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सार्वजनिक स्वास्थ्य पर जीडीपी का 2.5 फीसदी खर्च करेगी सरकार ?

राजीव आहूजा,
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नई दिल्ली: सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 फीसदी खर्च करने के 2025 के लक्ष्य की ओर केंद्र सरकार अग्रसर है, जैसा कि राष्ट्रीय आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है।

 

वर्ष 2015-16 से 2024-25 तक रुपयों में, भारत की आर्थिक वृद्धि को 8 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक दर पर ध्यान में रखते हुए, देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च को अगले छह वर्षों के लिए औसतन 19 फीसदी की वृद्धि की जरूरत है, जैसा कि हमारे विश्लेषण से पता चलता है।

 

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के तहत, 2015-16 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च 9.4 फीसदी, 2016-17 में 16.5 फीसदी और मामूली शर्तों के साथ 2017-18 में 36.3 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

अगर भारत 2015-16 में लक्ष्य हासिल कर लेता तो केंद्र को सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय के 42 फीसदी के लिए जिम्मेदार होना चाहिए था ( और केंद्र को खर्च किए गए राशि की तुलना में तीन गुना ज्यादा ज्यादा करना चाहिए था जबकि राज्य को खर्च किए गए राशि की तुलना में दोगुनी राशि खर्च करनी चाहिए थी ), जैसा कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य खर्च डेटा पर हमारे विश्लेषण से पता चलता है।

 

2017-18 में, उस वर्ष के बजट अनुमानों के आधार पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल 2018 के आंकड़ों के मुताबिक भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय में केंद्र की 37 फीसदी की हिस्सेदारी है, जबकि बाकी राज्य के जिम्मे था। यह आंकड़ा 2015-16 में 31 फीसदी से बढ़ गया, नवीनतम वर्ष जिसके लिए वास्तविक व्यय डेटा उपलब्ध था।

 

स्वास्थ्य पर कुल सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय में केंद्र-राज्य हिस्सेदारी (%) का रुझान

 

भारत अपने पिछले सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाया था। ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति- 2002’ ने 2010 तक जीडीपी का 2 फीसदी लक्ष्य निर्धारित किया था। 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने पांच साल की अवधि में सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च को सकल घरेलू उत्पाद का 2-3 फीसदी बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया था और केंद्र की 12 वीं पंचवर्षीय योजना ने मार्च 2017 तक सकल घरेलू उत्पाद का 1.87 फीसदी लक्ष्य निर्धारित किया था।

 

वर्ष 2015 में अपने सकल घरेलू उत्पाद का 1.02 फीसदी पर ( एक आंकड़ा जो 2009 से छह वर्षों में लगभग अपरिवर्तित रहा ) भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय दुनिया में सबसे कम है, यहां तक कि सबसे कम आय वाले देशों की तुलना में भी कम है जो एक समूह के रूप में स्वास्थ्य पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का 1.4 फीसदी खर्च करते हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 21 जून, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। संशोधित और बजट अनुमानों के मुताबिक, यह आंकड़ा निम्नलिखित दो वर्षों में 1.17 फीसदी और 1.28 फीसदी तक पहुंच गया।

 

मालदीव में स्वास्थ्य पर खर्च और जीडीपी का अनुपात 9.4 फीसदी है, श्रीलंका में 1.6 फीसदी, भूटान में 2.5 फीसदी और थाईलैंड में 2.9 फीसदी है।

 

अपर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च का नतीजा यह है कि भारत निम्न मध्यम आय वाले देशों के बीच स्वास्थ्य पर छठा सबसे बड़ा निजी खर्चकर्ता बन गया है।

 

आउट-ऑफ-पॉकेट स्वास्थ्य व्यय ने, 2011-12 में 55 मिलियन भारतीयों ( दक्षिण कोरिया, स्पेन या केन्या की आबादी से अधिक ) को गरीबी की ओर धकेला है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 19 जुलाई, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। यह कम खर्च, जैसा कि हमारे विश्लेषण से पता चलता है, अतीत की विरासत है।

 

हमने 25 जून, 2018 को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री के सचिव से कमेंट के लिए प्रश्नावली भेजी है। प्रतिक्रिया मिलने पर हम रिपोर्ट को अपडेट करेंगे।

 

केंद्र अपने आयुष भारत कार्यक्रम को ( जिसका उद्देश्य 100 मिलियन से अधिक परिवारों को 5 लाख रुपये का बीमा कवर प्रदान करना है ) सितंबर 2018 में शुरु होने के लिए तैयार है, लेकिन इससे पहले यह पता करना महत्वपूर्ण है कि देश वर्ष 2025 के लक्ष्य को कैसे पूरा कर पाएगा।

 

‘नेशनल हेल्थ पॉलिसी-2017’ स्वास्थ्य खर्च बढ़ाने की रणनीति निर्दिष्ट नहीं करती है, केवल यह कहती है कि “सामान्य टैक्सेशन देखभाल वित्तपोषण के लिए प्रमुख साधन बनेगी।”

 

नीति कहती है, “सरकार विशिष्ट वस्तुओं पर कर लगाने पर विचार कर सकती है- जैसे कि तम्बाकू, अल्कोहल और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव वाले खाद्य पदार्थ, निकासी उद्योगों और प्रदूषण सेस पर कर। कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के तहत उपलब्ध निधि स्वास्थ्य लक्ष्यों को संबोधित करने के उद्देश्य से केंद्रित कार्यक्रमों के लिए भी दी जाएगी।”

 

विश्लेषण

 

यह निर्धारित करने के लिए कि केंद्र और राज्यों को देश के वर्तमान स्वास्थ्य खर्च लक्ष्य को पूरा करने की ज़िम्मेदारी कैसे साझा की जानी चाहिए, हमने 2015-16 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद और व्यय डेटा का विश्लेषण किया।

 

 

2015-16 में, भारत का जीडीपी 137.6 लाख करोड़ रुपये (19.9 ट्रिलियन डॉलर) था। उस वर्ष 2.5 फीसदी लक्ष्य को पूरा करने के लिए, भारत को स्वास्थ्य पर 3.44 लाख करोड़ (50 बिलियन डॉलर) खर्च करना चाहिए था।

 

नेशनल हेल्थ पॉलिसी-2017 के मुताबिक राज्यों को स्वास्थ्य पर 8 फीसदी से अधिक बजट खर्च करने की उम्मीद है। 8 फीसदी की निचली सीमा को ध्यान में रखते हुए राज्यों को 1.99 लाख करोड़ रुपये खर्च करना चाहिए था। शेष व्यय (1.44 लाख करोड़ रुपये) केंद्र द्वारा पैदा किया जाना चाहिए था।

 

2015-16 में स्वास्थ्य मंत्रालय और अन्य मंत्रालयों सहित केंद्र का स्वास्थ्य व्यय 43,831 करोड़ रुपये (6.37 बिलियन डॉलर) था, जो आवश्यक खर्च के एक तिहाई से भी कम था। राज्यों ने 9 5,311 करोड़ रुपये (13.85 बिलियन डॉलर) खर्च किए, जो आवश्यक खर्च से आधा से कम था।
 

सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय: एक विश्लेषण

Public-Health Expenditure: A Counterfactual Analysis
Actual Health Expenditure, 2015-16
States’ health expenditure Rs 95,311 crore
Centre’s health expenditure (By health ministry) Rs 35,189 crore
Centre’s health expenditure (Other ministries) Rs 8,642 crore
Union Territories’ health expenditure Rs 912 crore
Total public-health expenditure Rs 1,40,055 crore
Centre’s share in total public-health expenditure 31.30%
States’ share in total public-health expenditure 68.10%
Counterfactual Analysis
Gross domestic product (2015-16) Rs 1,37,640,37 crore
States’ total expenditure* Rs 24,96,536 crore
A. Target health expenditure @ 2.5% of GDP Rs 3,44,101 crore
B. States’ health expenditure @ 8% of states’ total expenditure Rs 1,99,723 crore
Centre’s health expenditure (A-B) Rs 1,44,378 crore
Centre’s share in total public-health expenditure 42%
States’ share in total public-health expenditure 58%

Source: Author’s calculations based on national health data

Note: *Excludes the expenditure of union territories except Delhi

 

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा मई 2017 में प्रकाशित, स्टेट फाइनेंस: ए स्टडी ऑफ बजट्स के अनुसार, केवल तीन राज्यों ( असम, मेघालय और मिजोरम ) ने 2015-16 में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अपने बजट का 6 से अधिक खर्च किया है। बिहार, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के लिए, इसका मतलब उनके बजट में स्वास्थ्य व्यय के हिस्से को लगभग दोगुना करना होगा।

 

वित्त पोषण बढ़ाने के बारे में सरकार ने क्या कहा ?

 

जनवरी 2018 में ‘द हिंदू बिजनेस लाइन’ में एक शीर्ष बीजेपी नेता को यह कहते हुए उद्धृत किया गया था, “ समस्या धन की कमी नहीं है। प्रधान मंत्री मोदी के तहत स्वास्थ्य के लिए धन की कोई कमी नहीं है। मुद्दा यह है कि क्या राज्यों में धन को अवशोषित करने की क्षमता है?”

 

2015-16 और 2016-17 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के लिए आवंटित धन का उपयोग ‘उल्लेखनीय रूप से कम’ था, जब ‘राज्यों को आवंटित धन का लगभग 55 प्रतिशत वास्तव में खर्च हुआ था’, जैसा कि ‘नेशनल इन्स्टिटूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस पालिसी’ द्वारा मई 2018 के अध्ययन से पता चलता है।

 

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने लोकसभा को 9 फरवरी 2018 को बताया, “वित्तीय वर्ष 2015-16 के प्रभाव से 14 वें वित्त आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए, केंद्र-राज्य वित्त पोषण अनुपात 75:25 से बढ़कर 60:40 हो गया है। एनएचएम के तहत राज्यों के साथ हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन के अनुसार, राज्यों को हर साल कम से कम 10 फीसदी तक अपने राज्य स्वास्थ्य बजट में वृद्धि करने का निर्देश दिया जाता है।”

 

स्वास्थ्य खर्च बढ़ाने की योजना के लिए पूछे जाने पर,  पटेल ने कहा, 2 फरवरी, 2018 को, “नीति (राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017) पर विचार किया गया है कि राज्यों को संसाधन आवंटन राज्य विकास संकेतकों, अवशोषक क्षमता और वित्तीय संकेतकों से जोड़ा जाएगा।”

 

पटेल ने नवंबर 2016 में लोकसभा को बताया था, “स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए धनराशि का केंद्रीय आवंटन संसाधनों की उपलब्धता और इन संसाधनों पर प्रतिस्पर्धी दावों पर आधारित है।”

 

(आहूजा विकास अर्थशास्त्री हैं, स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। इससे  पहले उन्होंने बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और विश्व बैंक के साथ काम किया है। दिल्ली में रहते हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 23 जुलाई, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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