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शहरी, समृद्ध और शिक्षित लोगों में हृदय रोग का खतरा ज्यादा

स्वागता यदवार,
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2009

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मुंबई: भारत में सबसे ज्यादा मौतें हृदय रोग के कारण होती हैं, लेकिन एक नए अध्ययन के मुताबिक अलग-अलग राज्यों में हृदय रोग के खतरे का जोख्म अलग-अलग है। समृद्ध और अधिक शहरीकृत राज्यों में यह जोखिम अधिक है।

 

जून 2018 में, मेडिकल जर्नल, ‘पीएलओएस मेडिसिन’ में एक संस्था, ‘पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ (पीएचएफआई), और’ हार्वर्ड टीएच चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ द्वारा किए गए एक अध्ययन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। उस रिपोर्ट के मुताबिक, कार्डियोवैस्कुलर बीमारी (सीवीडी) के लिए 10 साल की अवधि के लिए जोखिम  झारखंड में 13.2 फीसदी से लेकर केरल में 19.5 फीसदी तक है।

 

उत्तरी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में अधिक जोखिम पाया गया था। शहरी क्षेत्रों में रहने वाले, समृद्ध और अधिक शिक्षित परिवारों से संबंधित लोगों के लिए भी इस रोग का खतरा अधिक था।

 

वर्ष 2016 में हृदय रोग के कारण 1.7 मिलियन भारतीयों की मौत हुई है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने सितंबर, 2017 की रिपोर्ट में बताया है। 2016 में, गैर-संक्रमणीय बीमारियों की हिस्सेदारी 61.8 फीसदी तक बढ़ी है ( भारत में दस मौतों में छह का कारण )। यह आंकड़े 1990 से 23.9 प्रतिशत अंक ज्यादा हैं, जैसा कि हमने नवंबर 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

पीएचएफआई अध्ययन में भारत में दो बड़े घरेलू सर्वेक्षणों, जिला स्तर के घरेलू सर्वेक्षण-4 (डीएलएचएस -4) और 2012 से 2014 के बीच आयोजित वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एएचएस) का दूसरा अपडेट 30-74 साल के 797,540 लोगों के आंकड़ों को शामिल किया गया है।

 

शोधकर्ताओं ने बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई), सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर और रक्त शर्करा के स्तर और ग्रामीण-शहरी स्थान और सामाजिक-जनसांख्यिकीय विशेषताओं द्वारा राज्यों के बीच भिन्नता के आधार पर कार्डियोवैस्कुलर जोखिम की गणना की है।

 

दक्षिण भारत में उच्चतम कार्डियोवैस्कुलर जोखिम

 

पुरुषों और महिलाओं दोनों में, दक्षिण भारत के राज्यों मॆ (गोवा समेत) , तीन सबसे उत्तरी राज्य (हिमाचल प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड) और उत्तर-पूर्वी राज्य (असम को छोड़कर) और पश्चिम बंगाल (विशेष रूप से पुरुषों में) में सीवीडी का जोखिम सबसे अधिक है।

 

जबकि उत्तर और दक्षिण भारत दोनों में अधिक वजन वाले व्यक्ति थे, दक्षिण में अधिक रक्त शर्करा वाले लोग थे, उत्तर में अधिक रक्तचाप वाले अधिक लोग थे। उत्तर-पूर्वी राज्यों और पश्चिम बंगाल में रहने वाले लोगों में खासकर पुरुषों में धूम्रपान की लत अधिक देखी गई।

 

राज्य अनुसार कार्डियोवैस्कुलर जोखिम

 

महिलाओं की तुलना में पुरुषों में कार्डियोवैस्कुलर जोखिम दोगुना

 

30 से 74 वर्ष के आयु वर्ग में, महिलाओं में कार्डियोवैस्कुलर बीमारी का कुल 10 साल का जोखिम 12.7 फीसदी था, जबकि पुरुषों में ये आंकड़े 21.4 फीसदी थे।

 

जबकि पुरुषों और महिलाओं दोनों के पास समान औसत बॉडी मास इंडेक्स (क्रमशः 22.6 किलोग्राम / एम 2 और 22.3 किलोग्राम / एम 2) था, पुरुषों की तुलना में कम वजन (18.5 किलो / एम 3 से कम बीएमआई) और मोटापा (23.5 के बीएमआई) किलो / एम 3) से ग्रसित होने की संभावना ज्यादा थी।

 

इसके अलावा, पुरुषों और महिलाओं में से 10 फीसदी में रक्त शर्करा का स्तर अधिक था,  लेकिन पुरुषों में उच्च औसत रक्तचाप था (पुरुष 126.7 एचजी / मिमी बनाम महिला में 129.1 एचजी / मिमी) और उच्च धूम्रपान प्रसार (27.1 फीसदी पुरुष बनाम महिला में 2.1 फीसदी) था।

 

समृद्ध ग्रामीण इलाकों में जोखिम अधिक

 

धन में वृद्धि के साथ, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में दिल से संबंधित बीमारी के जोखिम में वृद्धि हुई है, जैसा कि अध्ययन में पाया गया है।

 

ग्रामीण इलाकों में, सबसे गरीब 20 फीसदी जिलों की तुलना में सबसे समृद्ध 20 फीसदी जिलों में रहने वालों के बीच 10 साल के कार्डियक जोखिम में 13.1 फीसदी की सापेक्ष वृद्धि देखी गई थी। शहरी क्षेत्रों में यह वृद्धि 4.3 फीसदी थी।

 

घरेलू धन क्विंटाइल, आयु, ग्रामीण बनाम शहरी और लिंग अनुसार 10 साल का कार्डियोवैस्कुलर रोग जोखिम

 

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Source: PLOS Medicine

 

जोखिम कारकों को देखें तो अमीर व्यक्तियों के बीच बीएमआई काफी अधिक था, मध्यम और वृद्धावस्था में गरीब व्यक्तियों में उच्च रक्त ग्लूकोज और उच्च सिस्टोलिक रक्तचाप आम था। गरीब धन क्विंटाइल और ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों के बीच धूम्रपान सबसे प्रचलित था।

 

दिल की बीमारी को रोकने के लिए लक्षित प्रयासों की जरूरत

 

अध्ययन के लेखकों ने कहा कि सीवीडी जोखिम पर राज्यवार जानकारी “रोकथाम, स्क्रीनिंग और उपचार के लिए संसाधनों और हस्तक्षेपों के प्रभावी लक्ष्यीकरण के लिए आवश्यक है”।

 

अध्ययन से जुड़े लोग मानते हैं कि ,” अगर भारत स्वास्थ्य, कल्याण, वित्तीय जोखिम संरक्षण और आर्थिक विकास के लिए सीवीडी के प्रतिकूल परिणामों को कम करना चाहता है तो लक्षित सीवीडी देखभाल कार्यक्रमों के साथ-साथ प्रासंगिक स्वास्थ्य नीति उपायों में निवेश की आवश्यकता है। खासकर उच्च सीवीडी जोखिम वाले राज्यों में।”

 

अध्ययन में कहा गया है कि, “भारत की आबादी के आकार और अनुमानित विकास को देखते हुए आने वाले वर्षों में सीवीडी को रोकने और इलाज के लिए उपायों पर दृढ़ संकल्प और प्रभावशीलता वैश्विक स्तर पर एसडीजी [टिकाऊ विकास लक्ष्यों] की उपलब्धि में महत्वपूर्ण असर डालेगी।”

 

एसडीजी संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय किया गया एक वैश्विक लक्ष्य है, जिसमें सभी देश अपने नागरिकों के लिए स्वस्थ जीवन सुनिश्चित करने और सभी उम्र में अच्छी तरह से जीवनयापन करने और 2030 तक गैर-संक्रमणीय बीमारियों के कारण एक तिहाई समयपूर्व मृत्यु दर को कम करने को लेकर सभी सहमत हैं।

 
‘हार्वर्ड टीएच चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ में फैक्लटी और ‘पीएचएफआई’ में विजिटिंग फैकल्टी लिंडसे जैक्स ने एक बयान में कहा है, “यह अध्ययन लोगों से व्यापक हस्तक्षेप की मांग करता है कि वे वसा और सोडियम कमी के साथ-साथ तंबाकू के उपयोग को भी तत्काल कम करें।”
 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 24 जुलाई, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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