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स्वास्थ्य संकट जारी, फिर भी एनएचएम फंड नहीं हो रहे खर्च?

प्राची सालवे,
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मुंबई: भारत में स्वास्थ्य संकट के बढ़ने के बावजूद, पिछले पांच वर्षों से 2016 तक, राज्यों द्वारा अव्ययित राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) फंड में 29 फीसदी की वृद्धि हुई है, जैसा कि सरकार के लेखा परीक्षक द्वारा हालिया लेखापरीक्षा में बताया गया है।  भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा लेखापरीक्षा में इन फंडों का देरी से हस्तांतरण और गलत हस्तांतरण की भी बात की गई है।

 

वर्ष 2005 में सामने आया एनएचएम, स्वास्थ्य देखभाल के लिए सार्वभौमिक पहुंच प्रदान करने के उद्देश्य से भारत का सबसे बड़ा स्वास्थ्य कार्यक्रम है। इसका प्राथमिक मिशन मातृ और शिशु स्वास्थ्य में सुधार और संक्रमणीय और गैर-संक्रमणीय बीमारियों को नियंत्रित करना है।

 

डेटा यह दिखाता है कि, एनएचएम फंड का उपयोग बेहतर रूप से किया जाना क्यों महत्वपूर्ण है? मातृ मृत्यु के वैश्विक बोझ में भारत की अब भी 17 फीसदी की हिस्सेदारी है। 2016 में 61 फीसदी मौत के लिए गैर-संक्रमणीय बीमारियां जिम्मेदार हैं। कुष्ठ रोग और मलेरिया जैसी संक्रमणीय बीमारियां अभी तक नियंत्रित नहीं हैं और 2011-12 में 55 मिलियन भारतीय स्वास्थ्य आपदाओं के कारण गरीबी की ओर गए हैं, क्योंकि वे स्वास्थ्य का खर्च वहन नहीं कर सकते थे।

 

एनएचएम स्थानीय स्वास्थ्य प्रणालियों, संस्थानों और क्षमताओं को मजबूत करने में मदद के लिए राज्य स्वास्थ्य समितियों को भी धन वितरित करता है।

 

भारत के ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में मानव संसाधन और बुनियादी ढांचे की कमी है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 30 जनवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। उप-केंद्रों में 20 फीसदी मानव संसाधनों की कमी थी। उनमें से 29 फीसदी में नियमित रूप से पानी की आपूर्ति नहीं थी, 26 फीसदी में बिजली आपूर्ति की कमी थी और 11 फीसदी सभी मौसम की सड़कों से जुड़े हुए नहीं थे।

 

भारत स्वास्थ्य देखभाल के मामले में पड़ोसी देश बांग्लादेश, और यहां तक ​​कि उप-सहारन सूडान और इक्वेटोरियल गिनी से भी नीचे है, जैसा कि हमने 23 मई, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। भारत स्वास्थ्य पर अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.4 फीसदी खर्च करता है, जो ब्रिक्स देशों में सबस कम है।

 

दो आलेखों की श्रृंखला में, हम एनएचएम के कामकाज पर सरकारी लेखा परीक्षक के आकलन को देखेंगे। पहले आलेख में, हम वित्तीय प्रबंधन के उदाहरणों पर चर्चा करेंगे। दूसरे और अंतिम आलेख में इस कुप्रबंधन के कारण आधारभूत संरचना और चिकित्सा कर्मचारियों की कमी पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

 

वैसे सरकार ने वित्तीय अनियमितता के आरोपों का खंडन किया है। एनएचएम के अतिरिक्त सचिव और मिशन निदेशक मनोज झलानी के मुताबिक राज्यों को अपने आवंटन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तुरंत बाद फंड जारी किए गए हैं। उन्होंने कहा, “गैर-एनएचएम प्रयोजनों / राज्य सरकार योजनाओं के लिए एनएचएम फंडों का उपोयोग मंत्रालय द्वारा कभी समर्थित नहीं है। अगर ऐसा कोई उदाहरण हमारे (हमारे) ध्यान पर आता है, तो संबंधित राज्य सरकार से उसे वसूल लिया जाता है, और राज्यों को इस तरह के अभ्यास को तत्काल बंद करने का निर्देश दिया जाता है”।

 

देर से स्थानांतरण

 

कैग लेखापरीक्षा के हमारे विश्लेषण में स्वास्थ्य निधि के वितरण और उपयोग में निम्नलिखित समस्याएं सामने आई हैं:-

 

    • राज्य स्वास्थ्य समितियों द्वारा अव्ययित राशि 2011-12 में 7,375 करोड़ रुपये (1.44 बिलियन डॉलर) से बढ़कर 2015-16 में 9, 509 करोड़ (1.43 बिलियन डॉलर) हुई है।

 

    • राज्य के खजाने ने राज्य स्वास्थ्य समितियों को 2014-15 और 2015-16 में जारी 5,037 करोड़ रुपये (806 मिलियन डॉलर) और 4,016 करोड़ रुपये ( 606 मिलियन डॉलर) के हस्तांतरण में देरी की है। 15 दिनों में होने वाले स्थानांतरण में 50 से 271 दिनों का समय लिया गया है।

 

    • छह राज्यों -आंध्र प्रदेश, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, तेलंगाना और त्रिपुरा- में 36 करोड़ रुपये को अन्य योजनाओं में बदल दिया गया, जैसे कि तेलंगना में मुख्यमंत्री शुभ लक्ष्मी योजना (शिशु लड़कियों के लिए मुख्यमंत्री की योजना) और सुखीभव योजना (सहायता संस्थागत प्रसव)।

 

18 राज्यों ने आवंटन का केवल 32 फीसदी खर्च किया

 

18 राज्यों में, 2013-16 राज्य कार्यक्रम कार्यान्वयन योजनाओं में परिलक्षित, 133 करोड़ रुपये की आवश्यकता के मुकाबले, हमने पाया कि केवल 64 फीसदी आवंटित किया गया था। लेकिन राज्य आवंटित राशि का उपयोग करने में सक्षम नहीं थे।  32 फीसदी या 43 करोड़ रुपए से अधिक खर्च नहीं किए गए थे।

 

‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च एंड अकाउंटिबिलिटी इनिशिएटिव’ के निदेशक अवनी कपूर कहती हैं, “निर्माण संसाधन से संबंधित गतिविधियों में खरीद के लिए जटिल प्रक्रियाओं के लिए मानव संसाधनों की कमी से लेकर अव्ययित धन के लिए कई कारण हैं। योजना के तहत प्राप्त धन और राशि में अनिश्चितता एक और महत्वपूर्ण कारक है। राज्य / जिला प्रशासन की मांग और वास्तव में स्वीकृत और प्राप्त राशि में अक्सर एक विसंगति होती है। “

 

एनएचएम को केंद्र सरकार और राज्यों द्वारा वित्त पोषित किया जाता है, जिसमें केंद्र 60 फीसदी प्रदान करता है। 2013-14 तक, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय सीधे राज्य स्वास्थ्य समितियों को धन जारी करता था। पैसा अब राज्य सरकारों को भेजा जाता है, जो उसे समितियों तक ले जाते हैं।

 

राज्य स्तरीय स्वास्थ्य समितियां ब्लॉक तक राशि को आगे जारी करने के लिए जिला स्वास्थ्य समितियों को धन बांटते हैं। यहां से, धन समुदाय और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उप-केंद्रों और गांव स्वास्थ्य स्वच्छता पोषण समितियों जैसे विभिन्न कार्यान्वयन इकाइयों में जाता है।

 

एनएचएम फंड पांच हिस्सों में जारी किए जाते हैं:- एनआरएचएम प्रजनन और बाल स्वास्थ्य (आरसीएच) फ्लेक्सिपूल, राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (एनयूएचएम) फ्लेक्सिपूल और  चोट और आघात और आधारभूत संरचना रखरखाव सहित गैर-संक्रमणीय रोगों के लिए।

 

कपूर कहती हैं, “इन (राज्य स्वास्थ्य) समाजों के निर्माण के कारणों में से एक यह था कि अव्ययित धन अगले वर्ष तक ले जाया जाए। इसके विपरित राज्य राजकोष को वित्तीय वर्ष के अंत में शेष राशि को वापस करना है।”

 

उन्होंने कहा, “धन की प्राप्ति में देरी होती है, जैसा कि कैग की रिपोर्ट में भी बताया गया है। यह देखते हुए कि राज्यों / जिलों को वेतन और जननी सुरक्षा योजना भुगतान जैसी नियमित गतिविधियों को प्राथमिकता देना है, धनराशि विशेष रूप से (कुछ परियोजनाओं के लिए) तक पहुंचने तक धन खर्च नहीं करने का प्रोत्साहन है। इस प्रकार हमारे शोध से पता चला है कि आईईसी (सूचना, शिक्षा, संचार) या प्रशिक्षण जैसे कई जरूरी खर्च अक्सर उपेक्षित रहे हैं। “

 

एनएचएम जैसी योजनाओं के केंद्रीय प्रायोजन के साथ अन्य कई समस्याएं हैं। कपूर कहती हैं, “जरूरतों के अनुसार राज्यों को राशि खर्च करने की इजाजत नहीं है। मैंने हिमाचल प्रदेश के मामले को सुना है जहां आशा कार्यकर्ताओं (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) की जरूरत नहीं थी, लेकिन उन्हें एनएचएम मानदंडों के कारण उन्हें नियुक्त करना पड़ा। 14 वें वित्त आयोग के नए मानदंडों के तहत, एक प्रावधान है जिसमें 25 फीसदी वित्त पोषण पूरी तरह से लागू नहीं है। मैंने अभी तक यह नहीं देखा है कि राज्यों ने इसे कैसे कार्यान्वित किया है।”

 

अव्ययित धन 40 फीसदी से 76 फीसदी तक था

 

2011-16 के दौरान राज्य स्वास्थ्य समितियों ने 1,10,930 करोड़ रुपये (17.1 बिलियन डॉलर) में से केवल 1,06,180 करोड़ रुपये (20.7 बिलियन डॉलर) खर्च किए थे। कुछ राज्यों में अव्ययित राशि का अनुपात 40 फीसदी से 76 फीसदी के बीच था – उदाहरण के लिए, 2015-16 में, मेघालय में 76 फीसदी और उत्तर प्रदेश में 52 फीसदी था।

 

27 राज्य स्वास्थ्य समितियों के साथ उपलब्ध अव्ययित शेष राशि, , 2011 – 2016

Source: Comptroller and Auditor General of India

 

ऊपर दिए गए टेबल ब्याज के बिना और ब्याज के साथ अव्ययित शेष राशि दिखाती है (जैसा कि एनआरएचएम दिशानिर्देशों द्वारा अनिवार्य है)।2011-12 में, ब्याज के बिना 27 राज्य स्वास्थ्य समितियों के साथ उपलब्ध अव्ययित शेष राशि 5253 करोड़ रुपये (1.02 बिलियन डॉलर) थी, जो 2015-16 में 3686 करोड़ रुपये (555 मिलियन डॉलर) हो गई थी।

 

हालांकि, इसी अवधि में, 27 राज्यों के साथ ब्याज सहित अव्ययित शेष राशि 7375 करोड़ रुपये (1.44 बिलियन डॉलर) से बढ़कर 9509 करोड़ रुपये (1.43 बिलियन डॉलर) हो गई है।

 

डिफॉल्ट राज्यों को दंडित नहीं किया जा रहा है

 

केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, वे राज्य, जो उन्हें दिए गए पैसे खर्च नहीं करते हैं उन्हें दंडित किया जाना चाहिए और यह प्रावधान वर्ष 2014-15 से लागू है।

 

राज्य सरकारों को राशि प्राप्त होने के15 दिनों के भीतर राज्य स्वास्थ्य समितियों को इसे जारी करना पड़ता है, और यदि वे ऐसा करने में नाकाम रहे तो राज्य सरकार ब्याज का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होती है – 5.75 फीसदी से 7.25 फीसदी तक, यानी लागू बैंक जमा दर के आधार पर।

 

लेखापरीक्षा में पाया गया कि, मई 2016 तक, 2014-15 के दौरान जारी 49 करोड़ रुपये और 2015-16 के दौरान मिशन फ्लेक्सिपूल और आरसीएच फ्लेक्सिपूल के तहत जारी किए गए 450 करोड़ रुपये राज्य राजकोषों को राज्य स्वास्थ्य समितियों में स्थानांतरित नहीं किए गए थे।

 

जब व्याख्या करने के लिए कहा गया तो मंत्रालय ने कैग से कहा कि समय-समय पर राज्यों से स्वास्थ्य समितियों के लिए समय पर फंड जारी  करने के मामले को सुनिश्चित करने के लिए कहा गया। हालांकि, कैग ने पाया कि डिफॉल्ट राज्यों के खिलाफ की गई कार्रवाई के बारे में पूछे जाने पर मंत्रालय के पास कोई जवाब नहीं था।

 

निधि के लिए परिचालन दिशानिर्देश भी केवल विशिष्ट लक्ष्यों के लिए उपयोग किए जाने वाले पैसे प्रदान करते हैं। छह राज्यों-आंध्र प्रदेश, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, तेलंगाना और त्रिपुरा- में, 36 करोड़ रुपये को अन्य योजनाओं में दे दिया गया था, जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है। मंत्रालय ने कैग के सामने स्वीकार किया कि गैर-एनआरएचएम प्रयोजनों के लिए एनआरएचएम फंडों को हटाने में सही ढंग से कार्य नहीं किया गया था।

 

वर्ष 2011-15 की अवधि के लिए, मिशन फ्लेक्सिपूल के तहत 4,283 करोड़ रुपये के उपयोग प्रमाण पत्र (यूसी) 22 राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों में लंबित थे। आरसीएच फ्लेक्सिपूल के तहत, मई 2016 तक 21 राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों से 3,175 करोड़ रुपये के यूसी लंबित थे।

 

खराब डेटा प्रबंधन

 

एनएचएम पर बजट अध्ययन लिखने वाली कपूर कहती हैं, “एनएचएम के तहत डेटा प्रबंधन प्रक्रियाएं बहुत खराब हैं। हमने यह भी पाया है कि डेटा का रख-रखाव अक्सर बद्तर होता है। डेटा प्रबंधन प्रणालियों को सही ढंग से न बनाए रखने का प्रभाव अगले वर्ष के लिए योजना के साथ-साथ कार्यान्वयन पर भी पड़ता है। यूसी को उपयोग दिखाने की ज़रूरत है और  इसे प्रस्तुत करने में विफलता का प्रभाव आने वाले समय में फंड रिलीज पर पड़ता है। “

 

कपूर कहती हैं, “कर्मचारियों की कमी और उच्च रिक्तियों की कमी का मतलब है कि फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं को बिना किसी स्पष्टता के अधिकांश रिकॉर्ड बनाए रखना है कि इसका उपयोग कैसे और कब होगा।”

 

हमारे सवालों के जवाब में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने कहा है कि उसने इन समस्याओं से निपटने के लिए पहले से ही कई कदम उठा रखे हैं- ताजा धन का विनियमन, सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली का डिजिटल ढंग से उपयोग, वास्तविक समय में फंड प्रबंधन के लिए मंच, राज्य निधि के लेखा परीक्षा, राज्य वित्त कर्मचारियों के प्रशिक्षण और समीक्षा और राज्य स्वास्थ्य समितियों और राज्य के खजाने के बीच धन का तत्काल हस्तांतरण।

 

(यह दो आलेखों की श्रृंखला का पहला भाग है।)

 

(सालवे विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 20 अगस्त 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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