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अन्य समुदायों की तुलना में आदिवासियों, दलितों और मुसलमानों की होती है जल्द मृत्यु

एलिसन सलदानहा,

Villageois,_Bathpura,_district_Gwalior_620

 

मुंबई: 43 वर्ष की आयु पर, आदिवासियों (अनुसूचित जनजातियों या एसटी) के लिए मृत्यु की औसत आयु सबसे कम थी, जिसका अर्थ है कि अन्य भारतीयों की तुलना में उनकी मृत्यु जल्द होने   संभावना अधिक है, जैसा कि एक नए अध्ययन में बताया गया है।

 

आदिवासियों के अलावा, यदि कोई भारत में सामाजिक सीढ़ी पर नीचे स्थित हैं, या दलित (अनुसूचित जाति) या मुसलमान हैं, तो कम उम्र में मरने का जोखिम है। आपका स्वास्थ्य  खराब हो सकता है और गैर-मुस्लिम ऊपरी वर्ग की तुलना में उनकी संबंधित स्वास्थ्य देखभाल के लिए कम पहुंच है, जैसा कि 10 मार्च, 2018 को ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ में प्रकाशित अर्थशास्त्री वानी कांत बरुआ द्वारा ‘कस्ट, रीलिजन एंड हेल्थ आउटकम्स इन इंडिया, 2004-14’ द्वारा विश्लेषण में पाया गया है।

 

एक दशक से 2014 तक, आदिवासियों को छोड़कर सभी सामाजिक समूह 2004 में लंबे समय से जीवित थे – 2004 से अनुसूचित जाति के लिए मृत्यु की औसत आयु घट गई है। पहले यह आयु 45 वर्ष थी।

 

दलित, जिनकी औसत उम्र 2004 में 42 थी, उनकी 2014 में छह साल ज्यादा जीने की संभावना थी, जैसा कि विश्लेषण में पाया गया है।

 

ऊपरी वर्गों के गैर-मुस्लिम परिवार,  2014 में 60 साल की मौत की औसत उम्र के साथ छह समूहों में सबसे लंबे समय तक जीवित रहते हैं, जो 2004 में रहे 55 साल से ज्यादा है। बरुआ लिखते हैं, “समूह सदस्यता के बारे में बात यह है कि भले ही यह स्वास्थ्य असमानता के पीछे प्राथमिक कारक नहीं हो सकता है लेकिन यह स्वास्थ्य असमानता का मुख्य कारण है। ” बरुआ आगे कहती हैं, असमानता उस व्यक्ति की असमानता को संदर्भित करती है जो किसी व्यक्ति को उनके नियंत्रण से परे कारकों के कारण पीड़ित होती है ।

 

भारत में अपनी स्वास्थ्य स्थिति निर्धारित करने में, एक व्यक्ति की आर्थिक और सामाजिक स्थिति की सापेक्ष भूमिका निभाती है यह मूल्यांकन करने के लिए बरूआ ने 2004 और 2014 से राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) डेटासेट का उपयोग किया है। एनएसएसओ “सामाजिक समूह” और “धर्म” श्रेणियों का संयोजन करके  परिवारों को छह समूहों में विभाजित किया गया है: आदिवासी जिनमें से 56 फीसदी हिंदू थे और 33 फीसदी ईसाई थे; दलित जिनमें से 93 फीसदी हिंदू थे; गैर-मुस्लिम अन्य पिछड़े वर्ग; मुस्लिम अन्य पिछड़े वर्ग; और गैर-मुस्लिम ऊपरी वर्ग।

 

सामाजिक वर्ग के अनुसार भारत में मृत्यु के समय औसत आयु, 2004 और 2014

गैर-सामाजिक समूह चर में ( जाति और धर्म से संबंधित श्रेणियां ) एक मजदूर का औसत जीवन (45.2 वर्ष) गैर-मजदूर (48.4 वर्ष) की तुलना में तीन साल से कम था, जैसा कि विश्लेषण में पाया गया है। इसी प्रकार, ‘पिछड़े’ या कम विकसित राज्य में रहने से ‘आगे’ या अधिक विकसित राज्य (51.7 वर्ष) में रहने वालों की तुलना में सात साल से अधिक की मृत्यु (44.4 वर्ष) की औसत आयु कम हो गई है।

 

आदिवासियों द्वारा खराब स्वास्थ्य की रिपोर्ट करने की संभावना कम; मुस्लिमों में संभावना सबसे अधिक

 

अन्य सामाजिक समूह की तुलना में आदिवासियों की जल्दी मृत्यु होने के बावजूद उनमें से कम ही लोगों ने महसूस किया कि वे बीमार थे या उनका स्वास्थ्य खराब था। यह आंकड़ा मात्र 24 फीसदी है। हालांकि बीमारों लोगों के द्वारा बीमारी की रिपोर्ट करने वाली संख्या 2004 से 19 फीसदी बढ़ी है, जैसा कि अध्ययन में बताया गया है। अध्ययन में सामाजिक समूहों में वरिष्ठ नागरिकों (60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के) के बीच वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति की धारणा पर एनएसएसओ डेटा का भी विश्लेषण किया गया है। गैर-मुस्लिम ऊपरी वर्ग समूह के लोगों में यह समान था, जो 2004 (23 फीसदी) के बाद से कम ही बदला है।

 

स्थिति में इन लोगों को बेहतर, बहुत अच्छे, ठीक, या खराब स्वास्थ्य में बताया गया है, जो अध्ययन को खराब स्वास्थ्य (पीपीपीएच) की अनुमानित संभावना की गणना करने की अनुमति देता है।

 

अधिकतर खराब स्वास्थ्य में होने की रिपोर्ट करने वाले ( 35 फीसदी ) मुस्लिम थे ( ओबीसी और ऊपरी वर्ग दोनो ), जैसा कि डेटा में बताया गया है।

 

अध्ययन में पाया गया कि पुरुषों (24 फीसदी) की तुलना में अधिक महिलाएं (28 फीसदी) खराब स्वास्थ्य में हैं।

 

सामाजिक वर्ग के अनुसार खराब स्वास्थ्य की धारणा

गैर-सामाजिक समूहों में, अनुमानित पीपीएच उन स्व-नियोजित या कमाई नियमित वेतन (26 फीसदी) पाने वाले लोगों के मुकाबले में ‘मजदूर’ परिवारों (29 फीसदी) में व्यक्तियों के लिए काफी अधिक था, अध्ययन में पाया गया है।

 

2014 में, शहरी इलाकों में लोग अपने ग्रामीण समकक्षों (25.3 फीसदी) की तुलना में खराब स्वास्थ्य (28.7 फीसदी) में होने की रिपोर्ट करने की अधिक संभावना रखते थे, हालांकि यह एक दशक पहले नहीं था जब ग्रामीण (24.3 फीसदी) और शहरी (24.5 फीसदी) निवासियों ने समान विचार साझा किया है।

 

इसके अलावा, “पिछड़े राज्यों” ( 29.2 फीसदी ) की तुलना में “आगे के राज्यों” (24.2 फीसदी) में कम व्यक्ति खराब स्वास्थ्य में होने की रिपोर्ट करने की संभावना रखते थे, जैसा कि विश्लेषण में बताया गया है।

 

गरीब, एकल व्यक्ति द्वारा खराब स्वास्थ्य की रिपोर्ट करने की अधिक संभावना

 

अध्ययन में पाया गया कि पीपीएच के लेखा-जोखा में व्यक्ति के घर की आर्थिक परिस्थितियों ने भी भूमिका निभाई है।

 

उच्चतम संपत्ति श्रेणी (25.4 फीसदी) के परिवारों के व्यक्तियों की तुलना में सबसे निचले दो संपत्ति श्रेणियों से संबंधित परिवारों में व्यक्तियों की खराब स्वास्थ्य में होने की रिपोर्ट करने के लिए काफी अधिक संभावना थी (दोनों के लिए 27 फीसदी से अधिक), जैसा कि एनएसएसओ डेटा से पता चलता है

 

अन्य प्रकार की शौचालयों तक पहुंच या कोई शौचालय (27.9 फीसदी) तक पहुंच होने वाले व्यक्तियों की धारणा की तुलना में घर में फ्लश या सेप्टिक टैंक शौचालय तक पहुंच अनुमानित पीपीएच (24.6 फीसदी) कम करती है, जैसा कि अध्ययन में पाया गया है।

 

इसी प्रकार, अन्य ईंधन प्रकारों (27.8 फीसदी) की तुलना में गैस या बिजली (24.4 फीसदी) के साथ खाना पकाने से पूर्वानुमानित पीपीएच में काफी कमी आई है।

 

पीपीएच निर्धारित करने में व्यक्तिगत विशेषताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका

 

उदाहरण के लिए, एकल, विधवा या तलाकशुदा लोगों की तुलना में विवाहित व्यक्तियों के लिए पीपीएच का अनुमान कम था। जैसा कि अध्ययन में बताया गया है। अध्ययन में यह भी बताया गया कि  अशिक्षित व्यक्तियों (27.9 फीसदी) की अनुमानित पीपीएच स्नातक (18.3 फीसदी) की तुलना में काफी अधिक था।

 

(सलदानहा सहायक संपादक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्राजी में 12 अप्रैल 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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