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“2019 का चुनाव गणतंत्र को बचाने का चुनाव है!”

श्रीहरि पलियथ,
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New Delhi: Swaraj India leaders Yogendra Yadav with Prashant Bhushan addressing a press conference on Gurmeet Ram Rahim in New Delhi on Aug. 28, 2017. (Photo: IANS)
 

मुंबई: नवंबर 2018 के अंत में, बढ़ते कृषि संकट के बीच, देश भर से लगभग 200 संगठनों से जुड़े हजारों किसानों संसद के एक विशेष सत्र की मांग के लिए दिल्ली में पहुंचे, ताकि उन्हें उनके उत्पादन के लिए सरकारी खरीद में ऊंची कीमत मिले, ऋण से छुटकारा सहित सारे कर्जों से मुक्ति हो और अन्य मुद्दों को हल किया जा सके।

 

इस वर्ष खरीफ (मानसून) और रबी (सर्दी) फसलों के लिए सरकारी खरीद मूल्य में वृद्धि के बावजूद किसानों को लाभ मिला हो, इसका कोई साक्ष्य नहीं मिला है।

 

पिछले 12 वर्षों से 2016-17 तक, भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का हिस्सा 5 फीसदी से लेकर 12.2 फीसदी तक कम हुआ है, जैसा कि ‘लाइव मिंट’ ने 3 दिसंबर, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। लेख में कहा गया है कि पिछले चार दशक से 2015-16 तक, खेती कम लाभकारी हुई है और औसत खेत का आकार 53 फीसदी से कम हो कर 1.08 हेक्टेयर हुआ है।

 

स्वराज इंडिया पार्टी के अध्यक्ष, इस पार्टी द्वारा किसानों के अधिकार के लिए शुरू किए गए आंदोलन  ‘जय किसान आंदोलन’ के राष्ट्रीय संयोजक और  चुनाव विश्लेषक  योगेंद्र यादव का मानना है कि अन्य मुद्दों के बीच अपर्याप्त कृषि नीतियों, गंभीर ऋणात्मकता, नोटबंदी के प्रभाव और कृषि उत्पादन में प्रचुरता के कारण कीमतों में होने वाली गिरावट को देखते हुए किसानों के लिए एक व्यापक सुरक्षात्मक कानून की आवश्यकता है।

 

55 वर्षीय यादव ने हालिया किसानों के मार्च के दौरान दिल्ली-हरियाणा सीमा पर बीजवासन से संसद तक किसानों के चार दलों में से एक का नेतृत्व किया था।

 

 यादव अखिल भारतीय किसान संघ समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के एक कार्यकारी दल के सदस्य हैं, जो किसान के संगठनों का गठबंधन हैं, जिनके तहत बैनर मार्च आयोजित किया गया था। एआईकेएससीसी ने देश भर में किसानों को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों पर लंबे विचार-विमर्श के बाद खेती में ऋणात्मकता और गारंटीकृत लाभकारी सरकारी खरीद मूल्य के मुद्दे को हल करने के लिए किसान मुक्ति बिल की रूपरेखा तैयार की है ।  

 

अप्रैल 2015 में, यादव को तीन अन्य सदस्यों के साथ आम आदमी पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था, लेकिन जल्द ही उन्होंने अक्टूबर 2016 में स्वराज इंडिया पार्टी की सह-स्थापना की। पार्टी 2019 में पहली बार आम चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। यादव कहते हैं यह एक असाधारण और अद्वितीय  ‘चुनाव है और यह गणतंत्र के भविष्य को निर्धारित करेगा। इंडियास्पेंड के साथ एक साक्षात्कार में, यादव ने किसानों द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों,  आने वाले संसदीय चुनावों पर राज्य विधानसभा चुनाव के मौजूदा दौर का असर, और स्वराज भारत के भविष्य के बारे में बात की। 

 

स्वराज इंडिया के उद्देश्यों में से एक लोकतांत्रिक शासन स्थापित करना है, जो पारदर्शी, उत्तरदायी, सहभागी और विकेन्द्रीकृत है। स्वराज इंडिया जैसी युवा पार्टी इस विजन पर कैसे काम कर पाएगी, क्योंकि राजनेता और नौकरशाह स्थानीय सरकारों को शक्ति सौंपने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं। हमने पहले ही देखा है कि दिल्ली में यह कैसे अप्रसांगिक है। 

 

राजनीतिक सत्ता के विकेंद्रीकरण के लिए राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र की आवश्यकता है। हालांकि, 1990 के दशक से विभिन्न विपक्षी दलों और राजनीति के क्षेत्रीयकरण की उपस्थिति ने राजनीतिक दबाव सुनिश्चित किया, लेकिन यह व्यापक नहीं था। राज्य सरकार के स्तर पर (शक्ति) की एकाग्रता थी, लेकिन केंद्रीकरण की चुनौती जिले और निचले स्तर पर बनी हुई है। हम सामाजिक आंदोलनों की राजनीति को लेकर आगे बढ़ रहे हैं, जिनमें से अधिकतर स्थानीय हैं। यह एक दीर्घकालिक लक्ष्य है और किसी को रातों-रात सफलता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

 
आम आदमी पार्टी ने क्या गलतियां की? स्वराज इंडिया के साथ आप इनसे कैसे बचेंगे?
 

 हमने व्यवस्थित रूप से पार्टी में व्यक्तित्व पंथ से परहेज किया है। एक वैचारिक नीति दस्तावेज बनाया है और आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शिता के साथ एक संगठन बनाया है। हम इकलौते ऐसे राजनीतिक दल हैं, जो सूचना के अधिकार का स्वागत करते हैं और इसे खुद पर लागू करते हैं। लोग आ सकते हैं और हमसे पूछ सकते हैं कि क्या हम सफल रहे हैं भले ही हमने इन सिद्धांतों का पालन किया हो, और तथ्य यह है कि हमने इस तरह की (चुनावी) व्यवहार्यता हासिल नहीं की है।यह तभी होता है जब हम इन सिद्धांतों को बनाए रखने के साथ-साथ लोगों की आंखों में (चुनावी) सफलता देख सकते हैं, ताकि हम एक विकल्प पेश करने का सच्चा दावा कर सकें। हम उससे कई कदम दूर हैं।

 
2019 में आम चुनाव के लिए स्वराज इंडिया की योजना क्या है?

 

यह स्वराज इंडिया के लिए पहला आम चुनाव होगा, लेकिन यह एक असाधारण और अनूठा चुनाव है। क्योंकि आज की चुनौती गणतंत्र को बचाना है। यदि हम नियमित चुनाव के रूप में इस चुनाव में जाते हैं, जहां हर राजनीतिक दल अपने वोट शेयर को लेकर चिंतित है तो फिर हम बड़ी ऐतिहासिक चुनौती को खो देंगे। एक पार्टी के रूप में  हमने फैसला किया है कि हम अपनी सारी ऊर्जा गणतंत्र की रक्षा के बड़े उद्देश्य में डाल देंगे, भले ही इसका अर्थ अपने चुनावी हित को पीछे छोड़ना हो। हम उन वास्तविक मुद्दों के एजेंडे के साथ लोगों के बीच आ रहे हैं। जिन्हें उठाया जाना चाहिए और हम इसके लिए स्वयंसेवी लोगों की ताकत का इस्तेमाल करेंगे।वे केवल पार्टी की सेवा में नहीं होंगे, बल्कि गणतंत्र की रक्षा करने के लिए काम करेंगे।

 

अपने लिए आपने एक बड़ा काम तय कर रखा है, क्या इसके लिए आप गठबंधन में अन्य विपक्षी दलों के साथ काम करने के लिए मुक्त हैं?  

 

हमारी समझ में, महागठबंधन (विपक्षी दलों का भव्य गठबंधन) भारतीय जनता पार्टी का जवाब नहीं है। यदि यह था, तो महागठबंधन का आकार गणतंत्र का ख्याल रखेगा। केवल एक कारण है कि हमें कदम उठाने की आवश्यकता है कि महागठबंधन के पास संख्या है, उनके पास देश के लिए एक वैकल्पिक (दृष्टि) नहीं है जो आशा उत्पन्न कर सकता है। जबकि नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली बीजेपी सरकार को जाना होगा। महागठबंधन पर नजर रखी जानी चाहिए। तो, यहां दोहरा उद्देश्य है। हम किसी भी तरह से महागठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। 

 

व्यापक किसान संकट के बावजूद, एक हालिया सर्वेक्षण से पता चला है कि अधिक किसान कांग्रेस की तुलना में बीजेपी को वोट देने की सोच रहे हैं – मध्यप्रदेश में बीजेपी 43 फीसदी, कांग्रेस 39 फीसदी और छत्तीसगढ़ में बीजेपी 42 फीसदी, कांग्रेस 36 फीसदी। आपके विचार में,  किसानों के द्वारा बीजेपी के लिए मतदान करने के पीछे के क्या कारण हो सकते हैं?  

 

मैं यह निष्कर्ष नहीं दूंगा नहीं कि बीजेपी आगे है, क्योंकि ये पूर्व चुनाव सर्वेक्षण हैं। पोस्ट-पोल सर्वेक्षण एक और मजबूत तस्वीर प्रदान करेगा। मेरे लिए इसका कोई महत्व नहीं है कि बीजेपी कांग्रेस से आगे है या नहीं। हमें किसानों और आम जनसंख्या के बीच, पिछले दो साल पहले, या पिछले चुनाव की स्थिति की तुलना में बीजपी से अलग देखने की जरुरत है।

 

मैं यह नहीं मानूंगा कि किसान बीजेपी के साथ हैं। मेरी यात्रा के आधार पर, बीजेपी के खिलाफ भारी असंतोष है। हमें चुनाव के बाद सर्वेक्षण का इंतजार करना चाहिए, और निश्चित रूप से, स्थिति का आकलन करने के लिए चुनाव परिणाम का इंतजार करना चाहिए।

 

 कई राज्यों में गाय सतर्कता और गौ हत्या प्रतिबंधों के कारण, किसान अपने पशुओं को बेचने में असमर्थ या अनिच्छुक रहे हैं, इसकी बजाय उन्हें खुले में छोड़ दे रहे हैं। इससे उन्हें आर्थिक कठिनाई हो जाती है और ये स्थायी फसलों को नुकसान पहुंचाने के कारण भी बनते हैं। नोटबंदी ने भी किसानों को बुरी तरह प्रभावित किया, हाल ही में एक कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट ने स्वीकार किया है।(मंत्रालय ने बाद में रिपोर्ट वापस ले ली।) क्या ये बड़े चुनाव मुद्दे हैं? किसानों को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दे क्या हैं? 

 

जब मैं किसानों से बात करने के लिए इनमें से कुछ क्षेत्रों की यात्रा करता हूं, तो सबसे बड़ी समस्याओं में से एक कीमतों की कमी है। मध्य प्रदेश में, ‘भावांतर भुगतान योजना’, नीति नियोजन परिप्रेक्ष्य में असफल रही है। इस योजना के अक्षम कार्यान्वयन के कारण, व्यापारियों ने बाजार में छेड़छाड़ की और कीमतों को कृत्रिम रूप से नीचे किया है। नतीजा यह था कि इस योजना के बिना किसानों को जो भी मिलता था, उससे कम प्राप्त हुआ। सरकार ने मॉडल मूल्य (बाजार में प्रचलित औसत मूल्य) और सरकारी खरीद मूल्य के बीच अंतर की एक जटिल विधि को भरने की कोशिश की।

 

सोयाबीन के मामले में, भावांतर भुगतान योजना ने किसानों को बाजार दर से कम प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया, जिससे किसान गुस्सा हो उठे। मुआवजा अभी भी आठ या 10 महीने बाद आ रहा है।

 

 फिर सूखे के दौरान फसल के नुकसान के लिए अपर्याप्त मुआवजे का मुद्दा है। प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना प्रणाली और सूचना आधार इतना बद्तर है कि पेपर पर वे दिखा सकते हैं कि किसान को मुआवजे के रूप में एक निश्चित राशि का भुगतान किया गया था, लेकिन वास्तव में प्राप्तकर्ता प्रभावित नहीं था। पीएमएफबीवाई फ्लॉप हो गया है। मेरी बातचीत के दौरान, किसानों ने बार-बार कहा है कि भटक गए जानवर फसलों को नष्ट कर रहे हैं। हर कोई मानता है कि यह एक छोटी घटना है। जबकि यह एक प्रमुख माइक्रो घटना है जिसका सामना वर्तमान में भारतीय किसान कर रहे हैं। राजस्थान के सीकर जिले में, ऐसे क्षेत्र हैं जहां किसानों ने भटक गए जानवरों की वजह से खेती बंद कर दी है। विकल्प पूरे परिवार को रात में खेत की निगरानी करना या फिर खेत के चारो तरफ तार का बाड़ लगाना है, जो काफी महंगा है। समस्या का कोई आधिकारिक सर्वेक्षण नहीं है, लेकिन अगर कोई सर्वेक्षण होता है, तो परिणाम आश्चर्यजनक होंगे। हम एक बहुत बड़ी समस्या से जूझ रहे हैं।

 

अब, मवेशी व्यापार स्थिर हो गया है, क्योंकि पशुधन की बाजार में कीमत गिर गई है, जिससे किसान की संपत्ति के मूल्य में गिरावट आई है। दूध की कीमतों में गिरावट आई है।

 

 जहां तक ​​नोटबंदी का सवाल है, किसानों का कहना है कि ‘नोटबंदी के बाद अब तक कमर सीधी नही हुई है’ । स्थानीय व्यापारी सामान्य रूप से नकदी के निम्न भंडार के कारण किसानों से उत्पाद खरीदने में असमर्थ थे, जिससे जीवन बहुत कठिन हो गया। किसानों के लिए नवंबर में नोटबंदी जैसा बोझ उठाना काफी कठिन था। यह वह समय है, जब किसान अपनी फसलों को बेचने की कोशिश करते हैं, यह शादी और बुवाई का मौसम है। सरकार ने इस समय नोटबंदी को लागू करके किसान को चोट पहुंचाई है। 

 

पीएमएफबीवाई से देश भर में बीमा कंपनियों ने दो साल से 2017-18 तक 15,795 करोड़ रुपये लाभ के रुप में कमाए हैं।  वरिष्ठ संपादक पी साईंनाथ ने इसे राफले सौदे से बड़ा ‘घोटाला’ कहा है। बीमा योजनाओं पर आपके विचार क्या हैं, चूंकि कोई इनकार नहीं कर रहा है कि किसान सूखे, कीट और बीमारी की दया पर हैं? पीएमएफबीवाई के विकल्प क्या हैं? 

 

आप इनकार नहीं कर सकते कि किसानों को प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ सुरक्षा की आवश्यकता है, जो कई बार होते हैं और जलवायु परिवर्तन के साथ और अधिक होने की संभावना है। एकमात्र सवाल यह है कि यह किस प्रकार की सुरक्षा होनी चाहिए। क्या यह इस तरह का हो कि सरकार नुकसान का आकलन और क्षतिपूर्ति करे या यह प्रीमियम आधारित बीमा मॉडल होना चाहिए? अफसोस की बात है, पिछले फसल में हानि मॉडल बहुत नौकरशाही था, और रिटर्न मनमाने ढंग से थे। मैं बीमा मॉडल के खिलाफ नहीं हूं, हालांकि इसके खिलाफ कई किसान आंदोलन हैं। क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए ‘पीएमएफबीवाई के तहत प्रीमियम का भुगतान कौन करता है, यह कितना है, और कौन बीमा करता है।’ फसल बीमा तीन दशक पुरानी योजना है, जिसमें लगभग पांच संशोधन पहले से ही हैं। प्रधान मंत्री मोदी की घोषणा शायद इस योजना का छठा संस्करण है। समस्या यह है कि उन्होंने घोषणा की कि उन्होंने पहिये को फिर से चलाना शुरू किया है।

 

हालांकि पीएमएफबीवाई में पिछले संस्करण से सुधार था, लेकिन उसने प्रमुख मुद्दों को हल नहीं किया। कोई बीमा योजना किसान को सार्वभौमिक कवरेज प्रदान नहीं करती है। पिछली योजना में लगभग 24 फीसदी का कवरेज था। जब पीएमएफबीवाई की घोषणा की गई, तो उसने दावा किया कि पहले वर्ष में 30 फीसदी से कवरेज, दूसरे में 40 फीसदी और तीसरे वर्ष में 50 फीसदी की वृद्धि हुई है। हकीकत में यह 24 फीसदी से 28 फीसदी तक पहुंच गया, और फिर 24 फीसदी तक गिर गया, अनिवार्य रूप से (गिरने पर) वहीं पहुंच गया, जहां से यह शुरू हुआ था।

 

लेकिन इस समय के दौरान, सरकारी व्यय चार गुना से बढ़कर 15,000 करोड़ रुपये हो गया है, जिसका मतलब है कि यह बीमा कंपनियों को लाभ है। पीएमएफबीवाई में निजी कंपनियों की एक महत्वपूर्ण भागीदारी है। ऐसे क्षेत्र जहां निजी कंपनियां फसल बीमा प्रदान कर रही हैं,  वहां फसलें आपदाओं से कम प्रभावित नहीं होनी चाहिए । लेकिन यह देखा जा सकता है कि सरकारी स्वामित्व वाली और निजी (बीमा) कंपनियों द्वारा भुगतान किए गए दावों के बीच 10 प्रतिशत-अंक तक अंतर है। निजी कंपनियों ने अधिक लाभ कमाया है।

 

जमीन पर, नुकसान के पहचान के तंत्र में सुधार की कमी के कारण, प्रभावित किसानों को लाभ नहीं हुआ। सरकार का तर्क है कि एक सामान्य वर्ष में कंपनियों को लाभ प्राप्त करना चाहिए और प्राकृतिक आपदा वाले वर्ष के दौरान उसकी भरपाई होनी चाहिए। लेकिन यह एक विचित्र बहस है।

 

यदि आप उत्तर प्रदेश (2016 में), बिहार (2017 में) और तमिलनाडु (2017 में) जैसे राज्यों को देखते हैं, तो टीएन एकमात्र अपवाद है जहां पीएमएफबीवाई के तहत भुगतान किए गए दावों का भुगतान प्रीमियम से अधिक था।

 

संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे कुछ देशों में, प्राकृतिक आपदा के एक वर्ष में, बीमा कंपनियां व्यवसाय से बाहर हो सकती हैं। टीएन में, बीमा कंपनियों ने 140 वर्षों में सबसे खराब सूखे के समय बीमा राशि का एक-तिहाई भुगतान किया।

 

सूखे और बाढ़ से प्रभावित यूपी और बिहार के मामलों में, बीमा कंपनियों ने लाभ कमाया है। ऐसी परिस्थितियों में, साईनाथ सही हैं। यह एक घोटाला है।

 

पूरे देश में किसान ऋण की राहत मांग रहे हैं और उत्पादन की लागत से 50 फीसदी की सरकारी खरीद मूल्य की गारंटी चाह रहे हैं। हालांकि सरकार ने खरीफ और रबी के लिए सरकारी खरीद मूल्य में वृद्धि की है, लेकिन इससे किसानों के लिए आय में वृद्धि नहीं हो रही है। अक्सर, प्रोक्युर्मन्ट लिमिट से किसान निजी व्यापारियों को बेचने के लिए विवश हैं। कृषि में आय वृद्धि के मामले में सरकार और किसानों को क्या चुनौतियां हैं?

 

बिलों में, जिसे हमने (एआईकेसीसीसीसी) तैयार किया है, हमने विवरण प्रदान किया है। यह सिर्फ किसानों को बेहतर कीमतें प्रदान करना सिर्फ सरकारी खरीद मूल्य में वृद्धि पर नहीं है। यह उचित स्तर पर इसे ठीक करने के बारे में है। व्यापक खरीद सुनिश्चित करना, फसलों के लिए पर्याप्त रूप से वित्त पोषित बाजार हस्तक्षेप, जिसे सरकार खरीद नहीं लेनी चाहिए, व्यापारियों के लाभ के बजाय किसानों की जरूरतों के आधार पर आयात-निर्यात नीति, सार्वभौमिक रूप से फसल हानि मुआवजे का आधार, और जहां भी आवश्यक हो प्रत्यक्ष आय समर्थन के बारे में है। यह नीतियों का एक गुलदस्ता है, जो किसानों को आय सक्षम बनाता है।

 

हम केवल ऋण छूट के लिए नहीं पूछ रहे हैं। प्रस्तावित बिल के साथ, हमने मुख्य रूप से निजी धन उधारदाताओं के मुद्दे को संबोधित किया है, जिनसे अधिकतर ऋण लिया जाता है। हर बार ऋण छूट एक समाधान के रूप में आवश्यक नहीं है, लेकिन किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक पूरक उपाय के रूप में आवश्यक है। अगर किसानों की आमदनी के पूरक के बिना ऋण माफ कर दिया जाता है तो यह सार्वजनिक धन की बर्बादी होगी। लेकिन इस तरह के छूट के बिना, किसानों को लाभ नहीं होगा। इनमें से दोनों को कोरी स्लेट के साथ किसानों को प्रदान करना होगा। हमें एक स्थायी तंत्र की भी आवश्यकता है, जिसके माध्यम से किसानों को ऋणात्मकता से संरक्षित किया जा सके।

 

क्या व्यापक कृषि संकट के कारण, आम चिंता के मुद्दों पर मतदान करने के लिए पूरे देश में किसानों को एकजुट करना संभव है? क्या किसान अंततः कृषि संकट के बजाय जाति और धर्म जैसे कारकों से मतदान करते हैं?

 

 भारतीय किसानों का राजनीतिक ब्लॉक बनाना ऐतिहासिक चुनौती रहा है। यह समकालीन भारत में सबसे बड़ी राजनीतिक परियोजना है। मार्क्सवादी सिद्धांत के अनुसार, खुद में क्लास और खुद के लिए क्लास के बीच एक अंतर है। किसान खुद में क्लास हैं। वर्तमान में वे क्षेत्र, फसलों, जलवायु, वर्ग, जाति, धर्म और राजनीतिक विचारधाराओं से विभाजित हैं। किसानों को एकजुट करने की मांगों के बारे में (एआईकेएससीसी) सोचने में हमें वक्त लगा और हम इन दो (सरकारी खरीद मूल्य और ऋण राहत) पर पहुंचे। चुनौती कुछ मूल मुद्दों को ढूंढना, संचार को सरल बनाना था। भूमिगत और जमीन मालिकों जैसे विभिन्न समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों के लिए ‘एआईकेएससीसी’ जैसे एक आम मंच प्रदान करना था। पहले ऐसा कोई मामला नहीं रहा है, जब किसानों के लिए एक मोर्चा रहा है जहां कृषि श्रम और भूमि मालिकों के संगठनों का प्रतिनिधित्व किया गया है।  

 

 सितंबर 2018 में, आपको प्रस्तावित एक्सप्रेस वे का विरोध करने वाले किसानों से मिलने के दौरान तमिलनाडु के चेंगम में हिरासत में लिया गया था। जवाब में, आपने कहा था कि “गांधीवादी अवज्ञा ही एकमात्र रास्ता है, ऐसा लगता है।”  लेकिन, यह देखते हुए कि 2 अक्टूबर को नई दिल्ली में किसानों पर आंसू-गैस और पानी के गोले छोडे गए, क्या आप मानते हैं कि भारत भर में सरकारों के साथ सार्थक जुड़ाव संभव है? 

 

एक संभावना है, क्योंकि कई देशों के विपरीत, भारत में किसानों की संख्या मजबूत है। एक लोकतंत्र में, संख्याओं के मामले में एक बड़े पैमाने पर बड़े समूह के साथ, इस सोते बहुमत को जागृत बहुमत में परिवर्तित करना एकमात्र पहलु है। गांधी जी सही थे। अहिंसा केवल एक नैतिक सिद्धांत नहीं है, यह सबसे अच्छा व्यवहारवाद है। यह केवल तभी होता है जब किसान अहिंसक तरीके से अपनी ताकत का दावा कर सके, कि वे आंदोलन के साथ जारी रह सकते हैं और धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं। तब असली चुनौती किसानों को राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र में व्यवस्थित करना है।

 
( पलियथ विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं। )
 

यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 7 दिसंबर 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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