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सुधारात्मक शिक्षा से भारत में सीखने का संकट हो सकता है खत्म

श्रेया खेतान,
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उत्तर प्रदेश के ललितपुर में एक  सुधारात्मक शिक्षा कक्षा में अपने दोस्तों के साथ बैठे भागचंद (तस्वीर के उत्तर छोर पर)  रंगीन कागज की पट्टियों पर लिके वाक्यों को पढ़ रहा है। वर्ल्ड विजन इंडिया नामक एनजीओं द्वारा स्कूल के बाद  सुधारात्मक शिक्षा कार्यक्रम शुरु करने के एक साल बाद अब अधिक संख्या में छात्र समाचार पत्र पढ़ सकते हैं। किसी कहानी को पढ़ और समझ सकते हैं, जबकि कार्यक्रम के शुरुआत में कम ही छात्र अक्षर पढ़ सकते थे। )

 
 

ललितपुर, उत्तर प्रदेश: शाम के साढ़े चार बज चुके हैं और आज के दिन के लिए स्कूल समाप्त हो चुका है। फिर भी  लगभग 25 बच्चे कक्षा में समूहों में बैठे हैं, जो भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य के शुष्क, सूखा-प्रवण दक्षिण-पश्चिम कोने में स्थित है। एक समूह में से बच्चे, चार्ट पेपर के टुकड़ों पर लिखे हिंदी अक्षरों से शब्द बना रहे हैं। दूसरे समूह में, बच्चे कागज की रंगीन पट्टियों पर लिखे गए वाक्यों को पढ़ रहे हैं। कक्षा पांच का छात्र भागचंद पढ़ता है, “नल इतना बहा, इतना बहा, कि वे ले ले गया बस, कप और मला।” फिर उसने कविता का अर्थ भी समझाया। यह चंदेरा में एक सरकारी स्कूल है। यह मध्य प्रदेश के सीमा के साथ सटे उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में 200 घरों का एक गांव है, जिसमें ज्यादातर मजदूर और किसान हैं।  

 

ये बच्चे ‘अपराजिता’ (जिसे पराजित नहीं किया जा सकता है), नामक सरकारी स्कूलों के लिए एक  सुधारात्मक शिक्षा कार्यक्रम के हिस्से हैं। इस कार्यक्रम का लक्ष्य पांचवी कक्षा तक पढ़ने वाले बच्चों को उनकी पढ़ाई, लेखन और समझ कौशल में सुधार करने में मदद करना है। ‘अपराजिता’ विश्व विजन इंडिया द्वारा संचालित है, जो एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संस्था है और पूरे भारत में कई राज्यों में काम करता है। ललितपुर के वर्ल्ड विजन शाखा का प्रबंधन करने वाले लिजू वार्की जैकब ने कहा, “स्कूल वर्ष में लगभग 220 दिन होते हैं, जिसका अर्थ है कि प्राथमिक विद्यालय के बच्चों को सीखने के लिए कक्षा पांच के अंत तक कुल 1,000 दिन मिलते हैं। इससे आप समझ सकते हैं कि बच्चे के जीवन के शुरुआती साल कितने महत्वपूर्ण हैं।” जिला सूचना प्रणाली शिक्षा (डीआईएसई) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत प्राथमिक विद्यालय नामांकन में इस हद तक बढ़ने में सफल रहा है कि प्राथमिक विद्यालय की आयु के बच्चों में से 2016-17 में 83 फीसदी से अधिक नामांकन हुआ था, लेकिन पांचवी कक्षा ग्रामीण के आधे से कम बच्चे ( 47.5 फीसदी ) 2016 में कक्षा दो के पाठ पढ़ सकते थे, जैसा कि ‘एनुअल सर्वे ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट 2016’ से पता चलता है। यह सीखने का संकट भारत की युवा विद्यालय आबादी के लिए अच्छा नहीं है – भारत की पूरी आबादी का यह 22 फीसदी है और ये सभी भविष्य के नागरिक हैं।

 

ललितपुर में 130 गांवों में 4,300 छात्रों तक पहुंचने वाले अपराजिता जैसे कार्यक्रम, छात्रों को उनके सीखने के परिणामों में सुधार करने में मदद करने का एक तरीका हो सकता है।

 

हमारी रिपोर्टिंग में पाया गया है कि वित्तीय वर्ष 2017 में नामांकित 3,683 छात्रों ने पढ़ने के पैमाने पर प्रगति की है। विश्व विजन डेटा भी यही कहता है और इस तरह कार्यक्रम को समुदाय में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।

 

शून्य बेसलाइन से, एक वर्ष के भीतर नामांकित छात्रों में से 1.55 फीसदी स्थानीय सामग्री (जैसे समाचार पत्र) पढ़ सकते हैं और इसे समझ सकते हैं। 6.2 फीसदी (1.8 फीसदी से ऊपर) एक कहानी पढ़ सकते हैं और इसे समझ सकते हैं और 10.4 फीसदी एक कहानी पढ़ सकते हैं (5.1 फीसदी से ऊपर)।

 

इसके अलावा, 13.8 फीसदी छात्र एक पैराग्राफ पढ़ सकते हैं (7 फीसदी से ऊपर); 29.5 फीसदी शब्द पढ़ सकते हैं (16.9 फीसदी से ऊपर); और कुछ केवल अक्षरों को पढ़ सकते हैं (43.9 फीसदी बनाम 32.9 फीसदी) या कुछ भी नहीं पढ़ा (5.6 फीसदी बनाम 25.1 फीसदी)।

 

अपराजिता  सुधारात्मक शिक्षा कार्यक्रम के निष्कर्ष, 2017


 

कार्यक्रम के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए, वर्ल्ड विजन ने उन छात्रों के समूह का भी अध्ययन किया जो  सुधारात्मक वर्ग में नहीं आए, लेकिन उनमें नामांकित लोगों के समान सामाजिक-आर्थिक विशेषताएं थीं। उन्होंने पाया कि कार्यक्रम में नामांकित अधिक छात्र नियंत्रण समूह की तुलना में छह स्तरों के माध्यम से प्रगति कर रहे हैं, लेकिन अपने निष्कर्षों को साबित करने के लिए पूरी तरह से सांख्यिकीय विश्लेषण करना बाकी है। फिर भी, हमारी रिपोर्टिंग में, हमने पाया कि शिक्षकों ने कार्यक्रम की सराहना की है और बच्चों की क्षमताओं में सुधार हुआ है। समुदाय से व्यापक समर्थन मिला है और बच्चों ने स्पष्ट रूप से कक्षाओं का आनंद लिया है।

 
 सुधारात्मक शिक्षा क्यों ?
 

 भारत ने लगभग सार्वभौमिक प्राथमिक विद्यालय नामांकन हासिल किया है। यह उपलब्घि ज्यादातर माता-पिता को प्रेरित करके और क्षेत्रों के दूरस्थ इलाकों में प्राथमिक विद्यालयों की संख्या में वृद्धि करके पाई गई है। इसमें लोगों के बीच बढ़ती इस धारणा ने भी काम किया कि शिक्षा जीवन की गुणवत्ता  में सुधार करती है।

 

ग्रामीण भारत में सीखने के बद्तर परिणाम


 

यह ललितपुर में विश्व विजन के हस्तक्षेपों का महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें बड़े बच्चों के लिए छात्रवृत्तियां शामिल हैं। स्कूल प्रबंधन समितियों के लिए समर्थन जिसमें माता-पिता शामिल हैं; शिक्षकों के लिए सहायता; और माता-पिता के लिए कार्यक्रमों तक पहुंच है।

 
 

सुधारात्मक वर्गों के साथ अनुभव से कई तरह की सलाह भी सामने आई है- प्री-एजुकेशन (बच्चे के पहली कक्षा शुरु होने से पहले, उदाहरण के लिए किंडरगार्टन में), मल्टीग्रेड एजुकेशन (जब विभिन्न उम्र के छात्रों और ग्रेड स्तर एक ही कक्षा में पढ़ते हैं), और शिक्षकों के लिए समर्थन और प्रशिक्षण। जैकब कहते हैं, ” हालांकि हम 1997 से यहां काम कर रहे हैं, हम 100 फीसदी सफल नहीं हुए हैं।” एक ऊपरी प्राथमिक सरकारी स्कूल के 36 वर्षीय शिक्षक आशीष मिश्रा कहते हैं, ” बच्चे के सीखने में सुधार के लिए समुदाय और  शिक्षक को मिलकर काम करना जरूरी है।”

 
सरकारी स्कूल के छात्र अधिक कमजोर

 

10 वर्षीय भागचंद ने पहली बार अक्टूबर 2016 में इस तरह की कक्षाओं में भाग लिया, जब वह कक्षा 3 में पढ़ता था। वह उस समय शब्दों को पढ़ सकता था, और उसे वर्ल्ड विजन स्केल पर लेवल 2 छात्र के रूप में वर्गीकृत किया गया था। इसका अर्थ था कि वह शब्दों को पढ़ सकता था। मार्च 2018 तक, उन्होंने शब्दों को वाक्यों में पढ़ने से प्रगति की थी। वह बताता है, “मुझे यहां आना पसंद है। यह बहुत मजेदार है और अन्य बच्चे भी मेरी मदद करते हैं। ”  सुधारात्मक वर्गों में स्वयंसेवक मजेदार तरीकों का उपयोग करके सिखाते हैं, जो आमतौर पर सरकारी स्कूल में नहीं होता है। सप्ताह में एक बार वे ‘जीवन कौशल वर्ग’ का आयोजन करते हैं, जिसमें स्वयंसेवक कड़ी मेहनत, टीमवर्क और क्रोध नियंत्रण की आवश्यकता जैसे सॉफ्ट कौशल को पढ़ाने के लिए कहानियों और गेम का उपयोग करते हैं। इस तरह की एक कक्षा में शिक्षक द्वारका प्रसाद निरंजन छात्रों को टीमवर्क पढ़ा रहे थे – इसमें साइन लैंग्वेज का उपयोग करके तीन छात्र को एक साथ काम करना था।

 

उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में एक सरकारी स्कूल के छात्र संख्या सीखने के लिए एक गतिविधि-आधारित सत्र के दौरान

 

निरंजन कहते हैं, “हम जानते हैं कि बच्चे इन खेलों को घर और गांव में भी नकल करते हैं। खेल के माध्यम से शिक्षण की शक्ति रटने या पारंपरिक शिक्षण के माध्यम की तुलना से कहीं अधिक है।” भागचंद को इस तरह के अतिरिक्त मार्गदर्शन की जरूरत है। उनके माता-पिता दैनिक मजदूर हैं। वे कभी स्कूल नहीं गए और घर पर अपनी पढ़ाई में उनकी मदद नहीं कर सके। भागचंद के पिता ने कहा, “हम कुछ भी नहीं जानते?” उनको यह भी नहीं पता कि उनका बेटा किस वर्ग में था। घर पर मिलने वाली एकमात्र छोटी मदद उनकी बड़ी बहन सुषमा से थी, जो नौवीं कक्षा में पढ़ाई करती थीं। भागचंद के पिता सिर्फ इतना कहते हैं, “यदि वह पढ़ता है, तो उसकी किस्मत उज्ज्वल होगी।”

 

भागचंद के माता-पिता उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में  दैनिक मजदूर हैं। वे कहते हैं, “हम कुछ भी नहीं जानते हैं,” क्योंकि हम अशिक्षित हैं।”  वे इतना जरूर कहते हैं कि  सुधारात्मक शिक्षा कार्यक्रम भगचंद के लिए बहुत उपयोगी था।

 

आम तौर पर, निजी स्कूलों में नामांकित बच्चे अमीर, छोटे परिवारों से हैं, जहां माता-पिता अधिक ध्यान देते हैं। वे प्रायः पूरक शिक्षा के लिए भुगतान करते हैं । वहां घर के बेहतर वातावरण होते हैं, जैसा कि एक गैर लाभकारी संस्था ‘प्रथम’, से जुड़ी एक शोधकर्ता, विलिमा वाधवा के एक अध्ययन की रिपोर्ट है। सरकारी स्कूलों में जो बच्चे होते हैं, उन्हें अक्सर घर के बाहर शिक्षा की आवश्यकता होती है। सरकारी शिक्षा डेटाबेस डीआईएसई के मुताबिक, कुल मिलाकर, सरकारी स्कूल का नामांकन गिर रहा है। 2007-08 में, पूरे भारत में 27.6 फीसदी बच्चों ने निजी स्कूलों में भाग लिया है; 2016-17 में, यह आंकड़े 38.5 फीसदी था।

 

माता-पिता ने निजी स्कूलों में बच्चों को भेजने के फैसले के कई कारणों का उल्लेख किया, जिसमें कई धारणाएं भी शामिल हैं कि बच्चे सरकारी स्कूलों में कम सीखते हैं और निजी स्कूलों में अंग्रेजी भाषा की शिक्षा बेहतर होती है, जैसा कि इंडियास्पेन्ड ने फरवरी 2017 की रिपोर्ट में बताया था।

 

सरकारी स्कूलों के नमांकन में गिरावट


 

ललितपुर के सरकारी स्कूल में पिछले तीन वर्षों से पढ़ा रही 43 वर्षीय विभा कुमारी कहती हैं, “यह सरकारी स्कूलों में है कि अच्छे शिक्षकों की सबसे बड़ी आवश्यकता है। माता-पिता ब्च्चों का होमवर्क नहीं करा सकते हैं या जांच कर सकते हैं कि बच्चे ने स्कूल में क्या किया है। ” उन्होंने बताया कि उनके छात्रों के पास अक्सर अपना होमवर्क नहीं कर पाने के लिए कई तरह के कारण होते हैं, जैसे माता-पिता के लिए महुआ फल उठाने में मदद करना, छोटे से भाई की देखभाल करना, माता-पिता को उपज के लिए खराब कीमत मिलना और कॉपी वैगरह न खरीद पाना। सबसे कमजोर छात्रों की मदद के लिए शिक्षकों को अपने दैनिक ड्यूटी से अलग जाना होगा। एक अन्य सरकारी स्कूल में शिक्षक,  34 वर्षीय ललकुनवार ने कहा, अगर किसी बच्चे के कपड़े फट गए हैं और उनके माता-पिता के पास समय नहीं है तो हम उनके कपड़े भी सिलाई करते हैं।”

 

वर्ल्ड विजन जैसे कार्यक्रम ऐसे छात्रों के लिए सबसे प्रासंगिक हैं, जो सरकारी प्राथमिक विद्यालय के छात्रों पर ध्यान केंद्रित करने और सरकारी स्कूली शिक्षार्थियों को समर्थन प्रदान करते हुए  सुधारात्मक शिक्षा प्रदान करते हैं।

 
प्रशिक्षक और पूर्व स्कूल शिक्षा
 

  सुधारात्मक वर्ग के सफल होने को पीछे एक और वजह है कि शिक्षक एक ही कक्षा में विभिन्न ग्रेड स्तर के छात्रों को पढ़ाने के लिए सुसज्जित है, जैसा कि सरकारी स्कूली शिक्षकों को अक्सर ऐसा करने के लिए कहा जाता है। लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर के मुताबिक मार्च 2016 तक सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में सभी शिक्षण पदों में से 17.5 फीसदी खाली थे।

 

सरकारी शिक्षक और शिक्षकों को प्रशिक्षित करने वाले हर्ष चंद और आशीष मिश्रा ने बताया कि ललितपुर में शिक्षकों की कमी है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को एक वर्ग में कई ग्रेड, अलग-अलग आयु समूहों और विभिन्न शैक्षणिक स्तरों को पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। चांदेरा गांव के एक स्कूली शिक्षक घनश्याम दास ने कहा कि शिक्षकों के बीच उत्पन्न होने वाली समस्याओं को हल करने में सक्षम होने के लिए साल भर अधिक समर्थन की आवश्यकता है।

 

 एक और अंतर जो  सुधारात्मक शिक्षा कक्षाएं भर रही हैं वो बच्चों को उनके स्तर पर पढ़ाना है न कि उनके कक्षा के स्तर पर। क्योंकि आम तौर पर बच्चे उम्मीद से कम सीखने के स्तर पर स्कूल शुरू करते हैं। वर्ल्ड विजन के जैकब कहते हैं, “पूर्व शिक्षा सचमुच शून्य है। कक्षा एक बच्चे का लॉन्चिंग पैड है लेकिन सरकारी कोर्स ऐसा बनाया जाता है कि वे सोच लेते हैं कि बच्चे ने किंटरगार्टेन में भाग लिया है।  पहले अध्याय में ही कविता के साथ कैसे शुरु किया जा सकता है?  चंदेरा सरकारी स्कूल के एक शिक्षक घनश्याम दास कहते हैं, “सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे किंडरगार्टन या आंगनवाड़ी (डे केयर सेंटर) में भाग लें या स्कूल के पाठ्यक्रम को यह ध्यान में रखकर फिर से डिजाइन किया जाए कि कुछ बच्चे पहली बार कक्षा 1 में ही स्कूल में जाते हैं।”

 

रोल मॉडल बनाना
 

 ललितपुर में ज्यादातर ग्रामीण इलाका है, और ऐतिहासिक रूप से कम साक्षरता दर है, खासकर महिलाओं बीच। यहां बच्चों और माता-पिता को प्रेरित करने के मॉडल सफलता की कहानियों की जरूरत है। जैकब कहते हैं,  “किसी ने मजाक कर कहा कि युवा महिलाओं के लिए दो स्थानीय भूमिका मॉडल हैं- झांसी की रानी, ​​रानी जिन्होंने 1858 में ब्रिटिश अधिग्रहण के खिलाफ लड़ाई लड़ी और गैंगस्टर फूलन देवी।” ये बातों भले ही मजाक में कही गई हो, लेकिन जैकब सफलता की कहानियों को ऐसे समाज के लिए एक जरूरत बताते हैं। शिक्षा और काम के लिए अपने गांव बड़ौदा बिजलोन से बाहर निकलने वाली पहली महिलाओं में से एक, 23 वर्षीय सपना ने 10 जुलाई, 2018 को झांसी के सरकारी अस्पताल में एक नर्स के रूप में काम करना शुरू किया। वह 21 लोगों के एक समूह का हिस्सा थीं जिनका वर्ल्ड विजन ने नर्स प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के माध्यम से समर्थन किया था। उसके माता-पिता किसान हैं। उन्होंने कहा कि पांचवी कक्षा के बाद उनके पिता स्कूल से बाहर हो गए थे और उनकी मां अशिक्षित है।

 

शिक्षा और काम के लिए अपने गांव बड़ौदा बिजलोन से बाहर निकलने वाली पहली महिलाओं में से एक, 23 वर्षीय सपना 10 जुलाई, 2018 से झांसी के सरकारी अस्पताल में एक नर्स है।

 

हाल ही में सपना की शादी हुई है। सपना ने कहा कि उन्हें यकीन था कि वह काम करना जारी रखेगी। उन्होंने कहा, “हम इस बात पर सहमत हुए हैं कि मैं विवाह के बाद काम करूंगी।”  हमसे जब वह बात कर रही थीं तो उन्होंने नीली जींस भूरे रंग के टी-शर्ट और हल्के नीले रंग के स्कार्फ पहना था और  उनके माथे पर लाल बिंदी थी और बालों में सिंदूर लगा था। उन्होंने कहा, “मैंने नर्स बनने के लिए कड़ी मेहनत की है, मैं काम क्यों न करुं?”

 

सपना ने इसे ग्रामीण ललितपुर में सभी बाधाओं के खिलाफ रास्ता बनाया, जहां छह साल से ऊपर की आधी महिला आबादी (59.2 फीसदी) ने स्कूल में भाग लिया है, और 20-24 साल की 61.1 फीसदी महिलाओं की शादी 18 वर्ष से पहले हुई थी, जैसा कि चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) से पता चला है।

 

जैकब ने कहा कि ये सफलताएं छात्रों के लिए अध्ययन जारी रखने और माता-पिता के लिए स्कूल में बच्चों को नामांकित करने के लिए एक प्रेरणा है।

 
निकास रणनीति
 

 एनजीओ के हस्तक्षेप की सफलता कुछ हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि एनजीओ समुदाय से बाहर निकलने के बाद कार्यक्रम और इसके परिणाम कितने समय तक रहते हैं। वर्ल्ड विजन 2020 तक ललितपुर में अपने काम करेगा और फिर काम को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी स्थानीय समुदाय और स्कूलों की होगी। कार्यक्रम की कम लागत है ( 10 महीने के कार्यक्रम के लिए प्रति वर्ष 1,064.9 4 रुपये, शहरी रेस्तरां में दो लोगों के लिए भोजन के बराबर ) और तथ्य यह है कि सभी शिक्षकों को स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित किया गया, जिससे परिचालन आसान हुआ । जैकब कहते हैं, “हम एक ट्रांजिशन प्लान पर काम कर रहे हैं।” वर्तमान में, एनजीओ 2019 में कार्यक्रम चलाने के लिए आवश्यक 50 फीसदी धनराशि प्रदान करने के लिए समुदाय को मनाने की कोशिश कर रहा है, जिसका मानना ​​है कि 2020 से पहले कार्यक्रम के लिए सामुदायिक स्वामित्व का निर्माण होगा। सरकार के स्कूल फंड ( लगभग 10,000 रुपये प्रति स्कूल वर्ष ) का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। एनजीओ भी कार्यक्रम के लिए सरकारी शिक्षकों को प्रशिक्षण दे रहा है।

 

( खेतान लेखक और संपादक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 6 नवंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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