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वोट देने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी, लेकिन महिला उम्मीदवारों की संख्या कम

नमिता भंडारे,
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नई दिल्ली: यह समझने के लिए कि अप्रैल और मई 2019 में होने वाले आम चुनावों से पहले कुछ राजनीतिक दलों ने अधिक से अधिक महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता के संबंध में सोचा है, आपको केवल सहस्राब्दी के महिला मतदाताओं पर एक नजर डालनी है।

 

उत्तर-पश्चिमी ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के राजगामपुर गांव की 20 वर्षीय आदिवासी लड़की अंजू बा ने ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी कर ली है। उसने कंप्यूटर क्लास में दाखिला लिया है और कहती है कि कोर्स पूरा होते ही वह नौकरी के लिए आवेदन कर देगी। शादी? इस सवाल पर वह शरमा जाती है और कहती है कि पहले नौकरी का नंबर है।

 

जब अंजू छोटी थी, तब उसकी मां  रानी सिकंदरा बा, जो 12 वीं कक्षा पास थी और दिल्ली में एक घरेलू कामगार के रूप में कार्यरत थी, ने पहली बार ( और केवल एक बार ही ) चुनाव में मतदान किया था। वर्ष 2000 में उनके विधानसभा सीट बीरमित्रपुर के उम्मीदवार आदिवासी नेता जॉर्ज तिर्की थे, जो हाल ही में कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए हैं। उसने तिर्की को वोट क्यों दिया? रानी ने कहा, “क्योंकि उनके गांव ने उनका समर्थन करने के लिए एक सामूहिक निर्णय लिया था।”

 

लेकिन अंजू को कोई नहीं बताता है कि किसे वोट देना है। अपने दोस्तों की तरह, वह अपने मर्जी से वोट देती है। क्या वह एक महिला उम्मीदवार को पसंद करेगी? वह इंडियास्पेंड से फोन पर बातचीत में कहती है,“मैं देखूंगी कि उम्मीदवार कौन है। लेकिन अभी तक मेरे गांव में महिलाओं ने अच्छा काम किया है। हमारी सरपंच एक महिला है और वह सुलभ और मेहनती है। उसने हमारे लिए बहुत सारे सड़कों के काम करवाए। इसलिए, जब समुदाय सेवा करने की बात आती है, तो पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक समर्पित होती हैं।”

 

चार बार ओडिशा के मुख्यमंत्री रहे नवीन पटनायक शायद अंजू जैसी लड़कियों को सुन रहे हैं। इसी ने ही उन्हें राज्य की 21 संसदीय सीटों में से 33 फीसदी महिलाओं के लिए अलग रखने की घोषणा के लिए प्रेरित किया है। ओडिशा में अप्रैल 2019 में संसद और राज्य विधानसभा का चुनाव एक साथ होगा।

 

अंजू नई, मुखर और सहस्राब्दी महिला मतदाता की प्रतिनिधि हैं, जो मत का प्रयोग करने के लिए पुरुषों की तुलना में बड़ी संख्या में आगे आ रही हैं।

 

इस नई मतदाता की अपनी मां की तुलना में स्कूल में कम से कम 10 वर्ष पूरे करने की संभावना अधिक है। इसका अपने भाई की तुलना में स्कूल में दाखिला लेने की संभावना भी अधिक है – जैसा कि 2016 में, लड़कियों के लिए सेकेंड्री स्कूल नामांकन दर 75.8 फीसदी थी जो पुरुषो के 74.59 फीसदी के आंकड़ों से ज्यादा है, जैसा कि विश्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है।

 

वह भारत की युवा, आकांक्षात्मक महिला पीढ़ी से हैं, जिसमें 10 में से सात लड़कियों ने ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी करने की और चार में से तीन ने अंजू की तरह, विशिष्ट कैरियर मार्गों पर चलने की योजना बनाई है, जैसा कि ‘नंदी फाउंडेशन’ द्वारा 2018 के सर्वेक्षण से पता चलता है।

 

अपनी पीढ़ी की ज्यादातर युवा महिलाओं की तरह, अंजू का मानना ​​है कि महिलाओं को पुरुषों की तरह राजनीति में भाग लेना चाहिए। पहली बार महिला वोटरों के बीच, 68 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि महिलाओं को पुरुषों के साथ राजनीति में भाग लेना चाहिए, जैसा कि रिसर्च संगठन ‘लोकनीति-सीएसडीएस’ और न्यूज पोर्टल ‘द क्विंट’ द्वारा फरवरी 2019 में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया है। पांच में से तीन उत्तरदाताओं ने कहा कि वे परिवार से प्रभावित हुए बिना, अपनी पसंद के उम्मीदवार और पार्टी को वोट देंगे।

 

1992 के 73 वें और 74 वें संवैधानिक संशोधन द्वारा शासित स्थानीय शासन निकायों और पंचायतों में महिलाओं के लिए एक चौथाई सदी से अधिक आरक्षण ने जमीनी स्तर पर राजनीतिक रूप से जागरूक महिलाओं का एक कैडर बनाया है। पंचायती राज मंत्रालय के अनुसार महिलाओं में अब पंचायती राज संस्थाओं के विभिन्न स्तरों पर 46 फीसदी निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल हैं।

 

दिल्ली स्थित थिंक-टैंक ‘इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज’ (आईएसएस) में महिला अध्ययन विभाग के प्रमुख बिद्युत मोहंथी कहते हैं, “ पंचायत प्रणाली में लगभग 10 लाख महिलाएं निर्वाचित हुई हैं और अन्य 20 लाख ने चुनाव लड़ा है और हार गई हैं। वे बहुत जागरूक मतदाता हैं, विकास और अपने गांवों के अन्य मुद्दों के बारे में जानती हैं। ”

 

 हो सकता है कि ये महिलाएं बाधाओँ को न तोड़ पाई हो, लेकिन मतपत्र पर वह क्या चाहती हैं और अपनी पसंद को लेकर निडर हैं।   थिंक टैंक, ‘ब्रुकिंग्स इंडिया’ की निदेशक, शामिका रवि के अनुसार “अधिक से अधिक महिलाएं मतदान करने के लिए आ रही हैं और यह किसी भी टॉप-डाउन पॉलिसी हस्तक्षेप के कारण नहीं है, बल्कि स्व-सशक्तिकरण के स्वैच्छिक कार्य के कारण है।” रवि मानती हैं कि महिला मतदान में लगातार वृद्धि एक मूक क्रांति है। 2014 के आम चुनाव में, पुरुषों और महिलाओं के बीच लैंगिक अंतर सबसे कम था ( 1962 के चुनावों में 15-प्रतिशत के अंतर की तुलना में सिर्फ 1.5 प्रतिशत अंक ) और 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, महिला मतदाताओं का वोट पुरुषों से अधिक था।

 

राज्य जहां 2014 के आम चुनावों में महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया


 

मतदान में लैंगिक पक्षपात कम होना पारंपरिक रूप से पिछड़े ‘ बीमारू’  राज्यों ( बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश ) सहित सभी राज्यों में देखा जा सकता है, जैसा कि मार्च 2014 में मुदित कपूर और शामिका रवि द्वारा ‘इकॉनोमिक और पॉलिटिकल वीकली’ में लिखे गए पेपर से पता चलता है। अध्ययन के लेखकों ने लिखा है कि यह गिरावट ” केवल 1990 के दशक के बाद से चुनावों में महिलाओं की भागीदारी में नाटकीय वृद्धि से प्रेरित है, जबकि पुरुषों की भागीदारी अपरिवर्तित (एसआईसी) बनी हुई है।” समग्र लिंगानुपात 1960 के दशक से 2000 के दशक तक मामूली रूप से बिगड़ा है, जबकि मतदाता लिंगानुपात में सुधार हुआ है। रवि ने कहा कि हिंसा की कम घटनाएं और बेहतर बुनियादी ढांचे में सुधार ऐसी वजहें हैं जिनकी वजह से अधिक महिलाएं मतदान करने की ओर रुख कर रही हैं। उन्होंने कहा, “महिलाओं के लिए मतदान करने में जोखिम कम हो गया है। जब बड़े पैमाने पर मतपत्र भराई होता था (एक प्रकार का चुनावी धोखा, जहां किसी व्यक्ति को केवल एक वोट की अनुमति होती है, और वहां वह ढेर सारे वोट डालता था ), वहां हमेशा महिलाओं और बुजुर्गों के वोट जब्त होते थे।  भारत के चुनाव आयोग ने 1990 के बाद से अधिक महिलाओं को बाहर निकलने और वोट देने के लिए एक अभियान शुरू किया है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी कहते हैं, “मैंने सबसे पहला काम जो किया वह यह था कि देश के लिंग अनुपात को देखना।”  एकतरफा लिंग अनुपात में कम से कम 2 करोड़ महिलाएं मतदाता सूची से गायब थीं। उन्होंने इंडियास्पेंड को बताया, “हमने बूथ स्तर के अधिकारियों को भेजा और उन लापता महिलाओं को मतदाता के रूप में नामांकित करने के लिए खोजा।” महिलाएं अभी भी मतदाता सूची से गायब हैं, लेकिन चुनाव आयोग द्वारा इस महीने की शुरुआत में घोषित नए मतदाताओं में, 4.34 करोड़ महिलाएं और 3.8 करोड़ पुरुष हैं, जैसा कि ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ ने 12 मार्च 2019 की रिपोर्ट में बताया है।

 

महिला मतदाताओं की संख्या में सबसे ज्यादा वृद्धि

States With Largest Increase In Number Of Women Voters
State New Women Voters (In million) Total Registered Women Voters (In million)
Uttar Pradesh 5.4 66.1
Maharashtra 4.5 41
Bihar 4.28 33.2
West Bengal 4 34
Tamil Nadu 2.9
Gujarat 2.4 21

Source: Election Commission of India

 
ऐतिहासिक असंतुलन को ठीक करना
 

 दो राजनीतिक दलों, ओडिशा में नवीन पटनायक की बीजू जनता दल (बीजेडी) और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस द्वारा घोषणा की गई है कि वे 2019 में आम चुनावों में एक महत्वपूर्ण संख्या में महिलाओं के लिए क्षेत्ररक्षण करेंगे। यह वादा लिंग प्रतिनिधित्व में एक ऐतिहासिक असंतुलन के निवारण की ओर किसी तरह जा सकते हैं। आबादी में 48.1 फीसदी का गठन महिलाएं करती हैं, लेकिन लोकसभा सीटों में इनकी हिस्सेदारी केवल 12.1 फीसदी है। ओडिशा में, जहां विधानसभा और संसदीय चुनाव एक साथ होंगे, पटनायक ने कहा कि ह बीजेडी के संसदीय चुनाव के 33 फीसदी (सात) टिकट महिलाओं के लिए देंगे।

 

बीजेडी की नौ प्रतियोगियों की पहली सूची में तीन महिलाएं शामिल हैं। उनमें से दो राजनीतिक परिवार से हैं। स्कूल की शिक्षिका कौशल्या हिकाका कोरापुट से चुनाव लड़ेंगी, और वह सांसद (सांसद) झीना हिक्का की पत्नी हैं। सुनीता बिस्वाल कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हेमानंद बिस्वाल की बेटी हैं, जो मार्च 2019 में बीजेडी में शामिल हुई थीं और सुंदरगढ़ से चुनाव लड़ेंगी।

 

केवल प्रमिला बिश्नोई, जो अक्सा से चुनाव लड़ेंगी और जहां से नवीन पटनायक ने 20 साल पहले अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया था, वह ‘सता संखा सहायता समूह’ की अध्यक्ष हैं और उनकी पहचान एक जमीनी नेता की है। बीजेडी सांसद पिनाकी मिश्रा ने कहा, “बीजेडी हमेशा से महिला सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है।” मिश्रा ने कहा कि 1991 के 73 वें संवैधानिक संशोधन से पहले 1992 में स्थानीय निकायों और पंचायतों में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण अनिवार्य था, लेकिन पार्टी के संस्थापक बीजू पटनायक ने 33 फीसदी आरक्षण लागू किया। 2012 में, उनके बेटे नवीन ने इसे 50 फीसदी तक बढ़ाया था।

 

 मिश्रा ने कहा, “महिलाएं पारंपरिक रूप से बीजेडी का आधार रही हैं। महिलाएं उन पुरुषों के मुकाबले आसानी से शिफ्ट नहीं होती हैं, जो लुभाने के लिए अतिसंवेदनशील हो सकते हैं। महिलाएं अपनी सोच में अधिक स्थिर होती हैं। राजनीति पुरुष प्रधान है, क्योंकि व्यवस्था पुरुष प्रधान है। सचमुच मेधावी महिलाओं के लिए इस जाल को तोड़ना मुश्किल हो रहा है और नवीन पटनायक ऐसा करने में उनकी मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। ”वर्तमान में, संसद में ओडिशा का प्रतिनिधित्व करने वाले 21 सांसदों में से केवल तीन महिलाएं हैं। 147 सदस्यीय राज्य विधानसभा में सभी विधायकों में से केवल 8 फीसदी महिलाएं हैं, जो कि 9 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से कम है। 2014 में, ओडिशा के विधानसभा चुनावों के लिए महिला उम्मीदवार पिछले 2009 के चुनाव की तुलना में बहुत कम थीं। फिर भी, 2009 की तुलना में 2014 में अधिक महिलाओं ने जीत हासिल की।महिलाओं ने पारंपरिक रूप से विधानसभा और संसदीय चुनावों में प्रचार करना मुश्किल पाया है, जैसा कि प्रत्युषा राजेश्वरी सिंह कहती हैं, जिन्होंने 2014 के चुनावों के कुछ महीने बाद अपने पति की मृत्यु हो जाने के कारण उनके कंधमाल संसदीय सीट से उपचुनाव जीता था।“पंचायतों में आरक्षण ने कई महिलाओं को आगे लाया है लेकिन उनकी आवाज़ अभी भी नहीं सुनी जाती है, क्योंकि उनके परिवार के पुरुष सदस्यों का वर्चस्व रहता है। लेकिन शिक्षा के साथ, उन्हें एक्सपोज़र मिल रहा है, और वे लोगों की सेवा करना चाहते हैं। ”

 

ओडिशा ने विधानसभा चुनाव में कैसे मतदान किया है?


 

ओडिशा में महिलाओं की एजेंसी के दावे को न केवल वोट देने की उनकी उत्सुकता के रूप में देखा जा सकता है, बल्कि राज्य में स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के उदय में भी देखा जा सकता है। सरकार के मिशन शक्ति कार्यक्रम के तहत वर्तमान में 70 लाख महिला एसएचजी सदस्य हैं। जनवरी 2019 में मिशन शक्ति सम्मेलन में कुछ 50,000 महिलाओं ने भाग लिया। पटनायक ने स्वयं सहायता समूहों को 3 लाख रुपये तक के शून्य-ब्याज ऋण की घोषणा की। नवंबर 2018 में, ‘मेक इन ओडिशा’ शिखर सम्मेलन में, उन्होंने 600,000 एसएचजी को स्मार्टफोन देने का वादा किया था।

 

पटनायक द्वारा महिलाओं को 33 फीसदी संसदीय टिकट देने के वादे के एक दिन बाद, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी के उम्मीदवारों की सूची संसद को जारी की। इनमें से 41 फीसदी महिलाएं हैं, जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में किसी भी चुनाव के लिए अभूतपूर्व है। राज्य में एक राजनीतिक द्रष्टा ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “ममता के पास हमेशा एक परिकल्पित गेम-प्लान नहीं होता है। वह बहुत आवेगी हो सकती हैं। कुछ सीटों पर जीत मिलना मुश्किल होगा।

 

 राज्य में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा 2011 के विधानसभा चुनाव में हो गया, जब ममता बनर्जी की टीएमसी ने निर्बाध मार्क्सवादी शासन के 34 साल पूरे कर लिए थे। अगले विधानसभा चुनाव में, न केवल महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों की तुलना में अधिक रहा, बल्कि अधिक महिलाओं ने भी उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। परिणामों से पता चलता है कि ममता की लोकप्रियता बरकरार थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी और सीपीएम) राज्य में तीसरे नंबर पर आ गई, जबकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) प्रमुख विपक्ष के रूप में उभरी।

 

पश्चिम बंगाल ने विधान सभा में कैसे मतदान किया ?


 

बीजेपी और कांग्रेस द्वारा उम्मीदवारों की प्रारंभिक सूचियों के विश्लेषण से पता चलता है कि यह बड़े दलों के लिए हमेशा की तरह व्यापार है। पहली सूची में घोषित बीजेपी के 184 उम्मीदवारों में से केवल 23 या 12.5 फीसदी ​​महिलाएं हैं। कांग्रेस की सूची में 143 उम्मीदवारों में से 17 या 11.9 फीसदी महिलाएं हैं।

 

महाराष्ट्र बीजेपी के पार्टी प्रवक्ता और कोषाध्यक्ष शाइना एनसी ने कहा, “बीजेपी ने पहले ही संगठन में महिलाओं को 33 फीसदी दिए हैं। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। चुनाव लड़ना सबसे महत्वपूर्ण है। ”

 

क्या चाहती हैं  महिला मतदाता ?
 

क्या महिला मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं? “बिल्कुल !”, ब्रुकिंग्स इंडिया के रवि ऐसा ही कहते हैं। फरवरी 2005 के बिहार विधानसभा चुनावों के एक अध्ययन में, जहां किसी भी पार्टी के पास बहुमत नहीं था, आठ महीने बाद दोबारा चुनाव हुए, रवि ने पाया कि जीतने वाली पार्टी 243 निर्वाचन क्षेत्रों में से 87 में बदल गई। लेकिन फरवरी से अक्टूबर के बीच महिला मतदाताओं का प्रतिशत भी 42.5 फीसदी से बढ़कर 44.5 फीसदी हो गया। जबकि पुरुष मतदाताओं का प्रतिशत 50 फीसदी से घटकर 47 फीसदी हो गया। महिलाएं बदलाव के लिए मतदान करती हैं, जबकि पुरुष यथापूर्व स्थिति में रहते हैं। नीतीश कुमार (बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री) जानते हैं कि उन्हें महिला वोट द्वारा सत्ता में लाया गया था, और राजनीतिक दल अब उनकी किताब से एक पत्ता निकाल रहे हैं।

 

महिला मतदाता क्या चाहती हैं?
 

बिहार में, कुमार ने राज्य की मजबूत महिला एसएचजी (जिसमें 82 लाख महिला सदस्य हैं)से वादा किया थाकि वह शराब पर बैन लगाएंगे। यह मांग एक लंबे समय से चली आ रही थी। उन्हें वोट दिया गया और  उन्होंने वह वादा पूरा किया।

 

  बिहार में, महिला मतदाताओं के लिए मिश्रित सुधार ( मद्य-निषेध, सरकारी नौकरियों में आरक्षण, व्यावसायिक प्रशिक्षण, साइकिल, सेनेटरी नैपकिन, लड़कियों के लिए वर्दी और छात्रवृत्ति ) ने नीतीश कुमार का मार्ग आसान बना दिया है, जैसा कि जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय महासचिव और प्रवक्ता पवन के वर्मा कहते हैं। वह कहते हैं, ” सरकार की नीतियों में महिलाओं के लिए लाभ के तरीके को संस्थागत रूप दिया गया है।”

 

बिद्युत मोहंती ने कहा कि महिला मतदाताओं की अक्सर पुरुषों के समान मांग होती है। सूची में सबसे ऊपर रोजगार और आजीविका है। लेकिन महिलाओं को स्वास्थ्य, शिक्षा, पीने के पानी तक पहुंच, सुरक्षा और स्वच्छता भी चाहिए।

 

हालांकि, यह बताने के लिए कोई सबूत नहीं है कि महिलाएं एक ब्लॉक के रूप में वोट करती हैं। दिल्ली स्थित शोध संस्थान, ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज’ (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार ने कहा, “महिलाओं के वोटिंग पैटर्न में किसी राजनीतिक पार्टी के लिए थोड़ा भी झुकाव या पसंद परिणाम में काफी बदलाव ला सकती है।” उन्होंने कहा कि मतदाता मतदान में लिंग के अंतर के सिकुड़ने से चुनावों पर महिला प्रभाव बढ़ने की संभावना है।

 

 जरुरी नहीं कि महिलाएं, महिलाओं को ही वोट करें, जब तक कि यह किसी पार्टी की महिला प्रमुख न हो।  उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में 2016 के विधानसभा चुनावों में स्वर्गीय जे. जयललिता के नेतृत्व में, तमिलनाडु के अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) का वोट शेयर, पुरुषों की तुलना में महिलाओं में 10 प्रतिशत अंक ज्यादा था, जैसा कि ‘द मिंट’ के लिए एक लेख में सीएसडीएस के कुमार ने लिखा है।

 

नतीजतन, पार्टी राज्य में सत्ता विरोधी रुझान को उलटने में सफल रही। इसी तरह, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उसी साल टीएमसी का वोट शेयर पुरुषों की तुलना में महिला मतदाताओं में काफी बढ़ गया।

 
अधिक जीत के बावजूद, महिला उम्मीदवारों के लिए बहुत कम जगह
 

 जिस भी तरीके से आप इसे देखें, भारतीय राजनीति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को कम कर दिया गया है। ऐतिहासिक रूप से, भारतीय महिलाएं जो सत्ता तक पहुंची हैं ( संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष, विजया लक्ष्मी पंडित से, भारत की पहली स्टैंड-अलोन महिला रक्षा मंत्री, निर्मला सीतारमण तक ) अपवाद हैं, मानदंड नहीं। 1952 की पहली लोकसभा में केवल 22 महिला सांसद थीं। प्रतिशत में देखें तो 4.5 फीसदी । 67 साल बाद, केवल 66 महिला सांसदों के साथ निवर्तमान लोकसभा में 12.15 फीसदी महिलाएं शामिल थीं।

 

संसद में महिला सदस्य, 1951-2014


 

9 फीसदी राष्ट्रीय औसत के साथ राज्य विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व बदतर है। नागालैंड को राज्य के रूप में बनाए जाने के 53 वर्षों में, उसने कभी भी महिला विधायक नहीं चुना है। राज्य की सिर्फ एक महिला स्वर्गीय रानो मेसे शाइजा ने संसद तक का रास्ता देखा।  विधानसभा की कुल संख्या के 15 फीसदी पर हरियाणा में महिला विधायकों का अनुपात सबसे अधिक है। केरल में, 2001 के चुनाव में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 9.3 फीसदी था, लेकिन तब से लगातार 6 फीसदी से नीचे बना हुआ है।यहां तक ​​कि बीजेडी ने केवल संसदीय चुनावों के लिए सीटें आरक्षित की हैं, इसके बावजूद कि ओडिशा में एक साथ विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। फिर भी, आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों की तुलना में महिला प्रतियोगियों में लगातार जीत का प्रतिशत अधिक रहा है।

 

संसदीय चुनाव में महिला उम्मीदवारों की सफलता दर


 

राजनीतिक दलों की सामूहिक असफलता के कारण महिला उम्मीदवारों का एक सामूहिक प्रदर्शन चिंताजनक है, क्योंकि यह महिला नेताओं की पाइपलाइन की अनुपस्थिति को उजागर करता है, जैसा कि 2014 के वूमन इन पार्टी पॉलिटिक्स नाम के एक पत्र में शामिका रवि ने कहा है।

 

ब्रुकिंग्स इंडिया में एक शोध सहायक और रोहन संधू के साथ सह-लेखक, शामिका रवि ने पेपर में कहा है कि “हमारा राजनीतिक तंत्र सामूहिक रूप से महिला नेताओं का पोषण करने में विफल रहा है। संसद में कोटा लागू किया जाना चाहिए।  इस तरह के  संदर्भ में, भले ही विधेयक पारित हो जाए, लेकिन इसका प्रभाव संदिग्ध होगा। ”

 
कागज पर, पार्टी संगठन महिलाओं के लिए अनिवार्य पदों के बारे में बात करती है। वास्तविकता, हालांकि काफी अलग है।
 

 2014 में, कांग्रेस पार्टी के 42 सदस्यों में से केवल पांच महिलाएं थीं, जैसा कि रवि और संधू ने पाया। स्थिति अन्य दलों में हतोत्साहित करने वाली थी। टीएमसी के 30 उपाध्यक्षों में से कोई भी महिला नहीं थी। आम आदमी पार्टी में, 24 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी में केवल दो सदस्य महिलाएँ थीं। सीपीएम में, 12 सदस्यीय राजनीतिक-ब्यूरो की केवल एक सदस्य एक महिला थी।

 

पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 77 सदस्यों में से 26 महिलाओं के साथ केवल बीजेपी कुछ बेहतर थी। रवि कहते हैं, ” पार्टी नेतृत्व के पदों पर महिलाओं की अनुपस्थिति पार्टी की कमजोर आंतरिक बुनियादी ढांचे का संकेत है, जो महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी दिलाने में असमर्थ है।”

 

और फिर भी, ये राजनीतिक दल महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में गेटकीपर्स हैं। पार्टी के नेता तय करते हैं कि वे कितनी और किन महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारेंगे।

 

 “विधानसभा चुनाव के लिए कितनी महिलाएं मैदान में होंगी, इस पर बीजेडी की चुप्पी के बावजूद, पार्टी द्वारा की गई घोषणाओं का स्वागत है,” रवि कहते हैं, “क्योंकि यह महिला नेताओं के लिए एक नए मार्ग को प्रशस्त करेगा”।

 

अब तक कोई संकेत नहीं है कि महिला उम्मीदवारों को लेकर अन्य दल संवेदनशील होंगे। भले ही, मोहंती ने कहा हो, “ वर्ष 2019 के अभियान की राह पर महिलाओं की अधिक दृश्यता भारत के राजनीतिक जीवन में अधिक से अधिक लिंग इक्विटी हासिल करने का पहला कदम है।”

 

मोहंती कहती हैं, “भारतीय मूल्य रातों-रात नहीं बदलते हैं और इस बदलाव देखने में पीढ़ियां लग सकती हैं। हमें एक लंबा रास्ता तय करना है।”

 

(नमिता भंडारे स्वतंत्र पत्रकार हैं। दिल्ली में रहती हैं और भारत के लैंगिक मुद्दों पर अक्सर लिखती हैं।)

 

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 27 मार्च, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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