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हिमालयी राज्यों में, असम और मिजोरम हैं जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे कम तैयार

फैजी नूर अहमद,
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मुंबई: भारत के 12 हिमालयी राज्यों में से असम, मिजोरम और जम्मू और कश्मीर जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे अधिक संवेदनशील हैं। यह निष्कर्ष एक नए अध्ययन में सामने आया है। उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के खतरे का सामना करने में ज्यादा मुश्किलें आती हैं।

 

अध्ययन में कहा गया है कि हिमालयी समुदाय आम तौर पर जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, क्योंकि उनके पास आजीविका के कम विकल्प और सीमित बुनियादी ढांचे होते हैं और प्राकृतिक संसाधनों पर उनकी निर्भरता अधिक होती है।

 

अतिसंवेदनशीलता के चालकों की पहचान करने और उनके प्रभाव को कम करने के तरीके विकसित करने के उद्देश्य से, ‘इंडियन इन्स्टटूट ऑफ टेक्नोलोजी ’ (आईआईटी) और बेंगलुरु के ‘इंडियन इन्स्टटूट ऑफ साइंस ’ (आईआईएससी) ने मंडी और गुवाहाटी और ‘ क्लाइमेट वल्नरेबिलिटी एसेसमेंट फॉर द इंडियन हिमालियन रिजन यूजिंग ए कॉमन फ्रेमवर्क ’ नामक एक अध्ययन का आयोजन किया।

 

भारतीय हिमालयी क्षेत्र (आईएचआर) में सभी 12 राज्यों में अधिकारियों के सहयोग से अध्ययन किया गया- अरुणाचल प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल। इनमें से, पश्चिम बंगाल और असम आंशिक रूप से हिमालय से ढके हुए हैं।

 

असम (0.72), मिजोरम (0.71) और जम्मू-कश्मीर (0.62) के लिए अतिसंवेदनशीलता सूचकांक सबसे ज्यादा है, जबकि सिक्किम 0.42 के सूचकांक के साथ सबसे कम संवेदनशील राज्य है। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि सिक्किम का लाभ केवल अन्य राज्यों के सापेक्ष है।

 

लगभग 5 करोड़ भारतीय आईएचआर में रहते हैं और पानी, भोजन और ऊर्जा के लिए हिमालयी पारिस्थितिकी पर निर्भर हैं। इन क्षेत्रों में,70 फीसदी कृषि को ग्लेशियर पोषित करते हैं।

 

जलवायु परिवर्तन द्वारा हिमालय के परिदृश्य को प्रभावित करने और मौसम के पैटर्न के कारण लंबे समय तक ग्रीष्मकाल और कम सर्दियां होने के साथ इन समुदायों की आजीविका और अस्तित्व को खतरा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 12 अक्टूबर, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

ऊपरी हिमालय में तापमान में कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है, साथ ही आर्द्रता के स्तर में लगभग 10 फीसदी की वृद्धि हुई है। तापमान भिन्नता हिमालय के ग्लेशियरों, बड़े क्रायोस्फीयर का एक हिस्सा ( पृथ्वी प्रणाली का वह हिस्सा, जो पृथ्वी पर जमे हुए मीठे पानी के 75 फीसदी को संग्रहीत करता है ) पिघल रहे हैं। इसने हिमस्खलन की अत्यधिक घटनाओं की आशंका को बढ़ा दिया है।

 

बदलते तापमान पैटर्न से हिमालयी नदी घाटियों की जल सुरक्षा और स्थिरता के लिए खतरा है। अधिक ऊंचाई वाली झीलों में पानी के प्रवाह में वृद्धि के साथ, बाढ़ की संभावना भी बढ़ जाती है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

हिमाचल प्रदेश में, 2013 के इस अध्ययन के अनुसार, कम बर्फबारी को दोष देते हुए, किसानों ने उत्पादन में गिरावट और कटाई में देरी की की सूचना दी है। 8,000 फीट की ऊंचाई पर रहने वाले लगभग 80 फीसदी किसानों ने बर्फबारी में कमी देखी है और 9,800 फीट और उससे अधिक ऊंचाई पर रहने वाले लगभग 90 फीसदी लोगों ने भी ऐसा ही कहा।

 

भारत का सबसे हरा और सबसे नम हिमालयी राज्य, मेघालय, बारिश की अनिश्चतता के कारण गर्म होता जा रहा है और जिससे वनों की एक चौथाई, जलवायु परिवर्तन के लिए “अतिसंवेदनशील” हो गया है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 23 मार्च, 2019 को राज्य सरकार द्वारा 2018 में प्रोयोजित और आईआईएससी द्वारा चलाए गए एक अध्ययन का हवाला देते हुए रिपोर्ट किया है। इसके पौधे और जानवरों का जीवन प्रभावित हो रहा है, साथ ही समुदायों के जीवन को परेशान कर रहा है।

 

नया जलवायु परिवर्तन अध्ययन महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने भारत का पहला अतिसंवेदनशील मानचित्र तैयार किया है। इसका एक उद्देश्य एक सामान्य पद्धति विकसित करना है, और यह निर्धारित करना है कि जलवायु परिवर्तन के जोखिमों से निपटने के लिए राज्य और उनके जिले कैसे तैयार हैं। राज्य और जिला स्तर पर जलवायु जोखिमों को दर्शाते हुए एक भू-स्थानिक अनुप्रयोग भी शुरू किया गया है।

 

रिसर्च टीम ने अन्य भारतीय राज्यों में इसी तरह के अध्ययन की सिफारिश की है।

 

जानकारी और बुनियादी ढांचे के अभाव से जोखिम ज्यादा

 

अतिसंवेदनशीलता के चालक अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न होते हैं। असम में, चालकों में प्रति व्यक्ति कम आय, फसल बीमा के तहत कम प्रतिशत क्षेत्र और मनरेगा ( महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना-एक गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम जो गरीब परिवारों को 100 दिनों के भुगतान के काम का वादा करता है) में कम भागीदारी शामिल है।

 

सूचना और बुनियादी ढांचे तक पहुंच में कमी ऐसे कारक हैं, जो राज्य में समुदायों के लिए किसी भी जलवायु परिवर्तनशीलता का सामना करना मुश्किल बनाते हैं। पश्चिमी सीमावर्ती जिला धुबरी, पूर्वी जिला लखीमपुर और मध्य जिला सोनितपुर असम का सबसे संवेदनशील इलाका है।

 

Source: Climate Change Vulnerability Assessment

 

12 राज्यों में सिंचाई के तहत दूसरे सबसे कम प्रतिशत क्षेत्र के साथ, मिजोरम का कृषि क्षेत्र अत्यधिक संवेदनशील पाया गया। राज्य की खराब कनेक्टिविटी भी है ( इसका सड़क घनत्व आईएचएस के बीच तीसरा सबसे कम है ) और सूचना और बुनियादी ढांचे तक खराब पहुंच है।

 

जम्मू और कश्मीर सड़क घनत्व, फसल बीमा के तहत क्षेत्र, प्रति 1,000 ग्रामीण घरों में वनों के तहत क्षेत्र, सीमांत किसानों का प्रतिशत, बागवानी फसलों के तहत प्रतिशत क्षेत्र, पशुधन-से-मानव अनुपात, और कार्यबल में महिलाओं का प्रतिशत में पिछड़ा हुआ है।

 

हिमाचल प्रदेश, एक और कमजोर राज्य था, जिसमें सिंचाई की अपर्याप्त सुविधाएं थीं – इसके शुद्ध फसली क्षेत्र का केवल 20-21 फीसदी हिस्सा ही सिंचित है और शेष ज्यादातर बारिश पर निर्भर है। यहां देखी गई संवेदनशीलता के एकमात्र चालक निम्न पशुधन-से-मानव अनुपात और छोटे और सीमांत किसानों (जिनकी दो हेक्टेयर से कम भूमि है) की एक बड़ी मौजूदगी थी, जो कुल किसान आबादी का 87.95 फीसदी है और कुल भूमि का 54.17 फीसदी स्वामित्व करते हैं।

 

अनुकूल बनाने का पहला कदम जोखिम मूल्यांकन

 

भविष्य में जलवायु परिवर्तन से निजात पाने लिए पहला कदम संवेदनशीलता को कम करना है, जैसा कि जलवायु परिवर्तन पर इंटर- गवर्न्मेन्टल पैनल के नीति निर्माताओं ने रिपोर्ट के सारांश में सुझाव दिया है । अध्ययन के सह-मुख्य अन्वेषक और मंडी-आईआईटी में ‘स्कूल ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंस’ में असिसटेंट प्रोफेसर,श्यामश्री दासगुप्ता कहते हैं, “ अतिसंवेदनशीलता प्रणाली की निहित विशेषता को संदर्भित करती है – बायोफिजिकल भी और सामाजिक आर्थिक रूप में भी। वर्तमान मूल्यांकन से 12 भारतीय हिमालयी राज्यों के लिए राज्य के साथ-साथ जिला स्तर पर, भेद्यता के प्रमुख चालकों की पहचान करने में मदद मिलती है।”

 

संभावित संकट से कैसे निपट रहा है भारत

 

दासगुप्ता ने कहा, “सरकारी संस्थानों के लिए रिपोर्ट के उपयोगी होने की संभावना है। प्रसार कार्यशाला के दौरान कुछ राज्यों (हिमालयी और गैर-हिमालयी दोनों) के प्रधान सचिव उपस्थित थे। हालांकि, आपदा प्रबंधन के बजाय जलवायु भेद्यता और जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के आकलन के संदर्भ में इस अध्ययन पर विचार करना बेहतर होगा। ”

 

जून 2008 में पेश किए गए,जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) के तहत केंद्र सरकार पहले से ही हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र ( एनएमएसएचई ) को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन कोलागू कर रही है। जलवायु परिवर्तन जोखिम और भेद्यता मूल्यांकन पर अध्ययन करने के लिए 11 हिमालयी राज्यों में जलवायु परिवर्तन कोशिकाओं की स्थापना की गई है।

 

सरकार ने परियोजनाओं और कार्यों के साथ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सहायता के लिए 2015-16 में जलवायु परिवर्तन पर एक राष्ट्रीय अनुकूलन कोष ( एनएएफसीसी ) भी लॉन्च किया। 9 मार्च, 2018 को लोकसभा के आंकड़ों के अनुसार, कुल 2648 करोड़ रुपये की लागत से कुछ 26 परियोजनाओं को भारत भर में स्वीकृत किया गया था।

 

एनएएफसीसी के तहत स्वीकृत परियोजनाएं
राज्य स्वीकृत प्रोजेक्ट स्वीकृत राशि (करोड़ रु।) संवेदनशील चालक
असम जैविक खेती और तालाब आधारित मछली पालन के माध्यम से कमजोर समुदायों के लिए क्लाइमट रिज़िल्यन्ट लचीला आजीविका का निर्माण करके काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के पारिस्थितिकी तंत्र का प्रबंधन 12 सिंचाई के अंतर्गत कम से कम वन क्षेत्र, प्रति 1,000 ग्रामीण परिवारों पर उपलब्ध कम वन क्षेत्र, अन्य राज्यों की तुलना में कम किसान ऋण लेते हैं। इसमें दूसरी सबसे कम प्रति व्यक्ति आय, फसल बीमा के तहत कम प्रतिशत क्षेत्र और कम मनरेगा भागीदारी शामिल है।
मिजोरम विस्तार, वृद्धि और मॉडलिंग के माध्यम से सतत कृषि विकास 5 उच्चतम उपज परिवर्तनशीलता, फसल बीमा के तहत कई क्षेत्र, खुले जंगलों के तहत सबसे बड़ा क्षेत्र, ढलान के तहत सबसे बड़ा क्षेत्र, अन्य राज्यों की तुलना में सबसे बड़ा क्षेत्र, सिंचाई के तहत दूसरा सबसे कम प्रतिशत क्षेत्र और 12 राज्यों में तीसरा सबसे कम सड़क घनत्व है।
जम्मू और कश्मीर वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों में जलवायु-लचीला टिकाऊ कृषि 11 कम सड़क घनत्व, फसल बीमा के तहत कोई क्षेत्र नहीं, प्रति 1,000 ग्रामीण घरों में वनों के तहत कम क्षेत्र, सीमांत किसानों का उच्च प्रतिशत, बागवानी के तहत कम प्रतिशत क्षेत्र, कम पशुधन-से-मानव अनुपात और कार्यबल में महिलाओं का कम प्रतिशत।
मणिपुर फियांग के मॉडल कार्बन पॉजिटिव इको-गांव का विकास 5 प्रति व्यक्ति आय में सबसे कम, कर्ज लेने वाले किसानों का कम प्रतिशत और प्रति 1,000 घरों पर जंगलों के तहत कम क्षेत्र।
मेघालय जल-तनावग्रस्त क्षेत्रों में जलवायु-लचीला विकास के लिए स्प्रिंग्स का कायाकल्प के लिए स्प्रिंग शेड विकास 11.45 फसल बीमा के तहत बहुत कम क्षेत्र, प्रति व्यक्ति आय कम, प्रति 1,000 घरों पर वनों के तहत कम क्षेत्र और ऋण लेने वाले किसानों का कम प्रतिशत।
पश्चिम बंगाल दार्जिलिंग में पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन और स्थायी जल आपूर्ति, अनुकूली उपाय 11.56 सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व, प्रति 100,000 घरों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की कम संख्या, कार्यबल में महिलाओं का कम से कम प्रतिशत, वनों के तहत दूसरा सबसे कम क्षेत्र, सीमांत किसानों का उच्च प्रतिशत और कम मनरेगा भागीदारी।
नागालैंड आजीविका और खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए पारंपरिक, एकीकृत घूर्णी कृषि प्रणाली (झूम अनुकूलन) के तहत स्वदेशी चावल की किस्मों का जीन पूल संरक्षण 12.34 फसल बीमा के तहत कोई क्षेत्र नहीं, ऋण लेने वाले किसानों का कम प्रतिशत और प्रति 1,000 ग्रामीण परिवारों के लिए कम क्षेत्र।
हिमाचल प्रदेश सूखाग्रस्त जिलों में कृषि-निर्भर ग्रामीण समुदायों की सतत आजीविका 10 कम पशुधन-से-मानव अनुपात, अपर्याप्त सिंचाई, छोटे और सीमांत किसानों का बड़ा अनुपात।
त्रिपुरा लागू नहीं लागू नहीं सीमांत किसानों के तहत भूमि का उच्चतम प्रतिशत, प्रति व्यक्ति आय कम, वनों और फसल बीमा के तहत कम प्रतिशत क्षेत्र।
अरुणाचल प्रदेश लागू नहीं लागू नहीं बड़ा क्षेत्र अंडरस्लैप> 30%, कम सड़क घनत्व, कम से कम पशुधन-से-मानव अनुपात, बागवानी फसलों के तहत क्षेत्र का सबसे कम प्रतिशत, मनरेगा में कम से कम भागीदारी, बीमा के तहत कोई भी फसल नहीं और ऋण लेने वाले किसानों का कम प्रतिशत।
उत्तराखंड लागू नहीं लागू नहीं प्रति 1,000 घरों में वनों के तहत कम क्षेत्र।
सिक्किम सूखाग्रस्त क्षेत्रों में ग्राम पंचायत स्तर पर जल क्षेत्र की जलवायु परिवर्तन भेद्यता को संबोधित करना 10 प्रति 1,000 घरों पर वनों के अंतर्गत कम क्षेत्र, बीमा द्वारा कवर किया गया कम प्रतिशत क्षेत्र और ऋण लेने वाले किसानों का कम प्रतिशत।

Source: Lok Sabha and IHCAP

 

( अहमद इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं। )

 

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 29 मई 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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