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1990 के मुकाबले, अब हृदय रोग से मौतों की संख्या दोगुनी

तौफिक रशिद,
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नई दिल्ली: वर्ष 2016 में, किसी अन्य गैर-संक्रमणीय बीमारी की तुलना में हृदय संबंधी बीमारियों के कारण अधिक भारतीयों की मौत (28 फीसदी) हुई है। यह जानकारी स्वास्थ्य पत्रिका ‘द लैन्सेंट’ के सितंबर 2018 के अंक में प्रकाशित एक नए अध्ययन में सामने आई है। यह आंकड़े 1990 में हृदय रोगों के कारण हुई मौतों की संख्या की तुलना में दोगुनी है। 1990 में यह आंकड़े 15 फीसदी थे। ‘द चेंजजिंग पैटर्न ऑफ कार्डीओवैस्क्यलर डिजीज एंड देअर रिस्क फैक्टरस इन द स्टेट ऑफ इंडिया : द ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी,1990-2016’ शीर्षक अध्ययन के अनुसार भारत में हृदय की बीमारियों के कारण होने वाली मौतों में वृद्धि हुई है। यह आंकड़े 1990 में 1.3 मिलियन से बढ़ कर 2016 में 2.8 मिलियन हुआ है । वर्ष 2016 में दिल की बीमारियों के कारण मरने वालों में से आधे से ज्यादा 70 वर्ष से कम आयु के थे।  कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों में विभिन्न प्रकार के हृदय रोग, स्ट्रोक,और अंगों को रक्त पहुंचाने वाली वाहिकाओं की बीमारियां आती हैं। उनमें से, कोरोनरी धमनी रोग, जिसे इस्किमिक हृदय रोग भी कहा जाता है और स्ट्रोक अधिकांश मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। अध्ययन के अनुसार 17.8 फीसदी मौतें इस्किमिक हृदय रोग और 7.1 फीसदी मौतें स्ट्रोक के कारण हुई हैं। रूमैटिक फीवर के कारण होने वाला रूमैटिक हार्ट डिसीज का खतरा देश में कुछ कम हुआ है।कुल मौत में इसकी हिस्सेदारी 1.1 फीसदी है। लेकिन अध्ययन के मुताबिक, भारत अभी भी वैश्विक बीमारी के बोझ में 38 फीसदी का योगदान देता है।

 

अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि हृदय रोग से प्रभावित लोगों की संख्या दोगुनी हो गई है।

 

2016 में इस बीमारी से लगभग 54.5 मिलियन लोग प्रभावित हुए थे, जबकि 1990 में यह आंकड़े 25.7 मिलियन थे।

 

महिलाओं की तुलना में पुरुषों में धमनियों की कठोरता अधिक आम है, जबकि स्ट्रोक दोनों लिंगों को समान रूप से प्रभावित करते हैं।

 

25 वर्षों से प्रत्येक भारतीय राज्य में कार्डियोवैस्कुलर बीमारी में रुझानों को दस्तावेज करने वाले अध्ययन में दिल की बीमारी को “भारत की राज्यों में समयपूर्व मौत और एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या” के रुप में दर्ज किया गया है।

 

 जैसा कि हमने नीचे चर्चा की है, विद्वानों द्वारा हाइलाइट किया गया एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि यहां तक ​​कि उन राज्यों में जहां हृदय रोग में कम प्रसार था- जैसे कि बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे लगभग कम विकसित राज्य- वहां से भी अब जोखिम की सूचना मिल रही है। अध्ययन के लेखकों का मानना है कि इससे लड़ने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप की सख्त आवश्यकता है।

 
खराब भोजन, रक्तचाप, वायु प्रदूषण, उच्च कोलेस्ट्रॉल और तंबाकू: सबसे बड़ा कारक
 

 एक संस्था, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया में कार्डियोलॉजिस्ट और पेपर के प्रमुख लेखक, डोराइराज प्रभाकरन ने इस हृदय रोग का कारण अस्वास्थ्यकर आहार, उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल, मधुमेह, मोटापा और वायु प्रदूषण बताया है।  इनमें से पांच प्रमुख जोखिम कारक हैं: खराब भोजन की आदतें (54.4 फीसदी), उच्च रक्तचाप (56.6 फीसदी), वायु प्रदूषण (31 फीसदी), उच्च कोलेस्ट्रॉल (29.4 फीसदी) और तंबाकू उपयोग (18.9 फीसदी)। तंबाकू उपयोगकर्ताओं में 83 फीसदी में धूम्रपान को भी एक बड़ा जोखिम माना जाता है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने सभी राज्यों में धूम्रपान की आदतों में गिरावट देखी है।

    

2016 में कार्डियोवैस्कुलर बीमारी का प्रसार केरल, पंजाब और तमिलनाडु में सबसे अधिक था – प्रति 100,000 की आबादी पर 5,000 से अधिक। आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा और पश्चिम बंगाल में प्रति 100,000 पर में 4,500 से 4,999 के बीच के प्रसार के साथ दूसरे स्थान पर रहा है।

 

‘पीएचएफआई’ और ‘हार्वर्ड टी एच चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ द्वारा जून 2018 के एक अध्ययन में कहा गया है कि भारत में समृद्ध और अधिक शहरीकृत राज्यों में हृदय रोग का उच्च जोखिम है।

 

इस अध्ययन में पाया गया कि विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में धन में वृद्धि के साथ कार्डियक जोखिम में वृद्धि हुई है। ग्रामीण इलाकों में,  सबसे गरीब 20 फीसदी जिलों की तुलना में सबसे समृद्ध 20 फीसदी जिलों में रहने वाले लोग 10 साल के कार्डियक जोखिम में 13.1 फीसदी की सापेक्ष वृद्धि से जुड़े थे। शहरी क्षेत्रों में, वृद्धि 4.3 फीसदी थी।

 

चूंकि पिछले 26 वर्षों में आय बढ़ी है तो भारत में बीमारी का बोझ बदल गया है। वर्ष 2016 में भारत में अधिक मौतें (61.8 फीसदी) गैर-संक्रमणीय बीमारियों जैसे कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों और क्रोनिक अवरोधक फुफ्फुसीय बीमारी के कारण थीं, जबकि 1990 में अधिक मृत्यु (53.6 फीसदी) संक्रमणीय, मातृ, नवजात और पोषण (सीएमएमएनडी) रोगों के कारण थी, जैसा कि मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट’ में प्रकाशित नवंबर 2017 के अध्ययन से पता चलता है।

 

सभी राज्यों में जोखिम में वृद्धि

 

1990 से 2016 के बीच सभी राज्यों में जोखिम बढ़ गए हैं। कम विकसित राज्यों में, हृदय रोगों का प्रसार कम था। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मेघालय, असम, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा में, रोग का प्रसार प्रति 1,000,000 आबादी पर 3,000 से 4,000 के बीच था। लेकिन 1990 की तुलना में जोखिम कारकों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हाल के वर्षों में इन राज्यों में बीमारी के बोझ में भी 15 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

लेखकों ने इन कम उन्नत राज्यों पर विशेष ध्यान देने के साथ, भारत के सभी राज्यों में इस्किमिक हृदय रोग, स्ट्रोक और उनके जोखिम कारकों के बढ़ते प्रसार को नियंत्रित करने के लिए तत्काल नीतिगत कार्रवाई की सिफारिश की है।

 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना ‘आयुषमान भारत’ के तहत बेहतर प्राथमिक देखभाल और वित्तीय सुरक्षा प्रदान करके ऐसा करना संभव है। इस योजना का उद्देश्य 100 मिलियन गरीब और कमजोर परिवारों को स्वास्थ्य कवर प्रदान करना है।

 

सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में हृदय रोग का सामना कैसे किया जा सकता है? प्रभाकरन कहते हैं, “स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों के माध्यम से प्राथमिक देखभाल को मजबूत करके, स्वास्थ्य देखभाल के माध्यमिक और तृतीयक स्तरों के साथ उचित रेफरल संबंध शुरू करना जरूरी है। साथ ही  वसा, नमक और चीनी की खपत को कम करने, वायु प्रदूषण को कम करने, धूम्रपान विरोधी अभियान को बनाए रखने और निरंतर निगरानी के लिए बहु-क्षेत्रीय सहयोग शुरू करके जोखिम को कम किया जा सकता है।

 

यह अध्ययन राज्य स्तरीय डिसीज बर्डन पहल का एक हिस्सा है, जो भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद, पीएचएफआई और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के सहयोग से स्वास्थ्य मेट्रिक्स और मूल्यांकन संस्थान द्वारा संयुक्त रूप से संचालित एक परियोजना है। इसमें 100 से अधिक भारतीय संस्थानों में जुड़े विशेषज्ञों और हितधारकों को भी शामिल किया गया है।

 

सहयोग के परिणामस्वरूप 1990 से ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीज’ अध्ययन के हिस्से के रूप में विज्ञान डेटा के विश्लेषण के आधार पर भारत में हर राज्य के लिए कई प्रमुख गैर-संक्रमणीय बीमारियों और आत्महत्या की संख्याओं का व्यापक विश्लेषण हुआ है। ‘द लैन्सेंट ग्लोबल हेल्थ’, ‘द लैन्सेंट पब्लिक हेल्थ’, और ‘द लैन्सेंट ओन्कोलॉजी’ में प्रकाशित पांच शोध पत्रों की श्रृंखला में इन निष्कर्षों की रिपोर्ट दी गई है।

 
(रशीद ‘पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ में इक्स्टर्नल कम्यूनकैशन एंड डिजीटल के वरिष्ठ प्रबंधक हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 18 सितंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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