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स्वच्छ हवा से 1.7 साल तक बढ़ सकती है भारतीयों की जीवन प्रत्याशा

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New Delhi: People wear masks to protect themselves from pollution as smog engulfs New Delhi, on Nov 5, 2018. (Photo: IANS)
 

नई दिल्ली: यदि भारतीयों के पास सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा हो, तो उनके औसत जीवन प्रत्याशा में 1.7 साल की वृद्धि हो सकती है। यानी जीवन प्रत्याशा मौजूदा 69 वर्षों से बढ़ कर 70.7 होगी। यह जानकारी एक नए अध्ययन में सामने आई है।

 

हर आठ मौत में से एक मौत वायु प्रदूषण के कारण होती है और 2017 में भारत में कुल 1.24 मिलियन मौतें वायु प्रदूषण से हुई है। आधे से ज्यादा पीड़ित 70 साल से कम उम्र के थे, जैसा कि 6 दिसंबर, 2018 को द लांसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित ‘इंडिया स्टेट लेवल डिसीज वर्डन इनिशटिव’द्वारा वायु प्रदूषण मृत्यु दर और रोगी की संख्या अनुमान से पता चलता है।  सांस के माध्यम से भीतर जाने वाले हवा के कणों, जिसे आमतौर पर पीएम 2.5 के रूप में जाना जाता है, का भारत का औसत वार्षिक स्तर 90 μg / m3 था – दुनिया में चौथा सबसे ज्यादा  और भारत में राष्ट्रीय परिवेश वायु गुणवत्ता मानकों द्वारा अनुशंसित 40 μg / m³ की सीमा से दोगुना से भी अधिक और विश्व स्वास्थ्य संगठन की 10 μg/m3 की वार्षिक सीमा से नौ गुना ज्यादा।   वायु प्रदूषण के कारण भारत में समयपूर्व मौत की संख्या काफी ज्यादा है। – वैश्विक आबादी का 18 फीसदी यहां है और वायु प्रदूषण के कारण 26 फीसदी समयपूर्व मौत होते हैं और बीमारी के बोझ अलग ही।भारत की लगभग 77 फीसदी आबादी के परिवेश को वायु प्रदूषण के स्तर के राष्ट्रीय सुरक्षित सीमा से ऊपर के संपर्क में पाया गया था। सबसे बद्तर प्रभावित उत्तरी राज्यों में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और समृद्ध राज्यों में दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड शामिल हैं।चेन्नई के ‘श्री रामचंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च’ की प्रोफेसर और अध्ययन की मुख्य लेखक, कल्पना बालकृष्णन ने इंडियास्पेंड को बताया, “वायु प्रदूषण के कारण बीमार स्वास्थ्य के अनुमानों के संबंध में भारत में संदेह था, लेकिन यह अध्ययन साबित करता है कि वायु प्रदूषण ( परिवेश और घरेलू प्रदूषण दोनों सहित ) भारत में मृत्यु और विकलांगता के लिए सबसे बड़ा जोखिम कारक है।  तंबाकू के उपयोग से अधिक, नमक के सेवन, उच्च रक्तचाप और कई अन्य जोखिम कारक से प्रदूषण अधिक खतरनाक है।”

 

‘इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ (आईसीएमआर) के महानिदेशक बलराम भार्गव कहते हैं, “यह अध्ययन निश्चित रूप से साबित करता है कि वायु प्रदूषण से 1.7 साल की जीवन प्रत्याशा में कमी आई है, न कि चार साल, जैसा कि पहले माना जाता था।”

 

यह अध्ययन भारत के प्रत्येक राज्य में वायु प्रदूषण के प्रभाव का पहला व्यापक अनुमान था और आईसीएमआर, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई) और स्वास्थ्य मेट्रिक्स और मूल्यांकन संस्थान (आईएचएमई) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था। यह पहल स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और भारत भर में 40 से अधिक विशेषज्ञों के सहयोग से काम करती है।

 

गरीब और कम विकसित राज्यों में समय से पहले मौत
 

 जैसा कि पहले बताया गया था, 77 फीसदी देश पीएम 2.5 के राष्ट्रीय सीमा से उच्च वार्षिक औसत स्तर के संपर्क में है और विभिन्न राज्यों में प्रदूषण के स्तर के बीच महत्वपूर्ण भिन्नता है।सबसे कम सामना करने वाले राज्य की तुलना में  उच्चतम परिवेश वायु प्रदूषण वाला राज्य 12 गुना बद्तर था। घरेलू प्रदूषण के मामले में यह अंतर 43 गुना था।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि पीएम 2.5 का न्यूनतम एक्सपोजर लेवल 2.5 और 5.9 μg/m3 के बीच है। कम सामाजिक विकास सूचकांक (एसडीआई के साथ -प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा स्तर और कुल प्रजनन दर पर तय ) उत्तरी राज्य जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और झारखंड में परिवेश और घरेलू प्रदूषण दोनों का उच्चतम स्तर था। वायु प्रदूषण कम होने पर इन राज्यों को सबसे ज्यादा फायदा होगा। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय सीमा से कम प्रदूषण होने पर राजस्थान और उत्तर प्रदेश के निवासियों के जीवन में दो वर्ष जुड़ सकेंगे।

 

बुरी तरह प्रभावित मध्यम और उच्च एसडीआई राज्य, जैसे दिल्ली, पंजाब और हरियाणा अपने निवासियों के परिवेश से वायु प्रदूषण में कमी से क्रमशः 1.6, 1.8 और 2.1 साल जीवन प्रत्याशा जोड़ सकते हैं।

 

सुरक्षित सीमा में वायु प्रदूषण को लाने से जीवन प्रत्याशा में वृद्धि

Source: The Lancet Planetary Health

 
ठोस ईंधन उच्च मृत्यु दर और अक्षमता का कारण
 

हालांकि आधे से ज्यादा देश (55.5 फीसदी) अभी भी जलाने के लिए ठोस ईंधन ( गोबर, कोयले, लकड़ी और कृषि अवशेषों ) का उपयोग कर रहा है।  बिहार, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, असम, मध्य प्रदेश और राजस्थान के निम्न-एसडीआई राज्यों में यह 72.1 फीसदी से अधिक था। इन राज्यों को घरेलू प्रदूषण के कारण संयुक्त रुप से आधे मौतों का सामना करना पड़ा।

 

Source: The Lancet Planetary Health

 

सभी राज्यों में घरेलू प्रदूषण के कारण मौतें थीं। उदाहरण के लिए, परिवेश और घरेलू प्रदूषण के कारण केरल में लगभग समान संख्या में मौतें हुई हैं। बालकृष्णन कहते हैं, “यह एक मिथक है कि ज्यादातर राज्य ठोस ईंधन से स्वच्छ ईंधन में स्थानांतरित हो गए हैं।”

 

बालकृष्णन ने कहा, पिछले पांच वर्षों में घरेलू प्रदूषण में 30 फीसदी की कमी आई है (2012-2017), लेकिन यह कहना बहुत जल्दी है कि क्या यह प्रधान मंत्री उज्ज्वल योजना (पीएमयूवाई) के कारण है, जिसका लक्ष्य कम आय वाले परिवारों को एलपीजी सिलेंडर वितरित करना है।

 

हालांकि घरेलू प्रदूषण में सबसे ज्यादा कमी होने की संभावना है, लेकिन सबूत अब से दो साल उपलब्ध होंगे। उन्होंने कहा, “हालांकि स्वच्छ ईंधन की पहुंच और उपलब्धता की समस्या हल हो गई है, अब इसे सस्ता बनाने की जरूरत है।”

 

 2017 में, 482,000 मौतें, और 21.3 मिलियन अक्षमता समायोजित जीवन वर्ष ( डीएएलवाईएस- बीमारियों, विकलांगता के कारण खोए वर्ष या प्रारंभिक मौत ) का कारण घरेलू वायु प्रदूषण रहा है।

 

परिवेश वायु प्रदूषण ने महिलाओं की तुलना में 38.3 फीसदी अधिक पुरुषों को प्रभावित किया, जबकि घरेलू प्रदूषण के कारण पुरुषों की तुलना में 17.6 फीसदी अधिक महिलाओं की मृत्यु हुई है।

 

धूम्रपान की तुलना में प्रदूषित हवा के कारण श्वसन संबंधी अधिक समस्याएं
 

वायु प्रदूषण आमतौर पर फेफड़ों की बीमारी से जुड़ा होता है, लेकिन 2017 में भारत में हृदय रोग और मधुमेह के बोझ में इसका 38 फीसदी योगदान पाया गया।

 

 वर्ष 2015 में, गैर-संक्रमणीय बीमारियों (एनसीडी) के कारण भारत में 10.3 मिलियन मौतों में से 2.5 मिलियन मौतें प्रदूषण से जुड़ी हुई हैं। इसी संख्या ने भारत को सबसे ज्यादा प्रदूषण से संबंधित मौतों वाला देश बना दिया, दूसरे स्थान पर चीन है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 3 जनवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।  2016 में, कुल मौतों में से 13 फीसदी ‘क्रोनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज’ (सीओपीडी) के कारण हुई है और 7.5 मिलियन में बीमारी का जोखिम था, जैसा कि इंडियास्पेन्ड ने जनवरी 2018 की रिपोर्ट में बताया है। आईसीएमआर के भार्गव कहते हैं, “चूंकि पीएम 2.5 शरीर के सभी अंगों को प्रभावित करता है, सरकार इससे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को गंभीरता से ले रही है और आयुषमान भारत के हिस्से के रूप में गैर-संक्रमणीय बीमारियों के लिए अपने स्क्रीनिंग कार्यक्रम में सीओपीडी शामिल कर रही है।वायु प्रदूषण के कारण श्वसन संबंधी संक्रमण की बीमारी का बोझ कम, जबकि तंबाकू के उपयोग से ज्यादा थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि सीओपीडी, इस्कैमिक हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह, फेफड़ों के कैंसर और मोतियाबिंद सहित गैर-संक्रमणीय बीमारियों के लिए, वायु प्रदूषण के कारण बीमारी का बोझ तंबाकू के इस्तेमाल से उपजे रोग के बराबर था।

 
राज्य के अनुसार रणनीतियों का सुझाव
 

रिपोर्ट में कहा गया है, “परिवेश प्रदूषण के नियंत्रण के लिए कई क्षेत्रों में कार्रवाई की जरूरत है।”

 

रिपोर्ट ने राज्य के अनुसार नीतियों का सुझाव दिया है- दिल्ली में, वाहनों द्वारा संपीड़ित प्राकृतिक गैस का उपयोग; पंजाब में, कृषि अपशिष्ट को खाद में बदलने के लिए वैकल्पिक तकनीकों के लिए सब्सिडी, जिससे अपशिष्टों को जलाना न पड़े; और महाराष्ट्र में, कोयले या लिग्नाइट थर्मल प्लांट के 100 किमी भीतर निर्माण उद्योग में फ्लाई ऐश का अनिवार्य उपयोग। लेकिन इन उपायों को कणों के उत्सर्जन के मुद्दों के साथ अन्य राज्यों में भी विस्तारित किया जा सकता है।

 

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2018 की शुरुआत में लॉन्च किया गया, द क्लिन एयर फॉर दिल्ली अभियान, जिसने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की शुरुआत की, उसे रिपोर्ट में विशेष उल्लेख मिला है। कार्यक्रम का उद्देश्य वायु प्रदूषण से संबंधित मुद्दों पर जनता को संवेदनशील बनाना और देश भर में कार्यान्वयन एजेंसियों के बीच समन्वय को बढ़ाना है। यह रिपोर्ट भारत के राष्ट्रीय निर्धारित लक्ष्य जैसे प्रयासों के प्रभाव के बारे में भी आशावादी थी – देश राष्ट्रीय उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को अनुकूलित करने के लिए आगे आ रहा है। भारत का लक्ष्य 2030 तक पार्टीकुलेट मैटर को 33-35 फीसदी कम करना है। अध्ययन में कहा गया है कि, बिजली संचालित सार्वजनिक परिवहन का प्रचार और उत्सर्जन के अनुकूल मानकों वाले वाहनों का उन्नयन करने से प्रदूषण के स्तर को कम करने में भी मदद मिलेगी।

 
( यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 07 दिसंबर,2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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