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हरियाणा में स्कूटर पर दौड़ रही है महिलाओं की उम्मीद

नमिता भंडारे,
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मधुबन में हरियाणा पुलिस अकादमी में, ज्यादातर महिला ट्रेनी कांस्टेबल कहीं भी आने-जाने, यहां तक कि काम पर जाने के लिए अपने पतियों पर निर्भर करती हैं। हेड कांस्टेबल पिंकी उनकी इस आदत को बदलना चाहती हैं। कहती है, “मैं चाहती हूं कि ये लड़कियां ड्राइव करना सीखें, जिससे कहीं आने-जाने के लिए उन्हें किसी भी व्यक्ति पर निर्भर न होना पड़े।”

 

मधुबन और सोनीपत (हरियाणा): मधुबन में हरियाणा पुलिस अकादमी में यह प्रशिक्षण दिवस है, जहां 14 महिला कॉन्स्टेबल सर पर सफेद हेल्मेट लगाए अपने चमकदार होंडा डुएट्स के साथ खड़ी हैं।

 

सबको पता है कि उन्हें अगले रैंक में पदोन्नत नहीं किया जाएगा, जब तक कि वे दोपहिया वाहन चलाना नहीं सीखते। नवंबर 2016 में हरियाणा पुलिस में एक कॉन्स्टेबल के रूप में शामिल होने वाली सरिता कहती हैं, “यह ड्राइविंग शुरू में थोड़ा डरावना है। लेकिन जब आप इसे सीख जाते हैं तो आपका जीवन बहुत आसान हो जाता है। “

 

 

 

इन महिलाओं को दोपहिया वाहन सीखने की जरूरत क्यों है?

 

हरियाणा में पुलिस महानिरीक्षक (महिलाओं के खिलाफ अपराध) और उच्चतम रैंकिंग महिला पुलिस अधिकारी ममता सिंह कहती, ” इस विभाग में गतिशीलता बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आपको अपराध होने पर आपको जल्द से जल्द वहां तक पहुंचने के लिए सक्षम होना चाहिए।”

 

इससे पहले महिला कॉन्स्टेबल या तो उन सरकारी वाहनों के लिए इंतजार करती थीं, जो उन्हें उपलब्ध कराए जाते थे या पति से अनुरोध करते थे कि उन्हें ड्यूटी कॉल के दौरान अपराध की जगह तक ले जाएं, जैसा कि अकादमी में ड्राइविंग प्रशिक्षक, हेड कांस्टेबल पिंकी बताती हैं।

 

यह केवल दूसरा बैच ही है, जिन्हें वो गाड़ी चलाना सिखा रही हैं। वह कहती हैं, “ये महिलाएं हमेशा काम पर आने-जाने के लिए किसी और निर्भर रहती हैं। मैं इन लड़कियों से कहती हूं कि तब क्या होगा जब तुम्हारे घरवालों के पास वक्त नहीं होगा? मैं चाहती हूं कि ये लड़कियां गाड़ी चलाना सीखें, जिससे इन्हें किसी और पर निर्भर नहीं रहना पड़े। ”

 

 

हरियाणा की महिलाएं आगे बढ़ी हैं, लेकिन यह काफी नहीं

 

हरियाणा ही वह राज्य है जहां देश के सबसे खराब लिंग अनुपात को देखते हुए, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अभियान ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ शुरु किया था। हरियाणा के सभी 21 जिलों में एक महिला थाना (अखिल महिला पुलिस स्टेशन) है।

 

ममता सिंह कहती हैं, “राज्य में कुल पुलिस बल में 9 फीसदी से अधिक महिलाएं हैं, जो कि 7.28 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से ऊपर है, जैसा कि ‘ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट’ के आंकड़ों से पता चलता है।”

 

कुछ लिंग सूचकांक पर राज्य का प्रदर्शन बेहतर रहा है। मिसाल के तौर पर, मातृ मृत्यु दर, जो 2011-13 में प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 127 मृत्यु का है जबकि राष्ट्रीय औसत 167 का रहा है, जैसा कि नीति आयोग से पता चलता है।

 

हरियाणा में पहले की तुलना में अधिक लड़कियां स्कूल जाती हैं और तीन में से एक लड़की ने पूरी की है माध्यमिक शिक्षा, जबकि राष्ट्रीय औसत चार में से एक लड़की का है।

 

हरियाणा जेंडर रिपोर्ट

Haryana Gender Report
Indicator Haryana All India
Child sex ratio (age 0-6, females per 1,000 males) 834 919
Maternal Mortality 2013 (deaths per 100,000 live births) 127 167
Females with secondary education, 2012 34% 26%
Female labour force participation, 2012 19% 31%

Source: World Bank, Haryana Gender Brief, June 2017

 

फिर भी, शैक्षिक लाभ के बावजूद, भारत में सबसे कम महिला श्रम बल भागीदारी दर  हरियाणा में है। विश्व बैंक की जून 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक हरियाणा में केवल 19 फीसदी महिलाएं वेतनमान रोजगार में हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 31 फीसदी का है। नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक अखिल भारतीय महिला कार्यबल दर केवल 24 फीसदी पर है।

 

यह सिर्फ हरियाणा के लिए नहीं है। महिलाएं पूरे भारत में श्रम मानचित्र को छोड़ रही हैं। 2011 तक केवल 10 वर्षों में (पिछली जनगणना का वर्ष), 19.6 मिलियन महिलाओं ने नौकरियां छोड़ दी थीं।

 

गिरावट जारी है।

 

हमारी सतत राष्ट्रव्यापी जांच से पता चलता है कि महिलाएं कई जटिल कारणों से रोजगार से बाहर निकलती रहती हैं।

 

नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, कुछ महत्वपूर्ण मानकों पर महिला एजेंसी में सुधार हुआ है। उदाहरण के लिए, पूरे भारत में, एक दशक की तुलना में महिलाएं अपने स्वास्थ्य के संबंध में स्वंय निर्णय ले रही हैं, देर से शादी कर रही हैं और देरी से बच्चे को जन्म दे रही हैं। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर, महिलाओं का वेतन पाने वाले काम से बाहर निकलना जारी है।

 

भारत में लिंग मानदंड में बदलाव

Changing Gender Norms in India
Indicator 2005-06 2015-16
Involved in decisions about their own health 62.30% 74.50%
Involved in decisions about large household purchases 52.90% 73.40%
Say that wife beating is not acceptable 50.40% 54%
Median age at first marriage 17.3 18.6
Median age at first child birth 19.3 20.6
Educated 59.40% 72.50%
Employed 36.30% 24%

Source: Economic Survey 2017-18

 

इसके कारणों में विश्वसनीय, सुरक्षित और सस्ते सार्वजनिक परिवहन की कमी है, जैसा कि परिवहन और विकास संस्थान और एक एनजीओ जगोरी द्वारा किए गए इस अध्ययन से पता चलता है ( (भारत और परिवहन, गतिशीलता और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी के बीच के लिंक पर कहानियां यहां और यहां देखें।)

 

जब वे नौकरियों की तलाश करती हैं, तो महिलाएं उन नौकरियां को चुनना ज्यादा पसंद करती हैं, जो घर के करीब हैं, भले ही इन नौकरियों में उन्हें कम वेतन या मानदेय मिले।

 

गाड़ी चलाना सीखना महिलाओं के लिए क्यों है जरूरी?

 

2016 में, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) कपड़ा उद्योग में नौकरियां पाने के लिए महिलाओं के एक स्किलिंग कार्यक्रम में शामिल था।

 

हरियाणा और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए यूएनडीपी के राज्य परियोजना प्रमुख कंटा सिंह बताते हैं कि प्रशिक्षित होने के बाद, हरियाणा के विभिन्न गांवों की 60 महिलाओं को पानीपत में कारखानों से नौकरी की पेशकश मिली। लेकिन महिलाओं ने पूछा कि, ‘हम काम कैसे करेंगे?’

 

इसके लिए राज्य सरकार बस सेवा शुरू करने पर सहमत हुई। लेकिन यह भी पर्याप्त नहीं था। महिलाओं ने पाया कि उनका आधा वेतन बस किराया में चला गया। इसके अलावा, हर एक तरफ की यात्रा में एक घंटे से ज्यादा का समय लगता है। सिंह बताते हैं, “पहले महीने के अंत तक, 60 में से 59 महिलाओं ने नौकरी छोड़ दिया था।”

 

यह यूएनडीपी के लिए एक महत्वपूर्ण सीख थी, जो देश भर में महिलाओं के लिए विभिन्न स्किलिंग कार्यक्रम चलाता है। यूएनडीपी के कौशल और व्यावसायिक विकास के प्रमुख क्लेमेंट चौवेत कहते हैं, “अगर हम चाहते हैं कि महिलाएं नौकरी ढूंढें  तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि वे गतिशील हों।”

 

महिलाओं नौकरी करे, इसके लिए दो महत्वपूर्ण कारक नौकरी की सुरक्षा और गतिशीलता है। चौवेट बताते हैं, “वे पूछती हैं कि मैं कैसे काम करूंगी?’ और क्या मैं सुरक्षित रूप से आ और जा सकती हूं? “

 

विशेषज्ञों ने कहा, इस प्रकार, महिलाओं को तकनीकी कौशल सिखाना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें अन्य कौशल के साथ जोड़ना भी जरूरी है, जो उनकी आर्थिक भागीदारी को सक्षम बनाएंगे। उदाहरण के लिए, एक दोपहिया वाहन को चलाना ।

 

इंस्पेक्टर जनरल ममता सिंह बताती हैं, “महाराष्ट्र में औरंगाबाद जैसे शहरों में महिलाएं धूप से बचने के लिए लंबे दस्तानों से अपनी बांहों को ढक लेती हैं। लेकिन हरियाणा में, एक धारणा है कि ड्राइविंग केवल पुरुषों के लिए है । फिर भी, जब एक महिला स्कूटर की सवारी करती है तो वह न केवल सशक्त होती है, बल्कि वह प्रतीक भी बन जाती है”।

 

विचार मंच ‘सेंटर फॉर डेवलपमेंट रिसर्च एंड एक्शन’ में निदेशक और अर्थशास्त्री, रितु दीवान कहती हैं, महिलाओं की शारीरिक गतिशीलता में वृद्धि से आर्थिक गतिशीलता और आर्थिक अवसरों में सुधार के साथ-साथ आजीविका के स्रोतों में वृद्धि भी होती है।”

 

ड्राइविंग फोर्स: हरियाणा से पांच अन्य राज्यों तक

 

दिल्ली से 100 किमी उत्तर-पश्चिम में सोनीपत जिले के खानपुर कलान में भगत फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय (बीपीएस) के गेट पर गार्ड, आधिकारिक रजिस्टर में दर्ज करने के लिए मेरे पति का नाम जानना चाहता था। प्रवेश और निकास को चिह्नित करने के लिए यह उसके लिए जरूरी था।यह महिलाओं और ग्रामीणों के लिए देश में अपनी तरह का बहु-संकाय आवासीय विश्वविद्यालय है, जो केजी से पीएचडी शिक्षा प्रदान करते हैं।

 

एक संक्षिप्त तर्क के बाद गार्ड ने पति का नाम अंततः छोड़ दिया। अंदर, परिसर में इंजीनियरिंग और विज्ञान का एक स्कूल, शिक्षक प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान, और एक पॉलिटेक्निक कॉलेज है।

 

विश्वविद्यालय, जिसमें कन्या गुरुकुल सीनियर सेकेंडरी स्कूल भी चलता है, उसमें 7,000 छात्रा हैं जिनमें ज्यादातर आस-पास के गांवों से आती हैं।

 

विश्वविद्यालय 2006 में स्थापित किया गया था और सितंबर 2016 में, यूएनडीपी के साथ, एक करियर परामर्श और मार्गदर्शन केंद्र स्थापित किया गया था। विश्वविद्यालय में यूएनडीपी के नोडल अधिकारी सुमन दलाल ने बताया, “हमारे छात्र पास के गांवों से आते हैं। वे नौकरियां चाहते हैं लेकिन जहां वे रहते हैं वहां बहुत सारे अवसर नहीं हैं।”

 

दलाल ने कहा कि लड़कियां खुद, और अक्सर उनके माता-पिता, सिर्फ नौकरियों के लिए स्थानांतरण करने के लिए तैयार नहीं हैं। उनकी मुख्य चिंता है कि हम घर से दूर कैसे यात्रा करेंगे?

 

कंटा सिंह ने कहा, “अगर हम महिलाओं को नौकरी और नियुक्तियां पाने में मदद करना चाहते हैं, तो हमें उन्हें कम से कम एक दोपहिया वाहन चलाना सिखाना होगा, जिसे वे शायद हर हाल में खरीद सकती हैं।”

 

इसलिए शायद आईकेईए फाउंडेशन द्वारा समर्थित यूएनडीपी और इंडिया डेवलपमेंट फाउंडेशन के बीच साझेदारी के बाद, दिशा परियोजना सामने आई। इसमें दोपहिया निर्माता, हीरो मोटोकॉर्प, हरियाणा सरकार और विश्वविद्यालय का भी सहयोग है।

 

हीरो की सीएसआर (कॉर्पोरेट सोशल ज़िम्मेदारी) पहल की अध्यक्षता करने वाल विजय सेठी ने बताते हैं, “जून 2017 से शुरू हुई, विश्वविद्यालय के स्कूटर ड्राइविंग स्कूल सफल रहे हैं। कंपनी ने राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित पांच अन्य राज्यों में भी इसी तरह की पहल शुरू की है। हीरो मधुबन में पुलिस अकादमी में भी एक सहयोगी है।”

 

धीरे-धीरे, पुरुषों ने घूरना बंद कर दिया !

 

बीपीएस में, कुछ 260 महिलाएं, छात्र और विश्वविद्यालय के कर्मचारी, पहले ही सवारी करना सीख चुके हैं। पास के कासंद गांव की महिला सरपंच सबसे पहले नामंकन कराया।

 

 

सरपंच, निशा दयाया मलिक ने कहा, “मैं पहले बैच में शामिल हुई क्योंकि मैं अपने पति पर निर्भर नहीं होना चाहती थी कि हर जगह मुझ वे लेकर जाएं। मेरे गांव में सभी ने देखा कि मैं स्कूटर चलाना सीख रही हूं और अचानक अन्य लड़कियों ने भी कहा कि वे भी सीखना चाहती हैं।”

 

दोपहिया सवारी प्रशिक्षण अकादमी में कई शिक्षार्थी विश्वविद्यालय के कर्मचारी हैं। एक क्लर्क रचना ने कहा कि उन्हें काम तक पहुंचने के लिए हर तरफ से 30 मिनट पैदल की यात्रा करनी पड़ती है।

 

अब, उसने ड्राइव करना सीखा है, और लाइसेंस लिया है और उसने अपनी बचत से अपना पहला दोपहिया वाहन खरीदा है। वह कहती हैं, “घर पर मेरे लिए बहुत काम है, इससे अगर मुझे समय की बचत होती है तो यह मेरे लिए बड़ी मदद है।”

 

पूर्व राज्य स्तरीय हॉकी खिलाड़ी सुमन दलाल को याद है कि उन्होंने पहली बार 2003 में काम करने के लिए कार चलानी शुरू की थी।वह बताती हैं कि “पुरुष अपनी कारों को रोक देते थे और एक महिला चालक को देखने के लिए खिड़की से अपने सिर को बाहर निकाल लेते थे।”

 

 

और अब? उन्होनें अपने कंधों को उचकाते हुए कहा कि “यह अब कोई बड़ी बात नहीं है।”

 

भारतीय महिलाओं का श्रमबल से बाहर होने के कारणों पर देश भर में चल रही हमारी पड़ताल का यह नौवां लेख है।

 

पहले के लेख आप यहां पढ़ सकते हैं:-

 

क्यों भारतीय कार्यस्थलों में कम हो रही है महिलाओं की संख्या –

नौकरी पर महिलाएं : हरियाणा की एक फैक्टरी में उम्मीद के साथ परंपरा का टकराव

घरेलू कामों के दवाब से महिलाओं के लिए बाहर काम करना मुश्किल, मगर अब बदल रही है स्थिति

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हिमाचल प्रदेश की महिलाएं क्यों करती हैं काम: एक जैम फैक्टरी के पास है इसका जवाब

भारत में जज से लेकर श्रमिकों तक यौन उत्पीड़न का दंश

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थोड़ी सी मदद से ही बिहार की गरीब महिलाएं बदल रही हैं अपनी जिंदगी

 

(भंडारे  पत्रकार हैंदिल्ली में रहती हैं और अक्सर भारत के लैंगिक मुद्दों पर लिखती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 19 मई, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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