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शिक्षा पर भारत के केंद्रीय व्यय में गिरावट, 6 वर्षों में शिक्षक प्रशिक्षण के फंडिंग में 87 फीसदी गिरावट

मधुसूधन राव और ज्योत्सना झा,
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बेंगलुरु: जबकि उच्च शिक्षा के लिए वित्तपोषण में वास्तविक रूप से 28 फीसदी की वृद्धि देखी गई है, वहीं सरकार के बजट आंकड़ों के अनुसार स्कूली शिक्षा में पिछले छह वर्षों के दौरान 39,000 करोड़ रुपये यानी 3 फीसदी की गिरावट देखी गई है।

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में खर्च में भी 0.53 फीसदी से 0.45 फीसदी की लगातार गिरावट देखी गई है।

 

छह सालों में, शिक्षक प्रशिक्षण घटक के लिए फंड में 87 फीसदी की गिरावट हुई है। यह आंकड़े 2014-15 में 1,158 करोड़ रुपये से गिर कर 2019-20 में 150 करोड़ रुपये हुए हैं, जो निम्न प्राथमिकता को दर्शाता है।

 

शिक्षा में कौशल रोजगार की कुंजी है, और बदले में हर आदमी सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वृद्धि में योगदान देता है । शिक्षा समवर्ती सूची में है, जो संघ और राज्य सरकारों दोनों की भूमिका के लिए संकेत देती है। शिक्षा विभाग राज्य स्तर पर राजस्व व्यय के मामले में सबसे बड़ा है, और इसके बजट में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा शिक्षकों के वेतन का भुगतान शामिल है। केंद्र सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान को पुनर्जीवित किया है, जिसका उद्देश्य छह से 14 साल के सभी बच्चों को राष्ट्रीय शिक्षा प्रदान करना है, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आरएमएसए) या नेशनल मिडिल एजुकेशन मिशन भी है, जिसने अप्रैल 2018 में माध्यमिक शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण को एक नई योजना, समग्र शिक्षा में जोड़ा है। यह देखते हुए कि माध्यमिक और उच्च शिक्षा दोनों के लिए सार्वजनिक निधि से धन की मांग का मुद्दा हल नहीं हुआ है, और इसलिए सस्ता साधन उपलब्ध नहीं होने की वजह से वे लड़कियां और अन्य लोग भी बाहर रह सकते हैं जो निजी शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते हैं।

 

मध्याह्न भोजन के साथ राष्ट्रीय शिक्षा मिशन का व्यय, 2014-15 से 2019-20 तक


 
बजट के माध्यम से वित्त पोषण के बजाय शिक्षा उपकर के माध्यम से वित्त पोषण
 

हमारे विश्लेषण में,पारंपरिक बजट फंडिंग के बजाय उपकर के माध्यम से शिक्षा का वित्तपोषण स्पष्ट है। उपकर,कर पर एक कर है (कर के प्रतिशत के रूप में गणना) और एकत्र किया जाता है और आमतौर पर एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए होता है, जैसा कि उपकर का नाम इंगित करेगा। इन उपकरों को प्रत्यक्ष करों (निगम कर, आयकर आदि) और अप्रत्यक्ष करों के हिस्से के रूप में एकत्र किया जाता है (माल और सेवा कर या जीएसटी के साथ, केवल एक जीएसटी-मुआवजा उपकर प्रशासित किया जाता है और सेवा कर के पहले के उपकर समाप्त कर दिए गए हैं)।केंद्र सरकार द्वारा पहली बार 2004-05 में एक शिक्षा उपकर लगाया गया था। वर्तमान में, निगम कर, आयकर और सीमा शुल्क पर शिक्षा उपकर एकत्र किए जाते हैं। शिक्षा उपकर और उच्च शिक्षा उपकर को 2018-19 से 4 फीसदी पर स्वास्थ्य और शिक्षा उपकर में बदल दिया गया। केंद्र सरकार ने 2018-19 से कुल इंपोर्ट ड्यूटी पर 10 फीसदी का सामाजिक कल्याण अधिभार भी लगाया है।

 

मध्याह्न भोजन सहित राष्ट्रीय शिक्षा मिशन का संग्रह और व्यय


 

2015-16 से शिक्षा व्यय में गिरावट आ रही है। 2018-19 (संशोधित अनुमान) और 2019-20 (बजट अनुमान) के लिए प्रत्याशित संग्रह से नीचे, यह दर्शाता है कि प्रस्तावित बजट प्रत्याशित उपकर संग्रह से भी कम है।

 

इसका मतलब यह है कि सार्वजनिक शिक्षा को बनाने की दिशा में कोई अन्य राजस्व नहीं है। इसका यह भी अर्थ है कि उपकर के माध्यम से एकत्र राजस्व, जिस पर राज्यों का कोई नियंत्रण नहीं है, शायद कहीं और डायवर्ट होने के लिए तैयार किया जा रहा है।

 

सबसे आकर्षक कर संघ सरकार के लिए ले जाते हैं और शिक्षा समवर्ती सूची में है, जो केंद्र सरकार की नीतियों को तैयार करने और उन्हें देश भर में शिक्षा में सुधार करने के लिए वित्त पोषण के साथ समर्थन करने के लिए एक बड़ी भूमिका पर जोर देती है।

 

जीएसटी की शुरूआत ने राज्य सरकारों की ओर वित्त के प्रवाह को रोका है और केंद्र सरकार पर निर्भरता बढ़ा दी है। इनपुट टैक्स क्रेडिट का मुद्दा और मुआवजा उपकर में देरी राज्य स्तर पर व्यय को प्रभावित करता है।

 
(मधुसूदन राव बी.वी. और ज्योत्सना झा बेंगलुरु के ‘सेंटर फॉर बजट एंड पॉलिसी स्टडीज’ में अनुसंधान सलाहकार और निदेशक हैं।)
 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 05 फरवरी, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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