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आप योजना बनाकर मुंबई की बाढ़ से निपट लें, या फिर कंधे उचकाकर कहें कि ये ‘मुंबई का जज्बा’ है!

मुक्ता पाटिल,

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तूफान इरमा ने बहुत से राष्ट्रों को तबाह कर दिया है। बिहार में लगभग 17 मिलियन लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। समुद्र के तापमान में वृद्धि के कारण तूफान और बड़े आएंगे और कई बार आएंगे। सागर का स्तर बढ़ रहा है, और जंगल में लगने वाली आग में वृद्धि हो रही है। भारी बारिश की घटनाएं, जैसा कि भारत ने अभी सामना किया है, और बढ़ेंगी। मौसम की भविष्यवाणी करना मुश्किल हो सकता है।

 

लेकिन यह आज की बात है।

 

1990 के दशक में, जब जलवायु परिवर्तन एक नया विचार था, तब एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘इंटरगवर्मेंटनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज’ (आईपीसीसी) अपनी दूसरी आकलन रिपोर्ट में यह  साबित करने वाला पहला संगठन था कि ” साक्ष्य की एकरूपता वैश्विक जलवायु संतुलन पर स्पष्ट रूप से मानवीय प्रभाव को दिखाते हैं।”

 

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कृष्णा अचुता राव अब 53 वर्ष के हैं। राव अमेरिका के ब्रेकले में लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी में काम करने वाले 40 वैज्ञानिकों में से एक थे, जिन्होंने लगातार रिपोर्टों के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके लिए वर्ष  2007 में उन्हें यूएस के पूर्व राष्ट्रपति अल गोर के साथ नोबेल शांति पुरस्कार मिला है।

 

मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर के बाद अचुताराव आगे अपनी पीएचडी के दौरान जलवायु का अध्ययन करने तुलाने विश्वविद्यालय गए। वह लिवरमोर में एक पोस्ट-डाक्टरल रिसर्च वैज्ञानिक थे।  उन्होंने शोध वैज्ञानिक के रूप में वर्ष 2007 तक जलवायु मॉडलिंग पर काम करना जारी रखा। वह दिल्ली के आईआईटी में वायुमंडलीय विज्ञान केंद्र में सहयोगी प्रोफेसर भी रहे हैं।

 

राव की दिलचस्पी डांस में भी है। हालांकि, उनका कहना है कि उनके लिए नृत्य कल की बात हो चुकी है। लेकिन अचुताराव एक प्रमाणित जीडेको नर्तक हैं। यह लुइसियाना की संगीत की एक शैली है, जिसमें अकॉर्डियन और गिटार बजते हैं।  जब वह काम नहीं कर रहे होते तो वे पढ़ना और क्रिकेट देखना पसंद करते हैं।

 

इंडियास्पेंड के साथ एक साक्षात्कार में, अचुताराव ने जलवायु मॉडलिंग के बारे में अपने काम पर विस्तार से चर्चा की। उनकी बातचीत में हम आज की दुनिया के भविष्य के बारे में बहुत सी बातें जान सकते हैं, जो दुनिया अभी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए संघर्ष कर रहा है।

 

वर्ष 1995 में, आईपीसीसी की दूसरी आकलन रिपोर्ट कहती है कि वायुमंडलीय ग्रीनहाउस गैसों में महत्वपूर्ण वृद्धि के लिए बड़े पैमाने पर मानव गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। जैसे जीवाश्म ईंधन का उपयोग, भूमि उपयोग में परिवर्तन और कृषि की पद्धति। मानव गतिविधियों के कारण जलवायु परिवर्तन के बारे में आज हम कितना जानते हैं?

 

पहले केवल तापमान के मुद्दे पर बात हुई थी।  तब से, और आज से 20 साल पहले मानवीय गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराया गया है। इसमें हवा, पानी के पैटर्न, समुद्र के स्तर में वृद्धि, दुनिया के कुछ हिस्सों में बर्फ गायब होने, जल वाष्प में परिवर्तन आदि शामिल हैं। फिर भौतिक जलवायु परिवर्तन के माध्यमिक पारिस्थितिक तंत्र प्रभाव का एक पूरा ब्योरा है, जैसे कि पक्षियों को पलायन करना, कुछ पौधों की प्रजातियों का उच्च अक्षांशों की ओर पलायन करना। इन सभी के लिए मानवीय कारणों को जिम्मेदार ठहराया गया है।

 

इन प्रभावों में से कुछ के लिए कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ 2) जिम्मेदार है, हम सिर्फ इसके बारे में नहीं जानते हैं । एयरोसौल्ज़ (हवा में छितराया जाने वाला कण पदार्थ) और अन्य प्रदूषक के बारे में भी जानते हैं। यह कैसे वास्तव में तापमान को कम कर देता है, जैसा कि हम कुछ स्थानों पर अनुभव करते हैं।  इसलिए हम जानते हैं कि कहां-कहां चूक हुई है। यह एक संपूर्ण, बड़ी तस्वीर है जो 20 सालों में उभरी है।

 

जलवायु मॉडल क्या है? वो कैसा दिखता है? यह कैसे बना है? इसे क्या अच्छा या बुरा बनाता है?

 

कोई मॉडल संपूर्ण नहीं है। किसी के द्वारा यह प्रसिद्ध बात कही गई है, “सभी मॉडल गलत हैं। कुछ ही उपयोगी होते हैं। ” लेकिन बात यह है कि आप उन चीजों का प्रतिनिधित्व करने की कोशिश कर रहे हैं, जो हमारे जलवायु के लिए प्रासंगिक हो रहे हैं।

 

पीएचडी छात्र के रूप में जिस पहले मॉडल पर मैंने काम किया था, वह सिर्फ एक समीकरण था। यह एक गणितीय समीकरण था, जिसके साथ आप एक ग्राफ बना सकते थे। लेकिन यह एक सरल मॉडल था, बहुत सीमित था, जिसमें से बहुत कुछ सीखा जा सकता था। लेकिन यह भविष्य के लिए निर्णय लेने के लिए आदर्श नहीं था, क्योंकि व्यक्ति जहां कहीं भी रहे, इस बात में दिलचस्पी लेता है कि जलवायु परिवर्तन किस प्रकार प्रभावित हो रहा है। जब आपके पास ऐसा प्रश्न है, तो आपको अधिक विस्तार की आवश्यकता है। आपको दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लोगों को यह बताने में सक्षम होना चाहिए कि उनके पड़ोस में क्या होने वाला है ?

 

इसलिए, अगर मुझे सबको बताना है कि दुनिया के किस हिस्से में क्या हो रहा है तो मुझे पूरी दुनिया और हर किसी के पड़ोस के बारे में जानकारी होनी चाहिए । जलवायु का प्रतिनिधित्व करने के कुछ तरीके हमें बताते हैं कि हम इन सभी स्थानों के लिए अलग-अलग चीजे करते हैं। पहला कदम पृथ्वी को देखना है और देखें कि अगर इस पर कोई इंसान नहीं है तो ये कैसा दिखेगा। यदि कोई इंसान नहीं हैं, तो वहां केवल प्राकृतिक जलवायु ‘परिवर्तन’ है। पृथ्वी पर जो कुछ भी है वो जलवायु है। अगला कदम इस मॉडल में प्रतिनिधित्व करना है।

 

पूरे विश्व को पड़ोस के लिए बॉक्स में बांट दिया गया है, जहां सारी घटनाएं होंगी । सूरज उगता है, बारिश आती है, बादलों का निर्माण होता है, रात होती है। गर्मियां पड़ती हैं। सर्दियां आती हैं। आप केवल यह सुनिश्चित कर लें कि प्रत्येक छोटे ग्रिड सेल में भौतिक विज्ञान के सभी बुनियादी नियमों का पालन किया जाए। और जैसे ही मौसम आते और जाते हैं, आपके छोटे वर्ग के साथ क्या होता है? इसके बाद, जब आप इससे इंसानों को जोड़ते हैं, तो वे उत्सर्जन शुरू करते हैं। आप कोयला जलाते हैं। कृषि के लिए साफ भूमि के लिए जंगलों को हटाते हैं।  खनन शुरू करते हैं। तेल निकालते हैं, और आप इसे ईंधन के लिए जलाते हैं। ये सारे बदलाव मनुष्यों ने की हैं। मानव ने ग्रीनहाउस गैसों की एकाग्रता में वृद्धि की है। और इन परिवर्तनों को मॉडल में लिया जाता है। आप जमीन की सतह के बर्ताव को बदलते हैं। कल तक जिस जमीन पर जंगल था, वहां अब गेहूं के पौधे लगे हैं। इन प्रकार के परिवर्तन अब आपके मॉडल के हिस्से हैं। एक बार जब आप ऐसा करते हैं, तो इन इलाकों में से प्रत्येक परिवर्तन का जवाब हम ढूंढने की कोशिश करते हैं।

 

अब मैंने इन सभी चीजों को अपने मॉडल में रखा है।  मैंने देखा है कि मेरा पड़ोस 200 साल पहले कैसा था और अब कैसा है? तब मैंने परखा कि क्या मेरा मॉडल उससे मेल खाता है, जो हम वास्तव में देख रहे हैं। अगर ऐसा होता है, तो यह एक अच्छा मॉडल है। अगर ऐसा नहीं होता है, तो मैं कोशिश करता हूं और समझता हूं कि मैंने सही ढंग से किस चीज का प्रतिनिधित्व नहीं किया। क्योंकि मॉडल में हम पूरी दुनिया को लेते हैं और इसे छोटे-छोटे खानों में बांट देते हैं, जिसके लिए कई छोटी-बड़ी धारणाएं विकसित होती हैं।

 

हम कह सकते हैं कि पूरा भारत पांच या छह खानों में बंटा हैं और बॉक्स के अंदर सब कुछ समान है। लेकिन शायद हमें भारत में 100 खाने, या 1,000 खाने चाहिए, जहां प्रत्येक खाना दूसरे से थोड़ा अलग है।

 

यह देखने के लिए कि भविष्य में जलवायु कैसे होगी, आप मॉडल में किस प्रकार के डेटा लेते हैं?

 

मान लीजिए आज मैं एक जलवायु मॉडल शुरू कर रहा हूं तो मैं इसमें कुछ जोड़ता हूं, जो आज की तरह दिखता है। जलवायु समस्या के लिए, यह महत्वपूर्ण है कि हवा में सीओ 2 कितना है, कितना मीथेन उत्सर्जित होगा, कितनी धूल वहां बाहर है ,कितने एरोसोल और वे कैसा दिखते हैं? आज के लिए ही नहीं, मुझे उन चीजों को भविष्य के लिए जानने की जरूरत है। अगर मुझे किसी को बताना है कि उनका जलवायु में क्या बदल रहा है या अब से दस, पच्चीस साल में किस तरह दिखने वाला है, तो मेरे इस मॉडल को यह बताने में सक्षम होना चाहिए कि भविष्य में सीओ2 या मीथेन कैसे परिवर्तित होने जा रहा है।

 

इस तरह के परिवर्तनों को जानना बहुत कठिन है। मुझे कैसे पता चलेगा कि सीओ 2 या मीथेन की एकाग्रता या कुछ भी भविष्य में कितनी होगी? इसलिए यहां, ऐसे लोग हैं जो आर्थिक मॉडल करते हैं, सामाजिक-आर्थिक पूर्वानुमान । जनसंख्या क्या होने जा रही है, जीडीपी क्या होगा, उद्योग क्या दिखेंगे ? अब तक  की प्रौद्योगिकी 10 या 20 साल बाद कैसी दिखेगी?  क्या कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से अधिक सौर ऊर्जा संयंत्र होंगे?

 

इन सभी चीजों को भविष्य में जलवायु के अनुमान में पड़ना होगा। इसमें बहुत सावधानी की जरूरत होगी और जो सामने आएगा, वह महज एक अनुमान ही तो होगा।

 

यह हो सकता है कि चीन और भारत अब बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और बड़े प्रदूषक हैं। उनके पास एक बड़ी आबादी है, वे विकसित हो रहे हैं, इसलिए वे अधिक उत्सर्जन करते हैं, लेकिन यह भी एक संभावना है कि कुछ तकनीक ऐसी आएगी, जो हमें कार्बन मुक्त ऊर्जा दे सकती है। जिससे आप वातावरण में सीओ 2 उत्सर्जित किए बिना बिना प्रगति कर सकें।

 

मौजूदा जलवायु मॉडल की क्या खामियां हैं?

 

लंबे समय के लिए  मॉडल के साथ सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि वहां बादल पर सब कुछ केंद्रित है। बादल कहां आए, कहां गए यह जानने में बहुत अधिक प्रयास किए जा रहे हैं। उन्हें कैसे दर्शाया जाए, और क्या वे ग्रह को शांत करने में सहायता करेंगे या वे ग्रह की गर्मी में वृद्धि करेंगे। वास्तव में यही मॉडल से अपेक्षा की जाती है। एक बार जब समस्या को पर्याप्त रूप से देखा जाता है, तो हम भविष्य के बारे में जो भविष्यवाणी करते हैं, उसके बारे में हमें बहुत अधिक आत्मविश्वास मिलता है।

 

मान लीजिए कि बारिश स्थिर है। यह सबसे अच्छी स्थिति है, लेकिन तापमान बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि सूखे के भी आसार हैं। पानी को खत्म हो जाना है। मिट्टी को सूख जाना है। और यह कृषि के लिए अच्छा नहीं है। अगर तापमान बढ़ता है तो आप चाहते हैं कि वर्षा का ग्राफ भी ऊपर बढ़े। लेकिन आप यह भी नहीं चाहते कि इतनी भारी बारिश हो जाए कि चीजें खत्म हो जाएं। यही कारण है कि बारिश पूर्वानुमान में अधिक आत्मविश्वास प्राप्त करना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसा कुछ जिससे हम सटीक भविष्यवाणी कर सकते हैं । जैसे हम सब देख रहे हैं कि मानसून के मौसम में विस्तार हो रहा है।

 

भारतीय मानसून हवा में एयरोसॉल्स की उपस्थिति से प्रभावित होते हैं, जिसमें मध्य पूर्व के देशों और आसन्न रेगिस्तान के धूल के साथ-साथ स्थानीय काले कार्बन उत्सर्जन भी शामिल है, जो एक अल्पकालिक जलवायु प्रदूषक है। एरोसोल बादलों को कैसे प्रभावित करता है और साथ ही वर्षा को कैसे प्रभावित करता है?

 

एरोसोल के कई प्रभाव हैं। कुछ प्रत्यक्ष प्रभाव कहा जा सकता है, और कुछ अप्रत्यक्ष प्रभाव हैं और फिर अर्ध-प्रत्यक्ष प्रभाव होता है। सल्फेट प्रकार के एरोसोल इस प्रकार के प्रभाव बनाते हैं ताकि बादल बहुत ज्यादा भूमि के ऊपर रहे और भारी बारिश की प्रवृत्ति बने। काले कार्बन को अर्ध-प्रत्यक्ष प्रभाव कहा जाता है, यह वास्तव में बादल को खत्म और नष्ट कर सकता है।

 

जहां भी एरोसोल अधिक सक्रिय है वह अलग-अलग तरीकों से वर्षा को बदल देगा। वहां भी प्रत्यक्ष प्रभाव देखने को मिलता है, जो पूरे क्षेत्र को शांत और बारिश को कम करता है।

 

एरोसोल की वजह से भारतीय वर्षा का ग्राफ नीचे गिरने लगता है, जो अब काफी स्वीकार्य तथ्य है। लेकिन इतना स्पष्ट नहीं है कि प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष और अर्ध-अप्रत्यक्ष प्रभाव कितना है, और वर्षा में कमी के लिए उनका सापेक्ष योगदान क्या है। तीन अलग-अलग चीजें गलत हो सकती हैं, उन्हें क्षतिपूरक त्रुटि कहा जाता है, और आप गलत कारणों से सही उत्तर देते हैं। इसलिए हमें इस पर और अधिक अध्ययन करने की आवश्यकता है।

 

चरम मौसम की घटनाओं की भविष्यवाणी के संदर्भ में जलवायु मॉडल कितने सटीक हैं?

 

मैं एक जलवायु मॉडल और मौसम मॉडल के बीच भेद करना चाहता हूं। मौसम मॉडल आपको कुछ दिन पहले ही बताएगा कि आने वाले दिनों में भारी बारिश होगी, जैसा कि हाल ही में मुबंई ने अनुभव किया है।

 

एक जलवायु मॉडल को कुछ दिनों बाद यह याद नहीं रहता कि वह किस स्थिति में था। आपको बताएगा कि आज के मुकाबले, 20 साल बाद क्या उच्च तापमान होगा। और यह सिर्फ एक दिन के लिए नहीं है, लेकिन यह आपको बताएगा कि अगस्त में, अब से 20 साल बाद 1 डिग्री या उससे भी ज्यादा गर्म हो जाएगा, जिसका मतलब है कि 20 साल बाद और ज्यादा गर्मी होगी।

 

यह आपको भारी बारिश होने वाली घटनाओं के संबंध में भी बता सकता है। जैसे कि अब से 20 साल बाद ज्यादा वर्षा होने की संभावना है। इसलिए मानसून के मौसम में या पूरे वर्ष के लिए कुल वर्षा अधिक होना चाहिए, इसका मतलब है कि हर बारिश को इसके लिए योगदान करना पड़ेगा। तो या तो मेरे पास अधिक बरसाती दिन हैं या मेरे पास बारिश के दिनों की समान संख्या में ज्यादा बारिश है। तभी मेरे पास कुल वर्षा अधिक होगी।

 

“इस बात की बहुत चर्चा है कि 1970 के दशक के बाद से मानवोद्भव विज्ञान ने ऊपरी महासागर वार्मिंग (700 मीटर से ऊपर) में भारी योगदान दिया है। आईपीसीसी के अनुसार, इस महासागर वार्मिंग ने थर्मल विस्तार के माध्यम से इस अवधि में वैश्विक समुद्री स्तर में वृद्धि का योगदान दिया है। ” आप इस पत्र के मुख्य लेखक थे, और आप एक दशक से महासागरों का अध्ययन कर रहे हैं। महासागरों पर ग्लोबल वार्मिंग का असर क्या है और भविष्य में भारत के लंबे समुद्र तट को कैसे प्रभावित करेगा?

 

पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि, अधिक गर्मी का कारण बनती है। बढ़ने वाली गर्मी में से लगभग 93 फीसदी महासागर में गए हैं। हम हवा का तापमान गर्म होने का जो अनुभव कर रहे हैं,  वह उस गर्मी का केवल 7 फीसदी है।

 

गर्मी का ज्यादा हिस्सा सागर में चले गए हैं, क्योंकि पानी में उच्च गर्मी धारण करने की क्षमता होती है। मुझे अपनी पीएचडी याद है। मेरे सलाहकार कहते थे कि हम वातावरण में जो गर्मी का अनुभव कर रहे हैं, वह कुत्ते की पूंछ की तरह है। कुत्ता सागर है, क्योंकि वहां बहुत अधिक गर्मी है । गर्मी का बड़ा हिस्सा जानवर के शरीर में चला गया। रह गई पूंछ।

 

सागर वास्तव में इतनी गर्मी लेता है कि जो तापमान बदलाव हमने देखा है, वह एक डिग्री है। महासागर का तापमान और भी कम है, शायद आधा डिग्री, अधिकांश स्थानों में आधे से भी कम डिग्री, लेकिन ऊर्जा में जो भी वृद्धि हुई है वह 93 फीसदी है।

 

जब आप महासागर गरम कर रहे हैं तो आप समुद्र की सतह को भी गरम कर रहे हैं, और एक गर्म समुद्री सतह का मतलब है कि आप अधिक आसानी से चक्रवात बना रहे हैं, अधिक आसानी से पानी खत्म होने की आशंका है, हम हवा को अधिक आर्द्र बना रहे हैं। और ये चीजें पहले से ही हो रही हैं।दूसरी बात ये होती है कि जब आप कुछ भी गर्म करते हैं, तो वह फैलता है। और पानी इतने गर्म होता है कि महासागरों का विस्तार हो गया है। वास्तव में, समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी का मतलब महासागरों के विस्तार से हैं।  सभी ग्लेशियरों और अन्य चीजें पिघल रही हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य महासागरों का विस्तार होना है।

 

जलवायु मॉडलिंग के संदर्भ में, क्या हम तापमान, वर्षा और सूखे के बीच कोई संबंध बना सकते हैं? मॉडल हमें बता सकते हैं कि आज से 20 साल बाद, अधिक सूखा पड़ने वाला है, और यह किस क्षेत्र को प्रभावित करेगा? या अगर कुछ हिस्सों में सूखा और भारत के अन्य हिस्सों और दुनिया में बाढ़ हो तो?

 

ऐसा करने में अभी हम बहुत कुशल नहीं हैं। उम्मीद है कि यह किसी दिन करना संभव होगा। एक मुद्दा यह है कि अगर मुझे अगले मानसून के मौसम की भविष्यवाणी करनी है- कि भारत का सामान्य वर्षा से अधिक वाला हिस्सा कौन होगा और कौन सा हिस्सा सूखा का अनुभव करेगा- तो ऐसा बताने के लिए आज आप मौसम मॉडल से बहुत दूर हैं लेकिन आज भी आप एक जलवायु मॉडल का उपयोग करने के करीब हैं।

 

इस वर्ष और अगले वर्ष के बीच, सीमा शर्तों (जैसे सीओ 2 के स्तर, मीथेन के स्तर, भूमि उपयोग के पैटर्न) पर्याप्त रूप से नहीं बदले हैं, हालांकि वे अलग-अलग हैं। यह न तो मौसम है और न ही लंबे समय तक जलवायु है। तत्काल कुछ वर्षों के दौरान सूखे या बाढ़ की भविष्यवाणी में यह समस्या है। लेकिन मैं इस पर बात कर सकता हूं कि अब से 50 साल बाद कौन से विशेष स्थान में सूखा होगा और किन क्षेत्रों में बारिश होगी।

 

हम जलवायु परिवर्तन के लिए एक निश्चित मौसम की घटना को कैसे जोड़ कर देख सकते हैं?  हम कैसे इसे सही ढंग से कर सकते हैं?

 

पांच या छह साल पहले तक, जवाब देने का कोई तरीका नहीं था। उदाहरण के लिए, भारत में हमेशा गर्मी की लहरें होती थी,।यह हमेशा से एक गर्म और धूल वाला देश था, इसलिए वर्ष के अधिक समय में हमेशा उच्च तापमान रहता था। हमेशा अटलांटिक महासागर से तूफान आते थे और पश्चिमी घाट के पास बहुत बारिश होती थी।

 

लेकिन पिछली गर्मियों में (2016 का), राजस्थान में फलोदी नामक एक स्थान है, जिसने तापमान 51 डिग्री दर्ज किया था। यह उच्च तापमान भारत में कभी भी दर्ज नहीं किया गया है। इसके लिए कोई उदाहरण नहीं है, क्योंकि रिकॉर्ड रखना लगभग 100 साल पहले शुरू हुआ था।

 

हार्वे चक्रवात, जिसने ह्यूस्टन में जो वर्षा हुई, 500 साल में एक बार की घटना है। अब हम उन घटनाओं को देख रहे हैं जो स्वाभाविक दुर्लभ हैं , और उनके गंभीर प्रभाव हैं। मुंबई में भारी बारिश से अर्थव्यवस्था और मानव जीवन पर एक गंभीर प्रभाव पड़ता है। फलोदी में बहुत उच्च तापमान का स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। जलवायु परिवर्तन के साथ  इस प्रकार की घटनाओं को देखना, उस घटना की संभावना की खोज में एक कवायद है।

 

हम कोशिश करते हैं और देखते हैं कि कि मौजूदा आंकड़ों से इस घटना की संभावना क्या है और देखें कि क्या हम एक मॉडल का उपयोग कर सकते हैं । मान लीजिए कि मेरा डेटा कहता है कि कुछ प्रकार की बारिश की घटनाएं 50 साल में एक बार होती है। आप मूल रूप से अपने मौसम मॉडल चला रहे हैं जैसे कि मरने पर फेंकना, इस तरह की एक दुर्लभ घटना की संभावना को मापने की कोशिश कर रहे हैं। यह तथ्यों की दुनिया है, क्या संभावना है यह वास्तविक दुनिया है।

 

फिर हम कुछ कहते हैं जो प्रतितथ्यात्मक कहलाता है। प्रतितथ्यात्मक दुनिया मानव प्रभाव के बिना है। अगर हमारे पास मनुष्य नहीं होता तो जलवायु कैसे विकसित होगी? आप उन स्थितियों को मॉडल देते हैं और फिर देखते हैं कि घटना की संभावना क्या वास्तविक मॉडल में संभावना से भिन्न है। यदि कोई घटना मानव के बिना 100 सालों में एक बार उत्पन्न होती है, लेकिन वर्तमान मानव चालित दुनिया के साथ मुझे 30 वर्षों में एक बार की संभावना मिलती है तो इसका मतलब है कि इस तरह की घटनाओं में हमारा भी हाथ है।

 

दिसंबर 2015 में, चेन्नई में गंभीर बाढ़ आई थी, जहां 24 घंटे में औसतन 286 मिमी बारिश दर्ज की गई। घटना के बारे में एक पेपर के आप सह-लेखक हैं, जिसमें निष्कर्ष निकाला गया कि ग्लोबल वार्मिंग का कोई प्रभाव नहीं देखा गया था। एक अन्य पेपर में, जहां आपने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में मई और जून 2015 में चरम गर्म हवाओं का अध्ययन किया, जिसमें लगभग 2,500 लोगों की मौत हो गई थी, आपको पता चला कि यह घटना मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन की वजह से थी। क्या कोई ऐसी घटना है जो मानवीय हस्तक्षेप की वजह से हुई हो? या यह है कि मानव व्यवहार से बारिश की घटनाओं को जोड़कर देखना, गर्मी की तुलना में कठिन है, क्योंकि तापमान का मानचित्र आसान है?

 

हां, वर्षा के मुकाबले तापमान का अनुमान आसान है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में गर्मी की लहरों को समझना आसान थीं, जबकि कई मॉडल के लिए बारिश एक कठिन चीज है। सटीक अनुमान लगाने के लिए वर्षा बहुत कठिन है।

 

कभी-कभी बहुत भारी, तेज बारिश होती है जो स्थानीय स्थान पर होती है जैसे उत्तराखंड की बाढ़। हिमालय के केवल एक हिस्से में एक बादल फटी तो मॉडल के पूर्वानुमान के लिए यह बहुत कठिन है।

 

स्वाभाविक रूप से वर्षा का अनुकरण करना कठिन है, और कई प्रकार की बारिश की घटनाएं भी कठिन हैं। लेकिन चेन्नई की बारिश घटना उस तरह का नहीं थी। यह एक बड़ा क्षेत्र था। वास्तव में तमिलनाडु के तट पर और बाहर महासागर में भी बारिश हुई थी। और यह कई दिनों तक चली।
 

जब वर्षा की बात आती है, तो बारिश दो अलग-अलग कारणों या दोनों कारणों से बदल सकती है या बढ़ सकती है। एक यह है कि जब आपके पास गर्म हवा है, तो यह अधिक नमी रख सकता है। इसलिए तापमान के साथ पानी में परिवर्तन करने की क्षमता, जो कि उष्मकारक प्रभाव है। दूसरा यह है कि वर्षा हवा के संचलन से आता है। यहां गति शामिल है। इसलिए पहले वहां एक जगह थी जो इन बहुत भारी बारिश को प्राप्त करती थी, अब इसे स्थानांतरित कर दिया गया है। ऐसा नहीं है कि बारिश की गंभीरता में कोई बदलाव आया है जो हवा लाता है। क्योंकि अब हवा का पैटर्न बदल गया है तो दोनों, नए और पुराने जगह अब परिवर्तन का अनुभव कर रहे हैं। यही एक गतिशील प्रभाव है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि कौन सी घटना घटी है। यह भी हो सकता है कि गतिशील प्रभाव के कारण एक जगह जहां पहले बहुत बारिश हुई थी, वह अब सूख रहा है क्योंकि बारिश चली गई है। लेकिन आप ध्यान नहीं देते क्योंकि वातावरण में पानी की क्षमता बढ़ाने में वृद्धि हुई है। इसलिए दो परिवर्तन हैं, जो एक-दूसरे को जोड़ सकते हैं या अलग कर सकते हैं।इसलिए दोनों को अलग-अलग करके देखना कठिन है।

 

जलवायु परिवर्तन के लक्षणों को समझना क्यों जरूरी है, जिससे एक निश्चित मौसम घटना के लिए ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार ठहराया जा सके?

 

लोगों ने इसका अनुभव किया है, यह समाचार चक्र में है। इसलिए यदि आप तेजी से जलवायु परिवर्तन के लक्षणों को समझते हैं तो कह सकते हैं देखो, जो घटना हुई है वह देखें तो वह जलवायु परिवर्तन के कारण हुई है। लोग अब जो कुछ हो रहा है और सुन रहे हैं, सबके साथ साझा कर सकते हैं। हम यह नहीं कह सकते कि यह मेरी समस्या नहीं है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन का अनुभव किया जा रहा है।

 

नीति निर्माताओं की प्रतिक्रियाओं के संबंध में आप क्या कहते हैं जिन्हें योजना के लिए कम समयाअवधि में अधिक सटीक वैज्ञानिक आंकड़ों की जरुरत है?

 

मौसम पूर्वानुमान पहले ही यह कर रहे हैं। जो हिस्सा गायब है वह यह है कि जब कोई अगले पांच दिनों के लिए भविष्यवाणी करता है तो क्या यह जानकारी उस शहर के योजनाकार या जिला कलेक्टर या राज्य सरकार के एक अधिकारी के पास है? जो प्रदान किया गया है और जो जरूरत है, उसके बीच की खाई को कैसे भरा जा सकता है?

 

अगस्त में मुंबई के बाढ़ के बाद मैंने ऐसा कुछ सुना था कि भारतीय मौसम विभाग बेकार था, क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि मुंबई में बाढ़ आने वाली है। लेकिन उन्होंने बारिश की भविष्यवाणी की थी, इसी तरह उत्तराखंड बारिश की घटना का अनुमान लगाया गया था।

 

यह वैज्ञानिक क्षमता का प्रश्न नहीं है। बल्कि यह सवाल है कि विज्ञान और नीति के बीच की खाई को कैसे भरा जाए। एक उदाहरण यहां अहमदाबाद हिट एक्शन प्लान का है। अब दो और शहरों, नागपुर और भुवनेश्वर को यह प्लान  दिया जाएगा।

 

यह वाकई मुश्किल नहीं है- यह जिम्मेदारी लेने और खराब मौसम के लिए तैयारी का सवाल है। आप योजना बनाकर मुंबई की बाढ़ से निपट लें, या फिर कंधे उचकाकर कहें कि ये ‘मुंबई का जज्बा’ है!

 

(पाटिल विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 17 सितंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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