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असफल सिंचाई योजना के लिए 13 बिलियन डॉलर, किसानों को मिलेगी राहत?

अभिषेक वाघमारे,

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इंडियास्पेंड के विश्लेषण के अनुसार, अधूरी सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने के लिए, दो दशक पुरानी सेंट्रल कार्यक्रम, 66 मिलियन (या 660 लाख) किसानों के लिए विफल रहा है, साथ ही 350 मिलियन (या 3500 लाख) भारतीयों के आर्थिक प्रगति को भी धीमा किया है।

 

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पिछले महीने अपने बजट भाषण में कहा है कि, अगले पांच वर्षों में, 80 मिलियन हेक्टर खेती की भूमि की सिंचाई के लिए, सरकार 86,500 करोड़ रुपए (या 12.7 बिलियन डॉलर) खर्च करेगी।

 

इसका मतलब है कि, आज़ादी के बाद 69 वर्षों में जितनी सिंचाई हुई है उससे भी अधिक सिंचाई अगले पांच वर्षों में सरकार करने का वादा कर रही है। 2014 में जारी कृषि आंकड़ों के अनुसार, 140 मिलियन हेक्टर में से केवल 65 मिलियन (6.5 करोड़)  या 46 फीसदी भारतीय खेत सिंचित है। हालांकि, विश्व बैंक 36 फीसदी भारतीय खेत सिंचित होने की रिपोर्ट करता है।

 

जेटली, त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (एआईबीपी) पर 86,500 करोड़ रुपए खर्च करने का विचार कर रहे हैं – चौगुना वर्षिक खर्च – त्‍वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम-1996-97 में ऐसे राज्‍यों को ऋण सहायता उपलब्‍ध कराने के लिए शुरू किया गया था जिनकी अधूरी वृहद्/मध्‍यम सिंचाई परियोजनाएं पूरी होने के अग्रिम चरणों में थीं। जल संसाधन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में, 1997 से, एआईबीपी पर कम से कम 72,000 करोड़ रुपए (10.5 बिलियन डॉलर) खर्च किए गए हैं। केंद्रीय जल आयोग 2015 तक 53,000 करोड़ रुपए खर्च होने की रिपोर्ट करती है।

 

एआईबीपी के हमारे विश्लेषण से कई विफलताओं का पता चलता है, कुछ ऐसा है जो इसके वास्तुकार हाल ही में स्वीकार करते हैं।

 

योगेंद्र के अलघ, गुजरात के केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति ने पिछले हफ्ते पत्रिका आउटलुक में लिखा है कि, “मुझे एआईबीपी से प्यार है, 1990 के दशक में योजना मंत्री के रूप में मैंने इसे तैयार किया है। लेकिन, इस सदी की शुरुआत में हमने एक सवाल पूछा: इस योजना के काम न करने का क्या कारण है?  बारवीं योजना कहती है कि, हमें इसका जवाब नहीं पता और हमें इसका जवाब पता करना है। वित्त मंत्री को इसका जवाब पता लगाने के लिए अच्छी सलाह दी जाएगी।”

 

एक असफल सिंचाई कार्यक्रम पर जेटली डाल रहे हैं पैसे

 

लक्ष्य का केवल 28 फीसदी पूरा हुआ: वर्ष 2008 तक 34,000 करोड़ रुपए (5 बिलियन डॉलर) खर्च हुआ है, एआईबीपी, 19 मिलियन हेक्टर सिंचाई के निर्धारित लक्ष्य में से पांच मिलियन से अधिक सिंचाई नहीं कर पाया है – जो कि 29 फीसदी है – यह आंकड़े, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग), केन्द्रीय सरकार के लेखा परीक्षक के इस ऑडिट रिपोर्ट (2010) में सामने आए हैं।  ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2014 तक, एआईबीपी परियोजनाओं द्वारा 9.5 मिलियन (95 लाख) हेक्टर सिंचित किया गया है।

 

सिंचाई क्षमता 55 प्रतिशत अंक गिरा: कैग के अनुसार, सिंचाई की दक्षता – निर्मित क्षमता के प्रतिशत के रुप में भूमि को वास्तविक दिया गया पानी – सातवीं योजना (1985-1990) के दौरान 84 फीसदी से गिर कर  ग्यारहवीं योजना (2007-2011) के दौरान 29 फीसदी हुआ है।

 

निर्मित क्षमता में से केवल 33 फीसदी खेत को मिला पानी: आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 कहती है कि  2007 से 2011 के दौरान एआईबीपी द्वारा बनाई सिंचाई क्षमता में से केवल एक तिहाई खेत को वास्तविकता में पानी मिला है।

कैग रिपोर्ट के अनुसार, “त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम, बड़ी सिंचाई परियोजनाओं और किसानों को सिंचाई के पानी के लाभों के वितरण की गति के लक्ष्य को पूरा करने में विफल रहा है।”

 

जेटली का एआईबीपी पर वार्षिक खर्च चौगुना करने का इरादा

 

वित्त मंत्री ने एआईबीपी के लिए 86,500 करोड़ रुपए (12.7 बिलियन डॉलर) की घोषणा की है, अगले पांच वर्षों में एआईबीपी पर वर्षिक खर्च चौगुना, पिछले दो दशकों से प्रति वर्ष 3,650 करोड़ रुपए से अगले पांच वार्षों तक प्रति वर्ष 17,300 करोड़ रुपए होगा।

 

एआईबीपी परियोजनाओं पर खर्च

 

AIBPSpendingfinal

Source: Water Resources Ministry; Union Budget 2016-17.

 

2016-17 के लिए बजट में सिंचाई के लिए अलग 7,308 करोड़ रुपए निर्धारित किया गया है – एआईबीपी के लिए 1,877 करोड़ रुपए, सूक्ष्म सिंचाई के लिए 2,340 करोड़ रुपए, जल प्रबंधन के लिए 1,500 करोड़ रुपए, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण लिए 1023 करोड़ रुपए और अन्य खर्च के लिए 568 करोड़ रुपए । जेटली की एआईबीपी लक्ष्य को पूरा करने के लिए, उनकी सरकार को अगले दो साल में खर्च को ऊंची उड़ान भरने की आवश्यकता होगी।

 

एआईबीपी ने वास्तव में सिंचाई की दक्षता को धीमा किया है।

 

त्वरित कार्यक्रम से सिंचाई हुई धीमी

 

एआईबीपी 1996-97 में 500 करोड़ रुपए के साथ शुरु किया गया था। तीन वर्षों में, 2000 तक सिंचाई पर गैर एआईबीपी खर्च 700 करोड़ रुपए तक किया गया है जबकि अकेले एआईबीपी पर 1,440 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।

 

7,600 करोड़ रुपये की राशि के साथ, केंद्र सरकार द्वारा सिंचाई पर कुल खर्च 10,000 करोड़ रुपए पार होने के साथ, 2008-09 में एआईबीपी चोटी पर पहुंचा था।

 

दो दशक में, सिंचाई योजनाओं पर खर्त (करोड़ रुपए)

 

Source: Union Budgets of India; Figures in Rs crore.

 

Note: IWMP – Integrated Watershed Management Programme aims to restore the ecological balance by harnessing, conserving and developing degraded natural resources such as soil, vegetative cover and water; Non-plan spending majorly includes administrative and salary expenses.

 

हर पांच साल की योजना के साथ, सिंचाई क्षमता के बीच अंतर में निरंतर वृद्धि हुई है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है।

 

आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार, वृद्धि के बजाए, एआईबीपी की शुरुआत के बाद सिंचाई के उपयोग में गिरावट हुई है।

 

एआईबीपी के पहले और बाद में सिंचाई उपयोगिता

 

Source: Economic Survey 2015-16 of India; Report:Raising Agricultural Productivity and Making Farming Remunerative for Farmers, NITI Aayog.

 

सातवीं और आठवीं योजना के दौरान, सिंचाई क्षमता का उपयोग – उत्पन्न सिंचाई क्षमता के प्रतिशत के रुप में खेती के लिए उपयोग किया गया पानी – 85 फीसदी था, नौंवी योजना में 50 फीसदी तक गिरावट हुई, दसवीं योजना में 70 फीसदी एवं ग्यारवीं योजना में 29 फीसदी गिरावट हुई है। आर्थिक दर्शन के रुप में योजना अब खारिज कर दिया गया है।

 

सिर्फ कैग ने ही एआईबीपी की क्षमता में गिरावट की ओर इशारा नहीं करता है; वित्त आयोग की रिपोर्ट भी इस ओर इशारा करती है।

 

वित्त आयोग कि रिपोर्ट के अनुसार, “दसवीं पंचवर्षीय योजना (2007) के अंत में, संचयी सिंचाई क्षमता उपयोग करीब 84 फीसदी था। इसके बाद, विशेष रुप से 1990 के बाद से इसमें गिरावट हुई है।” 2012 के अंत में, यह दक्षता 77 फीसदी से नीचे थी।

 

इस बीच, भारतीय किसान कर रहा है पानी का इंतज़ार

 

2014 तक, शुरु की गई 294 एआईबीपी परियोजनाओं में से करीब 142 पूरे हैं। कई परियोजनाएं लागत में वृद्धि के कारण समस्या में हैं और कई परियोजनाएं पिछले दो दशकों से निर्माणाधीन हैं। कैग रिपोर्ट के अनुसार, सिंचाई क्षमता सृजित किए जाने के बाद भी – कुछ बांधों का निर्माण हुआ है – नहरों का निर्माण करने में नाकाम रहने से, जिनसे वास्तविक रुप में खेतों तक पानी पहुंचता, राज्यों में प्रगति रुकी है।

 

आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार अनुचित संचालन और रखरखाव, अधूरी नहरों, फसल पद्धति में उल्लंघन, और अन्य प्रयोजनों के लिए सिंचित भूमि के परिवर्तन से उपयोग किया सिंचाई नलिका में – पिछले 15 वर्षों में – 55 प्रतिशत बिंदु की गिरावट हुई है।

 

भारत में 138 मिलियन किसानों (या 1380 लाख) में से 66 मिलियन (या 660 लाख) अनिश्चित वर्षा पर निर्भर करते हैं। मध्य भारत में चरम वर्षा की घटनाएं, मानसून प्रणाली का मूल, बढ़ रही है और मध्यम वर्षा में कमी हो रही है – स्थानीय और विश्व मौसम में जटिल परिवर्तन के भाग के रूप में –  भारतीय और ग्लोबल अध्ययन पर इंडियास्पेंड द्वारा की गई समीक्षा से पता चलता है।

 

हालांकि, एआईबीपी में केंद्र सरकार से पैसे के प्रवाह में वृद्धि हुई है, लेकिन किसान पानी से वंचित रहे हैं।

 

2010 की कैग ऑडिट रिपोर्ट कहती है, “ताज़ा परियोजनाएं लेने की बजाए, मौजूदा परियोजनाओं के पूरा होने पर ध्यान केंद्रित करके सरकार को एआईबीपी के लक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करने की जरूरत है। साथ ही नई क्षमता का निर्माण करने के बजाए पहले से ही निर्माण की गई क्षमता का उपयोग सुनिश्चित करने की आवश्यकता है ताकि निवेश की गई बड़ी राशि का उत्पादक उपयोग किया जाए।”

 

सिंचाई का महत्व बढ़ रहा है, जैसा कि अक्टूबर से दिसंबर 2015 तिमाही में भारत की कृषि विकास में 1 फीसदी संकुचित हुई है, और वित्त वर्ष 2015-16 में केवल 1.1 फीसदी बढ़ी है (अग्रिम अनुमान है, नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के एक्सट्रपलेशन के द्वारा प्राप्त); एक के बाद एक पड़ने वाला सूखा, जो 30 वर्षों में सबसे बद्तर है; सर्दियों (रबी) फसल की बुआई 60 मिलियन हेक्टेयर नीचे हुआ है, चार वर्षों में सबसे खराब; और देश भर में हज़ारों किसानों ने आत्महत्या किया है।

 

एआईबीपी – महाराष्ट्र का मामला
 

महाराष्ट्र में त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम के द्वारा समर्थित 252 सिंचाई परियोजनाएं है –  किसी भी अन्य राज्य के मुकाबले सबसे अधिक। 2012 तक, उनमें से केवल 138 पूरी हुई हैं। 12.2 लाख हेक्टेयर की सिंचाई के लक्ष्य के साथ, 2014 तक, महाराष्ट्र केवल 6.5 लाख हेक्टेयर की सिंचाई कर पाया है। निर्मित सिंचाई क्षमता निर्धिरित लक्ष्य से 50 फीसदी कम है, और इसका उपयोग इससे भी बद्तर है, जिसका मतलब है, अंत में बांध बन सकता है (या नहीं भी बन सकता है) पानी बहुत कम प्राप्तकर्ताओं तक पहुंचता है।

 

कुल मिलाकर, महाराष्ट्र में 1,845 बड़े बांध है, गुजरात, कर्नाटक और मध्य प्रदेश को छोड़कर, 25 राज्यों में कुल से अधिक है। राज्य के सिंचाई परियोजनाओं पर 2014 की यह कैग रिपोर्ट कहती है,  एआईबीपी की विफलताओं के अलावा, 3712 पूरा/ चल रही परियोजनाओं के बावजूद (98 प्रमुख, 259 मध्यम और 3355 लघु सिंचाई परियोजनाओं), 2011 में, महाराष्ट्र के जल- संसाधन विभाग का सिंचाई लक्ष्य 50 फीसदी कम पूरा हुआ है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार, “66 लाख हेक्टर की नियोजित सिंचाई क्षमता एंव राज्य में बनाए गए क्षमता का 48.26 लाख हेक्टेयर के खिलाफ, जून 2012 तक सिंचाई क्षमता का उपयोग केवल 32.51 लाख हेक्टेयर था, यानि कि नियोजित क्षमता का 50 फीसदी।”

 

 

(वाघमारे इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 14 मार्च 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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