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2030 तक जीरो हंगर हासिल करने के लिए भारत सही ट्रैक पर नहीं

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बैंकाक: पिछले दशक की तुलना में 2017 में खाद्य सुरक्षा और पहुंच में वृद्धि के कारण भारत में कुपोषित और एनीमिया से ग्रसित लोगों की संख्या कम रही है, लेकिन भारत को अपने पोषण लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। यह जानकारी  2018 ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट (जीएनआर-2018) में सामने आई है।  रिपोर्ट के अनुसार, 2025 तक भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के नौ पोषण लक्ष्यों में से किसी को भी प्राप्त करने के लिए सही रास्ते पर नहीं है। ये नौ लक्ष्य हैं – बच्चों के बढ़ते वजन को कम करना, वेस्टिंग और स्टंटिंग, महिलाओं और पुरुषों के बीच मधुमेह को कम करना, प्रजनन आयु की महिलाओं में एनीमिया से मुक्ति,महिलाओं और पुरुषों में मोटापे के कम करना और विशेष स्तनपान में वृद्धि।

 

2025 तक कुपोषण के सभी रूपों को कम करने के लिए 2012 और 2013 में डब्ल्यूएचओ सदस्य देशों द्वारा नौ लक्ष्यों को अपनाया गया था। जीएनआर के स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह ( जिनमें अकादमिक, शोधकर्ता और सरकारी प्रतिनिधि शामिल हैं ) द्वारा संकलित ऐसी पांचवी रिपोर्ट  29 नवंबर, 2018 को बैंकाक में ‘ऐक्सेलरैटिंग द एंड ऑफ हंगर एंड मैलन्यूट्रिशियन’ सम्मेलन में जारी किया गया था। सम्मेलन संयुक्त रूप से अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आईएफपीआरआई) और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा आयोजित किया गया था।

 

 भारत ने बाल स्टंटिंग को कम करने में सुधार दिखाया है, लेकिन पांच वर्ष की आयु के कुल स्टंट बच्चों में, 46.6 मिलियन स्टंट बच्चों के साथ भारत 30.9 फीसदी स्टंट बच्चों का घर है, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है। ये आंकड़े दुनिया में सबसे ज्यादा हैं।

 

हालांकि, भारत ने छह अन्य वैश्विक पोषण लक्ष्यों से संबंधित कोई प्रगति या गिरावट के पैरामीटर नहीं दिखाए हैं (दो लक्ष्यों पर जानकारी उपलब्ध नहीं है)।

 

 रिपोर्ट में कहा गया है कि नौ वैश्विक पोषण लक्ष्यों में से कम से कम एक हासिल करने के लिए 194 देशों में से केवल 94 देश ट्रैक पर हैं। रिपोर्ट जारी होने पर रिपोर्ट के सह-अध्यक्ष और खाद्य नीति केंद्र के निदेशक कोरिन्ना हॉक्स ने कहा,  “हालांकि, (विश्व स्तर पर) स्टंटिंग में कमी हुई है, वहीं महिलाओं में एनीमिया और अंडरवेट में धीमी कमी आई है जबकि अधिक वजन और मोटापा और बढ़ रहा है।”

 

भारत में अल्पपोषितों की संख्या में कमी लेकिन अब भी कुपोषण के वैश्विक बोझ में 23.8 फीसदी की हिस्सेदारी

 

एफएओ के आंकड़ों के मुताबिक, 2015-17 में,  भारत में 195.9 मिलियन अल्पपोषित लोग थे ( जरुरी पोषण के बिना रहने वाले ) जो कि 2005-07 में 204.1 मिलियन के आंकड़े से कम है। अल्पपोषणता का प्रसार भी 2005-07 में 20.7 फीसदी से घटकर 2015-17 में 14.8 फीसदी हुआ है।

 

अल्पपोषत भारतीय एवं अल्पपोषणता का प्रसार, 1999-2017


 

हालांकि, कुपोषण के वैश्विक बोझ में भारत की 23.8 फीसदी हिस्सेदारी है, और चीन के बाद भारत में अल्पपोषित लोगों की अनुमानित संख्या सबसे ज्यादा है, जैसा कि एफएओ की रिपोर्ट में कहा गया है। 2015 में, भारत सहित सभी डब्ल्यूएचओ सदस्यों ने संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों को अपनाया है, जिसमें 2030 तक जीरो हंगर ( शून्य अल्पपोषित आबादी)  प्राप्त करना भी शामिल है। इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है कि 2030 तक जीरो हंगर हासिल करने के लिए, भारत को रोजाना भूख से 48,370 लोगों को बाहर करना होगा। 2015 से 2017 तक भारत में अल्पपोषित आबादी में कमी 3.9 मिलियन थी, जो प्रति दिन लगभग 10,685 लोगों के बराबर है ( 2030 तक लक्ष्य को पूरा करने के लिए आवश्यक एक-चौथाई से कम )। यहां तक कि अल्पपोषित आबादी की तेजी से कमी पर भी ( 2006-2008 में 15.2 मिलियन ) भारत प्रति दिन केवल 41,644 लोगों को भूख से बाहर निकाल सकता है।

 

वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है भूख

 

2017 में करीब 821 मिलियन कुपोषित लोगों के साथ ( 2016 में 804 मिलियन से ऊपर और आठ साल पहले के स्तर के बराबर ) वैश्विक कुपोषण खत्म करने का लक्ष्य खतरे में है, जैसा कि 27 नवंबर, 2018 को बैंकाक में एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में एफएओ और आईएफपीआरआई ने कहा है।

 

आईएफपीआरआई के महानिदेशक शेनगेन फैन ने कहा, “यह लगातार तीसरा साल है कि भूख खत्म होने के मामले में प्रगति रुक ​​गई है और अब वास्तव में उलट गई है।”

 

 हालांकि, अफ्रीका में अल्पपोषण वाले लोगों की संख्या सबसे अधिक है ( कुल आबादी का 21 फीसदी ) दक्षिण अमेरिका की स्थिति भी खराब हो रही है, जबकि एशिया में घटती प्रवृत्ति धीमी हो गई है, जैसा कि एफएओ के खाद्य सुरक्षा और पोषण में विश्व रिपोर्ट, 2018 में कहा गया है।

 

दुनिया में बढ़ती भूख


 

एफएओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि अल्पपोषण की बढ़ती वैश्विक प्रवृत्ति के पीछे की मुश्किलों में जलवायु परिवर्तन और आर्थिक मंदी मुख्य कारण थे। प्रेस कॉन्फ्रेंस में एफएओ सहायक महानिदेशक, कोस्टस स्टैमौलिस ने कहा, “जीरो हंगर (2030 तक) के लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल 12 साल बचे हुए हैं और इसका मतलब यह होगा कि हर दिन भूख से 185,000 लोगों को बाहर निकालना होगा, इसलिए हमें तेजी से आगे बढ़ना है। “

 

कुपोषण को कम करने में भारत के सामने कई चुनौतियां
 

2017 में भारत में मौत और विकलांगता का मुख्य कारण कुपोषण था। दूसरा कारण खराब आहार विकल्पों सहित आहार संबंधी जोखिम रहा है, जैसा कि 2017 के वाशिंगटन विश्वविद्यालय द्वारा अध्ययन, ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज से पता चलता है।  एक दशक पहले की तुलना में 2015-16 में, पुरुष और महिलाओं में मोटापा और अधिक वजन में 9.6 और 8 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है, जबकि 2016 में, 61 फीसदी मौतों के लिए गैर-संक्रमणीय बीमारियां जिम्मेदार रही हैं। बच्चों में कुपोषण और बीमारी को रोकने के लिए सबसे शुरुआती हस्तक्षेपों में से एक स्तनपान है, फिर भी केवल 54.9 फीसदी भारतीय बच्चे ही स्तनपान कर रहे हैं और जन्म के पहले घंटे में केवल 41.6 फीसदी बच्चे स्तनपान कर रहे हैं, जैसा कि स्वास्थ्य मंत्रालय और परिवार कल्याण के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -4 (2015-16) से पता चलता है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि देश में 10 फीसदी से कम बच्चों को पर्याप्त पोषण मिलता है।

 

इसके अलावा, भारत 2020 तक पैक किए गए भोजन के लिए तीसरा सबसे बड़ा बाजार बनने के लिए तैयार है, केवल 12 फीसदी पेय पदार्थ और 9 प्रमुख भारतीय खाद्य और पेय कंपनियों द्वारा बेचे जाने वाले 16 फीसदी  खाद्य पदार्थ “उच्च पौष्टिक गुणवत्ता” थे, जैसा कि ‘एक्सेस टू न्यूट्रीशन इंडेक्स इंडिया स्पॉटलाइट– 2016 में कहा गया है।

 

 भारत ने कुपोषण दरों में धीमी गिरावट की प्रवृत्ति के खिलाफ प्रयास किए हैं। महिलाओं और बच्चों में कुपोषण को कम करने के उद्देश्य से पोषण अभियान मार्च 2018 में शुरु किया गया था। जीएनआर 2018 के अनुसार, भारत मीठे पेय पदार्थों पर चीनी कर लगाने वाले 59 देशों में से एक बन गया है। शीतल पेय पर सामान और सेवा कर 2017 में 32 फीसदी से 40 फीसदी तक बढ़ गया था।

 

हालांकि, 2025 तक कुपोषण के सभी रूपों को कम करने और 2030 तक जीरो हंगर प्राप्त करने पर प्रगति को तेज करने के लिए, भारत दूसरे देशों की सफलताओं से सीख सकता है।

 
बांग्लादेश, ब्राजील और चीन से सबक
 

सार्वजनिक नीतियों, कृषि अनुसंधान और आर्थिक विकास के संयोजन से कई देशों में कुपोषण में कमी आई है। जीएनआर 2018 ने भूख और कुपोषण को कम करने में चीन, इथियोपिया, बांग्लादेश और ब्राजील द्वारा की गई प्रगति का हवाला दिया। फैन ने कहा, ” वर्तमान में महत्वपूर्ण प्रगति करने के लिए संघर्ष करने वाले देश उन सफलताओं से सीख सकते हैं।”

 

बांग्लादेश में बच्चों के वजन और स्टंटिंग में एतिहासिक रुप से तेजी से कमी देखी गई है। आईएफपीआरआई और एफएओ द्वारा एक बयान में कहा गया कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों में स्टंटिंग, जो 2004 में 55.5 फीसदी था, कृषि और पोषण में सुधार के लिए बड़े पैमाने पर नवीन सार्वजनिक नीतियों का उपयोग करके 2014 में 36.1 फीसदी हुआ है।   जबकि सहायक नीतियों द्वारा कृषि विकास में वृद्धि देखी गई, अन्य नीतियां जैसे पारिवारिक नियोजन, मजबूत स्वास्थ्य सेवाएं, बढ़ती स्कूल उपस्थिति, पीने के पानी और स्वच्छता तक पहुंच और महिलाओं के सशक्तिकरण ने भी भूमिका निभाई है। चीन में, यह उच्च आर्थिक विकास की वजह से था । वहां 2005 में प्रति व्यक्ति आय 5,060 डॉलर थी, जो बढ़कर 2017 में 16,760 डॉलर हो गई। इससे भूख और गरीबी दोनों से लाखों लोग बाहर निकल पाए।

 

एफएओ के अनुसार, ब्राजील और इथियोपिया ने अपने खाद्य प्रणालियों को बदल दिया और कृषि अनुसंधान और विकास और सामाजिक संरक्षण कार्यक्रमों में लक्षित निवेश के माध्यम से भूख के खतरे को कम कर दिया।

 

 “1980 के दशक के मध्य से शुरू होने और दो दशक से अधिक समय तक, ब्राजील में फसल उत्पादन 77 फीसदी बढ़ा और जरूरतमंद नागरिकों को सामाजिक सेवाओं की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदान करने के लिए 2003 में स्थापित देश के फोम जीरो कार्यक्रम (ज़ीरो हंगर) को इससे सहयोग मिला। इससे भूख और कुपोषण दस वर्षों में लगभग समाप्त हो गया, ” जैसा कि बयान में कहा गया है।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)
 

मीडिया कार्यशाला और बैंकॉक में ‘ऐक्सेलरैटिंग द एंड ऑफ हंगर एंड मैलन्यूट्रिशियन’ कांफ्रेंस’में भाग लेने के लिए यदवार की यात्रा को आईएफपीआरआई ने प्रायोजित किया है।

 

यह लेख मूलत: अंग्रजी में 10 दिसंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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