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हिमालय में स्थिति संकटपूर्ण, तेजी से पिघल रहे हैं बर्फ

दिशा शेट्टी,
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हमता पास, हिमाचल प्रदेश:  हिमाचल प्रदेश के लाहौल और स्पीति जिले में 20,000 फुट इंद्रासन शिखर पर इशारा करते हुए, ट्रेक गाइड करण शर्मा ने कहा, “पृथ्वी गरम हो रही है।” मैले चट्टान और शिलाखण्ड बाहर निकल रहे हैं जहां पिछले वर्षों में बर्फ से ढंका हुआ शिखर होता था। करण शर्मा हंसते हुए कहते हैं, “अब मंगल का ही सहारा है। अब हमें मंगल ग्रह जाना होगा।”

 

सितंबर 2018 में इंद्रासन चोटी का दृश्य

 

23 वर्षीय करण शर्मा बनारा नामक एक गांव के रहने वाले हैं। यह गांव हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध पर्वतीय शहर मनाली से दो घंटे की ड्राइविंग दूरी पर और समुद्र तल से 4,000 फीट की दूरी पर स्थित है। जैसे-जैसे पर्यटक क्षेत्र के ठंडे मौसम और सुरम्य दृश्यों के लिए आने शुरु होते हैं, शर्मा के परिवार और साथी ग्रामीणों में से अधिकांश कुक, ड्राइवर या ट्रेक गाइड के रूप में काम करते हैं। इसके अलावा क्षेत्र के सेब बागानों से भी उन्हें आय होती है। जलवायु का गर्म होना सेब और पर्यटन उद्योग दोनों के लिए चेतावनी है। शर्मा ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया, “पिछले साल हमने सेब के करीब 150 बक्से का उत्पादन किया था। इस साल केवल 50 बक्सों का उत्पादन हुआ है। ” 2018 में, इस क्षेत्र में अक्टूबर के पहले सप्ताह के शुरुआत में भारी बर्फबारी देखी गई, नदियां जम गई और सैकड़ों लोग फंस गए,  जिससे पर्यटन और ट्रेकिंग उद्योग के लिए खतरा पैदा हुआ।

 
वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि के परिणाम के कारण 600 मिलियन भारतीयों के जोखिम आने वालों में से करण और उनके गांव वाले भी हैं।

 

संयुक्त राष्ट्र के इंटरगवर्नमेंट पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की 6  अक्टूबर 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी का तापमान हर दशक 0.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है। 2030 तक और मध्य-शताब्दी के बाद, पूर्व-औद्योगिक आयु तापमान की तुलना में वार्मिंग 1.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाएगी। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यह पानी, भोजन और बीमारी संकट का कारण बन सकता है, जो आजीविका और जीवन को प्रभावित करेगा। जलवायु परिवर्तन से लोगों के जीवन बाधित होने के तरीके पर हमारी श्रृंखला का यह पहला आलेख है। श्रृंखला में नवीनतम वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ भारत के जलवायु परिवर्तन हॉटस्पॉट से ग्राउंड रिपोर्टिंग होगी और हम यह भी देखेंगे कि लोग बदलते माहौल को कैसे अनुकूलित कर रहे हैं।

 

हिमालय का अर्थ

 

हिमालय पश्चिम से पूर्व तक 2,500 किमी में, आठ देशों तक – अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार में फैला हुआ है। दुनिया के 10 सबसे ऊंचे चोटियों में से नौ यहां हैं। एशिया की सबसे बड़ी नदियों में से दस यहां उत्पन्न हुई हैं, जिनमें से तीन ( सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र ) भारत के माध्यम से प्रवाह करती हैं।

 
सिंधु और गंगा जैसे नदियों में लगभग 70 फीसदी पानी, गर्मियों में हिमालयी हिमनदों के पिघलने से आता है। बाकी मानसून बारिश से मिलता है।

 

यह वह पानी है जो भारतीय हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले शर्मा जैसे 50 मिलियन लोगों के लिए जीवन और कृषि को आसान बनाता है। अनुमानित 1.5 बिलियन लोग हिमालय पर पानी, भोजन और ऊर्जा के लिए निर्भर करते हैं।
 

 अब, जलवायु परिवर्तन उनकी आजीविका, उनके जीवन के तरीके, और उनके अस्तित्व को खतरे में डाल रहा है।

 

 

23 वर्षीय करण शर्मा अक्सर अपनी आजीविका पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और उनके गांव के दूसरे लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बात करते हैं।

 

2013 में शुरू होने वाले एक सतत अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता थंबन मेलोथ ने इंडियास्पेन्ड को बताया, ” इस समय में, हिमालय में जलवायु परिवर्तन तेजी से हो रहा है।” नेशनल सेंटर फॉर अंटार्कटिक एंड ओशन रिसर्च (एनसीएओआर), गोवा और भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी), दिल्ली के वैज्ञानिक संयुक्त रूप से भारतीय विज्ञान मंत्रालय के एक अध्ययन का संचालन कर रहे हैं, जिसमें यह देखा जाएगा कि कैसे ग्लोबल वार्मिंग हिमालयी क्षेत्र में 9,579 ग्लेशियरों में से कुछ को प्रभावित कर रही है।

 

 दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), में ‘स्कूल ऑफ एन्वायर्नमेंटल साइंस’ के एपी दीमरी कहते हैं, “हिमालय इस क्षेत्र के मौसम परिसंचरण को भी प्रभावित करता है।” दीमरी दो दशक से इस क्षेत्र का अध्ययन कर रहे हैं- “हिमालय में एक बहुत जीवंत प्रणाली है और बदलाव के बहुत सारे कारक हैं।”

   
पीछे हटता ग्लेशियर

 

एक महीने में कई बार, शर्मा 14,000 फीट की ऊंचाई तक ट्रेक करते है। पहाड़ों में जो बदलाव वह देखते हैं, वह बहुत ही अलग है। पहले कभी न देखे जाने वाले पेड़ों और फलों का अंकुरण हो रहा है। सेब बागानों पर कीट हमले अधिक हो रहे हैं।  हिमालय में ग्रीष्मकाल अधिक गर्म हो रहा है। इतना कि स्थानीय लोगों ने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। वह बताते हैं कि सर्दियों के दौरान बर्फबारी तेजी से और अनियमित होती है। शर्मा बताते हैं, “जब मैं बच्चा था, तो सर्दियों में करीब कमर तक बर्फबारी होती थी। हमारे घर बर्फ में डूब जाते थे। अब कई बार हम केवल इंच भर बर्फबारी होती है। ” अध्ययनों से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन अव्यवस्था जैसे चरम घटनाओं की बाधाओं को बढ़ा रहा है। बेंगलुरु स्थित ट्रेकिंग संगठन इंडियनहाइक, हिमालयी सीमा में करीब दो दर्जन ट्रेक चलाता है और इस क्षेत्र में पर्यावरणीय मुद्दों को भी दस्तावेज कर रहा है, इंडियनहाइक की लक्ष्मी सेल्वकुमारन कहती हैं, “स्थानीय लोग देख रहे हैं कि स्नोलाइन हिमालयी सीमा में ऊपर की ओर बढ़ रही है।” स्नोलाइन एक काल्पनिक रेखा है, जो पर्वत श्रृंखला में चलती है जिसके ऊपर बर्फ गिरता है, और हिमालय के विभिन्न हिस्सों के लिए अलग होता है। अब बर्फ देखने के लिए ऊपर जाना होता है।  
 
हिमालयी ग्लेशियर पृथ्वी पर सभी ताजे पानी के 75 फीसदी का एक प्रमुख घटक हैं जो एक जमे हुए स्थिति में मौजूद हैं। क्रोस्फीयर कहे जाने वाला, यह वैश्विक जलवायु प्रणाली का दूसरा सबसे बड़ा प्रभावक है, और साथ ही सबसे कम अध्ययन किया जाने वाला है। उत्तर और दक्षिण ध्रुवों के बाहर, हिमालय में ग्लेशियर बर्फ की मात्रा बहुत ज्यादा है। ध्रुवों में पाए गए हिमालयी ग्लेशियरों को क्या अलग करता है कि वे बर्फ की स्पष्ट चादरें नहीं हैं, लेकिन उनमें धूल और मलबे हैं। मेलोथ ने इंडियास्पेंड को बताया, “धूल और मलबे अधिक सौर विकिरण को अवशोषित करते हैं जिससे बर्फ तेजी से पिघल जाता है।” लेकिन अगर मलबे की परत बहुत मोटी होती है, तो यह बर्फ को गर्मी से इन्सुलेट करती है और इस प्रकार पिघलती है, जिससे यह एक जटिल संबंध बनाता है।

 

हालांकि इनमें से कुछ ग्लेशियरों का आकार क्रिकेट मैदान के बराबर है, जबकि अन्य सैकड़ों वर्ग किलोमीटर तक फैले पूरे शहरों के रूप में बड़े हैं। वे हर साल ताजा हिमपात की मात्रा के आधार पर, बहुत धीमी गति से, पीछे हटने या आगे बढ़ते हैं।
 

 मेलोथ के नेतृत्व में अध्ययन में पाया गया है कि कुछ क्षेत्रों में ग्लेशियरों हर साल तीन मीटर से पीछे हट रहे हैं, अन्य जगहों पर 40 मीटर तक, 12 मंजिला इमारत की ऊंचाई के बराबर पीछे हट रहे हैं। चूंकि हिमनद बर्फ की सटीक मोटाई को मापना मुश्किल है, वैज्ञानिकों के पास केवल राशि का अनुमान है।

 

न्यूयॉर्क के ‘अर्थ इन्स्टटूट’ में पीएचडी छात्र जोश मूरर ने शीत युद्ध युग से अमेरिकी सैन्य उपग्रह छवियों का उपयोग किया है और नेपाल और सिक्किम के बीच हिमालयी हिमनदों में हुए बदलावों को रेखांकित करने के लिए 2000 के बाद छवियों की तुलना की है। मूरर कहते हैं, “वर्ष 2000 से लेकर बर्फ तक पिघलने की दर 1975 से 2000 के बीच की अवधि के मुकाबले दोगुनी है।”

 

क्रेडिट: जोश मूरर, द अर्थ इंस्टिट्यूट, कोलंबिया यूनिवर्सिटी

 
नदी घाटी के लिए चेतावनी
 

नदियों को हिमालयी ग्लेशियरों द्वारा सींचे जाने का क्या अर्थ है?
 

 मेलोथ ने इंडियास्पेंड को बताया, “मॉडलिंग अध्ययनों से पता चला है कि मौजूदा वार्मिंग दर के साथ, आने वाले दशकों में गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु की प्रमुख नदियों की प्रणाली में बर्फ और ग्लेशियर की मात्रा पिघल जाएगी। लेकिन 21 वीं शताब्दी के दूसरे छमाही में, जब  अधिकांश हिमनद पिघल जाएंगे, नदियों में निर्वहन काफी कम हो सकता है। हिमालयी नदियों तक ग्लेशियर के पिघले हुए पानी से इन बेसिनों में जल सुरक्षा और स्थायित्व को काफी प्रभावित कर सकते हैं। ”  फिलहाल ग्लेशियरों के पिघलने के बाद पानी ऊंचाई वाले झीलों में चले जाते हैं, जो प्राकृतिक बांधों के रूप में कार्य करते हैं। जब इन झीलों में पानी का प्रवाह बढ़ता है, तो यह बाढ़ का कारण बन जाता है।

 

बदलते माहौल की बारीकी से निगरानी करने के लिए, भारत सरकार ने 13,500 फीट की ऊंचाई पर स्पीति में हिमांशु नामक एक स्टेशन स्थापित किया है।

 

ये परिवर्तन क्षेत्र में बढ़ते सेब के किसानों के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि सेब उत्पादन में लंबे समय तक सर्दियों की आवश्यकता होती है। जब बर्फ बढ़ता है, तो सेब के बगीचे भी बढ़ने चाहिए। लेकिन यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।

 

स्पीति जिले में समुद्री स्तर से 16,000 फीट की ऊंचाई पर चन्द्रताल जैसे काफी ऊंचाई पर स्थित झील ग्लेशियर के पानी के पिघलने के बाद प्राकृतिक बांध के रूप में काम करते हैं। जब पिघलने की गति बढ़ती है तो प्राकृतिक बांधों में उफान आता है और नीचे बाढ़ आती है।

 
जीवन कैसे हो जाता है बाधित?
 

 हिमाचल प्रदेश में एक 2013 के अध्ययन में पाया गया कि ज्यादातर सेब किसानों ने उत्पादन में गिरावट और फसल में देरी की सूचना दी है। इसके लिए उन्होंने बर्फबारी को जिम्मेदार ठहराया है। 8,000 फीट की ऊंचाई पर रहने वाले लगभग 80 फीसदी किसानों ने बर्फबारी में उल्लेखनीय कमी दर्ज की है और 9000 फीट ऊंची ऊंचाई पर रहने वाले लगभग 90 फीसदी लोगों का यही कहना है। उन्होंने लगातार कीट के हमलों की भी सूचना दी है।

 
भारत सेब का दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा उत्पादक देश है। 2.3 मिलियन मीट्रिक टन सेब, जो सालाना उत्पादन करते हैं, उनमें से लगभग 60 फीसदी जम्मू-कश्मीर में और शेष हिमाचल प्रदेश में और कुछ हद तक उत्तराखंड में उगाए जाते हैं।
 

 सेब हिमाचल प्रदेश के पूरे फल उत्पादन का 80 फीसदी का गठन करता है। अध्ययन में पाया गया है कि सेब की खेती के तहत क्षेत्र बढ़ रहा है, लेकिन प्रति हेक्टेयर उपज गिर रही है। गर्म तापमान फल उत्पादन को प्रभावित करता है और हिमालयी तापमान बढ़ रहा है। दीमरी कहते हैं, “हिमालय में बर्फ गिरने के दिनों की संख्या घट रही है।” उन्होंने यह भी कहा कि, अधिक ऊंचाई पर वार्मिंग की दर अधिक है।

 

अक्टूबर 2018 आईपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के प्रतिकूल परिणामों के कारण कृषि में शामिल लोगों बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इसका मतलब यह होगा कि एशिया और अफ्रीका में बड़ी संख्या में लोग गरीबी में उतर सकते हैं।

 
आईपीसीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि भारत इन परिवर्तनों से निपटना चाहता है, तो अगले दशक में कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने के लिए इसे वैश्विक समुदाय के साथ काम करना होगा। ऊर्जा उत्पादन के लिए कोयले के उपयोग में 78 फीसदी तक गिरावट करनी होगी, जबकि बिजली का 60 फीसदी नवीकरणीय संसाधनों से आना होगा।

 

मेलोथ, कुछ और बिंदुओं को रेखांकित करते हैं: जलवायु बदल रहा है और समाज को तैयार रहना चाहिए। अनुकूलन रणनीतियों और सरल तरीकों की तलाश करके हमें आगे बढ़ना है। उदाहरण के लिए, लद्दाख में, इंजीनियर और नवप्रवर्तनक सोनम वांगचुक ने गर्मियों में अतिरिक्त प्रवाह पानी का उपयोग करने का एक तरीका तैयार किया है – इस पानी को सर्दियों में बर्फ स्तूप के रूप में संग्रहीत करके, इसे गर्मियों के महीनों में उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाता है

 

( साइंस जर्नलिस्ट दिशा शेट्टी जलवायु परिवर्तन पर ‘कोलंबिया पत्रकारिता स्कूल-इंडियास्पेंड’ रिपोर्टिंग फेलो हैं।

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 12 अक्टूबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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