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पाकिस्तान को छोड़कर, पड़ोसी देशों की तुलना में भारतीय बच्चों की स्थिति बद्तर

सना अली,
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मुंबई: बच्चों के रहन-सहन का मूल्यांकन करते हुए 176 देशों की एक सूची में भारत को 113वां स्थान मिला है। ‘द एंड ऑफ चाइल्डहुड इंडेक्स’ ग्लोबल चाइल्डहुड रिपोर्ट का एक हिस्सा है, जिसे ‘सेव द चिल्ड्रन’ द्वारा 28 मई, 2019 को जारी किया गया था। सेव द चिल्ड्रन एक गैर-लाभकारी संस्था है, जो बाल अधिकारों के लिए काम करती है।

 

बच्चों और किशोरों (0-19 वर्ष) की स्थिति का निर्धारण करने के लिए इंडेक्स आठ संकेतकों पर देशों का मूल्यांकन करता है: पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु दर, कुपोषण जो विकास में बाधा डालता है, शिक्षा की कमी, बाल श्रम, कम आयु में विवाह, किशोर जन्म, संघर्ष द्वारा विस्थापन और बाल हत्या।

 

2000 और 2019 के बीच, भारत का स्कोर 632 से बढ़कर 769 हो गया। भारत ने 2018 में 172 देशों के 116 से अपनी रैंक में सुधार किया है, जैसा कि हमने कहा कि इस साल 176 देशों में से 113वें स्थान पर रहा है।

 


 

वर्ष 2000 में, दुनिया भर में अनुमानित 97 करोड़ बच्चे ऊपर बताए गए कारणों से अपने बचपन से वंचित थे। 2019 में यह संख्या 29 फीसदी गिरकर 69 करोड़ है।

 

रिपोर्ट के अनुसार सार्वजनिक निवेश में वृद्धि और हाशिए पर पड़े बच्चों को सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए लक्षित कार्यक्रमों के माध्यम से हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

 

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि बाल सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से सभी बच्चों के लिए एक न्यूनतम वित्तीय सुरक्षा सरकारों के एजेंडे पर होनी चाहिए। यह भी कहा गया है कि बाल गरीबी को कम करने और खत्म करने के लिए एक राष्ट्रीय कार्य योजना को अपनाना होगा, साथ में समर्पित बजट और निगरानी प्रणाली, जो गरीबी से संबंधित अभावों में सुधार को ट्रैक करते हैं, बचपन के बेहतर परिणामों को प्राप्त करने में मदद करेंगे।

 

संक्रामक रोगों से पांच वर्ष से कम आयु के भारतीय बच्चों की मृत्यु अधिक

 

इस 2018 रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने पिछले दो दशकों में अपनी बाल मृत्यु दर में 55 फीसदी की कमी की है, 2000 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 88 मौतों से 2017 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 39 मृत्यु तक। फिर भी, यह प्रति 1,000 जीवित जन्मों में 25 या उससे कम मृत्यु के मिलेनियम डेवलपमेंट लक्ष्य से पीछे है। इन मौतों के लिए ज्यादातर जिम्मेदार संक्रामक रोगों को ठहराया जाता है, जिन्हें रोका जा सकता है। इसके बाद दुर्घटनाओं, मैनिंजाइटिस, खसरा और मलेरिया से ज्यादा मौत होती है।

 

पड़ोसी देशों में, भारत की पांच वर्ष की आयु से कम बच्चों में मृत्यु दर केवल पाकिस्तान (74.9) की तुलना में बेहतर है। श्रीलंका (8.8), चीन (9.3), भूटान (30.8), नेपाल (33.7) और बांग्लादेश (32.4) सभी का प्रदर्शन भारत से बेहतर है।

 


 

38.4 फीसदी भारतीय बच्चे स्टंट

 

2000 से 2019 के बीच, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में स्टंट का प्रसार ( आयु के अनुसार कम कद ) विश्व स्तर पर 25 फीसदी गिर गया है। पहले 19.8 करोड़ बच्चे ऐसे थे, अब 14.9 करोड़ हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस कमी का 50 फीसदी से अधिक अकेले चीन और भारत में था।

 

2018 तक, पांच से कम उम्र के 38.4 फीसदी भारतीय बच्चों को स्टंट थे, जो अपने पड़ोसी देशों के बीच, पाकिस्तान ( 40.8 फीसदी ) के बाद यह दूसरा सबसे खराब प्रदर्शन था। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन (6 फीसदी) की दर सबसे कम थी, उसके बाद नेपाल (13.8 फीसदी), श्रीलंका (17.3 फीसदी), बांग्लादेश (17.4 फीसदी) और भूटान (19.1 फीसदी) का स्थान रहा।

 


 

भारत में राज्यों के बीच व्यापक असमानताएं हैं – जबकि बिहार में 48.3 फीसदी बच्चे स्टंट है, झारखंड में यह संख्या 45.3 फीसदी, छत्तीरगढ़ में 37.6 फीसदी है। केरल में सबसे कम 19 फीसदी, उसके बाद तमिलनाडु (27.1 फीसदी) है, जैसा कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे, 2015-16 के आंकड़ों से पता चलता है।

 

पांच में से एक भारतीय बच्चा स्कूल से बाहर

 

रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, अपने बच्चों को मुफ्त सार्वभौमिक शिक्षा देने के बावजूद, उनमें से 20.2 फीसदी (8-16 वर्ष की आयु वाले) अभी भी 2018 तक स्कूल से बाहर थे। अपने पड़ोसियों की तुलना में, भारत ने केवल पाकिस्तान ( वहां 40.8 फीसदी स्कूल से बाहर हैं) से बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि श्रीलंका (6.4 फीसदी), नेपाल (13.8 फीसदी), बांग्लादेश (17.4 फीसदी), भूटान (19.1 फीसदी) और चीन (7.6 फीसदी) ने बेहतर प्रदर्शन किया है।

 


 

2018 तक, दुनिया भर में 15.2 करोड़ बच्चे अभी भी दुनिया भर में बाल श्रम में लगे हुए थे, रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर एक काल्पनिक देश बनाया जाए, जो केवल इन बाल श्रमिकों से बना हो तो वह देश दुनिया की नौवीं सबसे बड़ी आबादी के रूप में रैंक करेगा।

 


 

भारत में वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक बाल मजदूर हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जून 2017 में बताया था। वे शिक्षा से वंचित हैं , असुरक्षित और विषाक्त वातावरण में काम करते हैं और ऐसे में स्वास्थ्य की दृष्टि से उन्हें अपरिवर्तनीय क्षति पहुंचती है।

 

2000 से 2018 के बीच, भारत में बाल विवाह में 51 फीसदी गिरावट

 

रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत ने 18 साल से 2018 में बाल विवाह की संख्या को आधा कर दिया, जबकि सबसे गरीब लड़कियों की शादी की दर उतनी ही कम हुई है, जितनी हर किसी के लिए। यह गिरावट 15 साल से कम उम्र की लड़कियों में सबसे तेज है।

 


 

1978 में, भारत ने लड़कियों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र 15 से बढ़ाकर 18 और लड़कों के लिए 18 से बढ़ाकर 21 कर दी। पिछले दो दशकों में, भारत ने बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 जैसे कानूनों और योजनाएं जैसे कि किशोरावस्था की लड़कियों के सशक्तीकरण के लिए राजीव गांधी योजना (जिसे सबला ’कहा जाता है), किशोरी शक्ति योजना और किशोर लड़कियों के लिए पोषण कार्यक्रम के माध्यम से बाल विवाह पर अंकुश लगाने के लिए काम किया है।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि कम उम्र में शादी की दर में गिरावट आर्थिक विकास, लड़कियों की शिक्षा की बढ़ती दर और सरकार द्वारा सक्रिय निवेश से हुआ है। समुदाय-आधारित हस्तक्षेप जैसे सशक्तिकरण परामर्श, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी जानकारी, व्यावसायिक प्रशिक्षण और लड़कियों के लिए जीवन-कौशल विकास भी महत्वपूर्ण कारक रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि बालिकाओं को शिक्षित करने के लिए सशर्त नकद हस्तांतरण जैसी योजनाओं ने भी बाल विवाह को कम करने में मदद की है।

 

20 वर्षों में, भारत में किशोर उम्र में जन्म में 63 फीसदी गिरावट

 

भारत ने 2000 के बाद से किशोर उम्र में जन्म की दर को 63 फीसदी तक कम करने में कामयाबी हासिल की है, जिसके परिणामस्वरूप 20 लाख कम युवा माताएं हैं। केवल भारत में प्रगति ही, किशोरों के जन्म के संबंध में वैश्विक कमी का लगभग तीन-चौथाई।

 

कम उम्र में बच्चे का जन्म न केवल बच्चे के लिए बल्कि मां के लिए भी घातक होता है, और 14 से 19 साल की लड़कियों के लिए मृत्यु का प्रमुख कारण बनता है।

 

भारत की अधिकांश प्रगति उसके सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों का परिणाम है, जिसने अधिक लड़कियों को स्कूल में रहने और यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने में सक्षम बनाया है।

 

2018 तक, किशोर उम्र में जन्म दर – अर्थात, 15-19 वर्ष की आयु की प्रति 1,000 लड़कियों में जन्म दर 24.5 फीसदी था, जो कि चीन (6.5), श्रीलंका (14.8) और भूटान (22.1) से ज्यादा है और पाकिस्तान (37.7), नेपाल (62.1) और बांग्लादेश (84.4) से बेहतर है।

 


 

(सना अली रिपोर्टर हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 29 मई 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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