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6 वर्षों में जंगल की आग में 158% की बढ़ोतरी

श्रीहरि पलियथ,
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मुंबई: भारत में जंगल की आग छह साल में 1.5 गुना बढ़ गई हैं और 35,888 घटनाएं हुई हैं, जैसा कि 20 जुलाई, 2018 को संसद में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों से पता चलता है।

 

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि, बढ़ती गर्मी के कारण, विशेष रूप से सर्दी और मानसून से पहले की लंबी शुष्क अवधि अधिक आग के लिए महत्वपूर्ण कारक हैं। पर्यावरण अनुसंधान संस्था, ‘सेंटर फॉर द साइंस एंड एनवायर्नमेंट’ (सीएसई)के विश्लेषण के मुताबिक 20 वीं शताब्दी की शुरुआत के बाद से भारत में वार्षिक औसत तापमान 1.2o सी बढ़ गया है।

 

भारत के जंगलों में आग, 2011 से 2017

 

सूखे में आग ज्यादा

 

सीएसई के डिप्टी डायरेक्टर जनरल चंद्र भूषण ने इंडियास्पेंड को बताया, “जलवायु परिवर्तन सूखापन बढ़ा रहा है। अधिकांश जंगलों में आग तब लगती है जब मिट्टी और वायुमंडल में नमी कम होती है, और आग जंगल के तल पर दहनशील सूखे घास, पत्तियों और लकड़ियों की वजह से फैलता जाता है। “

 

सीएसई विश्लेषण से पता चलता है कि अब तक के15 सबसे गर्म वर्षों में से 13, पिछले 15 वर्षों (2002-2016) के दौरान थे। रिकॉर्ड रूप से पिछले दशक यानी वर्ष 2001से 2010 और वर्ष 2007से 2016 सबसे गर्म वर्ष थे,जैसा कि  ‘डाउन टू अर्थ’ ने 5 जून, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

20 वीं शताब्दी की शुरुआत के बाद से भारत में चार में से तीन मौसमों (या एक वर्ष में नौ महीने) में तापमान 1.5o से अधिक हो गया है, जैसा कि 1901 से 2017 तक के तापमान डेटा पर सीएसई विश्लेषण से पता चलता है।

 

विश्लेषण से आगे पता चलता है कि, 1995 के बाद से तापमान में वृद्धि की दर के कारण अगले दो दशकों में भारत पेरिस समझौते में तय महत्वाकांक्षी लक्ष्य ( ग्लोबल वार्मिंग को 2o सी तक सीमित करना ) को पूरा नहीं कर पाएगा।

 

जंगल की आग के कारण भारत को हर साल 550 करोड़ रुपये का नुकसान होता है, जैसा कि ‘द हिंदुस्तान टाइम्स’ ने 13 फरवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। बाढ़ हर साल 10 गुना ज्यादा वित्तीय नुकसान का कारण बनती है,यह नुकसान करीब 5,600 करोड़ रुपयेका है।

 

जंगल की आग गर्मी में वृद्धि का एक दुष्चक्र बनाते हैं। राज्यों को आपदाओं को रोकने और तैयार करने में मदद करने के लिए एक सरकारी एजेंसी, ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाजटर मैनेजमेंट’, द्वारा 2015 की इस रिपोर्ट में कहा गया है, “जब वनस्पति जल जाती है, तब संग्रहित कार्बन की परिणामी रिलीज ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाती है। अधिक आग, अधिक निकलने वाला कार्बन डाइऑक्साइड, अधिक वार्मिंग … और अधिक गर्म, अधिक आग। “

 

90 फीसदी से अधिक जंगल की आग मनुष्यों द्वारा जानबूझ कर (व्यक्तिगत लाभ या प्रतिद्वंद्विता के लिए) या लापरवाही या दुर्घटना के कारण होती है

 

वनस्पतियों के मौसमी चक्र (पेड़ पर पत्ते या पत्ते) और पांच जैव विविधता हॉटस्पॉट में 47 पर्वत-संरक्षित क्षेत्रों के लिए 1982-2006 के बीच जलवायु डेटा पर शोधकर्ताओं जगदीश कृष्णस्वामी, रॉबर्ट जॉन और शिजो जोसेफ ने 2013 के इस अध्ययन में उल्लेख किया गया है कि “वैश्विक जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिक तंत्र परिवर्तन के एक प्रमुख चालक के रूप में उभरा है।”

 

उन्होंने आगे बताया, “हमने पाया कि वनस्पति और तापमान के बीच का रिश्ता समय के साथ कमजोर हो गया था या नकारात्मक था।”

 

2013 के इस अध्ययन के सह-लेखक, जगदीश कृष्णास्वामी और ‘अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकॉलॉजी एंड इन्वायरामेंट (एटीआरई) में जैव विविधता और संरक्षण में सीनियर फेलो, सूरी सहगल ने इंडियास्पेंड को बताया, “यह मानना ​​गलत होगा कि तापमान वृद्धि और वार्मिंग के कारण, हिमालय जैसे मौसमी ठंडे क्षेत्रों में भी पेड़ पौधे  सकारात्मक प्रतिक्रिया देंगे। इसके विपरीत, हमने पाया है कि बहुत ज्यादा गर्मियों के दौरान तापमान में वृद्धि के कारण, वनस्पतियां मुश्किल में हैं, खासकर तब जब सर्दी और वसंत के बीच सूखे का एक लंबा अंतराल है ।

 

वर्ष 2016 और 2017 के जाड़े के दिनों का तापमान अब तक के इतिहास का सबसे ज्यादा रहा। वर्ष 1901-1930 के बीच माने जाने वाले बेसलाइन की तुलना में औसत तापमान 2.95o सी अधिक था। साथ ही वीसवीं शताब्दी के शुरुआती दिनों की तुलना में जाड़े का औसत तापमान 2 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था, जैसा कि ‘डाउन टू अर्थ’ ने 5 जून, 2017 की रिपोर्ट में बताया था।

 

आग कई पहलुओं पर निर्भर हैं जैसा कि वन बायोमास और आग के मौसम के दौरान वातावरण में नमी। एट्री के कृष्णास्वामी के अनुसार, “भारत में आग कई बार विभिन्न कारणों से मनुष्यों द्वारा लगाई जाती है। विशेष रूप से शुष्क गर्मी के दौरान, कुछ साल पहले उत्तराखंड में ऐसी ही आग लगी थी।? “

 

7 अप्रैल, 2016 से हिमाचल प्रदेश के उत्तरी राज्य में जंगल का 4,500 हेक्टेयर (शिमला शहर के 1.3 गुना आकार) से अधिक आग के हवाले है। यह 2 फरवरी, 2016 से उत्तराखंड में 3,185 हेक्टेयर पर लगी आग से 40 फीसदी अधिक है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 11 मई, 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

 

कृष्णास्वामी कहते हैं, “शीतकालीन बारिश बहुत महत्वपूर्ण हैं। लेकिन लंबी सूखी गर्मी एक बड़ा कारक है। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी आग के मामले को बढ़ाती है। “

 

1990 और 2011 के बीच वर्ष 1995 में उत्तराखंड के जंगलों में सबसे खतरनाक आग फैली। लगभग 375,000 हेक्टेयर जंगल जल कर खाक हो गए। इसके बाद गंगा-यमुना वाटरशेड एरिया में वर्ष 1999 में  80,000 हेक्टेयर, हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2010 में 19,109 हेक्टेयर और महाराष्ट्र में 2010 और 2012 में कुल 10,000 हेक्टेयर जंगल जलकर तबाह हो गए। वर्ष 2012 की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।

 

अधिकांश राज्यों के जंगलों में मार्च से मई के बीच सबसे ज्यादा आग लगते हैं, जैसा कि ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने 3 मई, 2016 की रिपोर्ट में बताया है। पर्यावरणविद मानते हैं कि अग्नि प्रवण मौसम में चीड़ के कांटो को हटाना चाहिए, जिसमें अत्यंत ज्वलनशील पदार्थ भरे होते हैं, जैसा कि indiaclimatedialogue.net 4 अप्रैल, 2018 की रिपोर्ट में बताया गया है।

 

सीएसई के भूषण कहते हैं कि चीड़ वनों की तरह, नीलगिरी के पेड़ भी तेल की वजह से आग लगने के लिए अतिसंवेदनशील हैं।

 

उत्तराखंड जैसे राज्यों के जंगलों में भीषण आग देखी गई है। पूर्वोत्तर में पिछले छह वर्ष की अवधि से 2017 तक, आग की बढ़ी हुई घटनाओं की संख्या दर्ज की गई है।

 

पूर्वोत्तर राज्य के जंगल भी आग के लिए संवेदनशील

 

संसद में साझा आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर-पूर्वी राज्यों में से मिजोरम और असम के नाम,  छह वर्षों से 2017 तक, सबसे ज्यादा जंगल की आग के साथ शीर्ष पांच राज्यों में दर्ज हैं। मेघालय और मणिपुर अन्य राज्य हैं, जहां इस अवधि के दौरान जंगल की आग की बड़ी संख्या रिकॉर्ड की गई है।

 

वन राज्य सर्वेक्षण, 2017 के अनुसार, “यह देखा जा सकता है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में केंद्रीय राज्यों की तुलना में सालाना आग की घटनाओं की संख्या दोगुनी हो गई है ।”

 

हालांकि, यह देखा जा सकता है कि केंद्रीय और दक्षिणी राज्यों के बाद अन्य क्षेत्रों की तुलना में उत्तर-पूर्वी राज्यों में जंगलों का अनुपात अधिक है।”

 

जंगल में आग की घटनाओं के साथ टॉप पांच राज्य, 2011-2017

Source: Lok Sabha replies here, here, and here

 

FactChecker ने 4 जुलाई, 2018 की रिपोर्ट में बताया है कि लक्षद्वीप के पास 90.3 फीसदी, मिजोरम के पास 86.3 फीसदी और अरुणाचल प्रदेश के पास 79.9 फीसदी  वन क्षेत्र हैं जो अन्य राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा हैं।

 

एक वन्यजीव अनुसंधान संगठन ‘बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ में जलवायु परिवर्तन और हिमालय कार्यक्रम के सहायक निदेशक गिरीश जथर ने इंडियास्पेंड को बताया, “जब हम सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के समुदायों से बात करते हैं, तो वे कहते हैं कि पिछले दो दशकों में वर्षा [वर्षा और हिमपात] के पैटर्न बदल गए हैं। यह काफी कम हो गया है और उनका मानना ​​है कि सर्दियां पहले की तरह नहीं हैं। वास्तव में गर्मी बहुत बढ़ गई है। “

 

सरकार द्वारा संसद को दिए गए जबाव के अनुसार, दो वर्षों से 2017 तक, अरुणाचल प्रदेश की घटनाएं दोगुनी होकर 733 हो गईं और उसी अवधि के दौरान सिक्किम 2.6 गुना बढ़कर 8 घटनाएं हुई हैं।

 

वन संरक्षण के लिए सरकारी निधि में कमी

 

2015-17 के बीच जंगल की आग में 125 फीसदी की वृद्धि के बावजूद, वन संरक्षण उपायों के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जारी राशि में 21 फीसदी की कटौती हुई है। यह राशि 34.5 करोड़ रुपये है।

 

वन प्रबंधन योजना (आईएफएमएस) को 2017 में वन अग्निरोधी और प्रबंधन (एफपीएम) योजना के साथ बदल दिया गया था।

 

वन संरक्षण के लिए जारी राशि

 

पर्यावरण, वन और जलवायु मंत्रालय दिशानिर्देशों के अनुसार केंद्र शासित प्रदेशों के लिए केंद्र का हिस्सा 100 फीसदी, पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 90 फीसदी और अन्य राज्यों के लिए 60 फीसदी है।

 

बीएनएचएस के जठार के मुताबिक, परिवेश की सम्पूर्णता को बनाए रखने की आवश्यकता है जैसा कि इन क्षेत्रों में विकास के नाम पर पारिस्थितिक तंत्र से छेड़छाड़ हुई है। सरकारों द्वारा निर्णय में आसपास के समुदाय को शामिल करना चाहिए।

 

(पलियथ विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 13 अगस्त, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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