुसार, उनकी माप वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य जोखिम के स्तर का सबसे अच्छा संकेतक माना जाता है।

 

भारत में 2017 में प्रदूषित हवा के कारण 12.4 लाख लोगों की मौत हुई है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 7 दिसंबर, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

मई 2018 में, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने “वाराणसी में परिवेशी वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कार्य योजना” को अधिसूचित किया। इस योजना ने शहरी, स्थानीय निकाय या नगर निगम, यातायात पुलिस, वन विभाग और वाराणसी विकास प्राधिकरण सहित सरकारी एजेंसियों के लिए वाहनों, सड़क की धूल, बायोमास और नगरपालिका ठोस अपशिष्ट जलने, उद्योगों, निर्माणों से होने वाले प्रदूषण से निपटने के लिए कार्यों को सूचीबद्ध किया है।

 

Source: Uttar Pradesh Pollution Control Board

 

प्रशासनिक कार्रवाई, बहुत कम

 

नवंबर 2018 और फरवरी 2019 के बीच, ‘लेट मी ब्रीद’  ने वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए वाराणसी में 10 शहर विभागों के साथ आरटीआई दायर की। आरटीआई प्रतिक्रियाओं के विश्लेषण के आधार पर यहां कुछ निष्कर्ष दिए गए हैं:

 

  • नगर निगम ने सड़क की धूल को कम करने और कचरे के जलने पर रोक लगाने की दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। हालांकि, उदाहरणों और उल्लंघनों की प्रकृति के बारे में कोई विवरण नहीं दिया गया था।

  • यातायात पुलिस ने कहा कि उनका काम यातायात का प्रबंधन करने के लिए था, और उन्होंने “निगरानी और कार्यान्वयन अंतराल” का सुझाव देते हुए, वाहनों द्वारा वायु प्रदूषण कानूनों पर उल्लंघनों का उल्लेख नहीं किया।

  • वाराणसी में वन विभाग और विकास प्राधिकरण ने पेड़ लगाए हैं, जो वायु प्रदूषण के प्रभावों को कम करते हैं, लेकिन ढेर सारे पेड़ बुनियादी ढांचे-विकास परियोजनाओं के लिए काट दिए गए थे, यानी वृक्षारोपण में कोई वृद्धि नहीं हुई है।

  • यूपीपीसीबी ने सुझाव दिया कि नगरपालिका सीमा में ईंट भट्टे नहीं हों। हालांकि, जिला पंचायत (जिला परिषद) ने कहा कि ‘पेरी-शहरी क्षेत्र’ में कुछ हो सकता है, जिसके लिए अनुमति यूपीपीसीबी द्वारा दी गई थी। नगरपालिका सीमा को वायु-प्रदूषण के लिए ‘पारिस्थितिक सीमा’ के रूप में नहीं माना जा सकता है, और यह स्पष्ट है कि मानदंडों को केवल पत्र में देखा जा रहा है और वायु प्रदूषण को रोकने की भावना में नहीं।

 

विभागों से विस्तृत प्रतिक्रियाओं को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

 

वाराणसी का वायु-प्रदूषण बढ़ रहा है

 

स्थानीय सांसद और प्रधान मंत्री मोदी का ध्यान ‘सौंदर्यीकरण’ और बुनियादी ढांचे के विकास पर रहा है, जो शहर और क्षेत्रीय स्तर पर लगातार खराब वायु गुणवत्ता के प्राथमिक कारणों से पूरी तरह से नहीं जुड़े हैं, जैसा कि क्लाइमेट ट्रेंड् द्वारा ‘पॉलीटिकल लीडर्स पोजिशन एंड एक्शन ऑन एयर क्वालिटी इन इंडिया” नामक अप्रैल 2019 की रिपोर्ट में कहा गया है।

 

रिपोर्ट में दुनिया के शीर्ष 20 सबसे प्रदूषित शहरों का विश्लेषण किया गया है – जिनमें कानपुर, वाराणसी, दिल्ली, जयपुर, श्रीनगर, पटना और लखनऊ शामिल हैं । रिपोर्ट में कहा गया है कि यहां के सांसद काफी हद तक ‘निष्क्रिय’ और ‘चुप’ रहे।

 

वाराणसी प्रदूषित है, क्योंकि इसकी सड़कों को खोदा गया है और नालियों का निर्माण किया जा रहा है, यहां बड़ी संख्या में बुनियादी सुविधाओं के लिए निर्माण कार्य चल रहा है। यूपीपीसीबी के वाराणसी के क्षेत्रीय अधिकारी अनिल कुमार सिंह ने अप्रैल 2019 में क्लाइमेट ट्रेंड रिपोर्ट में कहा है।

 

वाराणसी उन 102 शहरों में भी शामिल है जिन्हें भारत के समग्र वार्षिक प्रदूषण स्तर को 2024 तक 20-30  फीसदी कम करने के लिए पर्यावरण मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के रूप में पहचाना गया था, लेकिन कोई नतीजा नहीं। कार्यक्रम के तहत अधिक वायु-गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों, वायु-गुणवत्ता प्रबंधन योजनाओं और वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों पर अध्ययन पर विचार किया गया था।

 

वाराणसी और गंगा के मैदानी इलाकों में वायु प्रदूषण के उच्च स्तर का एक बड़ा कारण यह है कि हिमालय उत्तर की  ओर जाने वाली हवा को रोकता है और दक्खन के पठार से दक्षिण की ओर जाने वाली हवा अटकाती है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 9 मार्च, 2019 को रिपोर्ट की है। उत्तर-पश्चिमी हवाओं के चलने से पूरे भारत-गंगा के मैदान में प्रदूषित हवा फैल जाती है।

 

2015 के एक अध्ययन के अनुसार, वार्षिक पीएम 2.5 का लगभग 31 फीसदी प्रदूषण वाराणसी में बाहर से आता है। क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा अप्रैल 2019 के अध्ययन में कहा गया है कि “भारत में गंगा के मैदान में वायु प्रदूषण नियंत्रण नीतियों को एक क्षेत्रीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है”।

 

वाराणसी में पार्टिकुलेट मैटर की सांद्रता अद्वितीय दर से बढ़ रही है: 1.9 µg / m3, जिसने पीएम 2.5 को 28.5 /g / m3 से बढ़ाकर 71.7 3g / m3 कर दिया। 17 साल से 2016 तक 1.6 गुना की वृद्धि; यह डब्ल्यूएचओ के वार्षिक मानक का तीन गुना है, जैसा कि मई 2018 के एक अध्ययन में कहा गया है। इससे श्वसन संबंधी बीमारियों में वृद्धि हुई है, जिसमें ब्रोन्कियल एलर्जी, अस्थमा, छाती में संक्रमण और साइनसाइटिस शामिल हैं।

 

अप्रैल 2019 ‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ अध्ययन के अनुसार, वाराणसी में दो निगरानी स्टेशन हैं, लेकिन कम से कम 11 की जरूरत है।

 

(त्रिपाठी प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 18 मई 2019 को indiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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