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अगले 20 वर्षों में ग्रामीण रोज़गार योजना पर 52 मिलियन निर्भर

प्राची सालवे एवं सौम्या तिवारी,

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बजट 2016-17 में  महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), के लिए राशि में 14 फीसदी वृद्धि की गई है। इसके साथ ही विश्व की सबसे बड़ी रोज़गार गारंटी योजना, मनरेगा, ऑपरेशन के एक दशक बाद भी, भारत की टॉप गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम बनी हुई है।

 

मनरेगा, जो भारत के गांवों में अकुशल मजदूरों को 100 दिन काम की गारंटी देता है, कम से कम 52 मिलियन लोगों को रोज़गार देगा एवं उनके परिवार को आजीविका प्रदान करेगा। इंडियास्पेंड के विश्लेषण के अनुसार, इसका मतलब अगले बीस वर्षों के लिए करीब 260 मिलियन (एक परिवार में औसतन पांच सदस्य को ध्यान में रखते हुए) लोग इस कार्यक्रम पर निर्भर रहेंगे।

 

मनरेगा का व्यय, 2014-15 से 2016-17

 

 

ऊपर दिए गए टेबल से पता चलता है कि तीन वर्षों के दौरान नरेगा वित्त पोषण (फंडिंग) में 18 फीसदी की वृद्धि हुई है। पिछले वर्ष के विपरीत, जब दिसंबर तक कार्यक्रम ने अपनी राशि समाप्त कर दी थी, यह स्पष्ट नहीं है कि यदि इस पैसे समाप्त हो गए – जो होने की संभावना अधिक है – तो इस वर्ष क्या होगा।

 

वर्ष 2015-16 में, यदि मंत्रालय के पास पैसे समाप्त हो गए तो उनके लिए 5,000 करोड़ रुपए का बफर था लेकिन दिल्ली स्थित एक गैर सरकारी संगठन, पीपुल्स एक्शन  फॉर एंप्लॉयमेंट गारंटी की अरुणा रॉय निखिल के अनुसार दिल्ली ने केवल 20,000 करोड़ रुपए ही जारी किए थे।

 

इंडोनेशिया की आबादी से अधिक गरीब हैं भारत में

 

गरीबों एवं गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की पूर्ण संख्या  (तेंदुलकर गरीबी रेखा के अनुसार) में पिछले दो दशकों से गिरावट हो रही है, जैसा कि हमने पहले भी अपनी खास रिपोर्ट में बताया है।

 

लेकिन 270 मिलियन लोग अब भी गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। यह आंकड़े इंडोनेशिया की जनसंख्या (255 मिलियन) से भी अधिक है। गरीबी रेखा,शहरी क्षेत्रों में, प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 47 रुपये एवं ग्रामीण क्षेत्रों में 32 रुपये खर्च करने की क्षमता के रुप में परिभाषित किया गया है।

 

भारत में गरीबी

 

 

दो दशक में 260 मिलियन होगें निर्भर मनरेगा पर

 

पिछले दशकों में मनरेगा की उपलब्धियों के लिए सराहना की जा रही है। इस कार्यक्रम के तहत 277.9 मिलियन पंजिकृत श्रमिक हैं, एवं इनमें से 98.3 मिलियन सक्रिय कार्यकर्ता हैं। कार्यक्रम के तहत ग्रामीण परिवारों के सभी वयस्कों को शामिल किया गया है जिन्हें काम की तलाश है। मनरेगा के तहत “अकुशल शारीरिक श्रम” को शामिल किया गया है, जिससे रोज़गार की तलाश में हर व्यक्ति को अवसर प्रदान हो सकेगा।

 

कौशल के बिना, ग्रामीण क्षेत्रों में युवा भारतीयों को होगी मनरेगा की आवश्यकता

 

आने वाले वर्षों में कितने भारतीयों को रोज़गार की आवश्यकता होगी, यह गणना करने के लिए इंडियास्पेंड ने 2011 की जनगणना में दर्ज ग्रामीण अशिक्षित जनसंख्या का अध्ययन किया है। 16 से 30 वर्ष की आयु के बीच 51.7 मिलियन अशिक्षित युवा हैं। चूंकि शिक्षा के अधिकार, जो 14 साल की उम्र तक मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की गारंटी देता है, का लाभ यह नहीं उठा पाएंगे, यह आबादी भारत के कुशल श्रम बल का हिस्सा नहीं होगी। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की इस परिभाषा के अनुसार ‘कौशल’ के लिए कम से कम पांच साल की स्कूली शिक्षा अनिवार्य है। इसलिए, कम से कम 20 वर्षों के लिए, भारत के इस समूह के समर्थन के लिए मनरेगा की आवश्यकता होगी।   सतर्कता: यह 52 मिलियन (अमूमन) आबादी में केवल 2011 की जनगणना के अशिक्षित शामिल हैं। अशिक्षित जनसंख्या में कई ऐसे लोग शामिल हैं जिन्हें लिखना और पढ़ना आता है लेकिन उद्योग में काम करने के लिए पर्याप्त रुप से कुशल नहीं हैं।

 

बकाया मजदूरी, भ्रष्टाचार, सुस्त वित्त पोषण – मनरेगा की समस्याएं  
 

मनरेगा के आलोचकों का तर्क है कि भ्रष्टाचार और खराब कार्यान्वयन के कारण यह योजना गरीबी कम करने में मदद नहीं करता है। सुरजीत भल्ला ने हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में लिखा था, “यदि नीति बिंदु से देखा जाए तो हमें गरीबों को आय के हस्तांतरण की दक्षता में रुचि होनी चाहिए।” आईआईटी (दिल्ली) में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर ऋतिका खेड़ा, हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस के कॉलम में लिखती हैं कि मनरेगा के काम की कोई लागत लाभ के आकलन नहीं होने एवं कोई तकनीकी सहायता नहीं होने के साथ, कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों में संपत्ति या बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए संघर्ष कर रहा है। मनरेगा को धन की कमी है; वित्त मंत्रालय को ग्रामीण विकास मंत्रालय से मिले एक पत्र के अनुसार अपने बजट का 17 फीसदी पिछले वित्त वर्ष से मजदूरी और सामग्री के भुगतान में चला गया है। इस वर्ष मनरेगा के लिए वास्तविक आवंटन 29,000 करोड़ रुपए (4.6 बिलियन डॉलर)

 

कम है मनरेगा राशि

     
 
 

मनरेगा के लिए निचोड़ी गई यह राशि नई नहीं है, एवं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन II (यूपीए) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) दोनों की व्यवस्थाओं के तहत प्रत्यक्ष देखा गया है। लंबित देनदारियों के साथ वर्ष की समाप्ति, प्रभावी रूप से इसका मतलब है मजदूरों के वेतन अवैतनिक हैं, सुसंगत प्रवृत्ति की ओर इशारा करती है।

 
 

मनरेगा के बकाया बिल    
 

 

चालू वित्त वर्ष (2015-16) के लिए बजटीय आवंटन का कम से कम 95 फीसदी दिसंबर 30, 2015 तक समाप्त हो गया था।

 

इसके अलावा, ग्रामीण विकास मंत्रालय और वित्त मंत्रालय की गणना के अनुसार, मजदूरी और अन्य खर्चों के भुगतान के लिए राज्य सरकारों को कम से कम अतिरिक्त 6,300 करोड़ रुपए की आवश्यकता है।

 

ओडिशा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश के सूखा प्रभावित राज्य रोज़गार के 150 दिन प्रदान करेंगे –  सामान्य 100 दिन के विपरीत – लेकिन दिल्ली या उनके बजट में कोई अतिरिक्त पैसा स्पष्ट नहीं है।

 

मनरेगा के लिए जेटली का बजट शायद पर्याप्त नहीं

 

14 वें वित्त आयोग की हस्तांतरण सिफारिशों के तहत भारत के राज्यों और अधिक पैसा दिया गया है, साथ ही वे सामाजिक कल्याण के लिए कैसा वित्तपोषण के लिए चाहते हैं, इसके लिए भी अधिक शक्तियां दी गई हैं।

 

योजना आयोग ने 66 केन्द्र प्रायोजित योजनाओं को नीति आयोग (योजना आयोग की जगह लेने वाली बॉडी)  के तहत घटा कर 30 कर दिया है। मनरेगा उन 30 से ही एक है।

 

हालांकि केंद्र ने “हस्तांतरण” के तहत सामाजिक कल्याण को राज्यों को सौंप दिया है  ( शक्तियों का हस्तांतरण – वित्तिय या या प्रशासनिक – सरकार के उच्च स्तर से सरकार के निचले स्तर तक), यह महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के लिए भुगतान करेगी, जैसे कि नरेगा एवं ग्रामीण सड़कें।

 

जेटली ने अपने भाषण में कहा: “केंद्र के लिए परिणाम स्वरुप कम वित्तिय स्पेस के बावजूद सरकार ने कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनरेगा, और सड़कों सहित ग्रामीण बुनियादी ढांचे के रूप में महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का समर्थन जारी रखने का फैसला किया है।”

 

(सालवे एवं तिवारी इंडियास्पेंड के साथ नीति विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 2 मार्च 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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