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18 वर्षों में दिहाड़ी मजदूरी दोगुनी, मजदूरी असमानता में वृद्धि

तिश संघेरा,
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मुंबई: पिछले दो दशकों में वार्षिक औसत सकल घरेलू उत्पाद में 7 फीसदी की वृद्धि के बावजूद भारत में कम वेतन और मजदूरी में असमानता बनी हुई है, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र एजेंसी, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की एक नई रिपोर्ट ले पता चलता है।

 

जबकि 1993-94 और 2011-12 के बीच 18 वर्षों में, वास्तविक मजदूरी लगभग दोगुनी और सकल घरेलू उत्पाद चार गुना बढ़ा है। इंडिया वेज रिपोर्ट में कहा गया है कि “भारतीय श्रम बाजार में विभाजन और अनौपचारिकता के उच्च स्तर हैं, जो आदर्श कार्य परिस्थितियों और समावेशी विकास को प्राप्त करने के लिए भारत के मार्ग को रोकती हैं। । इस रिपोर्ट में भारत में मजदूरी के रुझानों का विश्लेषण करने और समावेशी विकास के लिए नीतियों पर प्रतिबिंबित करने के लिए राष्ट्रीय रोजगार और बेरोजगारी सर्वेक्षण (ईयूएस) और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) से सरकारी मजदूरी और रोजगार डेटा का उपयोग किया गया है।

 

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन में मजदूरी के विशेषज्ञ और रिपोर्ट के लेखकों में से एक जेवियर एस्टुपियन ने इंडियास्पेंड को बताया, “हम आश्चर्यचकित हैं कि मजदूरी नीति ने अब तक कम मजदूरी कमाने वालों पर एक बड़ा प्रभाव नहीं बनाया है। यदि आपके पास मजबूत मजदूरी नीति है, तो यह उन कर्मचारियों के हिस्से को लाभान्वित करेगा जो आकस्मिक श्रमिक हैं,  जो अपनी आय रोजाना के आधार पर प्राप्त करते हैं और नौकरी की सुरक्षा जिनके पास कम है।”

 

ईयूएस पर उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है, वर्ष 2011-12 में 62 फीसदी (121 मिलियन) तक नियोजित लोग आकस्मिक कर्मचारी थे। फिर भी, संगठित क्षेत्रों में रोजगार में वृद्धि हुई है। हालांकि इनमें से ढेर सारी नौकरियां अनौपचारिक, अनियमित और बुनियादी सामाजिक सुरक्षा लाभ की कमी के साथ थे।

 

लिंग, राज्यों और आकस्मिक / वेतनभोगी श्रमिकों में व्यापक असमानता पूरे देश में व्यापक रूप से असमान रोजगार परिदृश्य दिखाती है। महिलाएं अभी भी पुरुषों की तुलना में औसतन 34 फीसदी कम कमाती हैं, (हालांकि 1993-94 में 48 फीसदी का आंकड़ा था) और ग्रामीण नियमित श्रमिकों की दैनिक मजदूरी औसतन, उनके शहरी समकक्षों की तुलना में 49 फीसदी कम है।

 

एक विभाजित भारत

 

लिंग

 

रिपोर्ट में कहा गया है, “भारत में श्रम बाजारों में लिंग आधारित असमानताएं हैं।” एनएसएसओ के आंकड़ों के मुताबिक, 1993-94 और 2011-12 के बीच पुरुषों की तुलना में महिलाओं की दिहाड़ी मजदूरी में तेजी से वृद्धि हुई हो सकती है, लेकिन महिला श्रमिकों को अभी भी हर रोजगार श्रेणी में पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी का भुगतान किया जाता है।

 

रिपोर्ट में, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के कार्यान्वयन के लिए वेतन अंतर में संकुचन को जिम्मेदार ठहराया गया है (1993-94 में 48 फीसदी से घटकर 2004-05 में 45 फीसदी होकर 2011-12 में 34 फीसदी हुआ है)। हम बता दें कि मनरेगा एक सरकारी योजना है, जो ग्रामीण श्रमिकों के लिए रोजगार और न्यूनतम मजदूरी की गारंटी देती है। इस योजना में नामांकित महिलाओं की मजदूरी बढ़ी है और इससे लिंग मजदूरी के अंतर में गिरावट आई है।

 

भारत में महिला और पुरुषों की दिहाड़ी मजदूरी

हालांकि, 34 फीसदी पर, अंतर वैश्विक औसत से अधिक है, जो 2015 में 23 फीसदी होने का अनुमान है, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है।

 

भारत में लिंग मजदूरी अंतर, 1993-94- 2011-12

 

उच्च शिक्षा के बाद भी पुरुषों और महिलाओं के बीच लिंग मजदूरी का अंतर उच्च रहता है- ग्रेजुएट महिला को औसतन 609 रुपये का भुगतान किया जाता है, जबकि ग्रैजुएट या उच्चतर डिग्री के साथ पुरुषों को 805 रुपये का भुगतान किया जाता है, जैसा कि सरकार के ‘मेन एंड वुमन इन 2017’ अध्ययन में बताया गया है।

 

अगर भारत ने धार्मिक मान्यताओं की कट्टरता को त्याग दिया, जो लिंग असमानताओं और जाति भेदभाव को कायम रखता है, तो यह पिछले 60 वर्षों की प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि को आधे समय में दोगुना कर सकता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 18 अगस्त, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

रोजगार की स्थिति और स्थान

 

शहरी इलाकों में नियमित श्रमिक रोजाना 449 रुपये कमाते हैं, जो ग्रामीण इलाकों के समकक्षों की तुलना में 49 फीसदी अधिक है। ग्रामीण इलाकों में नियमित श्रमिक रोजना 300 रुपये कमाते हैं।

 

ग्रामीण इलाकों में अनौपचारिक श्रमिक कम से कम 138 रुपये कमाते हैं; हालांकि, इस समूह और नियमित श्रमिकों के बीच का अंतर शहरी केंद्रों (149 रुपये के बजाय 33 रुपये) की तुलना में संकुचित है।

 

उप-समूह द्वारा औसत दिहाड़ी मजदूरी, 2011-12

 

लिंग के माध्यम से डेटा विच्छेदन, आगे और असमानता का खुलासा करता है। नियमित शहरी पुरुष श्रमिकों के साथ उच्चतम दिहाड़ी मजदूरी (470 रुपये) और आकस्मिक ग्रामीण महिला श्रमिकों की सबसे कम (104 रुपये) कमाने के साथ रिपोर्ट में पाया गया कि हर वर्ग में पुरुषों की तुलना में महिलाएं कम कमाती हैं।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि संगठित क्षेत्र में अधिक अनौपचारिक और संविदात्मक नौकरियां शामिल की जा रही हैं लेकिन 1991 के बाद नियमित नौकरियों में पर्याप्त वृद्धि नहीं हुई है।

 

नौकरी निर्माण पर बहस उपलब्ध डेटा की कमी से बाधित है (हालांकि इस जून, 2018 एनडीटीवी रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने मामलों में सुधार के लिए एक तकनीकी समिति की स्थापना की है)  लेकिन ‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ (सीएमआईई) ‘प्रोवेस आईक्यू डेटाबेस’ का कॉर्पोरेट डेटा नौकरी की वृद्धि दर सालाना 2 फीसदी दिखाता है, जो 2006-11 के बीच 4-5 फीसदी के आंकड़ों से नीचे है।

 

उप-समूह द्वारा औसत दिहाड़ी मजदूरी, 2011-12

 

हालांकि, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि क्या यह काम करने की स्थितियों में सुधार या गिरावट दर्शाता है। जबकि, अनुबंधित श्रमिकों में सामाजिक सुरक्षा और लाभ की कमी हो सकती है, असंगठित क्षेत्र से आगे बढ़ने से मजदूरी में वृद्धि हो सकती है और बेरोजगारी में गिरावट आ सकती है, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है।

 

राज्यवार असमानताएं

 

1993-94 के बाद से राज्यों में उच्चतम और निम्नतम औसत दिहाड़ी मजदूरी के बीच का अंतर बढ़ गया है।

 

उच्चतम कमाई वाले राज्यों में आकस्मिक श्रमिकों ने 2011-12 में सबसे कम कमाई करने वाले राज्यों की तुलना में 238 फीसदी अधिक कमाया है। 1993-94 में यह आंकड़े 168 फीसदी थे। इसी अवधि में नियमित श्रमिकों की तुलना में आकस्मिक श्रमिकों की स्थिति खराब (106 फीसदी बनाम 54 फीसदी) रही है।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि बेहतर आर्थिक संकेतकों के साथ अधिक विकसित राज्यों में कम विकसित राज्यों की तुलना में नियमित श्रमिकों के लिए उच्च औसत मजदूरी नहीं है।

 

हरियाणा उच्चतम दैनिक शहरी मजदूरी (783 रुपये) के लिए सूची में सबसे ऊपर है, इसके बाद असम (607 रुपये), झारखंड (543 रुपये), और जम्मू-कश्मीर (495 रुपये) का स्थान है, जैसा कि राज्य प्रति व्यक्ति आय और नियमित शहरी मजदूरी के बीच थोड़े सहसंबंध से पता चलता है।

 

पंजाब, तमिलनाडु, गुजरात और कर्नाटक(100,000 रुपये से ऊपर प्रति व्यक्ति आय) सभी नियमित शहरी श्रमिकों के लिए कम औसत मजदूरी का स्तर इंगित करते हैं।

 

राज्यवार नाममात्र नियमित शहरी मजदूरी, 2011-12
राज्य औसत दैनिक वेतन (रुपये में) प्रति व्यक्ति आय (रुपये में)
हरियाणा 783 1,48,485
असम 607 54,618
झारखंड 543 56,737
जम्मू-कश्मीर 495 62,857
पंजाब 362 1,14,561
तमिलनाडु 388 1,30,197
गुजरात 320 1,24,678

Source: India Wage Report, International Labour Organization, and Press Information Bureau, Government Of India

 

ग्रामीण नियमित श्रमिकों के लिए, एक नियमित कार्यकर्ता के लिए आर्थिक विकास और उच्च औसत दिहाड़ी मजदूरी के बीच संबंध भी गायब है और यह रिपोर्ट लेखकों के लिए परेशानी है। झारखंड (485 रुपये), उत्तराखंड (463 रुपये) और जम्मू-कश्मीर (431 रुपये) शीर्ष पर हैं और कर्नाटक (300 रुपये) आखिरी स्थान पर हैं।

 

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के बावजूद मजदूरी में असमानता

 

हालांकि भारत न्यूनतम मजदूरी अधिनियम (1948) स्थापित करने वाले पहले विकासशील देशों में से एक था, लेकिन कई मुद्दे गरीबी और असमानता को मिटाने में बाधक हैं।

 

इसकी जटिल प्रकृति (देश भर में अनुमानित 1,709 विभिन्न न्यूनतम मजदूरी दर हैं) और इसका कानूनी आवेदन ‘ शिड्यूल ‘ व्यवसायों में श्रमिकों तक ही सीमित है ( सरकार द्वारा वर्गीकृत नौकरियां में कम वेतन और शोषण सबसे कमजोर कडी हैं ), इसका मतलब इसका प्रभाव “अप्रभावी” है, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है।

 

न्यूनतम मजदूरी दर राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित की जाती हैं, और हमेशा जीवन की लागत को प्रतिबिंबित नहीं करती है।

 

2013 में, अरुणाचल प्रदेश में कृषि मजदूरों को रोजाना 80 रुपये, उड़ीसा में 126 रुपये और कर्नाटक में 269 रुपये का भुगतान किया गया था।

 

इसके अलावा, केवल 66 फीसदी श्रमिक न्यूनतम मजदूरी अधिनियम द्वारा कवर किए जाते हैं। शेष 34 फीसदी “अनुसूचित व्यवसाय” में नहीं हैं और न्यूनतम मजदूरी कानून के दायरे से बाहर रहते हैं।

 

1991 में राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी शुरू की गई थी, लेकिन इसका आवेदन कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। 2009 में, नियमित श्रमिकों का 15 फीसदी और 41 फीसदी आकस्मिक श्रमिकों ने इस न्यूनतम दैनिक मजदूरी से कम अर्जित किया, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है।

 

मजदूरी असमानता को हल करना

 

न्यूनतम मजदूरी संरचनाओं को सरल बनाना, सभी मजदूरी श्रमिकों को कानूनी दायरा बढ़ाना और कानूनी समर्थन महत्वपूर्ण कदम हैं, लेकिन कानून स्वयं पर्याप्त नहीं है, जैसा कि रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है।

 

सरकारों को कौशल संचय पर ध्यान केंद्रित करके और अधिक शिक्षित श्रमिकों की आपूर्ति में वृद्धि करके उच्च उत्पादकता क्षेत्रों में परिवर्तन की सुविधा प्रदान करनी चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि उच्च कुशल श्रमिकों के अनुपात में वृद्धि से कम कुशल श्रमिकों की मजदूरी में वृद्धि हो सकती है और इस प्रकार असमानता कम हो सकती है।

 

रिपोर्ट मनरेगा के श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी और उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित करने के उदाहरण का उपयोग करती है, और श्रमिकों को यह ज्ञान अन्य समूहों के बीच साझा करने की इजाजत देता है, जो वेतन वृद्धि की मांग करते हैं। इसी प्रकार, तथ्य यह है कि मनरेगा मजदूरी इलेक्ट्रॉनिक रूप से निगरानी और अनुपालन को स्थानांतरित कर दी जाती है।

 

एस्टुपियन कहते हैं, “मजदूरी नीति का हल हर सवाल का जवाब नहीं है, मैं इसका पुरजोर समर्थन करता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि ब्राजील और चीन में कितना और क्या किया गया है। इस समय, जब अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, तो बेहतर समावेशन की संभावना है”।

 

रिपोर्ट के अनुसार, ब्राजील में, नियमित आधार पर न्यूनतम मजदूरी संशोधित की जाती है और पिछले दो वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि को ध्यान में रखा जाता है।

 

(संघेरा लेखक और शोधकर्ता है और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 27 अगस्त, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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