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2015 में किए गए मोदी के 8 वादे: कुछ पूरे, कुछ पर काम जारी

देवानिक साहा,
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 अगस्त को अपने तीसरे स्वतंत्रता दिवस भाषण देने के लिए तैयार हैं और इस बार उन्हें किन मुद्दों पर बोलना चाहिए उन विचारों को वह आम नागरिकों से आमंत्रित कर रहे हैं।

 

 

वित्तीय समावेशन को तेजी, हर विद्यालय में शौचालय, रसोई गैस सब्सिडी में कमी, और गांवों का विद्युतीकरण जैसे कुछ वादे थे जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2015 को अपने दूसरे स्वतंत्रता दिवस के भाषण के दौरान किए थे।FactChecker ने प्रधानमंत्री द्वारा की गई प्रमुख घोषणाओं के कार्यान्वयन की समीक्षा की है, जैसा कि हमने पहले 2014 के भाषण का किया था।

 

1. प्रधानमंत्री जन धन योजना : 228 मिलियन से अधिक खाते खोले गए; 24 फीसदी में पैसे नहीं

 

क्या कहा था मोदी ने: “मैंने पिछले 15 अगस्त को जन धन योजना की घोषणा की थी। आज़ादी के 60 वर्ष बाद भी, जब बैंकों को गरीबों के लिए राष्ट्रीयकृत किया गया, देश के 40 फीसदी लोग, पिछले 15 अगस्त तक बिना बैंक खातों के थे; बैंकों के दरवाजे गरीबों के लिए खुले नहीं थे। मेरे देशवासियों, आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि हमने समय सीमा के भीतर है कि लक्ष्य हासिल कर लिया है। प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत 17 करोड़ लोगों ने बैंक खाते खोले हैं। गरीबों के लिए अवसरों का विस्तार करने के विचार के साथ हमने कहा था कि इन बैंक खातों को शून्य बैलेंस के साथ खोला जा सकता है।”

 

कितना हुआ काम पूरा: 3 अगस्त 2015 तक कम से कम 228.1 मिलियन नए बैंक खाते खोले गए हैं, जोकि 31 फीसदी की वृद्धि है – 2015 में 17.4 करोड़ खाते खोले गए थे – इनमें से 24 फीसदी खातों में कोई राशि नहीं है, जोकि 2015 से 22 फीसदी कम है। पिछले एक वर्ष के दौरान, इन खातों के बैलेंस में 85 फीसदी की वृद्धि हुई है, 22,033 करोड़ रुपए से 40,795 करोड़ रुपए हुए हैं।

 

पिछले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने , पांच वर्षों में, गरीबों के लिए 5 करोड़ से अधिक “सीमित सुविधा खाता” (नो फ्रिल अकाउंट) खोले हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश का इस्तेमाल नहीं किया गया है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अक्टूबर 2014 में विस्तार से बताया है।

 

2.स्वच्छ विद्यालय अभियान : सभी स्कूलों में लड़कों और लड़कियों के लिए 100 फीसदी अलग शौचालय का दावा, लेकिन सच नहीं

 

क्या कहा था मोदी ने: “यह अभी मेरे दिल में आया और मैंने घोषणा की थी कि अगले 15 वीं अगस्त तक हम हमारे सभी स्कूलों के लिए लड़कों और लड़कियों के लिए अलग शौचालय का निर्माण करेंगे। लेकिन बाद में जब हमने काम करना शुरु किया तो, “टीम इंडिया” ने अपनी जिम्मेदारियों को समझा, हमने महसूस किया कि 2 लाख और 62 हजार ऐसे स्कूल हैं जहां 4.25 लाख से अधिक शौचालयों का निर्माण करना आवश्यक है। मैं सभी राज्य सरकारों जिलों के सरकारी अधिकारियों, नीति निर्माताओं और शैक्षिक संस्थानों को बधाई देता हूं जो इस उपलब्धि को साकार करने में शामिल थे।”

 

कितना हुआ काम पूरा: राष्ट्र स्तर पर FactChecker की जांच यह दावा करती है कि भारत के 100 फीसदी स्कूलों के लिए यह सच नहीं है। सात राज्यों में यादृच्छिक जाँच से व्यापक कमियों का पता चलता है, जैसे कि:

 

  • कई स्कूलों, शहरी दिल्ली से पिछड़े इलाकों तक, अक्सर दूरदराज के इलाके जैसे कि चतरा जिले (झारखंड) और सेडैम तालुका, गुलबर्गा जिले (कर्नाटक), में शौचालय नहीं है। विशिष्ट दावा कि हर स्कूल में लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय हैं, यह सत्य नहीं है।
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  • कुछ इलाकों में मौजूदा शौचालयों में, जैसे कि दिल्ली, सीतापुर (उत्तर प्रदेश), तुमकुर (कर्नाटक) , दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) और वनापर्थी (तेलंगाना) –  या तो पहले से बना हुआ या नया बनाया गया – या तो पानी नहीं है या सुव्यवस्थित नहीं है। यही कारण है कि यह बेकार बन जाता है। पानी की कमी के कारण कुछ छात्रों के इस्तेमाल के बाद शौचालय काम करने योग्य नहीं रह जाता है।
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  • विदिशा ( मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान के निर्वाचन क्षेत्र ), चतरा (झारखंड) और बारामूला ( जम्मू-कश्मीर ) में नव निर्मित शौचालयों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है क्योंकि इन्हें जल्दबाज़ी में बनाया गया है और जल निकासी का कोई मार्ग नहीं दिया गया है। बारामूला में, शौचालय वहां बनाया गया जहां कोई स्कूल नहीं था। स्कूल उस स्थान से एक वर्ष पहले ही हटा दिया गया है लेकिन शौचालय निर्माण का कार्य आगे किया गया ताकि यह दिखा सकें कि शौचालय का निर्माण हुआ है।
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  • अभियान के तहत, 262,000 स्कूलों में 417,000 शौचालयों के निर्माण या प्रति स्कूल 1.5 शौचालय बनाने का उदेश्य था। इसका मतलब हुआ कि कुछ स्कूलों में अधिकतम दो शौचालय या एक शौचालय का निर्माण होना था। प्रति स्कूल एक या दो शौचालय पर्याप्त नहीं है (उद्हारण के लिए,पिल्लांगकट्टा, री भोई जिला, मेघालय के दो सरकारी स्कूलों में 250 से अधिक छात्रों के लिए एक ही शौचालय हैं, जोकि पर्याप्त नहीं है; लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है और पानी की व्यवस्था भी नहीं है।)
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  • बच्चों को शौचालयों का इस्तेमाल करने के बारे से शिक्षित करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि शौचालयों का निर्माण करना है। शौचालयों के निर्माण में इतनी जल्दबाज़ी की गई है कि विभिन्न हितधारकों के मिशन के महत्व को समझने का समय नहीं मिला है।

 

कई राज्यों में मई 2016 में एबीपी न्यूज द्वारा कराए गए एक और जांच के अनुसार शौचालयों की दशा बहुत खराब थी या इस्तेमाल करने योग्य नहीं था।

 

जून 2016 में, भाजपा शासित मध्य प्रदेश के सतना जिले में पांच लड़कियों को एक उचित शौचालय के अभाव में एक सरकारी स्कूल छोड़ दिया था।

 

3. इसे छोड़ दो : 1 करोड़ ने स्वेच्छा से एलपीजी सब्सिडी छोड़ दिया है, 1.76 करोड़ महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन मिला

 

क्या कहा था मोदी ने: “ मेरे भाइयों और बहनों, मैं अपने देशवासियों के लिए एक अनुरोध किया था कि यदि आप आर्थिक रूप से मजबूत हैं, तो आप  क्यों रसोई गैस पर सब्सिडी का लाभ उठाते हैं? क्यों आप पांच सौ से सात सौ रुपये की इस मामूली रकम है, जो आप आमतौर पर छोटी-मोटी नाश्ते पर खर्च कर देते हैं, उसकी जरूरत है? मैंने इस बारे में केवल संदेश देना शुरु किया। इसे से संबंधित कोई अभियान भी शुरु नहीं की गई क्योंकि “टीम इंडिया’ पर मुझे विश्वास है। जैसे ही संदेश फैलाता है, परिणाम आ जाएगा, लेकिन आज मैं यह गर्व के साथ कह सकता हूं, जब से मैंने “इसे छोड़ दो” का अभियान शुरु किया है, आज की तारीख तक 20 लाख उपभोक्ताओं ने एलपीजी गैस सिलेंडर की सब्सिडी छोड़ दिया है।”

 

कितना हुआ काम पूरा: तेल और पेट्रोलियम मंत्रालय से हाल ही में आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1 करोड़ लोगों ने स्वेच्छा से अपने एलपीजी सब्सिडी छोड़ दिया है।केंद्र ने गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली 50 लाख महिलाओं को एलपीजी कनेक्शन प्रदान करने के लिए “वित्त वर्ष 2016-17 से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ की शुआत की है।

 

संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, 25 जुलाई 2016 तक कार्यक्रम के तहत कम से कम 1.76 करोड़ कनेक्शन दिए गए हैं।

 

4. एलपीजी सब्सिडी सरकार द्वारा किए गए दावे के 10 फीसदी की बचत: लेखा परीक्षक का कहना है 20,000 करोड़ रुपए नहीं बल्कि 2,000 करोड़ रुपए है।

 

क्या कहा था मोदी ने: “इस तरह के विशाल देश में भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिए कई प्रकार के अनगिनत प्रयास किया जाना है, और यह किया जा सकता है। यदि मैंने कहा था कि मैं एलपीजी गैस पर 15 हजार रुपये कोर लायक सब्सिडी में कटौती करुंगा तो तो मैं कह सकता हूँ कि मेरी सरकार की महिमा करने के लिएसैकड़ों लेख लिखे गए हैं। वे कह सते हैं कि इस आदमी के पास एलपीजी गैस पर 15 हजार रुपए कोर सब्सिडी बंद करने के लिए सत्ता और शक्ति है।” मई 2016 में, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने दावा किया कि यह राशि पिछले दो वित्त वर्ष में यह राशि 21,000 करोड़ से अधिक थी।

 

कितना हुआ काम पूरा: वर्तमान सत्र के दौरान संसद में, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग), सरकार के लेखा परीक्षक, की हालिया रिपोर्ट के अनुसार जिन लोगों ने एलपीजी सब्सिडी को छोड़ा है, उससे 2,000 करोड़ रुपए से कम जुड़ा है, जैसा कि 20 जुलाई, 2016 को हिंदू की रिपोर्ट में बताया गया है।

 

लेखा परीक्षा भी एलपीजी सब्सिडी के नकद हस्तांतरण, व्यावसायिक उपयोग और वाणिज्यिक एलपीजी घरों में इस्तेमाल किया जा रहा है के लिए घरेलू सब्सिडी के मोड़ सहित प्रणालीगत समस्या पाया गया है।

 

कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि सब्सिडी विसंगति ज्यादातर एलपीजी की वैश्विक कीमत आयातित में गिरावट के कारण हुई है।

 

5.गांवों में बिजली : सरकार कहती है कि 98.1 फीसदी  विद्युतीकृत हैं, लेकिन बिजली आपूर्ति शक के घेरे में

 

क्या कहा था मोदी ने: “भाइयों और बहनों, आने वाले दिनों में मैं एक मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हैं। आज भी हमारे देश में लगभग अठारह हजार, पांच सौ ऐसे गांवों में जहां बिजली के तार और खंभे पहुंचने हैं। अठारह हजार पांच सौ गांवों ऐसे हैं जो आजादी का सूरज, आजादी की रोशनी, वे आजादी के विकास की किरणों से वंचित हैं।  लेकिन यह अब 1.25 बिलियन देशवासियों की ‘टीम इंडिया’ के पवित्र प्रतिज्ञा है किबिजली के खंभे, बिजली के तार और इन 18,500 गांवों में बिजली उपलब्ध कराने का लक्ष्य अगले 1000 दिनों के भीतर प्राप्त किया जाएगा।”

 

कितना हुआ काम पूरा: केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) द्वारा हाल ही में एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 597,464 गांवों (98.1 फीसदी) में से कम से कम 587,569 गांव 30 जून, 2016 तक विद्युतीकृत हुए हैं  जिसका अर्थ है केवल 9895 में बिजली नहीं है।

 

गांव जिसे “विद्युतीकृत” घोषित किया जा रहा उसका मतलब यह नहीं है उसे घरेलू बिजली मिल जाएगी, जैसा FactChecker ने  नवंबर 2015 में विस्तार से बताया है।

 

विद्युत मंत्रालय (2004-05) गांव में विद्युतीकरण को इस स्थिति में परिभाषित करता है:

 

  • बिजली के बुनियादी ढांचे जैसे कि ट्रांसफार्मर और वितरण लाइन का, बसे इलाके के साथ ही जुड़े दलित बस्तियों में प्रदान करना।
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  • बिजलीस्कूलों , पंचायत ( ग्राम परिषद ) के कार्यालयों, स्वास्थ्य केन्द्रों, औषधालयों और सामुदायिक केंद्रों के जैसे सार्वजनिक स्थानों पर प्रदान की जाती है
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  • परिवारों विद्युतीकृत की संख्या गांव में रहने वाले परिवारों की कुल संख्या का कम से कम 10 % होना चाहिए।

 

राहुल टोंगिया, केंद्र सरकार के स्मार्ट ग्रिड टास्क फोर्स को ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन में फेलो, और सलाहकार के अनुसार, “विद्युतीकरण के लिए पहली दहलीज, कवरेज क्षेत्र के घरों (यानि बहुमत) के कम से कम 50 फीसदी होना चाहिए।”

 

सार्थक विद्युतीकरण प्राप्त करने के लिए, सार्थक विद्युतीकरण प्राप्त करने के लिए, वास्तविक बिजली महत्वपूर्ण है – और वहाँ कोई बिजली कटौती नहीं होनी चाहिए, टोंगिया 7 अक्टूबर, 2014 को हिंदू में इस कॉलम में लिखा था।

 

उद्हारण के लिए, उत्तर प्रदेश में, चार में से तीन घरों में दिन में 12 घंटे से कम बिजली प्राप्त होती है। झारखंड में विद्युतीकृत घरों का केवल 2 फीसदी को 20 घंटे या उससे अधिक बिजली मिलती है; 81 फीसदी को शाम में चार या उससे अधिक घंटे बिजली नहीं मिलती है, जबकि 60 फीसदी को महीने में तीन से चार दिन बिजली मिलती ही नहीं है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने अक्टूबर 2015 में विस्तार से बताया है।

 

द हिन्दू द्वारा ग्रामीण विद्युतीकरण डेटा की एक जांच में पाया गया कि पिछले वर्ष गांवों की विद्युतीकृत होने की संख्या अतिशयोक्तिपूर्ण है। रिपोर्ट में कई विसंगतियों का पता चला जैसे कि:

 

  • गैर- विद्युतीकृत के रुप में वर्गीकृत कई गांव, एक ऐप ” गर्व ” (विद्युतीकरण ट्रैक करने के लिए बिजली मंत्रालय की ओर से शुरू की) पर विद्युतीकृत गिने जाते हैं।
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  • निर्जन गांवों को  विद्युतीकृत के रुप में चिह्नित किया गया है। गांव जैसे कि ओडिशा में पनालोमाली, कुसादनगर और पटवेटापली और मध्य प्रदेश में सनवारा – सभी गांवों का विद्युतीकरण के रूप में गिना गया है – में कोई भी नहीं रहता है।

 

6. सामाजिक सुरक्षा: 12.7 करोड़ लोगों ने तीन प्रमुख कार्यक्रमों में नामंकन कराया

 

क्या कहा था मोदी ने: “हमने सामाजिक सुरक्षा और गरीब कल्याण पर ज़ेर दिया है। और इस तरह प्रधानमंत्री की सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY), अटल पेंशन योजना (APY) और प्रधानमंत्री की जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY) शुरू किया गया है । हमारे देश के करोड़ों लोगों पास कोई सामाजिक सुरक्षा है।”

 

कितना हुआ काम पूरा : सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 14 जून 2016 तक अटल पेंशन योजना 0.27 करोड़ लोगों को दिया गया है, प्रधानमंत्री की सुरक्षा बीमा योजना 9.45 करोड़, प्रधानमंत्री की जीवन ज्योति बीमा योजना 2.97 करोड़ लोगों को दिया गया है।

 

हाल ही में संसद में पेश आंकड़े इंगित करते हैं कि 20 जुलाई 2016 तक अटल पेंशन योजना के तहत 0.3 करोड़ भारतीयों ने रजिस्टर कराया है।

 

7. ग्रामीण भारत : कृषि बजट 44 % की वृद्धि, कई ग्रामीण कार्यक्रमों का शुभारंभ

 

क्या कहा था मोदी ने: “हमें कृषि क्षेत्र में भारी बदलाव की जरूरत है। कृषि योग्य भूमि कम होती है; यह परिवार और जमीन के टुकड़े के बीच विभाजित हो रही है, छोटी हो रही है । हमारे कृषि भूमि की उत्पादकता में वृद्धि आवश्यक है। किसानों पानी और बिजली की जरूरत है और हम उनकी उपलब्धता की दिशा में काम कर रहे हैं । हमने ‘प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री कृषि सींचाई योजना’ में पचास हजार करोड़ रुपये का निवेश करने का फैसला किया है । पानी खेतों तक कैसे पहुंचेगा ? जल बचाना होगा। हमने कृषि क्षेत्र में ‘सेव वॉटर, सेव एनर्जी एंड सेव फर्टीलाइज़र’ मंत्र के साथ आंदोलन की शुरुआत की है।”

 

कितना हुआ काम पूरा: कृषि भूमि के विभाजन के संबंध में मोदी सही हैं। 5 फीसदी किसान भारत के 32 फीसदी खेतों पर नियंत्रण रखते हैं। और भारत में एक “बड़े” किसानों के पास “सीमांत” किसानों की तुलना में 45 गुना अधिक भूमि है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मई 2016 में बताया है।

 

खेती की जा सकने वाली भूमि में मामूली गिरावट हुई है, वर्ष 2008-09 में 182.5 मिलियन हेक्टेयर से गिरकर वर्ष 2012-13 में 182 मिलियन हेक्टेयर हुआ है। संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, यह गिरावट मुख्य रूप से गैर कृषि प्रयोजनों जैसे कि शहरीकरण, सड़क, उद्योगों और आवास के लिए हुई है।

 

लगातार मानसून विफलताओं से ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ रहा संकट का समाधान करने के लिए, कृषि बजट में 44 फीसदी की वृद्धि हुई है, 2015-16 में 24,909 करोड़ रुपए से बढ़ कर 2016-17 में 35,984 करोड़ रुपए हुआ है।

 

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट 2016 के दौरान घोषणा की 2016-17 में फ्लैगशिप प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई  योजना (PMKSY) के माध्यम से 2.85 मिलियन हेक्टेयर की सिंचाई होगी। उन्होंने यह भी कहा कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए सरकार कृषि और गैर कृषि क्षेत्रों में अपने हस्तक्षेप को नई दिशा देगी। एक दशक (2003-2013) के दौरान प्रति वर्ष भारतीय किसानों की आय को प्रभावी ढंग 5 फीसदी बढ़ी है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने मार्च 2016 में विस्तार से बताया है।

 

बजट में 20,000 करोड़ रुपये के प्रारंभिक कोष के साथ एक समर्पित लंबी अवधि सिंचाई कोष बनाया गया है।

 

8.सेवा कर्मियों के लिए एक रैंक एक पेंशन: स्वीकृत है, लेकिन विरोध प्रदर्शन जारी

 

क्या कहा था मोदी ने: “एक रैंक एक पेंशन (OROP)  का मुद्दा, हर सरकार के सामने आया है हर एक ने प्रस्ताव पर विचार किया है, और हर सरकार ने उस पर वादे किए हैं, लेकिन समस्या अभी भी हल किया  जा सकना लंबित है। मैं सेवा कर्मियों से कहता हूं कि हमने मोटे तौर पर “एक रैंक एक पेंशन’ स्वीकार कर लिया है लेकिन संगठनों के साथ वार्ता जारी है। वार्ता अंतिम चरण में पहुंच गया है और हम चाहते हैं कि सभी को ध्यान में रखते हुए पूरे देश के विकास को देखते हुए न्याय मिले।

 

कितना हुआ काम पूरा: अप्रैल 2016 में मोदी ने OROP प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इससे सरकार पर वार्षिक पेंशन में 7488 रुपये और बकाया राशि में 10,925 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

 

कम से कम 0.16 करोड़ पेंशनरों को OROP कार्यक्रम के माध्यम से अपना पहला पेंशन प्रप्त हुआ है; 31 मार्च, 2016 तक 2861 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। कर्मियों द्वारा कुछ मुद्दों और विसंगतियां उठाई गई हैं जिस पर एक सरकारी पैनल विचार कर रहा है।

 

(साहा नई दिल्ली स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 13 अगस्त 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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