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आधार का लाभ साफ नहीं: आरबीआई शोधकर्ता

स्वागता यदवार,

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भारत की बायोमेट्रिक्स आधारित राष्ट्रीय पहचान प्रणाली ‘आधार’ के लाभ अस्पष्ट हैं और गरीबों के लिए इसके प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के प्रभाव का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की शाखा द्वारा प्रकाशित एक नए अध्ययन के निष्कर्ष में ये बात सामने आई है।

 

‘बॉयोमीट्रिक एंड इट इंपैक्ट इन इंडिया’ शीर्षक से अक्टूबर 2017 संस्करण में प्रकाशित अध्ययन स्टाफ पेपर्स श्रृंखला का हिस्सा था। यह बैंकिंग टेक्नोलॉजी (आईडीआरबीटी) में विकास और अनुसंधान संस्थान के एक सहायक संकाय एस अनंत द्वारा लिखा गया है, जो कि आरबीआई द्वारा एक स्वायत्त संस्थान के रूप में स्थापित किया गया था।

 

आधार, अपने साथ जुड़े कार्यक्रमों की बढ़ती संख्या के साथ, भारत की सार्वजनिक नीति का केंद्र बनता रहा है और इसका दायरा लगातार बढ़ रहा है। इसकी शुरूआत के सात साल के बाद, 1.12 बिलियन भारतीय या 88.2 फीसदी आबादी ने आधार के लिए खुद को नामांकित किया है। इस बारे में  इंडियास्पेंड की मार्च 2017 की रिपोर्ट को देखा जा सकता है।

 

आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ और सेवाओं का लक्ष्यित वितरण) अधिनियम, 2016 के तहत भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) द्वारा स्थापित, राज्यों द्वारा आधार अब प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्रों में खाद्यान्नों और आवश्यक वस्तुओं ( सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस)  के तहत ) के वितरण के लिए उपयोग किया जाता है। इसमें आधार-सक्षम भुगतान प्रणाली से जुड़े विभिन्न भुगतान शामिल हैं।

 

सर्वोच्च न्यायालय ने 31 मार्च 2018 तक विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के साथ आधार जोड़ने की समय सीमा भी बढ़ा दी है।

 

इस नए अध्ययन ने आधार से संबंधित मुद्दों को खंगाला है- जैसे सबसे कमजेर वर्ग तक पहुंच की समस्याएं, प्रमाणीकरण की गुणवत्ता, अस्पष्ट वित्तीय लाभ और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के मुद्दे। कहा गया है कि जिस तरीके से सरकार अधिक आर्थिक कार्यक्रमों और आधार के साथ गतिविधियों को जोड़ रही है, उसमें बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है।

 

इसकी स्थापना के बाद से, आधार कई बहसों में पड़ा है, खासकर नागरिकों के गोपनीयता के अधिकार और सूचना के सार्वजनिक हो जाने के खतरे के मुद्दे पर।  इन विवादों में से नवीनतम ‘द ट्रिब्यून’ में 3 जनवरी, 2018 में छपी एक तहकीकात संबंधी रिपोर्ट है। इसमें आरोप लगाया गया है कि एक अरब से अधिक आधार संख्या के विवरण के लिए अप्रतिबंधित पहुंच, 500 रूपए से कम में खरीदा जा सकता है।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि 300 रुपए अतिरिक्त का भुगतान करके, किसी आधार कार्ड का ब्योरा छपाया जा सकता है। यूआईडीएआई क्षेत्रीय अधिकारी चंडीगढ़ के उप निदेशक का कहना है कि “यह एक बड़ी सुरक्षा चूक है।”

 

‘साइबर अपराधियों के लिए यह हो सकता है लक्ष्य’

 

यूआईडीएआई के लिए डेटा की सुरक्षा यूआईडीएआई के लिए एक बड़ी चुनौती है। पेपर में कहा गया है कि, “भारत के इतिहास में पहली बार आधार के लिए धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि अब साइबर अपराधियों और भारत के बाहरी दुश्मनों के लिए आसानी से एकमात्र उपलब्ध लक्ष्य है”।

 

 यूआईडीएआई के आंकड़ों पर कोई भी हमले भारतीय व्यवसायों और प्रशासन को अपनाना पड़ सकता है और इसके परिणामस्वरूप देश की अर्थव्यवस्था और उसके नागरिकों की गोपनीयता को बहुत नुकसान होगा।

 

साथ ही, चूंकि कई लेन-देन के लिए आधार की आवश्यकता होती है, यह बड़ी संख्या में सेवा प्रदाताओं के डेटाबेस में उपलब्ध है और किसी भी उल्लंघन से संबंधित जानकारी में समझौता किया जा सकता है। यूआईडीएआई, आधार के आसपास निजी पेशेवरों को एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की अनुमति देता है, जो डेटाबेस की सुरक्षा के बारे में सवाल उठाता है।

 

दिसंबर, 2017 में, यूआईडीएआई ने नए खातों को खोलने से ‘भारती एयरटेल’ और ‘एयरटेल पेमेंट बैंक’ पर रोक लगा दी थी। यह पाया गया कि एयरटेल ने अपने ग्राहकों के भुगतान संबंधी बैंक खातों को सूचित सहमति के बिना खोलने के लिए आधार-आधारित सत्यापन का इस्तेमाल किया। आरोप हैं कि ये खाते एलपीजी सब्सिडी प्राप्त करने के लिए जुड़े थे। आधार विधेयक के उल्लंघन के लिए यूआईडीएआई ने कोई दंडनीय कार्रवाई नहीं की थी।

 

यह पेपर निर्माण और एकत्रित किए जाने वाले बड़े पैमाने पर डेटा के उपयोग और दुरुपयोग पर एक अधिक मजबूत और व्यापक कानून की बात करता है।

 

सबसे कमजोर वर्ग तक पहुंच से जुड़ी समस्याएं

 

स्थापना के बाद से, वित्तीय समावेशन आधार के लक्ष्यों में से एक था लेकिन अनंत के अनुसार बायोमेट्रिक समाधान वादा पर लंबा और वितरण पर कम होने की संभावना है।

 

यह साबित करने के लिए पेपर ने अविभाजित आंध्र प्रदेश का उदाहरण उद्धृत किया है। यह राज्य विभिन्न स्कीमों को मैप करने वाले विभिन्न डेटाबेस बनाकर प्रशासनिक उपकरण के लिए बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण कार्यक्रम पर जाने वाले पहले राज्यों में से एक था। यह 2002 से शुरू हुआ और 2014 तक, राज्य ने स्व-सहायता समूहों, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, पेंशन, छात्र छात्रवृत्ति, विकलांगता लाभ, स्वास्थ्य बीमा और अन्य के साथ मैप किया था।

 

लेकिन आधार के इस्तेमाल पर अनिवार्य किए गए ‘ नो योर कस्टमर ‘ (केवाईसी) के कारण उन लोगों के लिए बैंकिंग पहुंच में एक बाधा हो रही है, जो आंध्र प्रदेश में पहले की प्रणाली के साथ पंजीकृत थे।

 

आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में, 2010 से 2013 के बीच जिन्होंने खाते खोले हैं, उन्हें अब पहुंच की समस्याएं हो रही हैं, जैसा कि बैंक के संवाददाता (एजेंट जो बैंककिंग क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाएं प्रदान करते हैं) बताते हैं। बैंकों ने उन लोगों तक पहुंच रोक दी है जिन्होंने अपना आधार नंबर नहीं जमा कर दिया है।

 

पहुंच की कमी के कारण ग्राहकों को असुविधा हुई है, जिन्हें विभिन्न प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के लिए खाते की जरूरत है। आधार के साथ न जोड़ने के कारण बैंकों द्वारा बंद खातों के मामले में पैसा सरकारी एजेंसियों में वापस आ गया है। इसके बाद ग्राहक को दूसरे बैंक में एक नया बैंक खाता खोलना होगा और फिर योजना के तहत पंजीकृत अपने बैंक खाते के नंबर को बदलने के लिए विभिन्न सरकारी कार्यालयों में चक्कर लगाना होगा।

 

पेपर में कहा गया है, “गैर-कार्यशील चैनलों या केवाईसी अनुपालन के कारण, लोगों को समस्या उस समय हुई, जब उन्हें पैसे की सबसे ज्यादा जरूरत थी। अब लोगों को लगता है कि उनके पैसे के लिए सबसे अच्छी जगह उनकी पॉकेट या घर में गद्दे के नीचे है।”

 

इसके अलावा जिन व्यक्तियों के पास बैंक खाता नहीं था, उनके लिए शून्य बैलेंस में खाते खोल दिए गए  और इससे साधारण बैंक खाते के बीच एक महत्वपूर्ण असमानता सामने आई। वित्तीय समावेशन खातों वाले ग्राहकों को गैर-घरेलू शाखाओं से अपने खातों तक पहुंच की अनुमति नहीं है, लेकिन नियमित खाते हैं।

 

लागत-लाभ विश्लेषण में विरोधाभास

 

पेपर में कहा गया है कि आधार पर लागत और लाभ के विश्लेषण में विरोधाभास है। सार्वजनिक वित्त और नीति के राष्ट्रीय संस्थान द्वारा प्रस्तुत एक पत्र में, सरकार दावा करती है कि आज तक उसने डीबीटी योजनाओं के माध्यम से आधार का इस्तेमाल करके 14,672 करोड़ रुपए बचाए हैं। लेकिन कनाडा के एक गैर लाभकारी संस्थान , इंटरेश्नल इन्स्टिटूट ऑफ सस्टैनबल डेवलप्मेंट ने दावा किया है कि सरकार को 97 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।

 

क्या सब्सिडी वितरण की व्यवस्था में बदलाव ( नकदी हस्तांतरण के लिए मूर्त वस्तुओं और सेवाओं को उपलब्ध कराने के मौजूदा अभ्यास से ) से वास्तव में गरीबों को मिलेगा लाभ? पेपर के अनुसार, “कोई ठोस जवाब नहीं है। यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभार्थियों के लिए असुविधाएं पैदा कर सकता है और गरीब (एसआईसी) पर डीबीटी के दीर्घकालिक लाभ अभी तक काफी हद तक समझे नहीं जा सके हैं। अधिकांश उम्मीदें सैद्धांतिक मान्यताओं पर आधारित हैं। “

 

बॉयोमीट्रिक प्रमाणीकरण में गुणवत्ता की समस्या

 

आधार अधिनियम सरकार को सब्सिडी, लाभ या सेवाओं के वितरण की शर्त के रूप में नागरिक की पहचान स्थापित करने की अनुमति देती है। ऐसे मामलों में, बॉयोमीट्रिक प्रमाणीकरण सरकार को वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचने की अनुमति देता है।

 

लेकिन इसके लिए, बायोमैट्रिक प्रमाणीकरण प्रणाली को निर्दोष होना चाहिए, जो भारत में वर्तमान में ऐसा नहीं है। आंध्र प्रदेश के यूआईडी डेटा के मुताबिक, जनवरी से जून 2017 के बीच बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण में विफलताएं आधे से 7.14 फीसदी से घटकर 3.56 फीसदी हो गई हैं। हालांकि जनवरी में प्रमाण की संख्या में 61 फीसदी गिरावट दर्ज की गई थी।

 

आधार किसी लाभार्थी को किसी भी स्थान पर पीडीएस जैसे लाभों का उपयोग करने की अनुमति देता है, भले ही वह पंजीकृत न हो। लेकिन उच्च स्तर के प्रवासन वाले जिलों में इस प्रावधान में एक उच्च असफलता दर का पता चला है।

 

गांव में जब बहुत प्रवासी और गैर-प्रवासी-मौजूद थे, तब प्रमाणीकरण की असफलता सबसे अधिक देखी गई। बायोमेट्रिक सिस्टम में ये खामियां सवाल उठाती हैं कि क्या आधार पंजीकृत होने पर सरकार नागरिकों को लाभ दे सकती है।

 

अध्ययन में कहा गया है, “संग्रहित बॉयोमीट्रिक्स की गुणवत्ता का सत्यापन करने का कोई रास्ता नहीं है, खासकर उस व्यक्ति द्वारा जिसने नामांकन किया है”।

 

पेपर में कहा गया है कि, सबसे बुरी स्थिति तब होती है जब एक दोषपूर्ण बॉयोमीट्रिक प्रमाणीकरण प्रणाली  में ‘पहचान अस्वीकृति’ का मामला सामने आता है, जिसमें एक व्यक्ति अपनी पहचान से वंचित रह जाता है।

 

यह भी मानते हुए कि केवल 5 फीसदी भारतीयों को आधार के मुद्दे के कारण सरकारी लाभ नहीं दिए गए हैं, हम अभी भी 50 मिलियन नागरिकों को देख रहे हैं, जैसा कि अद्ययन में बताया गया है। यह कई यूरोपीय देशों की जनसंख्या से अधिक है। पेपर के लेखक सवाल उठाते हैं, “क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि अल्पसंख्यक का बहिष्कार एक लोकतांत्रिक समाज में सम्मिलित हो रहा है?”

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 9 जनवरी 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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