Home » Cover Story » मुस्लिम महिलाओं की आबादी 6.9 फीसदी, लोकसभा में हिस्सेदारी 0.7 फीसदी

मुस्लिम महिलाओं की आबादी 6.9 फीसदी, लोकसभा में हिस्सेदारी 0.7 फीसदी

नमिता भंडारे,
Views
2215

Farhuna_620
 

नूंह (हरियाणा), नई दिल्ली, मुंबई: वह अपने गांव की मुखिया हो सकती हैं, लेकिन 22 सदस्यों के अपने बड़े परिवार के लिए रोटियां बनाना अभी भी उनकी पहली जिम्मेदारी है।

 

हरियाणा के नूंह जिले के हुसैनपुर गांव में अपने घर में छोटे से मिट्टी के चूल्हे पर झुकी आंखें, सलीके से आटे के लोई का गोला बनाते हुए अभ्यस्त उनके हाथ… फरहुना मुस्कुराते हुए अपनी शादी की परिस्थितियों और चुनाव को याद करती हैं। यह 2016 की शुरुआत थी। पंचायत चुनाव पास थी और हरियाणा सरकार ने हाल ही में एक नई पात्रता शर्त रखी थी। चुनाव लड़ने के लिए, महिलाओं को यह साबित करने की ज़रूरत थी कि उन्होंने अपनी आठवीं कक्षा की परीक्षाएं पास की हैं और पुरुषों के लिए दसवीं पास होना जरूरी था।

 

उस वर्ष, हुसैनपुर में सीट महिलाओं के लिए आरक्षित थी। समस्या यह थी कि उसके पति के परिवार की कोई महिला कभी स्कूल नहीं गई थी।

 

इसलिए फरहुना के ससुर ने अपने बेटे के लिए दुल्हन तलाशनी शुरू की। उनकी एकमात्र शर्त थी कि लड़की पढ़ी-लिखी हो। बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री पाने वाले फरहुना गर्व से बताती है, “उन्होंने कोई दहेज भी नहीं लिया।”परिवार में एक गैस स्टोव है, जिस पर सब्जियां और दाल पकती है। फरहुना ने बताया, “लेकिन मिट्टी के चूल्हे पर पकने वाली रोटियों में स्वाद बेहतर आता है। रोटियां चूल्हे पर पकती हैं।“ दोपहर और रात के लिए सबके लिए चूल्हे पर 70-70 रोटियां पकती हैं।रोटियां बनाने और अपनी छह महीने की बेटी की देखभाल करने के बाद  सरपंच के पास पंचायत बैठकों में भाग लेने के लिए ज्यादा समय नहीं होता है।

 

इसके अलावा, दो बहनों की शादी कुछ हफ्तों में होनी है, इसलिए दो-मंजिला घर को पेंट किया जा रहा है और घर से बाहर निकलने का समय नहीं है। तो, ज्यादातर फरहुना के ससुर पंचायत के मामलों में भाग लेते है।

 

लेकिन जब समय होता है, तो फरहाना बैठकों में भाग लेती हैं। उसने कहा, “मैंने सड़कें बनाई हैं और मैं गांव के सरकारी स्कूल की समस्याओं को देखती हूं। इन कामों में मेरी दिलचस्पी है। ”

 

 

निम्न राजनीतिक प्रतिनिधित्व हर स्तर पर एक समस्या है। वर्तमान में, 543 में से केवल चार, या निवर्तमान लोकसभा के 0.7 फीसदी सदस्य मुस्लिम महिलाएं हैं, जो सामान्य आबादी में 6.9 फीसदी का गठन करती हैं।

 

आजादी के बाद से पांच लोक सभाओं में कोई मुस्लिम महिला सदस्य नहीं

 

आजादी के बाद से 16 में से पांच लोक सभाओं में कोई मुस्लिम महिला सदस्य नहीं थी, और संसद की 543 सीटों वाले निचले सदन में उनकी संख्या कभी भी चार से ऊपर नहीं गई।

 

‘द क्विंट’ में मयंक मिश्रा की नवंबर 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 14 मुस्लिम बहुल लोकसभा क्षेत्र हैं। इसके अलावा, 13 निर्वाचन क्षेत्र ऐसे हैं जहां मुसलमानों की आबादी 40 फीसदी से अधिक है। कुल 101 सीटें हैं, जहां मुसलमान 20 फीसदी से ज्यादा आबादी का गठन करते हैं।

 

जनगणना 2011 के अनुसार, मुसलमान 14.3 फीसदी का गठन करते हैं, लेकिन निवर्तमान लोकसभा में संसद के 543 सदस्यों (सांसदों) में से केवल 22 (4 फीसदी) सदस्य हैं।

 

आंशिक रूप से, यह इसलिए है क्योंकि मुख्यधारा के राजनीतिक दल मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए अनिच्छुक हैं। नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘सेमिनार’ में प्रकाशित फ्रांसीसी विद्वान और स्तंभकार क्रिस्टोफ जाफरलोट के विश्लेषण के अनुसार, 2009 में, 543 सांसदों में से केवल 30 (5.52 फीसदी) मुस्लिम थे। उस चुनाव में केवल 832 मुस्लिम उम्मीदवारों को देखा गया था, जिनमें से लगभग आधे या 47.12 फीसदी ने निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा था। 2014 में चीजें बहुत बेहतर नहीं थीं जब आम चुनाव लड़ने वाले 3,245 उम्मीदवारों में से 320 (9.8 फीसदी) मुस्लिम थे। बीजेपी ने 428 में से सिर्फ सात (या 2 फीसदी) मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जैसा कि जाफरलॉट ने मार्च 2019 में छपी किताब ‘मेजरिटेरियन स्टेट: हाउ हिंदू नेशनलिज्म इन चेंजिंग इंडिया’ में लिखा है। इनमें से किसी ने जीत हासिल नहीं की। कांग्रेस ने कुल 462 में से 27 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा- कुल मिलाकर 6 फीसदी से भी कम और 2009 में उतारे गए 31 उम्मीदवारों से कम था।

 

गैर-मुस्लिम दलों के बीच, केवल समाजवादी पार्टी (सपा), राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने 15 फीसदी से अधिक मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा – और इनके लिए आंकड़े 18.4 फीसदी, 20.7 फीसदी और 15 फीसदी रहे हैं।

 

लेकिन मुस्लिम महिलाओं को दोहरे बंधन का सामना करना पड़ता है – महिला और मुसलमान, दोनों के रुप में भेदभाव किया जाता है।

 

 अशोका विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर और त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डेटा (टीसीपीडी) के सह-निदेशक, गाइल्स वर्नियर्स, कहते हैं “एक मुस्लिम होने के नाते और एक महिला होने के नाते, यकीनन दोहरा प्रभाव देखने को मिलता है।राजनीति में

 

प्रवेश की सामान्य बाधाएं, जो सभी महिलाओं पर लागू होती हैं, मुस्लिम महिलाओं पर और भी अधिक मजबूती से लागू होती हैं।”

 

महिला उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या के सबूत के बावजूद, आजादी के बाद से 16 लोक सभाओं में से पांच में, पहले वाले सहित, कोई मुस्लिम महिला सांसद नहीं रही है, और अपने सबसे अच्छे रूप में, यह आंकड़ा कभी भी चार से पार नहीं हुआ है।

 

लोकसभा में कभी भी मुस्लिम महिला सदस्यों की संख्या 4 से अधिक नहीं रहीं

Source: Lok Sabha, Trivedi Centre for Political Data, Indian Legislators Dataset

 

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेवानिवृत्त प्रोफेसर जोया हसन ने कहा, “आजादी के बाद से और समय के साथ मुस्लिम महिलाओं की उम्मीदवारी अब तक खराब हो गई है। प्रभुत्वशाली पार्टी, दक्षिणपंथी, मुसलमानों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर करने के लिए दृढ़ संकल्पित है और बहुत कम उम्मीदवारों को खड़ा करती है। इनमें मुस्लिम महिलाओं की संख्या और भी कम हैं। ”

 

अब तक घोषित उम्मीदवारों में, बीजेपी ने सिर्फ एक मुस्लिम महिला को मैदान में उतारा है।

 

मफूजा खातून जंगीपुर, पश्चिम बंगाल से चुनाव लड़ रही हैं और लोकसभा के लिए बीजेपी की ओर से पहली मुस्लिम महिला उम्मीदवार हैं।

 

 निवर्तमान लोकसभा में शुरू में केवल दो महिला सांसद थीं: डॉक्टर और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की पहली बार सांसद रहीं ममताज संघमित्रा और कांग्रेस से मौसम नूर। वह मालदाह से दो बार सांसद रहीं।  दो मुस्लिम महिलाएं अलग-अलग उपचुनावों में केवल 2018 में सांसद बनीं हैं। टीएमसी से साजदा अहमद, फरवरी 2018 में चुनी गई थीं। तबस्सुम हसन ने 2009 में बहुजन समाज पार्टी के सांसद के रूप में कैराना(उत्तर प्रदेश) का प्रतिनिधित्व किया था, उन्होंने  मई 2018 में राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर सीट पर हुए उपचुनाव में दूसरी बार भी जीत दर्ज कराई।  2019 के आम चुनाव के पहले चरण के उम्मीदवारों के टीसीपीडी द्वारा किए गए प्रारंभिक विश्लेषण के अनुसार 1,279 उम्मीदवारों में 111 महिलाएं हैं। इनमें से सिर्फ दो महिलाएं मुस्लिम हैं। चरण दो में, टीसीडीडी द्वारा विश्लेषण किए गए 1,202 उम्मीदवारों में 156 महिलाएं थीं। इनमें से सात ( टीएमसी और कांग्रेस में से प्रत्येक, और आरजेडी, बीजेपी और एसपी में से प्रत्येक ) मुस्लिम हैं।

 

वे ट्रिपल तालक पर प्रतिबंध लगा रहे हैं, लेकिन हमारे लोगों को मार रहे हैं….”

 
 

प्रतिनिधित्व का प्रश्न उस समय महत्वपूर्ण हो जाता है जब मुस्लिम महिलाओं के मुद्दों को, विशेष रूप से तत्काल ट्रिपल तलाक पर, राजनीतिक दलों द्वारा विशेष संदर्भ में देखा जाता है।

 

ट्रिपल तालक बिल, जो तत्काल तीन तालक को तीन साल की जेल की अवधि और जुर्माने के प्रावधानों के साथ एक अपराध बनाता है, एक बहस के बाद पिछले साल दिसंबर में लोकसभा द्वारा पारित किया गया था। विधेयक पर प्रमुख वक्ताओं में रविशंकर प्रसाद, स्मृति ईरानी और भाजपा की मीनाक्षी लेखी शामिल थे, जबकि कांग्रेस से रणजीत रंजन, मल्लिकार्जुन खड़गे और सुष्मिता देव ने इसका विरोध किया।

 

सरपंच फरहुना ने कहा, “मैं व्यक्तिगत रूप से उस अकेली महिला को नहीं जानती, जिसे तत्काल ट्रिपल तलाक के माध्यम से तलाक दिया गया था। यह हमारे गांव में नहीं होता है।”

 

क्या मुस्लिम महिलाओं के ट्रिपल तालक पर अपने रुख के कारण बीजेपी को वोट देने की संभावना है?  फरहुना ने कहा, “ट्रिपल तालक पर प्रतिबंध लगाकर, सरकार ने एक अच्छा काम किया है। लेकिन तत्काल ट्रिपल तलाक की इस्लाम में वैसे भी अनुमति नहीं है और सरकार को हमारे धर्म में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।”

 

उन्होंने कहा कि महिलाएं अपनी मर्जी, या पसंद के अनुसार मतदान करेंगी, लेकिन भीड़ के लिंचिंग जैसे मुद्दे दिमाग को प्रभावित कर सकते हैं।

 

 

हरियाणा के नूंह जिले के जयसिंहपुर गांव में पहलु खान की कब्र। अप्रैल 2017 में, खान को गायों की तस्करी करने के संदेह में पीट-पीटकर मार डाला गया था। फरहुना कहती हैं कि मुस्लिम महिला मतदाताओं को भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्या जैसे मुद्दे प्रभावित कर सकते हैं।.

 

नूंह में ही, पहलू खान, रकबर खान और उमर खान की गाय संबंधी हिंसा में हत्याओं ने एक निराशाजनक माहौल बनाने का काम किया है। उनेद गांव की  जमीला 75 या 80 वर्ष की है और पूरी तरह से निरक्षर है। वह कहती हैं,  “हम डेयरी किसान हैं, लेकिन गाय खरीदने से डरते हैं। हम अपने क्षेत्र के बाहर से भी भैंस नहीं खरीद सकते हैं। कोई भी आपको रास्ते में रोक सकता है।” क्या अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रिपल तालक पर प्रतिबंध बीजेपी के पक्ष में काम करेगा? उसके स्ट्रिंग चारपाई पर बैठी, जमीला ने नीचे देखा और कहा, “वे ट्रिपल तालक पर प्रतिबंध लगा रहे हैं लेकिन हमारे पुरुषों को मार रहे हैं। इसका क्या मतलब होता है? जब हमारा समुदाय उनसे खतरे में है, तो हम उन्हें कैसे वोट दे सकते हैं? ”

 

 

जमीला 75 या 80 साल की हैं। वह कहती हैं, “हम डेयरी किसान हैं लेकिन गाय खरीदने से डरते हैं। हम अपने क्षेत्र के बाहर से भी भैंस नहीं खरीद सकते। कोई भी आपको रास्ते में रोक सकता है।”

 

गिलर्स वर्नियर्स ने कहा कि मतदाता साधारण बायनेरिज़ के आधार पर चुनावी फैसले नहीं लेते हैं। “भले ही कुछ मुस्लिम महिलाओं में बीजेपी के बारे में बेहतर राय हो, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जो हुआ, वह सब इतनी जल्दी नहीं मिटने वाला।”

 

उन्होंने कहा, इसके अलावा, बीजेपी द्वारा तत्काल ट्रिपल तालक ( जो एक सामाजिक प्रथा है ) को व्यापक सामाजिक अस्वस्थता के रूप में  पेश करने का प्रयास, पूरे मुस्लिम समुदाय में इससे नाराजगी पैदा हो सकती है। क्षेत्र में एक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता, मोहम्मद आरिफ ने कहा, “मुस्लिम महिलाओं के लिए लैंगिक न्याय की सभी बातें, भीड़ द्वारा घृणा और घृणा के बाद अपराध से भर जाता हैं। ट्रिपल तालक का नूंह में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।”

 

मुंबई के बांद्रा पूर्व में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) कार्यालय तत्काल ट्रिपल तलाक मामलों की संख्या पर नजर रखता है ,जो इसके रास्ते आते हैं।

 

जब सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया तो 2017 के बाद से संख्या कम हो गई।

 

भारतीय मुस्लिम महिला अंदोलन द्वारा रिकॉर्ड किए गए ट्रिपल तलाक मामले, 2016-2019

Source: Bharatiya Muslim Mahila Andolan, Mumbai

 

बीएमएमए द्वारा विवाहों को व्यवस्थित करने के लिए प्रशिक्षित, एक महिला काजी, ज़ुबैदा खातून ने कहा,”जो लोग हमारे लिए बोलने का दावा करते हैं, उन्हें इस्लाम द्वारा महिलाओं को दिए गए अधिकारों के बारे में कोई जानकारी नहीं है।”

 

बीएमएमए द्वारा विवाहों को व्यवस्थित करने के लिए प्रशिक्षित महिला काजी, जुबैदा खातून कहती हैं, “जो लोग हमारे लिए बोलने का दावा करते हैं, उन्हें इस्लाम द्वारा महिलाओं को दिए गए अधिकारों के बारे में कोई जानकारी नहीं है।”

 

बीएमएमए के संस्थापक नूरजहां साफिया नियाज ने कहा, “ट्रिपल तालक केवल एकमात्र मुद्दा नहीं था, जिससे हम लड़ रहे थे। सुप्रीम कोर्ट में दिए गए अपने आवेदन में, हमने न केवल ट्रिपल तालक पर प्रतिबंध लगाने के लिए कहा था, बल्कि बहुविवाह और हलाला (एक प्रथा जिसके तहत एक तलाकशुदा पत्नी जो अपने पूर्व पति से शादी करने की इच्छा रखती है, उसे अन्य पुरुष के साथ विवाह करना चाहिए) पर प्रतिबंध की बात भी कही थी। दुर्भाग्य से, अदालत ने हमें केवल ट्रिपल तालक पर सुना और अन्य दो मुद्दों पर नहीं।”

 

फिर भी, नियाज के अनुसार, प्रतिबंध का ताल्लुक रखने वालों पर तुरंत प्रभाव पड़ता है और हाल के वर्षों में संख्या में गिरावट आई है। “कम से कम मोदी सरकार एक कानून लेकर आई है जिसने इस प्रथा को नीचे ला दिया है। लेकिन पुरुष अभी भी दूसरी पत्नी ला सकते हैं और मुस्लिम महिलाएं इस डर में लगातार जीती हैं।”

 

उन्होंने कहा, “आवश्यक है कि एक व्यापक कानून हो, जो तीनों को शामिल करता हो – तत्काल ट्रिपल तालक, बहुविवाह और हलाला। लेकिन एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी), जो बीजेपी के घोषणापत्र में एक वादा है, समाधान नहीं है। पूरे देश में एक यूसीसी लागू है। पहले आपको 80 फीसदी हिंदुओं से पूछना होगा कि क्या वे ऐसा चाहते हैं। ”

 

बीएमएमए अपने धर्म और संविधान दोनों के तहत मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक और कानूनी सुधार के लिए सबसे आगे रहा है। यह चाहता है कि संसद 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की तर्ज पर एक व्यापक मुस्लिम पारिवारिक कानून पारित करे। नियाज ने कहा कि इससे मुस्लिम महिलाओं को सशक्त और सम्मान का जीवन जीने में मदद मिलेगी।

 

 नियाज कहती हैं, “यह अफ़सोस की बात है कि आजादी के 72 वर्षों में, किसी भी सरकार ने आवश्यक सुधारों के लिए कोई विचार नहीं दिया है। हर किसी के लिए इस मुद्दे को अकेले छोड़ देना सुविधाजनक है। लेकिन मुस्लिम महिलाओं को डर में क्यों रहना चाहिए? क्या हम संवैधानिक अधिकारों के हकदार नहीं हैं? ”

 

पिछले महीने, बीएमएमए ने 2019 के चुनाव से पहले मांगों का एक चार्टर जारी किया। यह चाहता है कि राजनीतिक दल राष्ट्रवाद के नाम पर किसी भी विभाजनकारी विचारधारा के बजाय संवैधानिक राष्ट्रवाद का समर्थन करें। यह नफरत फैलाने वाले भाषण और धार्मिक ध्रुवीकरण के खिलाफ कार्रवाई करना चाहता है, जिससे पिछले चार-पांच वर्षों में कई दक्षिणपंथी समूहों और व्यक्तियों द्वारा “खुली नफरत” पर रोक लगे और यह ‘हीलिंग टच’ देना चाहता है और अल्पसंख्यकों और दलितों को “धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में समान नागरिक होने के बारे में आश्वस्त करना चाहता है।

 

कहीं भी सात-बिंदु चार्टर में ‘ट्रिपल तालक’ शब्द का उल्लेख नहीं है।

 

शांति…हमें बस इतना ही चाहिए

 

दिल्ली के जामिया नगर की संकरी गलियों में, महिलाओं का एक छोटा समूह बताती हैं कि डर में जीना क्या होता है?

 

जब से जून 2017 में जुनैद को दिल्ली-मथुरा ट्रेन में मारा गया था, तब से ही करीना बेगम, जो पांचवीं कक्षा तक पढ़ी हैं और उनके चार बच्चे हैं (तीन लड़के और एक लड़की) तब तक नहीं सो सकती जब तक उसके बच्चे घर वापस नहीं आ जाते है।

 

सरेना ने कहा,”अगर आपकी दाढ़ी है, कुर्ता-पायजामा पहना है तो निश्चित रुप से आप निशाने पर हैं। मेरे पति ने मुझे इस इलाके को छोड़ने पर बुर्का पहनने से बचने के लिए कहा है। वह नहीं चाहते हैं कि मैं अलग नजर आऊं।”

 

जुबैरा (वह एक नाम का इस्तेमाल करती हैं), दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में ग्रैजुएट हैं, और रोहिणी में एक निजी कंपनी में सहायक के रूप में काम करती हैं, उन्होंने इस चुनाव से एक ही उम्मीद की थी। वह कहती हैं, “शांति। वह बस हमें इससे ज्यादा नहीं चाहिए। ”

 

आयशा (वह एक नाम का उपयोग करती है), जो जाट पड़ोसियों के प्रभुत्व वाले गाजियाबाद के एक गांव में रहती है, कहती हैं, “कुछ साल पहले भी वह कभी असुरक्षित महसूस नहीं करती थी।”

 

लेकिन अब, भले ही किसी ने वास्तव में उसे कुछ नहीं कहा है, लेकिन जब वह अपना घर छोड़ती है तो वह आशंकित महसूस करती है। “यह जिस तरह से लोग आपको देखते हैं। हम अगला निशाना हो सकते हैं।” उसके परिवार ने दूध के लिए एक गाय रखी है। उनके हिंदू मित्र थे। “मैं यह नहीं कह रही हूं कि कांग्रेस महान है। लेकिन कम से कम तब कोई नफरत नहीं थी। ”

 

हर जगह अन्य मतदाताओं की तरह इलेक्ट्रीशियन और कढ़ाई करने वालों की पत्नियां और महिलाओं के दिमाग में बहुत कुछ है – नोटबंदी से बेरोजगारी तक।

 

उन्होंने कहा कि, अतीत में,  उन्होंने जिस भी उम्मीदवार के लिए मतदान किया, उन्हें लगा कि यह क्षेत्र के लिए अच्छा होगा। आयशा कहती हैं, “अरविंद केजरीवाल ने हमारे लिए बहुत काम किया और स्कूलों में सुधार किया और डिस्पेंसरी स्थापित की। यहां कई सड़कें दुरुस्त हैं और यहां तक ​​कि बिजली का बिल भी कम आया है। उन्होंने राजनीति में आने के लिए एक अच्छी नौकरी छोड़ दी।”

 

अब एक नई चिंता है, सोशल मीडिया, राष्ट्रवाद, हिंसा की घटनाओं और भाजपा के उम्मीदवारों की ओर से कही जा रही बातें। जैसे कि प्रज्ञा ठाकुर, जिन पर गैरकानूनी गतिविधियों और आतंकवादी साजिश के मामले में आरोप लगाया गया, उनके सामने आने से एक नई चिंता उत्पन्न हुई है।

 

जामिया नगर में सक्रिय एक सामाजिक कार्यकर्ता डॉली सिद्दीकी ने कहा, “यह केवल एक चीज नहीं है, यह चीजों का एक संयोजन है।” उन्होंने कहा, ” लिंचिंग की घटनाएं नहीं रुकी हैं और हमारी देश भक्ति पर सवाल उठ रहे हैं। हर दिन हमें पाकिस्तान जाने के लिए कहा जाता है।”

 

सोशल मीडिया ने पड़ोसियों के बीच की दूरी को बढ़ा दिया है। जुबैरा ने अपने पति के बचपन के एक हिंदू दोस्त के बारे में बात की।

 

दोनों एक-दूसरे के त्योहार मनाते हुए बड़े हुए। अब, मित्र मुसलमानों के राष्ट्रवाद पर सवाल उठाने वाले घृणित और अक्सर नकली संदेशों को आगे बढ़ाते हैं। उन्होंने कहा, “मेरे पति ने उससे सामना नहीं किया है, लेकिन उसने उसे फेसबुक पर अनफॉलो कर दिया है।”

 

महिलाओं के इस समूह के लिए, यह अस्तित्व की लड़ाई की तरह लगता है। सरीना कहती हैं, “एक बार जब आप मेट्रो लाइन पार कर लेते हैं, तो आप इस मुहल्ले (क्षेत्र) से दूर हो जाते हैं और हम वहां पर सुरक्षित नहीं है। हमारा एकमात्र उद्देश्य बीजेपी को हराना है।

 
(नमिता भंडारे पत्रकार हैं और भारत के लैंगिक मुद्दों पर नियमित लिखती हैं। दिल्ली में रहती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 27 अप्रैल, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। हमसे respond@indiaspend.org पर संपर्क किया जा सकता है। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार रखते हैं।

 
“क्या आपको यह लेख पसंद आया ?” Indiaspend.com एक गैर लाभकारी संस्था है, और हम अपने इस जनहित पत्रकारिता प्रयासों की सफलता के लिए आप जैसे पाठकों पर निर्भर करते हैं। कृपया अपना अनुदान दें :

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

code