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वैश्विक जलवायु सम्मेलन में इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल पर जोर

भास्कर त्रिपाठी,
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Kolkata: A fleet of Mahindra electric vehicles launched on Zoomcar in Kolkata, on June 13, 2018. (Photo: IANS)
 

नई दिल्ली:  रीनूअबल एनर्जी पर आधारित विद्युत परिवहन व्यवस्था जलवायु परिवर्तन से लड़ने में बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। इस बात को पोलैंड के कॉप 24 में (सीओपी 24) जोर शोर से उठाई गई है।

 

दुनिया के तीसरे सबसे बड़े ऑटोमोबाइल बाजार भारत के लिए इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) अनिवार्य है। 230 करोड़ पैसेंजर गाड़ियों को जोड़ते हुए 2017 में करीब 2.5 करोड़ पारंपरिक वाहन ( इंटरनल कंबस्शन इंजन के साथ ) बेचे गए थे, जो 2001 से 2016 तक की संख्या का तीन गुना है।  वैश्विक स्तर पर, कुल उत्सर्जन में परिवहन की हिस्सेदारी एक-चौथाई है । भारत दुनिया में सबसे खराब वायु गुणवत्ता वाले देशों में से एक है और इसका एक प्रमुख कारण वाहन उत्सर्जन भी है । 12.4 लाख जिंदगी लेकर 2017 में भारत में आठ मौतों में से एक के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार था, जैसा कि इंडियास्पेन्ड ने 7 दिसंबर, 2018 की रिपोर्ट में बताया था। फिर भी, 2040 तक भारत में सड़क पर दो गुना वाहन होने की संभावना है। 2030 तक ऑल-इलेक्ट्रिक होने की महत्वाकांक्षी योजना का सुझाव आने के बाद, सरकार पीछे हटी है और यह कह रही है कि पहले यह लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि 2030 तक देश में कम से कम 15 फीसदी वाहन इलेक्ट्रिक हो।

 

साफ है कि आगे चुनौतियां हैं और सावधानी से आगे बढ़ने की जरूरत है।ऐसे में सब्सिडी और टैक्स ब्रेक जैसे अन्य प्रोत्साहनों से, विशेष रूप से दोपहिया वाहनों और सार्वजनिक परिवहन वाहनों जैसे थ्री-व्हीलर और बसों के बीच, इसे आगे बढ़ाने की योजना है।नई नीतियों के सामने आने में अभी वक्त है। इंडियास्पेंड द्वारा की गई समीक्षा में आयात के मुकाबले घरेलू विनिर्माण, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता, सब्सिडी और कर प्रोत्साहन सहित, उद्योग को चलाने के लिए सरकार की स्पष्टता की जरूरत महसूस हुई है।भारत का ईवी क्षेत्र कहां खड़ा है और इसे ऊपर उठाने के लिए क्या किया जाना चाहिए, इस पर चर्चा नीचे की गई है।

 

ईवी क्षेत्र आगे बढ़ने को तैयार

 

कॉप 24 में सामने आए इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पर विश्व बैंक द्वारा दिसंबर 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक,  भारत जैसे ‘गंदे’ ग्रिड (मुख्य रूप से कोयले पर आधारित ) वाले देशों में भी, अपने जीवनकाल में, डीजल कार की तुलना में, एक इलेक्ट्रिक कार 25 फीसदी कम सीओ 2 उत्सर्जित करती है, जोकि सबसे आम ग्रीनहाउस गैस है। हालांकि, भारत का ग्रिड तेजी से हरा हो रहा है। रीनूअबल एनर्जी अब स्थापित बिजली क्षमता का पांचवां हिस्सा है। मार्च 2018 तक भारत की सड़कों पर 448,000 इलेक्ट्रिक वाहन थे, जो कि दोपहिया वाहन की कुल बिक्री का 90 फीसदी (475,000 वाहन) था। सोसाइटी ऑफ मैन्युफैक्चरर्स ऑफ इलेक्ट्रिक वाहन (एसएमईवी) के अनुसार, करीब 7,000 चार-पहिया और 150 भारी इलेक्ट्रिक वाहन, जैसे कि ट्रक और बसें हैं। करीब 17 लाख इलेक्ट्रिक तीन-पहिया वाहन भी हैं, ज्यादातर ई-रिक्शा, जिनमें से 850,000 (48 फीसदी) पिछले वित्तीय वर्ष 2017-18 (अप्रैल 2017-मार्च 2018) में बेचे गए थे।

 

प्रमुख ईवी निर्माताओं में हीरो इको, महिंद्रा रीवा, इलेक्ट्रोथर्म, एवन, लोहिया, एम्पेरा शामिल हैं, जो इलेक्ट्रिक वाहनों की बड़ी रेंज बनाते हैं – स्कूटर, कार (हाइब्रिड और पूर्ण इलेक्ट्रिक), बसें, मिनी पिकअप ट्रक, रिक्शा, साईकल ), और ये सब बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।

 

इलेक्ट्रिक कार सेगमेंट में, महिंद्रा रीवा के नेतृत्व में, दक्षिण कोरिया की हुंडई मोटर कंपनी लिमिटेड और मारुति सुजुकी की भारतीय इकाई क्रमशः 2019 और 2020 में ईवी लॉन्च करेगी। टाटा मोटर्स 2019 में ईवी बाजार में प्रवेश करने की सोच रहा है, जैसा कि  जून 2018 में मिंट समाचार पत्र ने अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

आपूर्ति श्रृंखला के साथ कई प्रकार के कारोबार उभर रहे हैं – सोर्सिंग या कच्चे माल, बैटरी सेल, बैटरी पैक, एकीकृत वाहन, बिक्री, रिचार्ज और सेवाएं, आदि ।

 
पॉलिसी से सहयोग
 

 2013 में सरकार की ‘नेशनल इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन प्लान 2020’ (एनईएमएमपी) की घोषणा के बाद से उद्योग को चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए बिक्री पर सब्सिडी, कर रियायतें और वित्त पोषण का सहयोग मिला है।

 

2020 से हर साल, एनईएमएमपी का लक्ष्य हर साल 60-70 लाख हाइब्रिड वाहन (जो बिजली और पारंपरिक ईंधन दोनों पर चलती है) और सभी तरह के इलेक्ट्रिक वाहन की बिक्री का है, जो कि सभी वाहनों का करीब 25 फीसदी है।  इसके लिए 2017 में बेचे गए 900,000 ईवीएस से ऊपर बड़ी छलांग की आवश्यकता होगी, उस साल आईसी इंजन की बिक्री का केवल 4 फीसदी, जैसा कि इंडियास्पेन्ड ने 17 सितंबर, 2018 की रिपोर्ट में बताया था। 2015 में लॉन्च हुए फास्टर एडोप्शन एंड मनुफैकचरिंग ऑफ हाइब्रिड एंड इलेक्ट्रिक वेहिकल (एफएएमई) योजना के तहत तेजी से विनिर्माण और प्रौद्योगिकी विकास को बढ़ावा देने, सब्सिडी के माध्यम से मांग बनाने, पायलट परियोजनाओं का संचालन करने और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थापना के लिए कदम उठाए गए हैं।

 

2017 में नवीनीकृत होने के कारण, यह तीन गुना बढ़ा दिया गया है। उद्योग को एक अधिक व्यापक एफएएमई-II के लिए इंतजार करना पड़ रहा है, जो सार्वजनिक परिवहन के साथ-साथ निजी उपयोग के लिए बड़े पैमाने पर अपनाने के द्वारा उद्योग को बढ़ाने में सक्षम बनाता है। यह चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर भी बनाएगा, ईवी प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देगा और घरेलू विनिर्माण के लिए दबाव डालेगा। इस बीच, कुछ हालिया घटनाएं अच्छे संकेत देते हैं- इलेक्ट्रिक क्वाड्रिकसायकल, जो हाल तक अवैध था, क्योंकि वे मोटर वाहन अधिनियम (सार्वजनिक सड़कों पर चलने वाले किसी भी वाहन के लिए अनिवार्य) के तहत पंजीकृत नहीं हो सकते थे, अब उन्हें पंजीकृत होने की अनुमति दी गई है। ये जल्द ही डीजल को प्रतिस्थापित कर सकते हैं (या पूरक) और सीएनजी संचालित ऑटो-रिक्शा, छोटे शहरों और कस्बों में बहुत अधिक उपयोगी हो सकते हैं और बड़े शहरों में ‘लास्ट- माइल कनेक्टिविटी’ को मजबूत कर सकते हैं।

 

बैटरी निर्माताओं के लिए उपलब्ध लाभ अब हल्के और अधिक कुशल लिथियम-आयन और अन्य फास्ट चार्जिंग बैटरी तक ही सीमित रखा गया है, जो प्रभावी बैटरी की निर्माण और खरीद को बढ़ावा देने के बाद कम कुशल लीड-एसिड बैटरी धीरे-धीरे ईवी सेक्टर से गायब हो जाएंगे ।

 

ब्लूमबर्ग न्यू एनर्जी फाइनेंस में इंडिया रिसर्च के प्रमुख शांतनु जयसवाल ने इंडियास्पेंड को बताया, ” यात्री वाहनों के रूप में पंजीकृत बिजली की चारपहिया वाहनों और एफएएम -1 योजना के दायरे से परंपरागत बैटरी को ईवी से हटाने से सस्ता और बेहतर प्रदर्शन करने वाले ईवी को लेकर नए अनुसंधान में मदद मिलेगी।”

 

इस बीच, छह राज्य सरकार अब ईवी क्षेत्र में निर्माताओं को भूमि और कर लाभ प्रदान कर रही हैं, ये राज्य हैं – कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना। अन्य राज्यों की सरकारें भी ऐसा करेगी, ऐसी उम्मीद की जा रही है।

 

निर्णय से निवेश में देरी  
 

कई निर्माताओं, आपूर्तिकर्ताओं और सेवा प्रदाता स्पष्ट नीति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्हें सरकार की एफएएमई-II को अंतिम रूप देने तक अपना निवेश रोकना पड़ा है।

 

हीरो इलेक्ट्रिक के चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर और एसएमईवी के महानिदेशक सोहिंदर गिल ने इंडियास्पेन्ड को बताया, “चार एक्सटेंशन के बाद, एफएएमई-I  को धीरे-धीरे उस पवाइंट तक रोका गया, जहां इसकी प्रासंगिकता खो गई है।”

 

जैसवाल ने कहा, “ईवी उद्योग को प्रोत्साहन की अंतिम संरचना और देश की दीर्घकालिक दृष्टि पर त्वरित स्पष्टता की आवश्यकता है। घोषणा में देरी से उन बड़े वैश्विक ऑटोमोटर्स की ओर से निवेश निर्णयों में देरी हो रही है, जो भारत में सक्रिय हैं।” वाहन पर अग्रिम मूल्य पर कितनी सब्सिडी प्रदान की जाएगी, इस पर काफी कुछ निर्भर करेगा। क्या चार्जिंग स्टेशन तेजी से चार्जिंग या बैटरी-स्वैपिंग मॉडल को अपनाएंगे। क्या घरेलू रूप से विनिर्माण बैटरी के लिए सब्सिडी प्रदान की जाएगी या बैटरी आयात करने के लिए सस्ता रहना जारी रहेगा इत्यादि।

 

कौन भुगतान करता है?

 

उद्योग के लोगों का कहना है कि एफएएनई-II को रोकने का मुख्य मुद्दा धन है – विभिन्न सब्सिडी, टैक्स ब्रेक और फंडिंग को कैसे सरकार द्वारा वित्त पोषित किया जाएगा।

 

गिल कहते हैं, “ प्रदूषक भुगतान करेंगे, इस सिद्धांत पर सरकार आईसी इंजन निर्माताओं पर “फीबेट” लेना चाहती है, जिसका उपयोग ई-गतिशीलता के लिए एक फंड बनाने के लिए किया जाएगा। यह विवाद का मुद्दा है, क्योंकि आईसी इंजन निर्माता ऐसा नहीं करना चाहेंगे। फीबेट पर निर्णय भारत में ईवीएस के लिए जीवन-और-मौत की स्थिति है। इसके बिना पर्याप्त धनराशि नहीं होगी और नई नीति केवल यहां और वहां टांके लगाने का काम करेगी। “

 

गिल ने कहा कि यहां तक ​​कि एक मामूली फीबेट ( एक संयुक्त “शुल्क” और “छूट” जहां एक खिलाड़ी को एक दूसरे को छूट प्रदान करने के लिए एक शुल्क लगाया जाता है ) संभावित रूप से ईवी क्षेत्र को शुरु करने में सक्षम होने के लिए पर्याप्त धन उत्पन्न कर सकता है।

 

 उदाहरण के लिए, यदि प्रत्येक आईसी इंजन दोपहिया की कीमत 60,000-70,000 रुपये है, 1,000 रुपए का 1.6-1.7 फीसदी फीबेट का भुगतान करता है यह एक वर्ष में 2,000 करोड़ रुपये (20 मिलियन यूनिट की बिक्री मानते हुए) का एक पूल बनाएगा, जैसा कि एसएमईवी विश्लेषण से पता चलता है। फीबेट का विचार अनुसंधान संगठनों के बीच काफी लोकप्रिय है। यह “ईवीएस के लिए सब्सिडी वित्तपोषण का एक मजबूत तरीका हो सकता है, जो कि सरकार द्वारा प्रदान किए गए मांग प्रोत्साहनों के लिए आवश्यक है,” जैसा कि काउंसिल ऑफ एनर्जी, एन्वायर्नमेंट एंड वाटर (सीईईई) में शोधकर्ताओं ने इंडियास्पेंड को बताया है। उन्होंने कहा कि दिल्ली राज्य के ईवी नीति मसौदे ने पहले से ही एक फीबेट का प्रस्ताव दिया है।

 
घरेलू निर्माण या आयात?

 

आज ईवी की लागत में 50 फीसदी से अधिक बैटरी की हिस्सेदारी है। चिंता बढ़ रही है कि वाहन की लागत पर सब्सिडी ( बैटरी की बजाय ) ऑटोमेकर्स को सस्ता आयातित बैटरी पर निर्भर कर देगा।  जैसवाल ने कहा, यह विनिर्माण मूल्य श्रृंखला के सभी प्रमुख हिस्सों को पकड़ने के लिए भारत की महत्वाकांक्षा को बाधित कर सकता है। उन्होंने कहा कि, “हम मानते हैं कि इस योजना को स्थानीय रूप से निर्मित बैटरी की अनुमति देनी चाहिए क्योंकि भारत में आपूर्ति श्रृंखला अभी तक बड़े पैमाने पर तैयार नहीं है।”

 
बैटरी स्वैपिंग या फास्ट-चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर?
 

सरकार यह तय करने की कोशिश कर रही है कि चार्जिंग स्टेशनों को फास्ट-चार्जिंग या बैटरी-स्वैपिंग मॉडल, या दोनों को अपनाना चाहिए या नहीं।

 

सीईईई के शोधकर्ता कहते हैं, “चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एक मॉडल नहीं होगा जिसे प्राथमिकता दी जाएगी, लेकिन, दोनों का संयोजन होगा जो विभिन्न ईवी सेगमेंट की सेवा में मदद करेगा।” उन्होंने आगे कहा कि, बैटरी स्वैपिंग तीन- और दोपहिया वाहनों के लिए अधिक उपयुक्त होगी जबकि फास्ट चार्जिंग ऑपरेटरों और वाणिज्यिक वाहनों द्वारा पसंद की जाएगी।

 

चार्जिंग स्टेशनों के बारे में विवाद का एक अन्य बिंदु यह है कि क्या उन्हें सेवा प्रदाता (चार्जिंग सेवा प्रदान करने) या विक्रेता (बिजली का) माना जाएगा। विद्युत अधिनियम केवल बिजली वितरण कंपनियों को बिजली बेचने की इजाजत देता है, इसलिए यदि बाद वाला विचार लिया जाता है तो इसे संशोधित करना होगा।

 

आईसी ऑटो उद्योग से दबाव

 

 

चूंकि एफएएमई के तहत बड़ी बिक्री हाइब्रिड सेगमेंट में रही है, इसलिए आईसी ऑटोमोबाइल उद्योग को कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। लेकिन एपएएमई – II में केवल 100 फीसदी इलेक्ट्रिक वाहनों को सब्सिडी देने की संभावना है, जैसा कि वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट इंडिया (डब्लूआरआई इंडिया) में एकीकृत शहरी परिवहन के लिए रणनीति प्रमुख अमित भट्ट ने इंडियास्पेंड को बताया है। कन्वेन्शनल ऑटोमोबाइल रिफाइनरियों में उत्पादित 30 फीसदी पेट्रोलियम का उपभोग करते हैं। जबकि, ईवी के पास लगभग 20 हिस्से हैं, आईसी इंजन वाहनों में 2,000 हैं, जैसा कि  द हिंदू बिजनेस लाइन ने 11 दिसंबर, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। इसमें कहा गया कि, कुल मिला कर तेल और ऑटो पार्ट्स उद्योग ईवी क्षेत्र के भयानक विरोध में होंगे।

 
अधिक व्यापक नीति

 

सरकार की वैचारिक संस्था, नीति आयोग द्वारा विकसित किए जा रहे एफएएमई – II के बारे में रणा यह है कि ह अधिक विकसित होगा।उम्मीद है कि यह यह सभी हितधारक मंत्रालयों – भारी उद्योग, सड़क परिवहन, शहरी नियोजन, बिजली, और नवीनीकरण के विचारों को एक साथ लाएगा।  इसके विपरीत, एफएएमई -1, पूरी तरह से भारी उद्योग मंत्रालय द्वारा विकसित किया गया था, जिसके अपने दायरे थे। इंडियास्पेन्ड द्वारा समीक्षा किए गए सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, एफएएमई-II इलेक्ट्रिक के सभी इंट्रा-सिटी वाणिज्यिक परिवहन जैसे तीन-पहिया और टैक्सी और बस बेड़े को चालू करने पर ध्यान केंद्रित करेगा। भारत में वार्षिक ऑटोमोबाइल बिक्री में 80 फीसदी हिस्सेदारी दो पहिया वाहन की है और एफएएमई-II इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों को सब्सिडी देगा।

 

सब्सिडी, विशेष रूप से यदि बढ़ाया गया हो, तो स्थितियां बदल सकती हैं, क्योंकि वर्तमान में ग्राहक अगर सस्ता हो तो ही ईवी चुनते हैं। एसएमईवी के गिल ने कहा, “इलेक्ट्रिक और गैर इलेक्ट्रिक वाहन के बीच अभी भी एक विस्तृत लागत अंतर है, जो सब्सिडी और टैक्स छूट के बावजूद भर नहीं रहा है।”

 

 उदाहरण के लिए सब्सिडी के बाद भी, आईसी इंजन विकल्प के साथ एक इलेक्ट्रिक दो-पहिया की लागत 30,000 रुपये से अधिक आती है। इसके अलावा ईवी की अधिकतम गति 45 किमी / घंटा है और दो शहर के बीच उससे यात्रा नहीं की जा सकती है। गिल कहते हैं, “एकमात्र तरीका यह है कि सरकार और उद्योग, कम से कम एक या दो साल के लिए, आईवी इंजन के खिलाफ आकर्षक बनाने के लिए ईवी के अधिग्रहण मूल्य को कम कर दे। और इसे एक बहुत ही सीमित समय की पेशकश करें। ” उन्होंने अनुमान लगाया कि यह सालाना 1-2 मिलियन आईसी इंजन खरीदारों को ईवी खरीदारों में परिवर्तित कर सकता है।ईवीएस को ईवीएस के लिए जीएसटी को कम करने या तर्कसंगत बनाने के लिए संभवतः अधिक कर छूट मिलेगी।  वर्तमान में, पेट्रोलियम और डीजल कारों और हाइब्रिड वाहनों पर 28 फीसदी एवं जीएसटी के मुकाबले ईवीएस पर 12 फीसदी जीएसटी लागू होता है।

 

पंजीकृत ईवी को प्रदान की गई ग्रीन नंबर प्लेट्स उन्हें अन्य लाभों के साथ विशेष पार्किंग स्लॉट, टोल छूट, कम सड़क और पंजीकरण शुल्क के लिए पात्र बनाती हैं।

 

पहले, 16 से 18 साल के बच्चों को इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन चलाने के लिए लाइसेंस दिए जा सकते थे। वर्तमान में, केवल 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोग ड्राइवर का लाइसेंस प्राप्त कर सकते हैं (हालांकि लर्नर लाइसेंस के लिए 16 वर्षी की उम्र सीमा खुली हुई है)।

 
( त्रिपाठी प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं। )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 15 दिसंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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