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‘अगर भारत में राष्ट्रीय जीएसटी हो सकता है, तो यूनिवर्सल नेशनल हेल्थकेयर क्यों नहीं?’

स्वागता यदवार,

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अगर राज्य और केंद्र एक राष्ट्रीय कर प्रणाली पर सहयोग कर सकते हैं, तो भारत सरकार एक राष्ट्रव्यापी सार्वभौम स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का निर्माण क्यों नहीं कर सकता, जो  मुख्य रूप से सरकार द्वारा बनाया और चलाया जाए? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब आज हम भारत के अग्रणी चिकित्सकीय विशेषज्ञ और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई) के अध्यक्ष श्रीनाथ रेड्डी से जानने की कोशिश करेंगे।

 

भारत स्वास्थ्य सेवा पर सकल घरेलू उत्पाद का 1.4 फीसदी से अधिक नहीं खर्च करता है, जो विश्व स्तर पर बहुत कम है और 52.5 मिलियन भारतीय स्वास्थ्य से संबंधित कारणों से प्रति वर्ष गरीबी में जाते हैं। वर्ष 2016 में, देश भर में 10 में से छह मौतें गैर-संचारी रोगों के कारण हुई थीं। ये आंकड़े हाल ही में जारी राज्य-वार डीजीज बर्डन रिपोर्ट में सामने आई है। यह रिपोर्ट अन्य के साथ पीएचएफआई, चिकित्सा अनुसंधान प्रयोगशालाओं के सरकार के नेटवर्क, द इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के साथ सहयोग के साथ जारी की गई है।  हम बता दें कि 1990 में यह आंकड़ा दस में से चार की मौतों का था।

 

पीएचएफआई राज्य और केंद्रीय सरकारों और अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय शिक्षा, द्विपक्षीय एजेंसियों और नागरिक समाज समूहों के बीच सार्वजनिक-निजी साझेदारी है और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण, अनुसंधान और नीति विकास का आयोजन करती है।

 

फिर भी, अप्रैल 2017 में, भारत के गृह मंत्रालय (एमएचए) ने पीएचएफआई के विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) लाइसेंस को रद्द कर दिया,  और इसके पीछे तंबाकू विरोधी तस्करी का हवाला दिया गया। इसके बाद पीएचएफआई ने अपने संचालन को रोक दिया है और अपने 60 फीसदी कर्मचारियों को हटा दिया, जिनमें से कई भारतीय मूल के शिक्षाविद थे, जो घर वापस आए थे। कई शिक्षाविद अब विदेशों में वापस चले गए हैं।

 

पीएचएफआई के खिलाफ सरकार की कार्रवाई में ऐसे समय में आया है, जैसा कि हमने कहा, गैर-संचारी बीमारियां पहले से कहीं ज्यादा भारतीयों को कमजोर कर रही हैं या मार रही हैं।

 

सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का सामना करने के लिए संघर्ष जारी है, क्योंकि यहां स्टाफ और फंड की कमी है। भारत में स्वास्थ्य देखभाल पर खर्च होने वाले जीडीपी के 1.4 फीसदी की तुलना में श्रीलंका 2 फीसदी, थाईलैंड 3.2 फीसदी, ब्राजील 3.8 फीसदी और चीन 3.1 फीसदी खर्च करता है, जैसा कि विश्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है। भारत की तुलना में इन सभी देशों में तेज गति से स्वास्थ्य सेवा में सुधार हुआ है।

 

रेड्डी ने कई डब्ल्यूएचओ विशेषज्ञ पैनलों पर काम किया है और वह वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन (2013-14) के अध्यक्ष रहे हैं। वर्ष 2010 में, उन्होंने एक सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज पर एक ‘उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह’ की अध्यक्षता की थी। वह राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड के अध्यक्ष थे, जो भारत में स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा परीक्षा आयोजित करता है। वर्ष 2003 में, रेड्डी को तंबाकू नियंत्रण में उत्कृष्ट वैश्विक नेतृत्व के लिए डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक का पद दिया गया था। वर्ष 2005 में, भारत सरकार ने उन्हें भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण से सम्मानित किया है।

 

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पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष श्रीनाथ रेड्डी को तंबाकू नियंत्रण में उत्कृष्ट वैश्विक नेतृत्व के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक का पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। वर्ष 2005 में भारत सरकार की ओर से उन्हें भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण दिया से सम्मानित किया गया था।

 

पीएचएफआई नवंबर 2017 में जारी ‘स्टेट-वाइज डिसीज बर्डन रिपोर्ट’ का हिस्सा था। इसमें पता चला है कि 1990 के दशक में सभी मौतों की 37.9 फीसदी हिस्सेदारी वाले गैर-संचारी रोग (एनसीडी) का बोझ 61.8 फीसदी हो गया, जिससे 2016 में भारत में दस में से छह मौतें हुईं हैं। जबकि पंजाब, तमिलनाडु और केरल जैसे समृद्ध राज्यों में एनसीडी का ज्यादा बोझ है। गरीब राज्य अभी भी संक्रामक बीमारियों से जूझ रहे हैं। समृद्ध राज्यों के लिए योजना क्या होनी चाहिए?

 

राज्यों ने एनसीडी के काफी भारी बोझ का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया है ( दोनों मौतों के प्रतिशत में वृद्धि और, अधिक महत्वपूर्ण बात, उच्च जोखिम वाले कारकों से आने वाले वर्षों में उच्च बोझ का जन्म ) इन राज्यों में तत्काल कार्रवाई करनी होगी।

 

आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि तम्बाकू का निपटान कर, स्वस्थ आहार सुनिश्चित करके, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि सुनिश्चित करके और प्रदूषण जैसे अन्य जोखिम कारकों को कम करने की कोशिश द्वारा लोगों को उच्च जोखिम में पड़ने से रोका जाए। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों के बीच बहुआयामी समन्वय की आवश्यकता है।

 

नीतिगत परिवेश के अलावा, स्वस्थ जीवन के लिए अनुकूल वातावरण बनाने की जरूरत है। आपको स्कूलों में अधिक जागरूकता फैलाने की भी आवश्यकता है, ताकि बच्चों को पता होना चाहिए कि किन चीजों से बचना चाहिए। कार्यस्थल पर और समुदाय की जागरूकता पर भी काम करने की जरूरत है।

 

नीति और सामुदायिक उन्मुख कार्य के माध्यम से स्वास्थ्य को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है, लेकिन जोखिम कारकों वाले व्यक्तियों में शीघ्र पहचान और उस जोखिम को कम करना, गैर-दवा उपायों के माध्यम से दोनों ( जिसे हम जीवन शैली कहते हैं ) लेकिन आवश्यक होने पर भी दवाइयां, जोखिम वाले कारकों को बहुत कम कर सकती हैं ।

 

इसलिए, जोखिम प्रबंधन और बीमारी का प्रारंभिक प्रबंधन प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल का एक बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व है। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को न केवल स्वास्थ्य प्रचार और रोग की रोकथाम के लिए तैयार किया जाना चाहिए, बल्कि जोखिम वाले कारकों का शीघ्र पता लगाना और जरुरतमंद लोगों की देखभाल के लिए उच्च स्तर की उचित रेफरल सेवा की आवश्यकता है।

 

यह वह जगह है, जहां स्वास्थ्य प्रणाली का नए सिरे से संरचात्मक गठन जरूरी है। पुरानी बीमारी प्रबंधन और जोखिम में कमी के परिप्रेक्ष्य से; संक्रामक रोगों के लिए छिटपुट देखभाल प्रदान करने से, स्वास्थ्य व्यवस्था में निरंतर देखभाल का विशेष रूप से प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर लगाया जाना चाहिए, क्योंकि तृतीयक देखभाल अभी भी तीव्र देखभाल के लिए हो सकती है

 

इसलिए, मैं तीन क्षेत्रों-नीति स्तर के हस्तक्षेप, सामुदायिक स्तर की हस्तक्षेप और स्वास्थ्य सेवा हस्तक्षेप के बारे में बात कर रहा हूं। इनमें से बहुत से काम बिना ज्यादा खर्च किए, हो सकते हैं।

 

यदि आप सामान्य जेनेरिक दवाओं के साथ उच्च रक्तचाप और मधुमेह के उपचार के बारे में बात कर रहे हैं, तो यह उतना महंगा नहीं है, जितना कोरोनरी स्टेंट और बाईपास सर्जरी और गुर्दे के प्रत्यारोपण में लगता है, जिससे बचा जा सकता है और यदि आप जल्दी देखभाल लेते हैं तो उसे बचा जाना चाहिए। यही वह सबक है राज्यों को सीखना है। अगर वे केवल उन्नत देखभाल में पैसे में देना चाहते हैं, तो यह एक कभी खत्म नहीं होने वाला काम हो सकता है, क्योंकि बीमारी का बोझ बढ़ता रहेगा, और स्वास्थ्य देखभाल की लागत में वृद्धि होती रहेगी।

 

शहरी और ग्रामीण इलाकों में एनसीडी का बोझ बढ़ रहा है?

 

हां, शहरी क्षेत्र हमेशा इस महामारी के मामले में सबसे आगे रहेगा, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में भी एक बड़ी माहामारी होगी, क्योंकि वे भी रूपांतरित हो रहे हैं।

 

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण, विशेष रूप से इलाज योग्य स्थितियों में भी इलाज तब तक नहीं किया जाता, जब तक वे जटिल न बन जाएं। उच्च रक्तचाप वाले लोगों का प्रतिशत शहरी इलाकों में (ग्रामीणों की तुलना में) अधिक हो सकता है, लेकिन अधिक लोगों को शहरी इलाकों में देखभाल मिलती है, जबकि ग्रामीण इलाकों में ऐसी सिथिति नहीं है।यही कारण है कि हम दवा के साथ या बिना जल्दी पहचान और प्रभावी उपचार पर बल दे रहे हैं। जब पूरक उपायों के लिए दवाओं की जरूरत होती है, उन्हें भी दिया जाना चाहिए। ऐसी परिस्थिति में प्राथमिक देखभाल निर्णायक है।

 

वर्ष 2016 में  इस्केमिक हृदय रोग भारत में मृत्यु का शीर्ष कारण था । देश में होने वाली सभी मौतों में से 17.8 फीसदी का कारण। मृत्यु के इस बढ़ते बोझ से निपटने के लिए सरकार अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था के माध्यम से क्या कर सकती है? हम दूसरे देशों से कौन सा सबक ले सकते हैं?

 

फिनलैंड में 1960 की शुरुआत में दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में सबसे ज्यादा मृत्यु दर (इस्कीमिक हृदय रोग के लिए) थी। फिर उन्होंने सामुदायिक स्वास्थ्य शिक्षा का एक कार्यक्रम शुरू किया और स्वास्थ्य सेवाओं को पुनर्जीवित किया। उन्होंने संतृप्त वसा की खपत को कम करने के साथ ही फलों और सब्जियों की उपलब्धता में भी वृद्धि के द्वारा लोगों के आहार संबंधी पैटर्न को नाटकीय रूप से बदल दिया। उन्होंने ‘बेरी’ खेतों के साथ ‘डेयरी’ खेतों को बदल दिया। शुरुआती पहचान और उपचार और धूम्रपान की दरों में नाटकीय रूप से कम होने के कारण बेहतर स्वास्थ्य सेवा भी लाई गई। 20 वर्षों में, फिनलैंड में औसत जनसंख्या कोलेस्ट्रॉल के स्तर और कोरोनरी मृत्यु दर में ऐसी नाटकीय गिरावट आई कि यूरोप में हृदय रोग की रोकथाम के लिए एक पोस्टर उदहारण बन गया।

 

हम जानते हैं कि अन्य विकासशील देशों में लोग नर्सों और सामुदायिक स्वास्थ्य श्रमिकों के साथ सामुदायिक सेटिंग में मधुमेह और उच्च रक्तचाप का प्रबंधन कर रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका, ईरान और मैक्सिको (शो) के अध्ययन से गैर-चिकित्सक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता प्रभावी रूप से उच्च रक्तचाप और मधुमेह का पता लगा सकते हैं और प्रबंधन कर सकते हैं। अन्य देशों ने दिखाया है कि प्रभावी तंबाकू नियंत्रण ने हृदय संबंधी मृत्यु दर को कैसे प्रभावित किया है?

 

चूंकि भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली मातृत्व और बाल स्वास्थ्य पर केंद्रित है, क्या इससे एनसीडी पर फोकस कम होता है?

 

मातृत्व कार्यक्रम बहुत महत्वपूर्ण हैं, मलेरिया कार्यक्रम बिल्कुल महत्वपूर्ण है और हमें हार नहीं माननी चाहिए। टीबी नियंत्रण बहुत महत्वपूर्ण है, हमें इससे भी हार नहीं माननी चाहिए लेकिन हमें सभी समस्याओं से निपटना होगा। हमने एक परिवार की सेवा के रूप में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा कभी नहीं देखा है, हमने इसे एक कार्यक्रम की सेवा के रूप में देखा है। यदि आप अपनी प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को व्यापक देखभाल बनाते हैं, तो प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल व्यापक आधार पर सफल सकती है।

 

हम पाते हैं कि मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) और सहायक नर्स और मिडवाइफ (एएनएम) मातृ एवं बाल देखभाल के ज्यादा बोझ ढो रही हैं । प्रत्येक को प्रजनन और बाल स्वास्थ्य, प्रतिरक्षण, परिवार नियोजन और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को लागू करने की जिम्मेदारी है।

 

यही कारण है कि हमें अपने स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों के विस्तार करने की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य कार्यबल का घनत्व बहुत कम है।  हमें और अधिक लोगों की आवश्यकता है, और यह रोजगार भी बनाने का एक बढ़िया अवसर है। हम नौकरियों के बारे बात करते हैं तो क्यों नहीं स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की जरूरतों को पूरा करते हुए युवा लोगों को विशेष रूप से संबद्ध स्वास्थ्य पेशेवरों को रोजगार प्रदान करते हैं? यह युवा लोगों के लिए कई नौकरियां पैदा करने वाला है। आपको इसे न केवल लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए बल्कि अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के तरीके के रूप में भी देखना होगा।

 

सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज वर्ष 2012 में शुरू किया जाना चाहिए था। हमने अब तक इस कार्यक्रम को लागू करने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया है? भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लिए सबसे बड़ी बाधाएं क्या हैं?

 

सबसे बड़ी बाधाएं दृष्टिकोण की कमी है। हम कार्यक्रम और अचानक पहल यानी अल्पकालिक प्रभाव की तलाश के आदि हैं।

 

वास्तव में सिस्टम आर्किटेक्चर बनाने के प्रति हमारा ध्यान नहीं है जो मध्यम अवधि और दीर्घकालिक उद्देश्यों और स्थिरता की ओर हमें लेकर जा सकता है।

 

दूसरा यह कि हमारे यहां सार्वजनिक वित्तपोषण का स्तर बहुत नीचे है। यदि आप सार्वजनिक वित्तपोषण में वृद्धि नहीं करते हैं, तो आप इस मानसिकता में आ जाते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र कुछ भी नहीं कर सकता है। इसे जो करना है, उसे करने के लिए आपको इसे निजी क्षेत्र में छोड़ना होगा और ऐसी व्यवस्था बनाने का अवसर खोना होगा जो सुलभ और सस्ती देखभाल प्रदान करता है, जो सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का सार है। इसलिए, असंगत पहल, विशेष रूप से अत्यावश्यकता और निपुणता से अल्पावधि उत्तर प्रदान करने से सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लिए एक प्रणाली बनाने में असमर्थता उत्पन्न होती है।

 

यह सार्वजनिक वित्त पोषण बढ़ाने, स्वास्थ्य के लिए आवंटित कर राजस्व के संदर्भ में उपलब्ध सभी संसाधनों को एकत्रित करके, नियोक्ता द्वारा प्रदत्त बीमा और सरकारी-सदस्यता वाली सोशल इंश्योरेंस योजनाओं को एक एकल में पहले ठीक से स्थापित करने की आवश्यकता है। यदि आप ऐसी प्रणाली बनाते हैं, तो आपके पास एक एकल भुगतानकर्ता प्रणाली हो सकती है, जहां आपके पास गुणवत्ता और लागत को नियंत्रित करने की शक्ति है। लेकिन अभी आप ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं।

 

बहुत से देश, जो (स्वास्थ्य) सेवाओं का एक बड़ा हिस्सा देने के लिए निजी क्षेत्र पर निर्भर हैं,वह नियंत्रण के लिए एक एकल भुगतानकर्ता प्रणाली भी प्रयोग में लाते हैं। हमने देखा है कि यह दवा खरीद में भी कैसे सफल होता है। तमिलनाडु में एकल खरीद ने राज्य को शक्ति दी है। जब आप बिचौलियों को खत्म करते हैं, तो आप लागत को नीचे लाते हैं

 

सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की जांच करने वाले एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह ने सिफारिश की थी कि भारत 2017 तक जीडीपी का 2.5 फीसदी और और 2022 तक 3 फीसदी खर्च करेगा। भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय जीडीपी का 1.4 फीसदी है और अब राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में इसे बढ़ाने के बारे में बात की गई है। भविष्य में सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 फीसदी। क्या हम भविष्य में हमारे लक्ष्य को बदल पा रहे हैं?

 

यह हमेशा होता है कि सरकारें ( कोई भी पार्टी सत्ता में हो ) प्रारंभिक लाभ को देखती है। ये आम तौर पर बुनियादी ढांचे, पावर के रूप में होते हैं-ये सभी महत्वपूर्ण हैं। वे समझते हैं कि स्वास्थ्य क्षेत्र के वित्त पोषण महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बजट चर्चा में इन्हें समय नहीं मिलता है।

 

जब आपके पास कमजोर व्यवस्था है, तो आपके पास स्वास्थ्य कार्यस्थलों में कम लोग हैं। आपके पास उचित प्रबंधकीय प्रतिभा नहीं है। आपने एक सार्वजनिक स्वास्थ्य कैडर को नियोजित या बनाया नहीं है। आपने जिला अस्पतालों को एक ताकत के रूप में विकसित नहीं किया है। आपने प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को कमजोर कर दिया है।

 

दूसरी ओर, आप पैसे डालते हैं, स्वास्थ्य कार्यबल का विस्तार करते हैं, उन्हें बेहतर भुगतान करते हैं और उन्हें लंबे समय तक काम करने और जवाबदेही उपायों को लागू करने के लिए प्रेरित करते हैं। फिर, आप सार्वजनिक क्षेत्र में निजी क्षेत्र से खरीदे गए सेवा-साधनों से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद करते हैं। अधिक जवाबदेही के साथ स्वास्थ्य देखभाल में सुधार होगा।

 

इसके लिए आपको वित्तपोषण के अपने स्तर में सुधार करने की आवश्यकता है। जब आप गियर नहीं बदले तो सिस्टम में गति कैसे आएगी? जब आप गियर बदलते हैं, तो आपको एक्सीलेरेटर दबाना पड़ता है। सरकार को ये समझना चाहिए।

 

राष्ट्रीय उद्योग स्वास्थ्य सेवा में सार्वजनिक-निजी साझेदारी के लिए जोर दे रहा है, खासकर जिला अस्पतालों में एनसीडी के निदान और उपचार के लिए, और कुछ मामलों में, निजी प्रदाताओं को अस्पतालों के प्रबंधन को सौंपते हुए। आपके क्या विचार हैं?

 

समस्या यह है कि हमारे पास मिश्रित स्वास्थ्य प्रणाली है, जो कि डिफॉल्ट रूप से विकसित हुई है और न कि डिजाइन से। सार्वजनिक क्षेत्र में वर्षों से कम रिसोर्सिंग और खराब प्रबंधन के कारण सड़ रहा है। इस प्रकार निजी क्षेत्र का क्षेत्र रिक्त करने के लिए एक अनियमित वातावरण में वृद्धि हुई है। बेशक, यह अच्छी तरह से वितरित नहीं है और अधिकतर शहरी है और ज्यादातर अधिक समृद्ध या सरकारी कार्यक्रमों को छोड़ने वालों लोगों को पूरा करता है।

 

यह कहने में कोई मतलब नहीं है कि जिला अस्पताल, जिन्हें माध्यमिक देखभाल के लिए केन्द्र बनाना है, पर्याप्त सेवाएं प्रदान नहीं कर रहे हैं, इसलिए हम निजी खिलाड़ियों को मिलेंगे। इसके अलावा, जिला अस्पताल चिकित्सा और नर्सिंग कॉलेजों के लिए शिक्षण केंद्र बनना चाहिए – यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का हिस्सा है। यह बहुत जरूरी है कि सरकारें जिला अस्पतालों पर खर्च करें।

 

कुछ ऐसे एनसीडी, जैसे मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, को संभालने के लिए निजी पेशोवरो को लाने के लिए दो मॉडल हैं: या तो बहुत साफ, प्रदेय और उत्तरदायित्व तंत्र के साथ आप निजी प्रदाताओं को रणनीतिक क्रय के साथ अंतराल को भरने के लिए तैयार कर सकते हैं, या आप उन्हें अपने जिला अस्पताल में दुकान स्थापित करने, बुनियादी ढांचे में निवेश करने, उन्हें 30 साल की लंबी अवधि के पट्टे दे सकते हैं और उन्हें सेवाएं प्रदान करने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं, जो कि नीति आयोग का प्रस्ताव है।

 

दूसरे विकल्प के साथ समस्या यह है कि आप निजी सेवा प्रदाता की दया पर हैं। आप उन सेवाओं या सेवाओं की गुणवत्ता का निर्णय नहीं ले सकते जो वे प्रदान करने जा रहे हैं। अनिवार्य रूप से आप निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की मांगों के मुताबिक जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी कीमतें तय कीं हैं। इसमें कोई गारंटी नहीं है कि सरकार द्वारा निर्दिष्ट मरीजों को प्राथमिकता दी जा रही है, क्योंकि बिस्तरों का कोई कोटा या प्रतिशत नहीं है। इससे भी महत्वपूर्ण बात, अगर निजी सेवा प्रदाता आपकी अपेक्षाओं तक सेवा प्रदान नहीं करता है, तो आप व्यक्ति को बाहर कैसे निकाल सकते हैं? क्योंकि उस व्यक्ति का कहना है, ‘मैंने बुनियादी ढांचे में निवेश किया है, मैंने उपकरणों में निवेश किया है, मुझे रहने का अधिकार है क्योंकि आपने मुझे 30 साल का पट्टा दिया है।’ ‘इसलिए, इन 30 वर्षों में, अगर वे प्रदर्शन नहीं करते हैं, और आप उन्हें फेंकना चाहते हैं, मुकदमेबाजी होगी क्योंकि 30 साल बाद अब पूरी तरह से स्थापित हो गए हैं और उन्हें लगता है कि उनके पास किरायेदार के अधिकार हैं। आपने इस तरह की व्यवस्था को लेकर अपने लिए परेशानी खड़ी की है। यदि आपको एक निजी-क्षेत्र के साझेदार की जरूरत है, तो उन्हें जिला अस्पताल के बाहर रहने दें और उनको सूचीबद्ध करें। लेकिन स्थायी किरायेदारी अधिकारों के साथ गैर-भुगतान करने वाले अतिथि के रूप में उन्हें अंदर लेना अचल संपत्ति बाजार को भी अनसुना करना है।

 

स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए भारत अभी भी स्वास्थ्य-बीमा मॉडल पर भारी निर्भर है। यह अनुमान है कि जनसंख्या का 25 फीसदी राज्य या निजी-स्वास्थ्य बीमा द्वारा कवर किए गए हैं। हालांकि, वर्ष 2016 ब्रुकिंग्स रिपोर्ट के मुताबिक, उसने विपत्तिपूर्ण व्यय कम नहीं किया है या गरीबी में गिरने से परिवारों को रोका है।

 

दरअसल, यह आरएसबीवाई (राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना या राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना) पर पीएचएफआई के अपने शोधकर्ताओं द्वारा किया गया एक पहले के विश्लेषण से और आंध्र प्रदेश में एक कार्यक्रम पर भी खुलासा हुआ था, जो कि आरोग्यश्री (राज्य स्वास्थ्य बीमा) के रूप में शुरू हुआ था। इन कार्यक्रमों ने अस्पतालों, विशेष रूप से निजी अस्पतालों में गरीब मरीजों की पहुंच बढ़ाई है, जहां पहले रोगी नहीं पहुंच सकते थे, लेकिन इसने वित्तीय बोझ कम नहीं किया है।

 

इसके कई कारण हैं। सबसे पहले, चूंकि आरएसबीवाई 30,000 रुपए तक का कवर करता है, जो पूरी लागत को कवर नहीं करता है, उस व्यक्ति को अपनी जेब से अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है और अस्पतालों की लागत उच्च स्तर पर बढ़ सकती है क्योंकि वे यह तय करते हैं कि किस प्रक्रिया की आवश्यकता है ।

 

दूसरा, यह प्रक्रिया से पहले या बाद में बाह्य रोगी देखभाल को शामिल नहीं करता है। प्रक्रिया के बाद, यदि आपको अस्पताल में आने के लिए कहा जाता है तो कई परीक्षण करने के लिए ओपीडी में दौरे के लिए, इन सभी लागतों को जमा किया जाता है, है ना?

 

यह सच है कि कुछ अच्छी चिकित्सा उपचार से बाहर आ रही है, लेकिन हमें ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जो वास्तव में वित्तीय संरक्षण, उचित देखभाल और सार्वभौमिक पहुंच प्रदान करता है। बीमा कार्यक्रम का इरादा अच्छा है, लेकिन वे इन उद्देश्यों को पूरा नहीं करते हैं।

 

क्या राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा मॉडल की समीक्षा की जा रही है? क्या हमारे पास कोई विकल्प है? क्या उन पर कोई चर्चा की जा रही है?

 

‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना’ को विस्तार देकर आरएसबीवाई बनाने की योजना है।

 

लेकिन जब तक हम बहुत ही अच्छी तरह से सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज, प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक सेवाओं के संयोजन और कई हेल्थकेयर-धन संसाधनों के पूलिंग और एक बड़ा जोखिम पूल बनाने के माध्यम से एकल दाता प्रणाली बनाने के बारे में नहीं सोचते हैं, हम इस समस्या को दूर करने में सक्षम नहीं होंगे। अगर हम टुकड़े टुकड़े के समाधान का प्रयास करते हैं, तो हम सभी को हमेशा असफलता का सामना करना पड़ेगा।

 

समस्या स्वास्थ्य मंत्रालय में नीति निर्माण को लेकर भी है। मुझे यकीन नहीं है कि नीति निर्माता को अन्य संबंधित विभागों में, खासकर वित्त मंत्रालय में, स्वास्थ्य सेवाओं की जटिलता और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को समझते हैं। वे शायद इसे क्रय सेवाओं की एक साधारण गतिशीलता के रूप में देखते हैं और सामान्य सी समझ यह है कि निजी क्षेत्र से क्रय सेवाएं आसान है। ऐसा लगता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के विरोध का समय में है। लेकिन सामान्य बाजार की गतिशीलता स्वास्थ्य में काम नहीं करती है। यहां, ज्ञान और निर्णय लेने में असमानता झलकती है। हमें पता है कि आपको किस तरह की देखभाल की ज़रूरत है, और आप प्रदाता से खरीद के नियमों में से दूसरे विकल्प चुनने में नहीं कह सकते हैं – यह निर्णय आपको प्रदाता द्वारा किया जाता है। इसलिए, हर कोई जानता है कि स्वास्थ्य सेवा एक आदर्श बाजार स्थिति नहीं है; इसे बाजार की विफलता कहा गया है।

 

बाजार की विफलता के मामले में, राज्य को आगे बढ़ना होगा और जिम्मेदारी लेनी होगी। यह कि एकमात्र प्रदाता नहीं होगा, लेकिन यहां सवाल सेवाओं की गारंटी, उचित देखभाल की, अच्छी गुणवत्ता और लागत की है, जो व्यक्ति पर एक वित्तीय बोझ को लागू नहीं करता है। जब तक कि यह एक ऐसी प्रणाली पैदा न करे, आपके पास कई तंत्र कार्यरत होंगे, और सबसे कमजोर व्यक्ति रोगी होगा । हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि स्वास्थ्य मंत्रालय भी इसे स्पष्ट रूप से समझता है इसमें सरकार में निर्णय लेने वाली सभी मंत्रालयों और एजेंसियों को शामिल करना होगा। इसमें सभी राजनीतिक दलों को शामिल करना होगा। निरंतरता के साथ प्रतिबद्धता का अर्थ होना चाहिए। इसमें केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को शामिल करना होगा।

 

पोर्टेबिलिटी का भी एक मुद्दा है। हम एक ही देश के बारे में बात कर रहे हैं। अब, यदि कोई चेन्नई में पैदा हुआ है, हैदराबाद में पढ़ने जाता है और दिल्ली में काम करता है, तो (स्वास्थ्य) प्रणाली को उस व्यक्ति के जीवन भर में पूरा करना चाहिए। आप यह नहीं कह सकते हैं कि मुझे आपके हकदारी का दावा करने के लिए चेन्नई या हैदराबाद जाना है।

 

आपको एक ऐसी प्रणाली बनाना होगा जिसमें इस तरह से लोगों को दिक्कत न हो। इसके लिए विचार और कुछ धैर्य की आवश्यकता है। दुर्भाग्य से, जिन निर्णयों के साथ फैसले किए जाते हैं, वहां मांगों का दबाव महसूस करते हैं तब  आप एक प्रणाली बनाने के लिए धैर्य रखने की बजाय आसान समाधान की ओर बढ़ जाते हैं।

 

मुझे लगता है कि यह संभव होना चाहिए, अगर केंद्र सरकार राज्य सरकारों को फोन करने की पहल करती है और कहती है, ‘देखो, स्वास्थ्य भारत के विकास के लिए बिल्कुल महत्वपूर्ण है, और हमें एक ऐसा तंत्र तैयार करना होगा जो राज्यों के बीच स्वास्थ्य असमानता को कम कर देगी और भारतीय आबादी पूरी तरह से बेहतर स्वास्थ्य का आनंद लेगी। ‘

 

हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बीमार स्वास्थ्य भारत के विकास या गरीबी को बढ़ाने या आर्थिक क्षति का कारण नहीं बने। बीमार स्वास्थ्य के कारण वर्ष 2011 में 52.5 मिलियन भारतीय गरीबी में यानी पीछे की ओर चले गए।

 

अब, कराधान जैसे मामले पर, केंद्रीय और राज्य सरकारों ने एक साथ बैठकर जीएसटी (माल और सेवा कर) को बनाया। क्या यह (स्वास्थ्य प्रणाली का निर्माण) जीएसटी की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण नहीं है? हम इस प्रकार की व्यवस्था क्यों नहीं बना सकते? इसके लिए लोगों को एक मुद्दे को समझने के लिए एक साथ आने की आवश्यकता ।

 

पीएचएफआई को अप्रैल 2017 में गृह मंत्रालय द्वारा भारत में विदेशी धन प्राप्त करने से रोक दिया गया था। उठाए गए कुछ मुद्दे तम्बाकू और एचआईवी-एड्स से संबंधित थे।

 

कुछ कारण दिए गए थे, जो तंबाकू से संबंधित थे, जिसे लॉबिंग के रूप में कहा गया था। हमने बताया, बहुत विनम्रतापूर्वक, कि शब्द लॉबिंग एफसीआरए (विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम 2010) में कहीं भी मौजूद नहीं है। वकालत स्वीकार्य है, जब तक यह नीति निर्माताओं के बीच जागरूकता बढ़ाने का काम करता है। हम सूचना प्रसार और जागरूकता बढ़ाने में शामिल थे। लेकिन तम्बाकू एक ऐसा क्षेत्र है, जो स्पष्ट रूप से कुछ शक्तिशाली लोगों के पास हैं, और संभवत: उन्हें लगा कि हमारे प्रयास उद्योग के हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ठेठ उद्योग फैशन में, उन्होंने किसानों को एक ढाल के रूप में इस्तेमाल किया और और तंबाकू नियंत्रण द्वारा किए गए नुकसान के रूप में किसानों के संभावित नुकसान का अनुमान लगाना शुरु किया।

 

हमने तर्क दिया कि, ऐसे स्तर पर मांग को कम करने के लिए जिससे किसान प्रभावित होते हैं, तंबाकू नियंत्रण के लिए कुछ दशक लगेंगे। इस अवधि में वैकल्पिक व्यवसायों में बदलाव करने के लिए पर्याप्त समय है। और समाधान तंबाकू नियंत्रण को धीमा करने में नहीं है बल्कि वैकल्पिक व्यवसायों और अन्य फसलों के उत्पादन को तेज करने में है।

 

हालांकि, हम पर राष्ट्रीय हित में काम न करने का आरोप था। लेकिन राष्ट्रीय हित  राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति से परिलक्षित होती है। यहां स्थायी विकास लक्ष्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता परिलक्षित होता है। यह भारतीय संसद की इच्छा से परिलक्षित होता है कि वह वर्ष 2003 में भारतीय तंबाकू नियंत्रण कानून को सर्वसम्मति से लागू करे; यह भारत सरकार द्वारा तंबाकू नियंत्रण के फ्रेमवर्क कन्वेंशन के लिए (2004 में) सदस्यता लेने से परिलक्षित होता है।

 

इसलिए, यदि ये सभी राष्ट्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो हम राष्ट्रीय हितों की सेवा कर रहे हैं।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 14 जनवरी 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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