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स्वास्थ्य-शिक्षा में कम निवेश आर्थिक भविष्य के लिए जोखिम

तिश संघेरा,
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मुंबई: शिक्षा की बद्तर गुणवत्ता और आबादी के बीच कुछ बीमारियों की अपेक्षाकृत उच्च प्रसार का सीधा मतलब है,कार्यबल उत्पादकता के लिए भारत अपने महत्वपूर्ण आर्थिक विकास को दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कम निवेश कर जोखिम बढ़ा रहा है। यह जानकारी एक नए अध्ययन में सामने आई है।  

 

इन्स्टटूट  ऑफ हेल्थ एंड मैट्रिक्स एंड इवैल्युएशन द्वारा किए गए और एक वैश्विक पत्रिका द लांसेट में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि भारतीय चोटी की उत्पादकता पर साढ़े छह सालों तक काम करता है ( चीन में 20 साल, ब्राजील में 16 और श्रीलंका में 13 की तुलना में ) और मानव पूंजी की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में 195 देशों में से 158 वें स्थान पर है।

 

मानव पूंजी एक आबादी में शिक्षा और स्वास्थ्य स्तर का एक माप है, जो 20 और 64 वर्ष की उम्र के बीच रहने वाले अपेक्षित वर्षों की संख्या के रूप में व्यक्त की जाती है। इसे आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण निर्धारक माना जाता है। निवेश में फोकस की पहचान के लिए अन्य देशों और क्षेत्रों की तुलना में जीवन प्रत्याशा, कार्यात्मक स्वास्थ्य, स्कूली शिक्षा और शिक्षा की गुणवत्ता के वर्षों को ध्यान में रखते हुए, देश के भीतर उत्पन्न श्रम की गुणवत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है।

 

फिनलैंड ने 27 साल की मानव पूंजी के साथ अपनी टॉप रैंकिंग बरकरार रखी है, जबकि नाइजर, दक्षिण सूडान और चाड, दो वर्ष के साथ निचले स्थान पर है। यह विश्व स्तर पर असमानता का विशाल स्तर दिखाता है।

 

अध्ययन में पता चला है कि, वर्षों से शिक्षा की कमी के कारण अमेरिका, जो पहले उच्च रैंकिंग राष्ट्र था, 21 स्थान नीचे गिर कर छठे से 27वें स्थान पर गया है।

 

 वाशिंगटन विश्वविद्यालय के ‘इन्स्टिटूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड एवोल्युशन’ (आईएचएमई) के निदेशक क्रिस्टोफर मरे कहते हैं, “हमारे निष्कर्ष शिक्षा और स्वास्थ्य और बेहतर मानव पूंजी और सकल घरेलू उत्पाद (सकल घरेलू उत्पाद) में निवेश के बीच के संबंध को दिखाते हैं-नीति निर्माता अख्सर इस जोखिम को अनदेखा करते हैं।”

 

“चूंकि विश्व अर्थव्यवस्था की निर्भरता डिजिटल प्रौद्योगिकी पर तेजी से बढ़ी है, कृषि से लेकर विनिर्माण उद्योग तक, मानव पूंजी स्थानीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं को गति देने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है।”

 

 हालांकि 1990 में भारतीयों ने लगभग दो दशकों की तुलना में स्कूल में अतिरिक्त चार साल खर्च किए हैं, लेकिन 2016 में दक्षिण एशिया में शिक्षा की गुणवत्ता के लिए देश का दूसरा सबसे कम स्कोर था (संभवतः 100 में से 66, अफगानिस्तान के 64 के आंकड़ों से आगे)।

 

समान रूप से, जबकि और 64 वर्ष की आयु के बीच काम काम करने वाले भारतीयों की संख्या सात साल (36 से 43 तक) बढ़ी है, इस क्षेत्र में सबसे कम कार्यात्मक स्वास्थ्य स्कोर (संभवतः 100 में से 43, अफगानिस्तान के 45 से पीछे) के साथ दक्षिण एशिया में कार्यबल सबसे अस्थिर है।  
 

जबकि भारत ने अपनी रैंकिंग में 1990 में 162 वें स्थान से 2016 में 158 वें स्थान तक सुधार किया है और चोटी उत्पादकता पर काम करने वाले वर्षों की संख्या तीन से सात हो गई है। भारत सुडान (157 वां) और नामीबिया (159वीं) के बीच स्थान पाता है। ये दोनों भारत के मुकाबले काफी कम ( भारत के 2.6 ट्रिलियन डॉलर की तुलना में  2.6 बिलियन डॉलर और 13 बिलियन डॉलर ) जीडीपी वाले देश हैं।

 
 

इसका मतलब है कि भारत, सूडान और नामीबिया में मानव पूंजी के समान स्तर हैं – विश्व बैंक के अध्यक्ष जिम योंग किम ने “जनसंख्या के स्वास्थ्य, कौशल, ज्ञान, अनुभव और आदतों की कुल योग” के रूप में परिभाषित किया है।

 

विश्व बैंक ने पिछले साल आईएचएमई से मानव पूंजी का एक उपाय विकसित करने का अनुरोध किया था, जो समय के साथ वैश्विक तुलना को सक्षम करने में मदद करेगा और सरकारों को उन अंतर्दृष्टि के साथ लैस करेगा जहां महत्वपूर्ण स्वास्थ्य और शिक्षा निवेश की आवश्यकता है।

 

बद्तर स्वास्थ्य स्थिति का असर उत्पादकता पर
 

  हालांकि 2016 में भारतीयों ने 1990 की तुलना में 20 और 64 की उम्र के बीच पांच साल ज्यादा जीवन जीने  की उम्मीद की है, लेकिन 43/100 के कम कार्यात्मक स्वास्थ्य स्कोर का मतलब है कि इन उत्पादक वर्षों में बीमार स्वास्थ्य से प्रभावित होने की अधिक संभावना हो सकती है।

 

अध्ययन के मुताबिक, सीखने और उत्पादकता पर असर डालने वाली सात स्थितियों को ( स्टंटिंग, वेस्टिंग, एनीमिया, संज्ञानात्मक हानि, सुनवाई और दृष्टि हानि और एचआईवी / एड्स, मलेरिया और तपेदिक जैसी संक्रामक बीमारियां सहित ) एक समग्र कार्यात्मक स्वास्थ्य स्कोर का उत्पादन करने के लिए मापा जाता है। 43 के आंकड़े के साथ, 2016 में, दक्षिण एशियाई देशों में भारत का सबसे कम स्वास्थ्य स्कोर था। यह वही आंकड़ा है जो 1990 में 16 साल पहले पाकिस्तान ने दर्ज किया था। भारत की तुलना में काफी कम आय वाले देश (भारत के 1,939 डॉलर  की तुलना में  835 डॉलर) नेपाल में सबसे बड़ा सुधार हुआ है। 16 साल की अवधि में नेपाल ने कार्यात्मक स्वास्थ्य स्कोर में 28 फीसदी की वृद्धि की है। इसके बाद 22 फीसदी के साथ बांग्लादेश,  21 फीसदी के साथ श्री लंका और फिर 18 फीसदी के साथ भारत का स्थान रहा है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने छोटी बढ़ोतरी (5 फीसदी और 9 फीसदी) दर्ज की, लेकिन उनके स्वास्थ्य स्कोर भारत की तुलना में अधिक बने रहे हैं।

 

दक्षिण एशियाई देशों के कार्यात्मक स्वास्थ्य स्कोर अनुमान


 

ब्रिक्स देशों में, भारत और चीन दोनों ने 1990 की तुलना में 2016 में 18 फीसदी उच्च स्वास्थ्य स्कोर दिखाया। हालांकि, भारत का स्कोर (43) चीन से काफी कम (72) और ब्राजील का लगभग आधा (78) है।

 

ब्रिक्स राष्ट्रों के कार्यात्मक स्वास्थ्य स्कोर अनुमान


 

कार्यबल उत्पादकता पर खराब स्वास्थ्य के प्रभाव अच्छी तरह से प्रलेखित हैं। विश्व बैंक के अनुमानों के मुताबिक बचपन के स्टंटिंग के कारण वयस्क ऊंचाई में 1 फीसदी की कमी आर्थिक उत्पादकता में 1.4 फीसदी की कमी से जुड़ी है। गैर-स्टंट व्यक्तियों की तुलना में स्टंट बच्चे वयस्कों के रूप में 20 फीसदी कम कमाते हैं, जैसा कि इंडियास्पेन्ड ने जनवरी 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 
खराब गुणवत्ता वाले शिक्षा प्रणाली में अधिक समय का बीतना
 

जबकि भारतीय स्कूल में 68 फीसदी अधिक समय (2016 में 10 साल की तुलना में 1990 में छह साल) खर्च कर रहे हैं, शिक्षा की गुणवत्ता में केवल मामूली वृद्धि (इसी अवधि में 5 फीसदी) हुई है। यह दर्शाता है कि स्कूली शिक्षा के अतिरिक्त वर्षों का समय बर्बाद हो रहा है।

 

अध्ययन में कहा गया है कि शिक्षा की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलनीय परीक्षणों पर औसत छात्र स्कोर के विश्लेषण के माध्यम से निर्धारित की जाती है, ताकि 100 में से एक समग्र स्कोर तैयार किया जा सके।

 

दक्षिण एशियाई समकक्षों के बीच भारत का दूसरा सबसे कम शिक्षा स्कोर (66/100) है, जो अफगानिस्तान (65) से थोड़ा आगे है और समूह के नेता श्रीलंका (75) से काफी पीछे है।

 

श्रीलंकाई भी स्कूल में सबसे अधिक वर्ष (13 साल) खर्च करते हैं, जैसा कि 1990 में हुआ था, इसके बाद भारतीयों (10) का स्थान है।

 

अफगानिस्तान मे शिक्षा प्राप्ति में सबसे बड़ी वृद्धि उत्पादन हुआ है, 1990 में अविश्वसनीय रूप से कम दो वर्षों से शिक्षा में बिताए गए वर्षों की संख्या में वृद्धि कर 2016 में सात तक हुआ है, यानी 232 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

दक्षिण एशिया देशों के लिए स्कूल में खर्च किए वर्ष

दक्षिण एशियाई देशों के लिए शिक्षा स्कोर

Source: Measuring human capital: a systematic analysis of 195 countries and territories, 1990–2016, The Lancet

 

ब्रिक्स देशों के बीच रूस की शिक्षा गुणवत्ता का उच्चतम स्कोर (90/100)  है, जिसमें छात्र 12 साल तक स्कूल में रहते हैं – ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के समान।

 

चीनी छात्र 13 वर्षों तक यानी स्कूल में सबसे लंबा समय बिताते हैं और एक उच्च स्तर की शिक्षा गुणवत्ता का अनुभव करते हैं, जो संभवत: 100 में से 89 स्कोर बनाते हैं।

 

ब्रिक्स देशों में स्कूली शिक्षा के वर्ष

ब्रिक्स देशों के शिक्षा स्कोर

Source: Measuring human capital: a systematic analysis of 195 countries and territories, 1990–2016, The Lancet

 

शिक्षक की कमी, खराब मूल्यांकन और वित्त पोषण में कटौती के मौजूदा माहौल में भारत के निम्न शिक्षा स्कोर को आसानी से समझा जा सकता है। इस संबंध में  इंडियास्पेंड ने जनवरी 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

जबकि देश में 27 साल की औसत आयु के साथ दुनिया की सबसे युवा आबादी में से एक है, और आर्थिक लाभ उठाने के लिए अच्छी तरह की परिस्थितियां हैं तो ऐसे में शिक्षा में निवेश की कमी का मतलब अवसर बर्बाद होने की संभावना हो सकती है।

 
सकल घरेलू उत्पाद पर मानव पूंजी का प्रभाव
 

 देश की मानव पूंजी में वृद्धि, तेजी से आर्थिक विकास से जुड़ी हुई प्रतीत होती है, जैसा कि अध्ययन में दिखाया गया है।   1990 और 2016 के बीच मानव पूंजीगत सुधार के टॉप 25 फीसदी देशों ने मानव पूंजीगत सुधार के 25 फीसदी नीचे की तुलना में 1.1 फीसदी उच्च वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर भी दर्ज की है।  यह सकारात्मक सहसंबंध यह भी बताता है कि स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश करने में असफल राष्ट्र अर्थव्यवस्थाओं को कम करने और प्रति व्यक्ति जीडीपी कम करने का जोखिम रखते हैं। विश्व बैंक ने पहले कहा है कि विशेष रूप से कम आय और मध्यम आय वाले देशों में मानव पूंजी में निवेश में कमी आ रही है।

 

डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम गेबेरियस कहते हैं, “मुख्य रूप से आधारभूत संरचना के बजाय लोगों में निवेश करना स्थायी विकास हासिल करने का सर्वोत्तम तरीका है, और स्वास्थ्य और शिक्षा के माध्यम से मानव पूंजी में निवेश आकर्षक रिटर्न प्रदान करता है।”

 

जीडीपी (2015) के 1.02 फीसदी पर भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय दुनिया में सबसे कम है, विशेषज्ञों द्वारा अनुशंसित 5 फीसदी और अन्य कम आय वाले देशों से पीछे हैं जो जीडीपी का औसत 1.4 फीसदी है।  सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 फीसदी तक सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च बढ़ाना राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में एक लक्षित उद्देश्य था, लेकिन भारत ने जीडीपी के 2 फीसदी के अपने लक्ष्य को पूरा नहीं किया है, जैसा कि इंडियास्पेन्ड ने अप्रैल 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

देश के आय वर्गों द्वारा स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय


 

चीन में 3.3 फीसदी और मॉरीशस में 5 फीसदी की तुलना में 2017-18 में 2.7 फीसदी पर, जीडीपी के अनुपात के रूप में शिक्षा पर सरकारी खर्च भारत में इसी तरह कम है। यूनेस्को द्वारा दी गई वैश्विक नीति सलाह के अनुरूप, 1964 में, कोठारी आयोग ने शिक्षा खर्च में सकल घरेलू उत्पाद का 6 फीसदी आवंटन की सिफारिश की थी।

 

( संघेरा लेखक और शोधकर्ता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 25 सितंबर 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित है।

 

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