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क्या बिहार कर पाएगा 94% बिजली की मांग की आपूर्ति

चैतन्य मल्लापुर,

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देश के गरीब राज्यों में तेजी से अर्थव्यवस्था बढ़ने के मामले में दूसरा स्थान बिहार का है। पिछले सात वर्षों में बिहार में बिजली की मांग 94 फीसदी दर्ज की गई है। जब तक आंकड़ों पर ठीक प्रकार से नज़र न डाली जाए, बिजली की मांग में यह वृद्धि काफी प्रभावशाली लगती है

 

वर्ष 2014-15 में बिहार में, जोकि 104 मिलियन लोगों के साथ देश का तीसरा सर्वाधिक आबादी वाला राज्य है, 3,500 मेगा वाट बिजली की मांग की गई है। यह आंकड़ा मुंबई ( पांचवा सर्वाधिक आबादी वाला राज्य ) के आंकड़ों के बराबर हैं।

 

बिहार में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 144 किलो वाट प्रति घंटे  है। यह आंकड़े राष्ट्रीय औसत से 85 फीसदी कम है। गौरतलब है कि राष्ट्रीय औसत 927 किलोवाट प्रति घंटा दर्ज की गई है। इंडियास्पेंड ने पहले ही अपनी खास रिपोर्ट में बताया है कि ग्रामीण परिवारों में से केवल 26 फीसदी ही विद्युतीकृत हैं जोकि देश के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में बेहद कम है।

 

यह स्पष्ट है कि लोगों की बढ़ती बिजली की मांग को बिहार पूरा नहीं कर सकती है।

 

बिजली की कमी में गिरावट, राज्य में उर्जा की कमी

 

वर्ष 2007-08 में अधिकतम मांग 1,800 मेगा वाट थी जोकि वर्ष 2014-15 में बढ़ कर 3,500 मेगा वाट हो गई है। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2007-08 में बिजली की अधिकतम उपलब्धता 1,244 मेगा वाट थी जोकि वर्ष 2014-15 में बढ़ कर 2,831 मेगा वाट हो गई है।

 

2014-15 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार में बिजली की 19 फीसदी कमी है ( बिजली की मांग और बिजली की आपूर्ति के बीच अंतर) ।

 

बिहार में बिजली की स्थिति , 2008-2015

 

Source: Economic Survey 2014-15; Central Electricity Authority- 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8 (Load Generation Balance Report 2008-09: 1; 2009-10: 2; 2010-11: 3; 2011-12: 4; 2012-13: 5; 2013-14: 6; 2014-15: 7, 2015-16: 8.)

 

हालांकि केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए ) की रिपोर्ट के अनुसार बिजली की कमी में खासी गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2007-08 में यह आंकड़े 34 फीसदी थे जबकि वर्ष 2014-15 में यह गिर कर 4 फीसदी दर्ज की गई है।

 

बेमेल आंकड़े होने के बावजूद यह स्पष्ट है कि बिजली की कमी में गिरावट हुई है।

 
बिहार के स्थापित विद्युत क्षमता
 

Source:Central Electricity Authority; Figures in MW; Data as on August 31, 2015

 

31 अगस्त 2015 तक बिहार में स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 2,759 मेगावाट थी। यह आंकड़ा भारत के कुल बिजली क्षमता का 1 फीसदी है एवं पूर्वी क्षेत्र ( झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा , सिक्किम, दामोदर घाटी निगम और बिहार) का 8 फीसदी है।

 

सीईए के लोड जनरेशन बैलंस रिपोर्ट 2015-16 के अनुसार  देश के आठ पिछड़े राज्यों में – बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा , राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश – वर्ष 204-15 के दौरान छत्तीसगढ़ (4.7 फीसदी ) और उत्तर प्रदेश (17 फीसदी ) की तुलना में बिहार ( 4 फीसदी ) में सबसे कम बिजली की कमी थी।

 
बिहार एवं अन्य ईएजी राज्यों में बिजली की कमी, 2014-15
 

Source: Central Electricity Authority

 

कुछ राज्य, जैसे कि राजस्थान एवं उत्तराखंड में बिजली की कमी नहीं है। वर्ष 2014-15 के दौरान भारत में 4.7 फीसदी बिजली की कमी दर्ज की गई थी।

 
बिजली की कमी वाले टॉप राज्य, 2014-15
 

Source: Central Electricity Authority

 

जम्मू-कश्मीर एवं अंडमान निकोबार सबसे अधिक उर्जा की कमी से जूझ रहे हैं। इन क्षेत्रों में 20 फीसदी बिजली की कमी दर्ज की गई है।

देश में कई राज्य हैं जो बिहार की तुलना में अधिक बिजली की कमी से जूझ रहे हैं जैसे तेलंगाना (14.3 फीसदी ), असम ( 13.3 फीसदी ), पंजाब (13.1 फीसदी ), केरल (4.4 फीसदी ) और कर्नाटक ( 4.5 फीसदी ) ।

 

बिजली की कमी के मामले में बिहार की स्थिति बेहतर प्रतीत होती है लेकिन वह इसलिए क्योंकि जैसा कि हमने पहले बताया है राज्य में बिजली की मांग , क्षमता और उत्पादन बहुत कम हैं।

 

बिहार के बिजली उत्पादन मुख्य रुप से तापीय ऊर्जा (91 फीसदी) पर निर्भर है जबकि जल विद्युत और नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी केवल 5 फीसदी एवं 4 फीसदी की है।

 

वर्ष 2013-14 में बिहार में उच्च संचरण और वितरण (टी एंड डी) में 42 फीसदी नुकसान दर्ज की गई है। गौरतलब है कि राष्ट्रीय औसत 27 फीसदी है।

 

वर्ष 2013-14 में लागत कवरेज के संदर्भ में मापा वित्तीय घाटा 52 फीसदी के साथ उत्तर बिहार वितरण नेटवर्क के लिए उच्च रहे हैं एवं दक्षिण बिहार में वितरण नेटवर्क के लिए 50 फीसदी दर्ज की गई है।

 

( मल्लापुर इंडियास्पेंड के साथ नीति विश्लेषक हैं। )

 

(यह लेख बिहार पर इंडिस्पेंड के विशेष विश्लेषण का हिस्सा है। आप इस श्रृंखला के अन्य लेख यहां पढ़ सकते हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 29 सितंबर 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 
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