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“स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को समझना आसान नहीं है…”

दिशा शेट्टी,
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न्यूयॉर्क: एक पोलिश शहर, कटोविस में ( जिसकी अर्थव्यवस्था हमेशा कोयले के उत्पादन पर टिकी हुई है )  दुनिया के नेताओं ने पिछले महीने बैठकर 2015 के पेरिस समझौते के साथ आगे बढ़ने की रूपरेखा पर काम किया, जिसका उद्देश्य, ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस तक नीचे रखना है।

 

 वे नेता, जो 24वें कॉंफ्रेंस ऑफ पार्टीज (सीओपी, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय ) का हिस्सा हैं, उनका लक्ष्य हमारे ग्रह के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए उपाय निकालना है। जलवायु परिवर्तन से भारत में कम से कम 60 करोड़ लोगों के प्रभावित होने की आशंका है, जिनमें से ज्यादातर कृषि से जुड़े या मछली पकड़ने वाले लोग शामिल हैं। वैश्विक तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से हिमालय की बर्फ की चादरें पहले से ही तेज गति से पिघलने लगी हैं, जिससे नदियों पर पानी की आपूर्ति प्रभावित होती है। समुद्र के बढ़ते स्तर ने पहले से ही देश में समुद्र तट के पास रहने वाले लोगों के जीवन को बदल दिया है और उनकी आजीविका को प्रभावित किया है । इससे संघर्ष की आशंका बढ़ी है। लेकिन, आजीविका पर सीधे-सीधे देखे जाने वाले प्रभावों के अलावा, जलवायु परिवर्तन से फसलों में संक्रामक रोगों और पोषण स्तर के प्रभावित होने की संभावना है। अक्टूबर 2018 में जारी संयुक्त राष्ट्र की आईपीसीसी रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि से गर्मी से संबंधित प्रतिकूल परिस्थितियों और मौतों में वृद्धि होगी। इसमें वेक्टर-जनित रोगों जैसे मलेरिया और डेंगू बुखार में वृद्धि की चेतावनी दी गई।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, जलवायु परिवर्तन का पहले से ही स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव है और यह हर आदमी के “स्वास्थ्य के अधिकार” को कमजोर करता है, विशेष रूप से सबसे गरीब और सबसे कमजोर समुदायों के बीच, स्वास्थ्य असमानताओं को व्यापक बनाता है। स्वास्थ्य के लिए प्रत्यक्ष क्षति लागत 2030 तक 200-400 करोड़ डॉलर के बीच होने का अनुमान है, जो भूटान के संपूर्ण सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से अधिक है।अकेले वायु प्रदूषण के कारण दुनिया भर में हर साल 70 लाख लोगों की मौत होती है। इंडियास्पेंड ने न्यूयॉर्क के ‘मेलमैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ के जेफरी शमन के साथ बात की, जहां वह जलवायु और स्वास्थ्य कार्यक्रम के निदेशक हैं। जेफरी के साथ  हमने जलवायु परिवर्तन हमारे स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है और जलवायु परिवर्तन के लिए किसी विशेष सार्वजनिक स्वास्थ्य घटना को जोड़ना इतना कठिन क्यों है, इस बात पर चर्चा की । जलवायु, वायुमंडलीय विज्ञान और जल विज्ञान, साथ ही जीव विज्ञान में एक पृष्ठभूमि के साथ, शमन अध्ययन करते हैं कि वायुमंडलीय परिस्थितियां रोगजनकों के अस्तित्व, संचरण और मौसम की स्थिति को कैसे प्रभावित करती हैं।

 

वह इस बात में भी दिलचस्पी रखते हैं कि मौसम विज्ञान मानव स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है। शमन वर्तमान में गणितीय और सांख्यिकीय मॉडल का उपयोग करते हुए समय के पैमाने पर संक्रामक रोग के प्रकोप का पूर्वानुमान लगाने के लिए सिस्टम विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

 

साक्षात्कार के संपादित अंश:

 

इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम घेबियस के अनुसार जलवायु परिवर्तन का मानव जीवन और स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। हम किस तरह के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रभावों की बात कर रहे हैं?

 

यह विविध होने जा रहा है और इसमें से कुछ अति सूक्ष्म होंगे। मुझे लगता है कि आपको अन्य प्रणालियों पर जलवायु परिवर्तन के बढ़ते तनाव के बारे में सोचने की जरूरत है, जिनमें से कुछ स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। आप इसे तीन घटकों में बांट सकते हैं – प्रत्यक्ष प्रभाव, अप्रत्यक्ष और अधिक जटिल डाउनस्ट्रीम प्रभाव।

 

कुछ उदाहरणों में, यह गर्म लहर की तरह होने जा रहा है, जो अधिक विशिष्ट, अधिक संख्या में और अधिक तीव्र होने जा रहा है। निकट भविष्य में, दिन में ऐसे समय होने की भी संभावना है, जहां दुनिया के कुछ हिस्से में बाहर का मौसम रहने लायक नहीं होगा।   निश्चित रूप से अन्य प्रभाव हो सकते है, कि  यह अधिक अप्रत्यक्ष हो सकते हैं, जैसे कि पारिस्थितिक प्रणालियों, प्राकृतिक प्रणालियों और अन्य जैविक एजेंटों के माध्यम से संक्रामक रोग जैसी चीजें, जिनके बारे में लोग अक्सर बात करते हैं और एलर्जी तथा पराग के मौसम में परिवर्तन आदि।

 

यह अधिक जटिल प्रभाव डालने वाला है, जो जीवाश्म ईंधन के दहन, वायु प्रदूषण में बदलाव और फसलों को उगाने की क्षमता में बदलाव, खाद्य सुरक्षा और जल सुरक्षा को बनाए रखने से संबंधित हो सकता है।

 

 यदि आप परिणामों के बारे में सोच रहे हैं, तो वे समस्याओं का एक पूरा चक्र​​चलाते हैं – संक्रामक रोगों से गैर-संचारी रोगों तक, हृदय संबंधी समस्याओं, फुफ्फुसीय मामलों, न्यूरो से जुड़ी समस्याएं, विकासात्मक मुद्दों, सीधे तापमान से जुड़े मुद्दों, गर्मी से संबंधित रुग्णता और मृत्यु दर, पराग के स्तर में बदलाव और चीजों के परिवर्तन से जुड़ीं- फेफड़ों की पुरानी स्थितियों का मुकाबला करने के लिए, सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज), अस्थमा आदि।

 

इससे जुड़े मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे सामने आने वाले हैं और जो कुछ हो भी रहा है । जबरन प्रवासन के कारण जीवन में हो रहे बदलाव से लोग प्रभावित हो सकते हैं। जो वास्तव में नुकसान के रास्ते में हैं और खुद की देखभाल करने में सक्षम नहीं हैं, उनके लिए स्थितियां और भी मुश्किल वाली हो सकती हैं।

 

विभिन्न तरीके से जलवायु परिवर्तन मानव स्वास्थ्य को करता है प्रभावित

Source: Centers for Disease Control and Prevention

 

पोलैंड में सीओपी 24 की बैठक के दौरान, डब्ल्यूएचओ ने ध्यान आकर्षित किया कि कैसे बहुपक्षीय जलवायु वित्त का केवल 0.5 फीसदी विशेष रूप से स्वास्थ्य परियोजनाओं को सौंपा गया है। इसमें इस बात पर भी प्रकाश डाला गया कि जलवायु परिवर्तन का पहले से ही नकारात्मक स्वास्थ्य प्रभाव है और यह “स्वास्थ्य के अधिकार” को कमज़ोर करता है, विशेष रूप से सबसे गरीब और सबसे कमजोर समुदायों वाले छोटे-द्वीप राज्यों में। क्या जलवायु परिवर्तन के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रभाव पर जोर पर्याप्त है?

 

उसमें देरी हो गई है। चाहे बहुत देर हो या न हो, मैं आपको नहीं बता सकता। वैश्विक स्तर पर 25 साल पहले इन सभी मुद्दों पर कार्रवाई को देखते हुए मुझे अच्छा लगता।

 

क्या हमारे पास तब सबूत थे?
 
 

हां। पर्याप्त मात्रा में साक्ष्य थे। लोगों ने कहा है कि सबूत अब बेहतर है, और यह है, लेकिन सवाल यह है कि आप इस पर कब कार्रवाई करेंगे? बड़ी समस्या यह है, और यह इस बात के कारण है कि हम ग्लोबल वार्मिंग के बारे में कार्य क्यों नहीं कर पाए हैं। हमारे पास मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल था और इसके बारे में वहां एक तैयार समाधान था। (देशों ने ओजोन को समाप्त करने वाले पदार्थों को चरणबद्ध करने का निर्णय लिया था )। यह एक विकल्प था, जिसे आप प्लग इन कर सकते हैं, जिसे आसानी से निर्मित किया जा सकता है, और यह जो लोग पहले से ही करते आ रहे थे,उसे वही करने के लिए लोगों की क्षमता से समझौता नहीं करना पड़ता। उस प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने से जुड़ा दर्द बहुत अच्छा नहीं था। इसके परिणाम अच्छे थे। जलवायु परिवर्तन के लिए हमारे पास आसान उत्तर नहीं है। जलवायु परिवर्तन – तेल, गैस, कोयला, विद्युत शक्ति, कार उद्योग – इन सभी घटकों के हितों के खिलाफ जा रहा है।  जिस तरह से हम इन मुद्दों के बीच जाते हैं, उनपर फिर से विचार की जरूरत है।

  
 

इनमें से कुछ  नगर-समाज का अस्तित्व ही गायब हो जाएगा। इनमें से कुछ इस परिवर्तन में नहीं बच पाएंगे। समाजों को अपने व्यवसाय या कार्य करने के तरीके को बदला होगा। कहीं-कहीं यह हुआ भी है। यह करों और नियामक कार्यों के साथ तेजी से हो सकता था। ठीक से लागू होने पर नियामक क्रियाएं बहुत प्रभावी होती हैं। हम नवाचार पर ध्यान केंद्रित कर सकते थे, लेकिन यहां समस्या यह है कि किसी को भी इसके लिए भूख नहीं है। इच्छाशक्ति कहां से आती है? लोगों में इच्छाशक्ति आनी चाहिए। लोग उन बातों पर प्रतिक्रिया देते हैं जिसे समाजशास्त्री तीन एस कहते हैं- चीजें जो जल्द ही हो जाएंगी, जो निश्चित हैं और जो मुख्य हैं। अगर यह तुरंत होने जा रहा है, अगर यह निश्चित रूप से होने जा रहा है और अगर इसका असर महसूस होने वाला है तो लोग इस आगे आएंगे। जलवायु यह निश्चित नहीं है – हम में से कोई भी नहीं जानता कि यह कितना बुरा होने वाला है या आप जहां रह रहे हैं,  आपके उस स्थान पर यह कितना खराब होने वाला है। हां, कुछ इलाकों में तूफान और चक्रवात आ सकते हैं, लेकिन फिर लोग इसपर कह सकते हैं कि ये तो पहले से ही आ रहे हैं।

 

जलवायु परिवर्तन किसी एक खास स्थान पर नहीं है कि सामान्य आबादी अपने परिवार आदि के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे पाए।

 

मानव स्वास्थ्य के बारे में क्या?  मानव स्वास्थ्य पर जलवायु का प्रभाव पर आपको लगता है कि यह लोगों को कार्रवाई करने के लिए प्रेरित कर सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है। ऐसा अधिकांश जगहों पर नहीं दिखता है। हमारे पास पहले तूफान थे, हमारे पास पहले सूखा था। यहा साक्ष्य का संचय होने वाला है। आपदा के बाद आपदा जब लोग वास्तव में पहचानने लगते हैं कि ऐसी चीजों की संख्या में एक निश्चित बढ़ोतरी है, जो गलत है।

 

 हम इस बात का इंतजार करें कि लोग समझेंगे, इन सब चीजों को महसूस करेंगे, सही तरीका नहीं है, क्योंकि हमने जलवायु परिवर्तन को अच्छी तरह से देखा नहीं है।

 

डब्ल्यूएचओ वीडियो दक्षिण पूर्व एशिया में स्वास्थ्य सेवाओं पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की व्याख्या करता है।

 

हम भारत में जीका का ताजा प्रकोप देख रहे हैं, जो इस क्षेत्र में पहले कभी सुनी गई बीमारी नहीं है। गर्म ग्रह ऐसे संक्रामक रोगों के नए क्षेत्रों में प्रसार पर क्या भूमिका निभाएगा?

 

जीका स्पष्ट रूप से वेक्टर-जनित है और पर्यावरण में जो परिवर्तन होने जा रहे हैं वह एडीज़ एजिप्टी और एडीज़ अल्बोपिकस (मच्छर प्रजाति जो ज़ीका फैलते हैं) के लिए फायदेमंद हैं। वे जलवायु-संवेदी रोग इस अर्थ में हैं कि मच्छर स्वयं जलवायु-संवेदनशील हैं। आप पहले से ही (भारत में) ऐसे वातावरण में हैं, जहां ये मच्छर जीवित रह सकते हैं।

 

 मुझे लगता है कि निश्चित रूप से भारत के भीतर जलवायु संचालक जीका से जुड़े होने की कुछ संभावना है, लेकिन मैं फिर ये चेतावनी देता हूं कि बीमारी के कई अन्य संचालक हैं और आप एक बीमारी को अलग-थलग करके नहीं देख सकते हैं। यदि आपकी आबादी ऐसी है, जहां हर कोई पहले से ही ज़ीका के प्रति प्रतिरक्षित है, तो आपको इसका प्रकोप नहीं दिखाई देगा, क्योंकि कोई भी इसके साथ नहीं आने वाला है। यदि जनसंख्या पूरी तरह से अतिसंवेदनशील है तो आपको जीका का बड़ा प्रकोप दिखाई देगा। यह सब बुनियादी ढांचे से जुड़ा हुआ है। आप उन्हें उन क्षेत्रों में देखें, जहां मच्छरों के प्रजनन की संभावना अधिक है जैसे कि झुग्गियों में… जहां खिड़कियों में अच्छी स्क्रीन नहीं होती है और जहां खड्डों में पानी उपलब्ध होता है, जो मच्छरों के लिए प्रजनन स्थल हो सकते हैं।

 

गर्म तापमान वेक्टर-जनित बीमारी घटनाओं को बढ़ा सकते हैं

A vector is any organism–such as fleas, ticks, or mosquitoes–that can transmit a pathogen, or infectious agent, from one host to another. Warmer average temperatures might make it easier for some vectors to reproduce leading to a rise in vector-borne diseases.Source: Centers for Disease Control and Prevention

 

तो अपने आप में वे परिस्थितियां किसी भी चीज़ की तुलना में अधिक सामाजिक-आर्थिक होती हैं, जिससे असमानताएं पैदा हो सकती हैं। आप उन समुदायों में अधिक जीका देखेंगे, जो अधिक खराब हालत में हैं।

 

 यह ग्लोबल वार्मिंग लक्षण हैं, यह कहने में हमें केयरफुल रहना है। यह एक संकेत यहां तक ​​कि एक जलवायु परिवर्तन का संकेत है। शायद मानसून उस वर्ष वास्तव में गीला था। मैं आपको अभी नहीं बता सकता कि सूखे के कारण सीरियाई गृहयुद्ध हुआ। आपके पास अन्य सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संचालक हैं, जो वहां चल रहे हैं। क्या इससे फसल की विफलताएं हुईं जो समस्या को बढ़ा सकती थीं? हां ऐसा हुआ है। पूर्ण रूप से। क्या वे फसलें मौसम से जुड़ी हैं? हाँ वे हैं। क्या मौसम की घटनाएं जलवायु परिवर्तन से संबंधित हैं? मुझे तो ऐसा लगता है।

 

शायद मैं थोड़ा ज्यादा सूक्ष्म हो रहा हूं। लेकिन मुझे अभी भी लगता है कि कनेक्शन है और मैं अभी भी इसे देखता हूं। हमने इसे कई बार देखा है और ऐसा लगता है कि यह अधिक से अधिक बढ़ेगा। यह उस लेंस के साथ है, जिसे आपको वापस ले जाना है और कहना है कि जीका अलगाव में नहीं होता है। संक्रामक रोग दुनिया भर में हैं और वे निश्चित रूप से भारत में अभी भी प्रचलित हैं। तो, यह तथ्य कि आपके पास एक जीका प्रकोप है, इसका मतलब यह हो सकता है कि यह वायरस की शुरूआत या वायरस की पुनरावृत्ति है।

 

इससे नीति निर्माताओं के लिए कार्य करना अधिक कठिन हो जाता है, क्या ऐसा नहीं होता है?

 

सही है, क्योंकि मैंने अभी उस की निश्चितता को कम करके आंका है। यह बहुत मुश्किल है, जब आप उन्हें विशेष नहीं बना सकते। एक नीति निर्माता एक नीति को लागू नहीं करना चाहता है क्योंकि यह अलोकप्रिय है और इसे करने का एक स्पष्ट कारण नहीं है, जो फायदेमंद है।

 

लेकिन हमें सामूहिक साक्ष्यों को देखना होगा और सामूहिक साक्ष्यों से पता चलता है कि जो हो रहा है, यह तत्काल नहीं है। यह समस्याग्रस्त है।

 

और इसके प्रकट होने के तरीके कई हैं। इसलिए, हमारे पास यह बहु-स्तरीय परिणाम हैं, जो हमें कई मायनों में अस्थिर करने वाले हैं। हम अपने जीवन में एक निश्चित मात्रा में स्थिरता पसंद करते हैं।

 
उदाहरण के लिए मुंबई जैसे शहर के लिए क्या होगा?
 

 वहां लागू की जा सकने वाली सभी प्रकार की नीतियां हैं। जिस तरह से ईंधन जलाया जा रहा है, उस पर पेड़ लगाने,विनियम और नियंत्रण लगाने की कोशिश की जा रही है। जाहिर है, ऐसा करने का बोझ मुंबई जैसे शहर में बहुत अलग होने वाला है। यह शहर कुछ हद तक आधुनिक है, लेकिन अभी भी यहां एक जटिल प्रणाली है। यह कम केंद्रीकृत है और यह अपने सभी नागरिकों को पाइप्ड पानी भी प्रदान नहीं करता है । इसके कुछ नागरिक भी आधिकारिक नहीं हैं। इसलिए, इस तरह की स्थिति में विनियमन और सामुदायिक प्रयासों के लिए भूमिकाएं होनी चाहिए, मैं इसे ऊपर से नीचे के बजाय नीचे से ऊपर करने की कोशिश करूंगा।

 

दिशा शेट्टी ‘कॉलंबिया जर्नलिज्म स्कूल-इंडिया स्पेंड’ की रिपोर्टिंग फेलो हैं,जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर लिखती हैं।

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 20  जनवरी, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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