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देश भर में जमीन के लिए दलितों की लड़ाई

निहार गोखले, लैंड कंफ्लिक्ट वाच,
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(रामभाऊ कांबले (बाएं) पांच साल के थे, जब उन्होंने एक रैली में सुना था कि बी. आर. अंबेडकर दलितों से चराई की भूमि पर कब्जा करने का आग्रह कर रहे थे। 80 वर्षीय, कांबले का अभी भी महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के घरेगांव गांव में जमीन पर कब्जा है। राज्य में 11,000 से अधिक दलित परिवारों का वर्तमान में पुणे और बेंगलुरु के संयुक्त आकार के बराबर फैले चरागाह भूमि पर अतिक्रमण है।)

 

उस्मानाबाद (महाराष्ट्र): रामभाऊ कांबले पांच साल के थे, जब उन्होंने पहली बार भीमराव रामजी अंबेडकर को देखा था। 1941 में फरवरी की सुबह, अंबेडकर ( भारत के संविधान को बनाने से आठ साल पहले लेकिन अपने समय के सबसे प्रमुख दलित नेता ) ने मराठवाड़ा में एक सार्वजनिक रैली को संबोधित किया था, जो अब पश्चिमी भारत में महाराष्ट्र राज्य का एक हिस्सा है।

 

80 वर्षीय कांबले, जो अब उस्मानाबाद के दक्षिणपूर्वी महाराष्ट्र जिले के घरेगांव गांव में अपने एक कमरे के घर में रहते हैं, उस समय को याद करते हुए कहते हैं कि, “वहां पूरे इलाके से सभी दलित आए थे।”

 

कांबले लगभग 100,000 दलित किसानों में से थे, जो मराठवाड़ा में अंबेडकर के आह्वान पर आए और चरागाह भूमि पर कब्जा किया। 1991 में एक आंदोलन के बाद उनलोगों ने 100,000 हेक्टेयर भूमि पर कब्जा कर लिया – जो संयुक्त रुप से आज के पुणे और बेंगलुरु के बराबर का क्षेत्रफल है।

 

2019 में, आंदोलन उतना ही वास्तविक है जितना कि 1941 में रामभाऊ के लिए और 11,000 अन्य दलित परिवारों के लिए मराठवाड़ा में था, 64,590 वर्ग किमी का क्षेत्र है और भौगोलिक रूप से देखें तो तमिलनाडु का लगभग आधा है। वे अभी भी सरकारी भूमि पर कब्जा करते हैं, क्योंकि दलितों और अन्य ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित समुदायों को भूमि प्रदान करने के उद्देश्य से सात दशक पहले का भूमि सुधार और सरकारी कार्यक्रम अब अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं।

 

इंडिया लैंड एंड लाइवस्टॉक होल्डिंग सर्वे के अनुसार, लगभग 60 फीसदी दलित परिवारों के पास 2013 में ( नवीनतम वर्ष जिसके लिए आंकड़े उपलब्ध हैं ) कोई खेत नहीं था । जनगणना 2011 के अनुसार, लगभग 70 फीसदी दलित किसान दूसरों के स्वामित्व वाले खेतों में मजदूर हैं।

 

पश्चिमी महाराष्ट्र के एक दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले अंबेडकर का तर्क था कि ग्रामीण दलितों को सरकार द्वारा नियंत्रित खेती योग्य भूमि दी जानी चाहिए । 1941 में मराठवाड़ा रैली में, उन्होंने दलितों से गांवों में सार्वजनिक भूमि पर कब्जा करने और खेती करने का आह्वान किया था और बताया था कि ऐसा करके वे आत्मनिर्भर किसान बन सकते हैं।

 

लैंड कॉनफ्लिक्ट वॉच के अनुसार, 13 भारतीय राज्यों में 31 भूमि संघर्ष हैं, जिनमें 92,000 दलित शामिल हैं, जो जमीन पर दावा करने के लिए लड़ रहे हैं। लैंड कॉनफ्लिक्ट वॉच शोधकर्ताओं का एक नेटवर्क है जो भारत में भूमि संघर्ष के आंकड़ों को एकत्र करता है और उसका खाका तैयार करता है।

 

महाराष्ट्र में सरकारी भूमि पर कब्जे की जो शुरुआत हुई, वह पंजाब, केरल और तमिलनाडु में फैल गया है। बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश में, भूमि-पुनर्वितरण कार्यक्रमों में वर्षों से दलितों को दिए गए भूमि टाइटिल बेकार हैं, क्योंकि उच्च जाति, जो मूल रूप से भूमि के मालिक थे, ने कभी नियंत्रण नहीं छोड़ा।

 

1947 में आजादी के बाद, भारतीय राज्यों, जिन्हें अकेले भूमि कानून पारित करने का अधिकार है, उन्होंने जमींदारों या सामंती जमींदारों की बड़ी भूमि को तोड़ने के उद्देश्य से कानूनों को पेश किया, और दलितों सहित भूमिहीनों को अतिरिक्त भूमि को वितरित किया।

 

हालांकि, भूमि सुधार कानूनों का कार्यान्वयन खराब रहा है, क्योंकि कोई भी सरकार ज़मींदारों से दुशमनी लेने के लिए तैयार नहीं है, जो प्रमुख जातियों से हैं, जैसा कि 100 से अधिक जमीनी आंदोलनों का समूह, ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ दलित लैंड राइट्स मूवमेंट’ के अध्यक्ष टी विंसेंट मनोहरन कहते हैं।

 

राजनेता नौकरशाहों पर कानूनों को ठीक से लागू न करने के लिए दोषी ठहराते हैं, जबकि नौकरशाह राजनेताओं पर हस्तक्षेप का आरोप लगाते हैं, जो अक्सर स्वंय बड़े भूस्वामी होते हैं। मनोहरन ने कहा, “लेकिन जब कोई मेगा प्रोजेक्ट प्रस्तावित होता है, तो वे आसानी से जमीन का अधिग्रहण कर लेते हैं, चाहे वह कोई भी हो।”

 

कभी अछूत कहे जाने वाले और अब आधिकारिक तौर पर ‘अनुसूचित जाति’, दलित हिंदू जाति व्यवस्था द्वारा परिभाषित व्यवसायों में काम करने के लिए मजबूर थे। दलितों ( उत्पीड़न के लिए संस्कृत शब्द से लिया गया एक नाम है ) की नौकरियों में शौचालय की सफाई, मवेशियों के शवों को संभालना, चमड़ा बनाना और खेत में काम करना शामिल था। उन्हें मंदिरों में प्रवेश करने से रोका जाता था और ऊंची जातियों के लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कुओं से पानी खींचने की मनाही थी। उन्हें शिक्षा या स्वयं की भूमि की अनुमति नहीं थी। इनमें से कई प्रतिबंध आज भी अस्तित्व में हैं।

 

मराठवाड़ा में संघर्ष

 

कांबले की पड़ोसी, 50 वर्षीय सुनंदा कांबले (कोई संबंध नहीं) एक हंसमुख महिला हैं और वह माथे पर बड़ा सिंदूर लगातीं है। 1989 का वह दिन उन्हें स्पष्ट रूप से याद है, जब वे और पड़ोस की कुछ महिलाएं घास काट रही थी और वे सब गांव के अनुत्पादक चराई भूमि की ओर चली गईं।

 

उन्होंने रेडियो पर सुना था कि दलित जमीन पर कब्जा कर रहे हैं। सुनंदा के रिश्तेदार, जो पड़ोसी जिले बीड से आए थे, ने उन्हें बताया कि उन्होंने कुछ जमीन पर कब्जा कर लिया है और उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया।

 

सुनंदा और अन्य महिलाओं ने दरांती से जमीन खोदा और ज्वार के बीज लगाए। कुछ हफ्तों बाद, बीज अंकुरित हुए। आखिरकार, गांव के दलितों ने 32 हेक्टेयर में से 22 हेक्टेयर क्षेत्र को आपस में बांट लिया, जो इस बात पर निर्भर करता था कि प्रत्येक व्यक्ति कितना बीज और श्रम वहन कर सकता था। यह तीसरी बार था जब घड़गांव में दलितों ने घारेगांव भूमि पर कब्जा किया।

 

सुनंदा कांबले उन दलित महिलाओं में शामिल थीं, जिन्होंने 1989 में, उस्मानाबाद के दक्षिणपूर्वी महाराष्ट्र जिले के घरेगाँव गाँव में गोचर भूमि पर कब्जा कर लिया था। उसने पड़ोसी बीड जिले से अपने रिश्तेदारों से सुना था कि जमीन पर कब्जा करने का आंदोलन फिर से उठ रहा है, और उन्होंने भी ऐसा ही किया।

 

मराठवाड़ा में सार्वजनिक भूमि पर कब्जे की लहर उठती रही।1940 के दशक में, अम्बेडकर के आह्वान के बाद ऐसा पहली बार हुआ था। एक और कब्जे की लहर 60 और 70 के दशक में लोकप्रिय दलित नेता और अंबेडकर के करीबी सहयोगी दादासाहेब गायकवाड़के नेतृत्व में उठी थी। 1978 में, राज्य सरकार ने तब तक किए गए सभी अतिक्रमणों को नियमित करने  का आदेश जारी किया।

 

दलितों ने जमीन पर आंशिक रुप से कब्जा कर रखा था, क्योंकि उन्होंने अक्सर क्षेत्र के गंभीर सूखे और स्थानीय प्रशासन के दबाव के कारण ( अक्सर उच्च जातियों की ओर से भी ) कुछ छोड़ दिया था।

 

उदाहरण के लिए, कांबले के परिवार ने पहली बार 1945 में गोचर पर कब्जा किया था, लेकिन अगले वर्ष के सूखे ने परिवार को दिहाड़ी मजदूरी के रूप में काम करने के लिए मुंबई जाने के लिए मजबूर कर दिया था। वे वापस आए और 70 के दशक में फिर से जमीन पर कब्जा कर लिया, लेकिन बाद में इसे फिर से छोड़ना पड़ा। रामभाऊ ने कहा,  “इसका कारण ऊपरी जाति के जमींदारों का दबाव था।

 

1991 में, सुनंदा और अन्य लोगों द्वारा भूमि पर कब्जा करने के दो साल बाद, राज्य सरकार ने दलित भूमि अधिकार आंदोलन की कब्जे वाली भूमि को नियमित करने की मांग पर सहमति व्यक्त की। एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि 14 अप्रैल, 1990 से पहले अम्बेडकर की जयंती से कम से कम एक वर्ष पहले तक अतिक्रमण साबित करने वाले लोगों को भूमि के खिताब दिए जाएंगे।

 

एक अनुमान के अनुसार, सरकारी आदेश में 1978 और 1991 के बीच, 84,230 लोगों ने पूरे महाराष्ट्र में गायरन के लगभग 100,000 हेक्टेयर पर कब्जा किया था।

 

लेकिन ज्यादातर किसानों के पास इस बात का सबूत नहीं था कि जमीन उनके कब्जे में हैं, जैसा कि जमीन अधिकार आंदोलन (भूमि अधिकार आंदोलन) के जिला संयोजक अशरुबा गायकवाड़ कहते हैं। जमीन अधिकार आंदोलन ने जमीन खिताब फाइल करने के लिए आवश्यक कागजी कार्रवाई के साथ लगभग 35,000 दलितों की मदद की है।

 

आधिकारिक साक्ष्य के अभाव में, आंदोलन ने सुनंदा कांबले जैसे लोगों को, गांव के बुजुर्गों, चरवाहों और मददगार किसानों से हलफनामा प्राप्त करने में मदद की और प्रमाणित कराया कि जमीन उनके कब्जे में है।

 

गायकवाड़ कहते हैं, “हालांकि, सरकार ने केवल आधिकारिक रिकॉर्ड का उपयोग करने पर जोर दिया, जैसे कि राजस्व अधिकारियों या पुलिस शिकायतों से अतिक्रमण नोटिस, । सभी कब्जाधारियों को दंडित नहीं किया गया था, और कई मामलों में किसानों ने कागजी कार्रवाई सुरक्षित नहीं की थी, इसलिए वे चूक गए।”

 

महाराष्ट्र में आवर्ती भूमि-कब्जे अभियान का एक और कारण भूमि सुधार कानून को लागू करने में राज्य की विफलता है- महाराष्ट्र एग्रीकल्चर लैंड्स (सीलिंग ऑन होल्डिंग्स) एक्ट, 1961। कानून में जमीन के आकार की ऊपरी सीमा निर्धारित की जा सकती है। सीमा से ऊपर की किसी भी भूमि को राज्य द्वारा ले लिया जाएगा और वितरित किया जाएगा, पहले भूमि पर खेती करने वाले काश्तकार किसानों और फिर भूमिहीन दलितों और आदिवासियों (आदिवासियों) को।

 

2007 के योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2001 तक, महाराष्ट्र के केवल 2 फीसदी कृषि क्षेत्र को अधिशेष घोषित किया गया था। सरकार द्वारा संचालित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के 2005 के एक अध्ययन के अनुसार, महाराष्ट्र में जमींदार झूठे दस्तावेजों का उपयोग करके, परिवार के सदस्यों के बीच भूमि का विभाजन करके, भूमि के स्वामित्व की सीमा को समझते हुए और कम उम्र के आयु के बेटों को वयस्कों के रूप में दिखाते हुए अपनी जमीनों को बचाने में कामयाब हो गए। परिणामस्वरूप, महाराष्ट्र ने सिर्फ 41,039 दलित परिवारों को भूमि वितरित की थी, जैसा कि नवीनतम उपलब्ध आंकड़े, 2008 ग्रामीण विकास डेटा मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है। 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना के अनुसार, इससे राज्य के 854,000 भूमिहीन दलित परिवारों को 5 फीसदी का लाभ हुआ है।

 

कांबले जैसे दलित किसान, जिन्हें न तो अधिशेष भूमि प्राप्त हुई और न ही नियमित रूप से कब्जा की गई भूमि मिली। वे बैंक ऋण, फसल बीमा, सिंचाई पंपों के लिए बिजली कनेक्शन या सूखा राहत के लिए पात्र नहीं हैं।

 

 
यह पता चलने पर कि हैदराबाद के निजाम, जिन्होंने मराठवाड़ा पर शासन किया, उन्होंने 1948 में, चरागाह भूमि पर सभी अतिक्रमणों को नियमित करने का एक फरमान जारी किया था, 2017 में एक दिन घरेगांव के कुछ दलित किसान ब्लॉक प्रशासन कार्यालय गए। उर्दू में लिखे निजाम-युग के रिकॉर्ड को निकालने के लिए चपरासी को रिश्वत दी, और धूल भरी फाइलों पर पूरे दिन का समय बिताया। लेकिन वे किसी भी फाइल का पता नहीं लगा सके।

 

दशक से 2019 तक, दलित किसानों ने राज्य की राजधानी मुंबई और राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में कई विरोध प्रदर्शन किए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री और जिला कलेक्टरों को पत्र सौंपे हैं, जिसमें उन्होंने अपने कब्जे वाले क्षेत्र में खेती के तहत आने वाली फसलों का विवरण दिया है, और अपनी फ़सल काटने के लिए खड़े होने की तस्वीरें भी संलग्न की हैं। पत्रों में, उन्होंने पति और पत्नी दोनों के नाम पर खिताब मांगा है, और सिंचाई सुविधाओं का अनुरोध किया है। 2018 के एक पत्र में अपील की गई है: “कृपया गोचर अतिक्रमणकारियों की आजीविका को सुरक्षित करके राष्ट्रीय खाद्य उत्पादन बढ़ाने में मदद करें।”

 

हताशा में, जिन लोगों ने गोचर पर कब्जा कर लिया है, उनमें से कुछ ने खुद के खिलाफ कार्रवाई का आग्रह करने के लिए प्रशासन को याचिका देना शुरू कर दिया है, ताकि यह आधिकारिक सबूत पैदा करे ।घरेगांव के दलित परिवारों द्वारा किए गए एक प्रतिनिधित्व ने ब्लॉक कार्यालय को भूमि पर निरीक्षकों को भेजने, पंचनामा तैयार करने, या आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार करने, खेती के तहत फसलों के सबूत देने और उन पर जुर्माना लगाने के लिए कहा।

 

अतिक्रमण करने वालों में से एक अरविंद कांबले पूछते हैं, “क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई व्यक्ति खुद के उपर मुकदमा चलाने के लिए सरकार को कह रहा है? यह अब हमारी स्थिति है।”

 

सभी राज्यों में इसी तरह की चुनौती और समाधान नहीं के बराबर

 

जनगणना 2011 के अनुसार, गैर-दलितों में 49 फीसदी भूमिहीन किसानों के विपरीत महाराष्ट्र में 81 फीसदी दलित किसान खेतिहर मजदूर थे, जिनके पास खुद की कोई जमीन नहीं थी और वे दूसरों के खेतों में काम करते थे।कम से कम तीन अन्य राज्यों में भूमिहीनता के एक बड़े अनुपात के साथ, दलितों ने भी सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया है।

 

2014 में, पंजाब के संगरूर जिले के दलितों ने (जहां 90 फीसदी दलित किसान कृषि श्रमिक हैं )  6,475 हेक्टेयर खाली पड़ी जमीन पर कब्जा किया और सरकार से उन्हें खिताब देने के लिए कहा। पंजाब में, दलित आबादी का एक तिहाई हिस्सा है, जो भारत में सबसे अधिक है। उन्होंने राज्य पर उन कानूनों को लागू नहीं करने का आरोप लगाया है जो खेती और घरों के निर्माण के लिए दलितों के लिए सार्वजनिक भूमि आरक्षित करते हैं। जामिन प्रपत्ति संघर्ष समिति के तहत आयोजित प्रदर्शनकारियों ने जमीन कानूनी रूप से उन्हें नहीं दिए जाने पर उनके कब्जे ड्राइव को तेज करने की धमकी दी है।

 

केरल में, जहां 93 फीसदी दलित किसान खेतिहर मजदूर हैं, दलितों और आदिवासियों ने 2007 में दक्षिणी जिले पठानमथिट्टा के चेंगारा में 25,000 हेक्टेयर के रबर प्लांटेशन के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया।

 

वे राज्य के 1963 के भूमि सुधारों में दो दोषों की ओर इशारा करते हैं, अन्यथा उस सुधार को सफल माना जाता है।

 

सुधारों में केवल “मध्यस्थ” को शामिल किया गया, जैसे कि किरायेदार, जो आमतौर पर उच्च जाति के थे, और खेत मजदूर नहीं थे जैसे कि दलित या आदिवासी थे। सुधारों ने अतिरिक्त भूमि देने से वृक्षारोपण को छूट दी। इसका मतलब था कि बड़े एस्टेट्स, जैसे चेंगारा में भूमिहीनों को वितरित नहीं किए जा सकते।

 

2012 में, केरल के कोल्लम जिले के अरियप्पा में 22 हेक्टेयर से अधिक सरकारी भूमि पर दलित परिवारों ने कब्जा कर लिया था, जिन्होंने पाया कि उन्हें वितरित की जाने वाली भूमि, एक डेंटल कॉलेज और एक विश्वविद्यालय परिसर को आवंटित की जा रही थी।

 

2017 में, तमिलनाडु के वेल्लोर जिले में भूमिहीन दलित महिलाओं ( जहां 87 फीसदी दलित किसान भूमिहीन हैं ) ने सरकारी स्वामित्व वाली भूमि पर कब्जा कर लिया और खाद्य फसलों के साथ खेती की शुरुआत की।

 

गुजरात और बिहार में भूमिहीन दलित (जहां 80 फीसदी से अधिक दलित किसान दूसरों के खेतों में काम करते हैं ) एक और समस्या का सामना करते हैं: उन्हें भूमि सुधार के तहत खिताब दिए गए थे, लेकिन उनकी भूमि उच्च जातियों के कब्जे में है।

 

2015 के सर्वेक्षण के अनुसार, गुजरात के छह जिलों में केवल आधे दलित परिवार में पाया गया कि उन्हें आवंटित की गई भूमि के कब्जे में है। इनमें से आधे से अधिक परिवारों को जमीन पर कब्जा पाने के लिए कम से कम पांच साल तक संघर्ष करना पड़ा। दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने दलितों को दी गई जमीन पर कब्जा करने में मदद करने के लिए अदालती मुकदमे लड़ा था।

 

2014 में, बिहार ( जहां लगभग 90 फीसदी दलित किसान खेतिहर मजदूर हैं ) यह पहचानने वाला पहला राज्य बना कि कब्जे में कमी एक समस्या है, जिसपर राज्य के हस्तक्षेप की आवश्यकता है। उस समय, राज्य के 23 लाख दलितों में से लगभग 500,000 को अभी तक दी गई भूमि पर कब्जा नहीं मिला था।

 

बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री और पद संभालने वाले पहले दलित जीतन राम मांझी ने ‘ऑपरेशन दखल देहनी’ शुरू किया, जिसके तहत गांवों में शिविर लगाए गए और पुलिस और राजस्व अधिकारियों ने दलितों उस भूमि का नियंत्रण हासिल करने में मदद की, जो उन्हें दशकों पहले मिली थी। 2018 में, जब ऑपरेशन समाप्त हो गया, केवल 40,000 परिवारों ( या उन पात्र लोगों में से 25 फीसदी ) अभी भी भूमि के बिना थे और ऐसा मुकदमेबाजी के कारण था, जैसा कि बिहार सरकार की वेबसाइट से पता चलता है।

 

अर्थशास्त्री और जातिगत भेदभाव के विशेषज्ञ सुखदेव थोराट कहते हैं, “सरकार दलितों को जमीन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि अगर वे जमीन खरीदने का खर्च उठा सकते हैं, तो भी उनके साथ भेदभाव होता है।” तमिलनाडु, हरियाणा, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश को शामिल करते हुए थोराट की टीम द्वारा एक अप्रकाशित क्षेत्र अध्ययन में पाया गया कि दलित आमतौर पर भूमि के लिए उच्च मूल्य का भुगतान करते हैं और आमतौर पर “उच्च-गुणवत्ता वाली भूमि” – सिंचाई नहरों के पास या प्रमुख-जाति वाले किसानों के खेतों के पास नहीं बेची जाती हैं। “सरकार को अनुसूचित जातियों के लिए सार्वजनिक भूमि का स्वामित्व देना है,” जैसा कि थोराट ने कहा।

 

सार्वजनिक भूमि प्रदान करने का एक विकल्प 2014 में शुरू किए गए तेलंगाना की तरह एक कार्यक्रम हो सकता है। भूमि खरीद योजना के तहत तेलंगाना सरकार दलितों से जमीन खरीदकर और प्रत्येक भूमिहीन दलित परिवार को लगभग तीन एकड़ (1.2 हेक्टेयर) जमीन देकर दलितों को भूमि के पुनर्वितरण की कठिनाइयों को दूर करती है। राज्य ने अब तक 6,070 हेक्टेयर भूमि खरीदी है और इसे लगभग 6,000 दलित परिवारों को वितरित किया है।

 

तेलंगाना कार्यक्रम के तहत, परिवारों को खाद, कीटनाशक और खेती के लिए आवश्यक अन्य चीजों के लिए सिंचाई और धन भी प्राप्त होता है। हालांकि, दलित समूहों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने धीमी प्रगति के लिए योजना की आलोचना की है, और कुछ परिवारों ने खराब गुणवत्ता वाली भूमि की शिकायत की है।

 

भूमिहीनता की ओर

 

मराठवाड़ा में, दलितों द्वारा नियमित रूप से कब्जा की गई भूमि को प्राप्त करने के लिए लड़ रहे दलितों के खिलाफ संघर्ष जारी है। 2011 में, सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि व्यक्तियों या संस्थानों द्वारा सार्वजनिक जमीन पर अतिक्रमण को नियमित नहीं किया गया।

 

जल संचयन जैसे पारिस्थितिक कारणों का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू द्वारा निर्णय में कहा गया कि, “हमारे पूर्वज मूर्ख नहीं थे।” सप्ताह के भीतर, महाराष्ट्र सरकार ने एक संकल्प जारी किया कि यह अब चरागाह भूमि पर ‘अतिक्रमण’ को नियमित नहीं किया जाएगा।

 

2016 में, महाराष्ट्र सरकार ने वृक्षारोपण के तहत राज्य के एक तिहाई क्षेत्र को लाने के लिए पेड़ लगाकर वनीकरण परियोजना शुरू की। यह योजना 2020 तक सरकारी भूमि पर 500 मिलियन पेड़ों का आह्वान करती है। उन पेड़ों को मराठवाड़ा में गायरन पर लगाया जा रहा है।

 

अप्रैल 2017 में, जब सुनंदा कांबले और अन्य लोग अनाज की फसल काटने के लिए खेतों में पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि पौधा लगाने के लिए, अर्थ मूवर ने जमीन को खोदना शुरू कर दिया था- उनके खेतों  एक मीटर चौड़ी और पांच मीटर लंबी । किसानों ने कहा कि वे अर्थ मूवर के सामने खड़े हो गए और ऑपरेटर के न रुकने पर पत्थर फेंकने और मशीन में आग लगाने की धमकी दी।

 

एक ग्रामीण ने बताया कि “ऑपरेटर, जिन्हें मैं जानता हूं,  पर महिलाओं ने इस तरह की अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया कि कई दिनों तक वे सकते में रहे।”

 

तब दलितों ने उस्मानाबाद शहर में एक बस ली और जिला कलेक्टर के पास शिकायत दर्ज कराई। जब ग्रामीण भूमि के रिकॉर्ड तक पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि 2015 में जिला प्रशासन ने सभी चरागाह भूमि को वन विभाग को स्थानांतरित कर दिया था, बिना किसी सार्वजनिक सूचना के या उन्हें सूचित किए।

 

दलित परिवार महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के घारेगांव में एक सामुदायिक केंद्र के पास इकट्ठा होते हैं। दलितों के पास गांव में कोई जमीन नहीं है और वे ऊंची जाति के किसानों के खेतों में काम करते हैं। क्षेत्र के आवर्ती सूखे के दौरान, वे काम की तलाश में पश्चिमी महाराष्ट्र या मुंबई चले जाते हैं।

 

एक जिला वन अधिकारी, जिन्होंने नाम नहीं बताना चाहा, ने कहा कि यद्यपि लगभग 5,000 हेक्टेयर गोचर को वन विभाग को हस्तांतरित कर दिया गया था, उन्होंने केवल 900 हेक्टेयर भूमि पर कब्जा कर लिया था, क्योंकि शेष भूमि पर दलित किसानों का कब्जा था।

 

वन अधिकारी ने कहा, “हमारा विभाग कलेक्टर से हमारी मदद करने के लिए कह रहा है … शायद कब्जा करने वालों को कुछ वैकल्पिक जमीन दी जा सकती है।”

 

लेकिन एक वरिष्ठ जिला अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर यह भी कहा कि कलेक्टर के पास कब्जा करने वालों को टाइटिल देने या उन्हें स्थानांतरित करने का कोई तरीका नहीं है- “भूमि अब वन विभाग की है और यह अब उन सभी पर निर्भर है।

 

मुंबई के एक शोधकर्ता अवनीश कुमार ने कहा कि दलितों के लिए गोचर भूमि पर दलितों की मांग के पीछे एक तर्क यह भी था कि यह गांवों में सबसे कम उपजाऊ भूमि है- “भूमि को ग्रामीणों द्वारा कम से कम उपजाऊ होने के लिए छोड़ दिया गया था, अन्यथा यह बहुत पहले प्रमुखों द्वारा कब्जा कर लिया गया था। आंदोलन उन “भूमि पर खेती के अधिकार की मांग करने का संघर्ष है जो कि खेती योग्य भी नहीं है।”

 

वन विभाग द्वारा जमीनों को खोदने के बाद 2017 में घारेगांव के दलितों ने अपने खेतों को छोड़ दिया। रामभाऊ कांबले ने कहा कि किसान अपनी फसल को विभाग द्वारा खराब होने का जोखिम नहीं उठा सकते। एक एकड़ (0.4 हेक्टेयर) की खेती करने के लिए लगभग 10,000 रुपये का खर्च आता है, और किसान साहूकारों और अल्प कृषि मजदूरी से बचत की ओर रुख करते हैं।

 

2017 में, महाराष्ट्र के वन विभाग ने राज्य भर में 500 मिलियन पेड़ लगाने की सरकार की परियोजना के हिस्से के रूप में पेड़ लगाने के लिए गोचर भूमि पर गड्ढे खोदना शुरू किया।

 

2019 के मानसून के करीब आने के बाद, कांबले और अन्य लोगों ने सोचा कि दो साल के अंतराल के बाद बोना है या नहीं। यदि वे नहीं करते तो गांव में उनके पास एकमात्र नौकरी उच्च जातियों के बड़े खेतों पर दिहाड़ी मजदूरी थी। वे जमीन पर कब्जा करना चाहते थे, हालांकि उन्हें एहसास है कि यह तेजी से अस्थिर हो रहा है।

 

“हम इस वर्ष खेती करना चाहते हैं और काफी संभावना है कि सरकार हमारे खिलाफ कार्रवाई करेंगे,” कांबले कहते हैं, “लेकिन यह हमारा अधिकार है कि हमारी खुद की जमीन हो, इसलिए हम आसानी से हार नहीं मानेंगे।”

 

(गोखले लैंड वॉच कॉन्फिलक्ट से जुड़े लेखक हैं।  ‘लैंड वॉच कॉन्फिलक्ट शोधकर्ताओं का एक नेटवर्क है, जो भारत में चल रहे भूमि संघर्ष के बारे में डेटा एकत्र करता है।)

 

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में  07 जून, 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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