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अवध में धर्म और जाति की राजनीति के व्यापक संकट का चेहरा

रेवती लाउल,
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अयोध्या की सड़कों पर रामायण की घटनाओं को चित्रित करती पेंटिंग। यह शहर 1991 में शुरू हुई भारतीय जनता पार्टी की मंदिर राजनीति का केंद्र रहा है। लगभग तीन दशक पहले जिस स्थान पर यह सब शुरू हुआ अब वहां, ग्रामीण संकट और भटकते मवेशियों से किसान नाराज दिख रहे हैं।

 

अयोध्या, लखनऊ (उत्तर प्रदेश): 55 वर्षीय राम तीरथ और उनकी पत्नी मिथिलेश कुमारी, 6 मई, 2019 को वोट देने के मुद्दे पर एक दूसरे से बहस में उलझ गए थे कि आखिर किसको वोट दें । उत्तर प्रदेश के मध्य जिले फैजाबाद के पलिया प्रताप शाह के उच्च जाति वाले गांव में ये दंपत्ति अपने 2.5 एकड़ खेत में गन्ने उपजाते हैं।

 

राम तीरथ ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा किसी के लिए मतदान करने का कोई सवाल ही नहीं था। उन्होंने मोदी के अभियान को ध्यान में रखते हुए शौचालय को घर की इज्जत बताते हुए कहा, “मोदी ने हमें शौचालय बनाने के लिए 12,000 रुपये दिए।” उन्होंने स्वीकार किया कि शौचालय का इस्तेमाल अब तक नहीं हुआ है, क्योंकि गांव में पानी की आपूर्ति नहीं है। सीमेंट टॉयलेट को फ्लश करने के लिए एक बड़ी दूरी से बाल्टी में पानी ले जाने का कोई मतलब नहीं है, जबकि खेतों में कम पानी से काम चल जाता है।

 

55 वर्षीय राम तीरथ, फैजाबाद जिले के पलिया प्रताप शाह में अपने घर पर सरकार की स्वच्छ भारत योजना की सहायता से बनाए गए शौचालय के बगल में खड़े हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा किसी को भी वोट देने का कोई सवाल ही नहीं है।

 

उन्होंने मोदी की बीमा योजनाओं और गरीब किसानों को हस्तांतरित की गई धनराशि (6,000 रुपये प्रति वर्ष या 500 रुपये प्रति माह ) के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि, “कम से कम उन्होंने ऐसा किया है।” राम तीरथ ने यह स्वीकार किया कि गांव में मुख्य समस्या आवारा पशुओं की है, जिसने उनका सारा गन्ना और सरसों खा लिया था, जिसे वह लगभग 100,000 रुपये में बेच सकते थे।

 

उनसे फिर पूछा गया कि 6,000 रुपये मिलने और 10,000 रुपये खोने के बाद वे गणित कैसे जोड़ते हैं। राम तीरथ ने कहा कि उन्होंने मोदी का कोई विकल्प नहीं देखा। उन्होंने बाद में स्वीकार किया कि जाति और धर्म  चुनाव में कारक हैं।

 

कुमारी, जो कि एक दबंग महिला दिखती थी, ने एक-लाइनर के साथ अपने पति की भाजपा की तारीफ  को बाधित कर दिया, जिसने सबको चुप करा दिया, “हम नंगे हैं। आपके पास दस कपड़े हैं, हमारे पास एक नहीं हैं, बेपरदे खड़े हैं…अब आप हमारे परदा नहीं डाल सकते हैं तो हम आपके पीछे क्यों मरें?”कुमारी ने बोलना जारी रखा। मोदी की जाति के संबंध में उल्लेख करते हुए उसने कहा, “वोट बाराबर देते हैं, पिछली बार दिए थे  तेली को। कुछ नहीं हुआ।” अब तक, उसकी बात सुनने के लिए कुछ और लोग इकट्ठा हो गए थे।

 

चुनाव में किसे वोट देना है, यह सवाल 50 साल के मिथिलेश कुमारी और उनके पति राम तीरथ के बीच तकरार में बदल गया। कुमारी का नरेंद्र मोदी सरकार से मोहभंग हो गया है, वह कहती है कि वह किसी को भी वोट नहीं देगी।

 

बहस भाजपा के राम मंदिर अभियान की आलोचना के साथ समाप्त हुई। 6 दिसंबर, 1992 का जिक्र करते हुए, बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर उन्होंने कहा, “मस्जिद टूटा वो सही हुआ। लेकिन मन्दिर ना बना, ना बानेगा। मोदी जी भी कहते हैं कि बनेगा…हू हा..हू हा…उसके बाद सब खत्म हो गया। अब फिर मोदी खड़े हैं तो अब क्या करेंगे, कुछ नहीं। देखते रहिए।”

 

कुमारी ने कहा कि वह इस बार किसी को वोट नहीं देगी।

 

 यह उत्तर प्रदेश में हिंदू वोट पर छह रिपोर्ट की श्रृंखला में से चौथी रिपोर्ट है। आप पहली रिपोर्ट यहां, दूसरी यहां और तीसरी यहां पढ़ सकते हैं। उत्तर प्रदेश, भारत का सबसे चर्चित चुनावी युद्ध का मैदान है, जहां से कुल 543 लोकसभा सीटों में से 80 के लिए सांसद चुने जाते हैं। अवध में 17 लोकसभा क्षेत्र हैं, जिनमें फैजाबाद और लखनऊ और कांग्रेस पार्टी के अमेठी और रायबरेली शामिल हैं।

 

Source: District Census Handbook, 2011 census

 
अयोध्याभाजपा की मंदिर राजनीति की सीट
 

उसी गांव से थोड़ी दूर पर फैजाबाद निर्वाचन क्षेत्र से सांसद रहे और फिर से चुने जाने का आग्रह करने वाले 64 वर्षीय लल्लू सिंह पहुंचे थे।

 

बाहर का तापमान 45 डिग्री था। सिंह ने अपनी एसयूवी से निकालने की कोशिश की। उन्हें बाहर निकलने में मदद की जरूरत थी, और तब एक पार्टी कार्यकर्ता दौड़ा आया  ताकि सिंह झुककर अपना पैर उसकी पीठ पर रख कर उतर सके।

 

लू के थपेड़ों से बचने के लिए सिंह ने अपनी आंखें बंद करके बात की और भीड़ को भाजपा के मुख्य मंत्र – धर्म और हिंदुओं की सुरक्षा पर खुराक दी।

 

64 साल के लल्लू सिंह फैजाबाद सीट से लोकसभा के लिए फिर से चुनाव लड़ रहे हैं। पलिया प्रताप शाह गांव में एक सभा में बोलते हुए, उन्होंने भीड़ को भारतीय जनता पार्टी के मुख्य मंत्र – धर्म और हिंदुओं की सुरक्षा पर खुराक दी।

 

उन्होंने अयोध्या को विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल और भाजपा की नीतियों और विभिन्न मंदिरों और धरोहर स्थलों में से 141 को ग्रेटर अयोध्या सर्किट में बदलने की योजना की बात की। अधिक सड़कें, अधिक राजमार्ग की बात की।

 

दर्शकों में भगवा वस्त्र और चमकदार, सोने के चश्मे के साथ एक साधु भी था। एक आदमी ने उसकी ओर ताकते हुए टिप्पणी की: “यह आदमी स्थानीय माफिया गैंग का है।”

 

Faizabad’s Lok Sabha Members, 1991-2014
Lok Sabha Duration Winning Candidate Party
Tenth 1991-96 Vinay Katiyar Bharatiya Janata Party
Eleventh 1996-98 Vinay Katiyar Bharatiya Janata Party
Twelfth 1998-99 Mitrasen Yadav Samajwadi Party
Thirteenth 1999–2004 Vinay Katiyar Bharatiya Janata Party
Fourteenth 2004-09 Mitrasen Yadav Bahujan Samaj Party
Fifteenth 2009-14 Dr. Nirmal Khatri Indian National Congress
Sixteenth 2014-Incumbent Lallu Singh Bharatiya Janata Party

 

फैजाबाद, जिसका हाल ही में नाम बदल कर अयोध्या किया गया है, भाजपा की मंदिर राजनीति का केंद्र है, जो 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार अटल बिहारी वाजपेयी और पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में शुरू हुआ। अभियान में, आडवाणी ने एक पौराणिक रथ की तरह दिखने वाली टोयोटा बस में रथयात्रा शुरू की। भगवान जैसी भाव-भंगिमा के साथ, आडवाणी ने भीड़ से कहा था कि बाबरी मस्जिद भगवान राम की जन्मभूमि पर खड़ा है और इसे भगवान राम को समर्पित मंदिर के लिए इसे प्रतिस्थापित करने की आवश्यकता थी। एक साल बाद, 6 दिसंबर, 1992 को, हजारों नाराज हिंदू भक्तों ने अयोध्या शहर पर कब्जा कर लिया और मस्जिद को तोड़ दिया। मस्जिद के विध्वंस का स्थल अब एक मिट्टी का टीला है, जिसके ऊपर भगवान राम की मूर्ति है, जिसे राम लला कहा जाता है। यह एक ऐसा स्थान है जहां हर दिन हजारों भक्त आते हैं

 

इस उम्मीद में कि राम मंदिर बनाने के लिए भाजपा का वादा-‘एक दिन जरूर पूरा होगा’, भक्त मंदिर में प्रार्थना करने के लिए पांच सुरक्षा जांचों से होकर गुजरते हैं।

 

मंदिर की ओर बढ़ते हुए एक भक्त ने टिप्पणी की: “यहां हमारे प्रिय भगवान राम एक झोपड़ी में रहते हैं, जबकि हम वातानुकूलित अपार्टमेंट में रहते हैं। यह किस तरह की दुनिया है? ” उनकी भावना का कई लोगों ने अपना सिर हिलाते हुए समर्थन किया और यह विश्वास किया कि भाजपा को छोड़कर अन्य सभी राजनीतिक दल मंदिर निर्माण में बाधा डाल रहे हैं – और केवल मोदी (और भाजपा) उनके रक्षक हैं।

 

मंदिर के बाहर, सैकड़ों दुकानों में पूजा की समग्री और देवताओं के चित्र बिकते हैं। रामानंद सागर द्वारा निर्मित और 1987-88 में दूरदर्शन पर प्रसारित रामायण पर टेलीविजन श्रृंखला के सबसे अधिक चित्र अभी भी दिखते हैं, जो 80 के दशक में एकमात्र चैनल था।

 

अयोध्या में धर्मस्थल के बाहर दुकानों में बिकने वाली पूजा की सामग्री और साथ में चित्र

 

इस टेलीविजन श्रृंखला के तीन साल बाद एक राष्ट्रीय सनसनी बन गई, आडवाणी और वाजपेयी ने अपने राम जन्मभूमि अभियान में श्रृंखला से आइकनोग्राफी का उपयोग किया। अब, उस धारावाहिक के पोस्टर, जिसका फिर से टेलीकास्ट हो रहा है, अयोध्या में भगवान राम, सीता और लक्ष्मण के चित्र के रूप में बेचे जाते हैं।

 

अब, लगभग तीन दशक बाद, साइट अदालत के विवाद का विषय है, लेकिन यह मध्य यूपी या अवध क्षेत्र के 17 जिलों में भाजपा के अभियान के केंद्र में है ।अयोध्या लोगों की भावना का केंद्र और  क्षेत्र के दूसरे छोर पर लखनऊ, इसका राजनीतिक केंद्र।

 

लखनऊ, जहां राजनीतिक आकांक्षाओं का घर है

 

राकेश पांडे के पिता को बेटे की पढ़ाई के लिए राजमार्ग पर रहे एक पारिवारिक भूखंड को बेचना पड़ा। अपने पिता के त्याग के कारण, पांडे ने सेमेस्टर शुरू होने से पहले ही अपनी गर्मी की छुट्टियों में ही गणित और विज्ञान के सिलेबस को पूरा किया। उनके गांव में बिजली नहीं थी, और इसका मतलब पांच साल की उस उम्र उम्र में लोटना था – जब यूपी के पूर्वी हिस्से से 840 किलोमीटर की दूरी पर कुशीनगर से, वह पश्चिमी यूपी के बुलंदशहर जिले में गए थे। इसलिए वह अपने चाचा के साथ रह लगे थे, जिनके गांव में बिजली थी।

 

जब पांडे अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री के बीच में थे, उनके पिता ने चीनी मिल में अपनी नौकरी खो दी। पांडे के पास अपना अंतिम सेमेस्टर का फीस देने के लिए पैसे नहीं थे और उन्हें परीक्षा देने से रोका जा रहा था। लेकिन पांडे का पढ़ाई करने का संकल्प इतना मजबूत था कि उन्होंने अपने कॉलेज के निदेशक को धमकी दी कि अगर उन्हें परीक्षा देने की अनुमति नहीं मिली तो वह इमारत से कूद जाएंगे। शायद अपराध बोध के बाद निदेशक ने पांडे के फीस का भुगतान किया।

 

एक शिक्षक और एक इंजीनियरिंग कोच के रूप में खुद को बदलने के बाद, पांडे और अधिक चाहते थे। वर्ष 2011 था। पांडे उन दिनों नोएडा क्षेत्र में पढ़ा रहे थे, जब शहर में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरु हुआ। पांडे ज्वार से बह गए थे। वह एक ऐसे युवा में बदल गए, जो दुनिया को बदलना चाहता था। उन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा भी दी, लेकिन असफल रहे। उन्होंने बताया कि “…तो मैंने खुद से पूछा कि मैं और क्या कर सकता हूं, और जवाब था राजनीति।”  लेकिन पांडे ने पाया कि वे आम आदमी पार्टी की तरफ आकर्षित नहीं थे। उन्होंने पाया कि इसके बजाय, भाजपा में आकांक्षा और राजनीतिक सफलता का एक बड़ा आकाश है।

 

इसलिए, वह दिल्ली से यूपी लौट आए और पार्टी के आईटी सेल में अपना रास्ता बनाने तक बीजेपी के लखनऊ कार्यालय में लगातार आना शुरू कर दिया। दो साल के भीतर, 2019 की शुरुआत में वे लोगों को प्रभावित करके चुनाव प्रबंधन टीम में शरीक हो गए।

 

राकेश पांडे (सफेद कपड़े में) उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में एक रैली में भाग लेते हुए, जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आईटी सेल में हैं। पांच साल की आयु में पांडे ने अपने चाचा के घर पर रहे, ताकि वे पढ़ाई कर सकें, क्योंकि वहां बिजली थी। अन्ना हजारे के 2011 के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से वे राजनीति में शामिल हुए। लेकिन बाद में उन्होंने आम आदमी पार्टी नहीं, बल्कि भाजपा को चुना। (फोटो साभार: राकेश पांडे)

 

लखनऊ के प्रमुख रियल एस्टेट जोन हजरतगंज में एक आरामदायक एयर कंडिशन कमरे में बैठे, पांडे ने अपने चश्मे के ऊपर किया और उन्होंने एक चुनौती की तरह हवा में एक नंबर फेंका: अकेले उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा के लिए इस मैदान में 40 लाख से अधिक स्वयंसेवक और कार्यकर्ता हैं।  मोदी प्रशंसक पांडे ने कॉफी पीते हुए बताया कि, कोई अन्य पार्टी संभवतः इस संख्या तक नहीं पहुंच सकती है।

 

राज्य विधानसभा विधायकों के लिए बने अपार्टमेंट परिसर में पार्टी द्वारा आवंटित फ्लैट में 37 वर्षीय पांडे अपनी कुर्सी पर आराम से लेट गए। भाजपा की यूपी चुनाव टीम में रहते हुए, मतदाताओं और कार्यकर्ताओं की संख्याओं पर काम करते हुए और यह सुनिश्चित करते हुए कि फोन लाइनें काम कर रही हैं और प्रत्येक चुनावी बूथ पर जमीनी लोग हैं, पांडे ने अपने जीवन में पहली बार एक आरामदायक घर का अधिकार अर्जित किया है।

 

 

पांडे ने 40 लाख के भाजपा के आंकड़े पर बात को आगे बढ़ाया- भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य, जहां देश की आबादी का पांचवा हिस्सा रहता है, सभी सांसदों का लगभग छठा भाग ( 543 में से 80) लोकसभा में भेजता है।  राज्य में 163,000 चुनाव बूथ भी हैं। भाजपा के पास प्रति चुनावी बूथ पर 21 लोगों की एक टीम है, जो 34 लाख लोगों को जोड़ती है। इसके अलावा, किसानों के समूह, महिलाओं के समूह और सहयोगी समूहों का एक समूह है, जो कुल 40 लाख से अधिक लेते हैं। पार्टी का हर घोषणापत्र पांडे के खून में दौड़ता है – वे चाहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी पर पार्टी के सदस्यों के अपार भरोसे के लिए भगवान राम का मंदिर अयोध्या में बनना चाहिए।

 

गाड़ी पर लगाया गया यह स्क्रीन  लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी के अभियान के वीडियो चलाता है। निर्वाचन क्षेत्र ने 1991 से भारतीय जनता पार्टी के लिए मतदान किया है।

 

लखनऊ शहर में उनके दृष्टिकोण और अन्य शहरी उम्मीदवारों से चुनाव को देखते हुए, यह प्रतीत होता है कि राज्य में भाजपा के समेकन की कहानी एक पूर्वविदित परिणाम है। यूपी की राजधानी लखनऊ में भी 1991 के बाद से लगातार और लगातार भाजपा को वोट दिया गया है।

 

Lucknow’s Lok Sabha Members, 1991-2014
Lok Sabha Duration Winning Candidate Party
Tenth 1991-96 Atal Bihari Vajpayee Bharatiya Janata Party
Eleventh 1996-98 Atal Bihari Vajpayee Bharatiya Janata Party
Twelfth 1998-99 Atal Bihari Vajpayee Bharatiya Janata Party
Thirteenth 1999–2004 Atal Bihari Vajpayee Bharatiya Janata Party
Fourteenth 2004-09 Atal Bihari Vajpayee Bharatiya Janata Party
Fifteenth 2009-14 Lalji Tandon Bharatiya Janata Party
Sixteenth 2014-Incumbent Rajnath Singh Bharatiya Janata Party

 

लेकिन शहरों के बाहर कदम रखने, और अवध क्षेत्र की राजनीतिक तस्वीर हिंदुत्व या हिंदू अभियोजन के सतही स्तर के पढ़ने की तुलना में कहीं अधिक जटिल है।

 

जाति का गणित
 

लखनऊ से सटे मिसरिख लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र  के बीजेपी उम्मीदवार अशोक रावत एक गांव से दूसरे गांव गए। वह जानते थे कि विपक्षी दलों के साथ ( बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी) एक गठबंधन के साथ एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए बहुत कुछ इस बार एक भगवा के बजाय जाति गणना पर निर्भर करेगा।

 

43 साल पुरानी उनकी राजनीति भी जाति पर केंद्रित है। वह पासी नामक अनुसूचित जाति से आते हैं। वह पिछले चुनावों तक बसपा के साथ थे और अब उन्हें भाजपा में आमंत्रित किया गया था। पार्टी को रावत समुदाय की राजनीतिक ताकत के बारे में पता था।

 

पासी क्षेत्र में दूसरे सबसे बड़े अनुसूचित जाति समूह हैं। पहले पर जाटव हैं, जो बसपा नेता मायावती की जाति है। जैसा कि रावत ने मोदी सरकार की उपलब्धियों को सूचीबद्ध करने के लिए एक गांव से दूसरे गांव में कदम रखा, उन्होंने जाति गणित पर भी बात की।

 

रावत ने कहा, “300,000 जाटव -जो बसपा को वोट देंगे, 100,000 यादव -जो सपा को वोट देंगे और 250,000 मुसलमान -जो सपा को भी वोट देंगे तो कुल मिलाकर 17.6 लाख मतदाताओं की कुल आबादी में यह 650,000 वोट है। “

 

उन्होंने कहा, “बाकी वोट हमारे हैं या उनमें से कम से कम 60 फीसदी, जिनमें 250,000 पासी, 250,000 ब्राह्मण, 100,000 ठाकुर और क्षत्रिय और अन्य पिछड़े वर्गों के 450,000 मतदाता हैं।”

 

इन समुदायों को भाजपा के लिए पारंपरिक मतदाताओं के रूप में देखा जाता है। चूंकि वे बसपा को दलित समर्थक और सपा को मुस्लिम समर्थक के रूप में देखते हैं, इसलिए ये समूह स्वत: ` हिंदू-झुकाव’ वाली पार्टी के साथ खड़े हो जाते हैं।

 

अवध की ब्रिटिश व्याख्या और आधुनिक राजनीतिक बयानबाजी
 

 चुनावी मौसम में, प्रधान मंत्री मोदी क्षेत्र के एक पुराने राजनीतिक विचार की फिर से पैकेजिंग कर रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसा कि  ब्रिटिश  उपनिवेशवादियों के विरोध को खारिज करने का तरीका अपनाते थे। लखनऊ या यूपी का मध्य क्षेत्र कभी अवध था, या ब्रिटिश लेक्सिकॉन में ऑध था। इसका नाम उस क्षेत्र से मिलता है, जो कभी मुगल सम्राट अकबर द्वारा 16 वीं शताब्दी में स्थापित किया गया था। जब इसे 1857 में ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने अपने कब्जे में ले लिया, उन्होंने पिछले राजवंश वाजिद अली शाह को एक कुशासक बताया था। अंग्रेजों ने मुस्लिम कुशासन का आरोप लगा कर राज्य पर कब्जा कर लिया और हर तरह के विद्रोह को कुचल दिया। अंग्रेजों ने सुनिश्चित किया कि राजा को एक दुष्ट और एक खराब शासक के रूप में चित्रित किया जाए। वाजिद अली शाह के नंगे बदन के साथ उनके चित्रों और उनके प्रतिकृतियों को पूरे क्षेत्र के शहरों में लगाया गया था। दो-ढाई शताब्दियों के बाद, प्रधान मंत्री मोदी और उनकी ‘सेना’ सभी अन्य पार्टियों पर कुशासन का मामला बना रही है। जैसा कि रावत ने हरदोई शहर के एक बड़े मैदान में स्पष्ट संदेश दिया: “यह मोदी बनाम कुशासन है।”

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोग एक स्क्रीन पर देखते हैं जैसा कि वह उत्तर प्रदेश के हरदोई शहर में 200,000 से अधिक लोगों की सभा में बोलते हैं। अंग्रेजों ने अवध में मुस्लिम कुशासन का हवाला दिया था। ढाई सदी बाद, मोदी क्षेत्र में विपक्षी कुशासन का मामला बना रहे हैं।

 

हरदोई शहर के एक बड़े मैदान में मोदी को सुनने के लिए 200,000 से अधिक लोग इकट्ठा हुए, पार्टी नेता नरेश अग्रवाल द्वारा पिच किया गया था, जिन्होंने  सपा-बसपा गठबंधन के अपमान के साथ शुरुआत की। अग्रवाल ने बीएसपी (हाथी) और सपा (साइकिल) के चुनावी प्रतीकों का जिक्र करते हुए कहा, “जब साइकिल पे हाथी बैठ जाएगा तो साइकिल चकनाचूर होगा।” मोदी ने अपशब्द को आगे बढ़ाया। मोदी ने भारतीय संविधान लिखने वाले बीआर अंबेडकर के अनुयायियों, दलितों और निचली जातियों के नेताओं का जिक्र करते हुए कहा,  “वही लोग जिन्होंने कभी अंबेडकरवादियों को माफिया कहा था … वही लोग अब निचली जातियों की राजनीति के बारे में बात कर रहे हैं। वही लोग अब निचली जातियों की राजनीति के बारे में बात कर रहे हैं।”

 

भारतीय जनता पार्टी के समर्थक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी के उम्मीदवार अशोक रावत द्वारा संबोधित हरदोई की रैली में पार्टी की प्रचार सामग्री को प्रोत्साहित करते हैं।

 
गाय की राजनीति और कृषि संकट

 

लगभग 50 किमी दूर जहां से मोदी और रावत चुनाव प्रचार कर रहे थे, जराहा गांव के परशुराम जाति (पासियों के लिए एक और शब्द) की 55 वर्षीय राज रानी ने रस्सी घुमाते हुए कहा, “मोदी ने कुछ भी नहीं किया।”

 

55 वर्षीय राज रानी कहती हैं, “मोदी ने कुछ भी नहीं किया है।”

 

50 वर्षीय सुनीता इसी जाति से हैं। वह कहती हैं: “गांव में आवारा-मवेशियों की बड़ी आबादी है, जो बहुत खतरनाक हैं।”

 

उत्तर प्रदेश के जराई गांव में सुनीता कहती हैं, “गांव में आवारा-मवेशियों की बड़ी आबादी है, जो बहुत खतरनाक हैं।”  आवारा मवेशी किसानों को नुकसान पहुंचाते हैं।

 

अन्य लोगों ने कहानी की टुकड़ों को जोड़ा।  जब से भाजपा के गौ-रक्षा (गौ रक्षा) अभियान की शुरुआत हुई और सतर्कता समूहों ने कानून को अपने हाथों में लेना शुरू कर दिया, जराहा जैसे गांवों की अर्थव्यवस्था को नुकसान उठाना पड़ा।

 

2014 के बाद से, यूपी में गाय से संबंधित घृणा अपराधों में 11 लोग मारे गए हैं, उनमें से 73 फीसदी मुस्लिम हैं, किसी भी भारतीय राज्य में इस तरह के हमलों में सबसे अधिक है, जैसा कि FactChecker.in द्वारा चलाए गए डेटाबेस से पता चलता है।

 

 इससे पहले, जब गायों की उम्र दूध देने की उम्र से ज्यादा हो जाती थी,किसान उन्हें बेच दिया करते थे। जरहा में साल में दो पशु मेले लगते थे। बैल – या गैर-स्तनपान कराने वाली मादा गाय को बेचना संकट के खिलाफ किसानों का बीमा था। यह यूपी जैसे राज्य में और भी महत्वपूर्ण हो गया है, जहां आधे से अधिक कार्यबल या 55 फीसदी पूरी तरह से कृषि पर निर्भर है, जो राज्य की आर्थिक गतिविधि के एक तिहाई से भी कम में योगदान देता है। जब हम देखते हैं कि राज्य की अर्थव्यवस्था क्षेत्रवार कितनी अच्छी है, तो तस्वीर स्पष्ट होती है। शुरू करने के लिए, यूपी में औसत व्यक्ति की आय का अंतर (प्रति व्यक्ति आय – क्षेत्र की जनसंख्या से विभाजित आय) देश के बाकी हिस्सों की तुलना में कम हो गया है (नीचे देखें)। इसका अर्थ है आर्थिक संकट। किसान आय के अतिरिक्त स्रोतों, जैसे, मवेशी रखने का अवसर खो सकते हैं।

 

 

मध्य यूपी में, मुख्य रूप से अवध क्षेत्र, कृषि अर्थव्यवस्था का सबसे छोटा टुकड़ा है। हालांकि, इस क्षेत्र की आय का 20 फीसदी से कम पैदावार से आती है।

 

Source: International Labour Organization Employment report on Uttar Pradesh, 2017

 

राम किसान मौर्य ने इस रिपोर्टर को गांव में उस क्षेत्र को दिखाया, जो अब आवारा पशुओं से आबाद है। वह एक अनुसूचित जाति समुदाय से भी थे और अपनी दुर्दशा के लिए राज्य और केंद्र की भाजपा सरकार पर नाराज़ थे।

 

 उन्होंने कहा, ”पहले हजारों में बिकते थे, आमदनी भी होती थी। गाय बेच दिए,कुछ पैसे बचे कपड़े के लिए। बिकेगा नहीं तो पालेगा कौन।”

 

उत्तर प्रदेश के जरहा गांव में एक खेत में चरते आवारा पशु। अवध क्षेत्र में आवारा मवेशियों को नष्ट करने के साथ, गाय सतर्कता हमलों से किसान संकट और भी बदतर हो गया है।

 

हालांकि बीजेपी उम्मीदवार के खुद के समुदाय के भीतर का ये गुस्सा उनकी जातिगत गणना को कैसे तोड़ सकता है नहीं मालूम। यह स्पष्ट नहीं था कि क्या यह गुस्सा असंतोष के वोटों में तब्दील हो जाएगा। पहले से ही ग्रामीण संकट और शहरी बेरोजगारी का सामना कर रहे क्षेत्र में  कुछ लोगों ने कहा कि जो भी गांव के मुखिया सलाह देंगे, उन्हों को वे लोग वोट देंगे।

 

जराहा गांव में, एक प्रभावी व्यक्ति हैं अमित कुमार सिंह। वह उच्च जाति के हैं । उनकी पत्नी ग्राम प्रधान है, लेकिन पितृसत्तात्मक स्थापना में, आदमी अपनी पत्नी के नाम पर गांव को नियंत्रित करता है।

 

सिंह सपा से स्थानीय नेता हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि उन्हें मिशरिख के भाजपा उम्मीदवार रावत पसंद हैं, और एक दशक से अधिक समय से उनके प्रति वफादार रहे हैं। इसलिए, वह विपक्ष से होने के बावजूद सभी को भाजपा के लिए वोट करने के लिए कह रहे थे।

 

 सिंह अशोक रावत के साथ मोदी की रैली में हरदोई गए। क्षेत्र के एक पार्टी कार्यालय में, उनके समर्थकों में से एक, जो नाम नहीं बताना चाहते थे,  ने रैली के लिए बड़ी भीड़ सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक ईंधन के बारे में बताया: व्हिस्की। उस व्यक्ति ने दावा किया, “ब्लैक डॉग की दो बोतलें प्रति घर या कुल 5,000 बोतलें।” बाद में, इस रिपोर्टर को जराहा गांव में एक शराबी व्यक्ति मिला, जिसने लाभार्थी होने का दावा किया। मिशरिख क्षेत्र में विपक्षी दल के एक नेता भाजपा के लिए प्रचार कर रहे हैं, एक उच्च जाति की महिला पार्टी के खिलाफ खुलकर बोल रही है, क्या यह यह संभव है कि दोनों तरफ का गणित ठीक उसी तरह से न जुड़ पाए… जिस तरह से भाजपा ने योजना बनाई है?यह उत्तर प्रदेश में हिंदू वोट पर छह-रिपोर्ट की श्रृंखला में से चौथी रिपोर्ट है। आप पहली रिपोर्ट यहां, दूसरी यहां और तीसरी यहां पढ़ सकते हैं।

 
(लाउल एक स्वतंत्र पत्रकार और फिल्म-निर्माता हैं। वह ‘द एनाटॉमी ऑफ हेट’ के लेखक हैं, जो ‘वेस्टलैंड / कॉन्टेक्स्ट’ द्वारा दिसंबर 2018 में प्रकाशित हुआ है।)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 6 मई, 2019 को indiaspend पर प्रकाशित हुआ है।
 

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