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आर्थिक मंदी के बावजूद गरीबी और भूख से लड़ाई में कैसे जीत सकता है भारत?

चारु बाहरी,

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अपने परिवार के साथ दशरथ मांझी ( दाएं से दूसरे )। उन्हें स्थानीय एल्यूमिना रिफाइनरी में काम करके उसे अपने परिवार को गरीबी से निकालने, भूख से लड़ने और मध्यम समृद्धि हासिल करने में मदद मिली है। एक चौथाई भारतीय आज भी उतने ही वंचित हैं जितना तीन दशक पहले मांझी का परिवार था। और उनकी गरीबी का सबसे स्पष्ट प्रमाण उनका अल्प-पोषण है।

 

नियमगिरि, जिला-कालहंडी, ओडिशा: 1980 के दशक के अंत में नियामगिरी पर्वत श्रृंखला के नीचे रहने वाले अनुसूचित डोंगरिया कोंध जनजाति के  दशरथ मांझी भूख से बेहद परिचित थे।

 

उनका परिवार मुख्य रूप से मोटा अनाज खाता था और जब कभी अनाज की कमी होती तो मांझी की मां आम की गुठली को पीस कर और बांस के ‘चावल’ खिलाती थी, जो वास्तव में बांस में होने वाले बीज होते हैं।

 

अब पिछले एक दशक से ज्यादा समय से 45 वर्षीय मांझी एल्यूमिना रिफाइनरी में काम कर रहे हैं। मांझी निर्माण कार्यों की देखरेख करते हैं और ओडिशा में अर्द्ध कुशल श्रमिकों को मिलने वाले 220 रुपए प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी से चार गुना ज्यादा वेतन पाते हैं।

 

मांझी के चार बच्चे बाजरा, चावल, गेहूं, मक्का, ग्राम और हरी सब्जियों जैसे पौष्टिक आहार पर बड़े हो रहे हैं। अपनी मां द्वारा भोजन की बद्तर स्थिति  का सामना करने के विपरीत मांझी की पत्नी वर्ष भर के लिए बेहतर ढंग से अनाज जमा कर पाती हैं।

 

लाखों साथी नागरिकों की तरह ही मांझी की जिंदगी में भी सुधार हुआ है। इसका श्रेय मजबूत आर्थिक विकास को जाता है। 1990 की शुरुआत में उदारीकरण के बाद के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था में 6.2 फीसदी की वृद्धि हुई है। विकास से गरीबी और भूख में पर्याप्त कमी आई है। लेकिन फिर भी भूख पर स्थिति विकट है।

 

‘इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (आईएफपीआरआई) ने हाल ही में जारी की गई 2017 ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की स्थिति को ‘गंभीर’ बताया है। इस बारे में इंडियास्पेंड ने 12 अक्टूबर, 2017 की रिपोर्ट में बताया है। 1990 तक स्थिति बदतर थी, उसमें सुधार तो हुआ है, लेकिन भूख से पीड़ित लोगों की संख्या को कम करने के मिलोनियम डेवलपमेंट गोल यानी एमडीजी के लिए पर्याप्त नहीं है। भारत वर्ष 2014 की सूची से तीन स्थान नीचे आया है और यह चार देशों में से एक है जहां हरेक पांच में एक बच्चा वेस्टेड है।

 

भूख संकेतक रुझान, 1992-2017

Source: 2017 Global Hunger Index

 

भारत नए और अधिक महत्वाकांक्षी सतत विकास लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए तैयार है, विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक विकास में चल रहे मंदी से सरकारी कार्यक्रमों की जरूरत बढ़ सकती है, जिससे गरीबी और भूख कम हो सके, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में। यह एक मौका है कि नीति निर्माताओं को लोगों की क्षमता वृद्धि स्वास्थ्य में सार्वजनिक व्यय निवेश पर ध्यान दे, जो आने वाले कल के लिए फायदेमंद साबित हो।

 

कम गरीबी, लेकिन सीमित लाभ

 

भारत की औसत वार्षिक वृद्धि दर 2003 में समाप्त हुए दशक में 6.2 फीसदी से बढ़ कर 2004 और 2011 के बीच 8.3 फीसदी तक हुआ है। इस समय के दौरान गरीबी में गिरावट की वार्षिक गति तिगुनी हुई है।

 

वार्षिक विकास दर एंव और इसके अनुकूल गरीबी में गिरावट

Source: Millennium Development Goals India Country Report 2014

 

भारत ने गरीबी पर अपने मिलेनियम विकास लक्ष्य (एमडीजी) को प्राप्त करने के लिए अपने गरीबी अनुपात ( राष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे आबादी ) आधा किया है। ये आंकड़े वर्ष 1990 में 47 फीसदी से कम होकर वर्ष 2011 में 21 फीसदी हुआ है।  (ग्रामीण क्षेत्र में प्रति दिन 27.2 रुपए से कम और शहरी इलाकों में प्रतिदिन 33.3 रुपए से कम खर्च करने वाले भारतीय को गरीबी रेखा के नीचे माना जाता है।)

 

इससे लाखों लोगों को मांझी जैसी गरीबी से बाहर निकाला गया है। मांझी ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए कहा, “जब भी मैं सोचता हूं कि मैं पहले कैसी जिंदगी जी रहा था, मेरे आंखों से आंसू आ जाते हैं। ”

 

मल्टीडायमेंश्नल पोवर्टी इन्डेक्स (एमपीआई) स्कोर, ऑक्सफ़ोर्ड गरीबी और मानव विकास पहल और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा अवधारणा में तीव्र गरीबी का एक अंतरराष्ट्रीय उपाय है। यह 10 में से तीन या अधिक संकेतकों का सामना करने वाले को ‘गरीब’ के रूप में वर्गीकृत करता है, अर्थात्: स्कूली शिक्षा के वर्ष, विद्यालय उपस्तिथि, बाल मृत्यु दर (परिवार में), पोषण स्थिति, संपत्ति का स्वामित्व, बिजली तक पहुंच, बेहतर स्वच्छता, पीने का पानी, फर्श,और खाना पकाने ईंधन।

 

कच्चे मकान में रहने वाले मांझी का परिवार लगभग सभी क्षेत्रों में वंचित था। मांझी ने दसवीं कक्षा तक पढ़ाई की, लेकिन उनकी दो बहनें तीसरी कक्षा से आगे पढ़ नहीं पाईं। उनके पाता-पिता कुछ पैसों के लिए दूसरे की जमीन पर काम करते थे।

 

आज, मांझी के बच्चे एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ते हैं। वह सात एकड़ जमीन के मालिक हैं लेकिन उनकी कृषि आय नौकरी से मिलने वाली उनकी कमाई की तुलना में कम है और उनकी पत्नी कपड़ों की सिलाई करती हैं।

 

मांझी के पक्के घर में बिजली कनेक्शन, एक शौचालय और पाइप से पानी की आपूर्ति है। लकड़ी की आग से खाना बनाना अब उनके लिए अतीत की बात है। उनकी पत्नी खाना पकाने के ईंधन का उपयोग करती है। मांझी एक मोबाइल फोन, एक टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर और यहां तक ​​कि चार-पहिया वाहन के मालिक भी हैं जिसे वे  किराए पर देते हैं।

 

एक जिले के रूप में, कालाहांडी ने सामाजिक और स्वास्थ्य संकेतक पर सुधार किया है। वर्ष 2001 और वर्ष 2011 के बीच, साक्षरता 45.94 फीसदी से बढ़कर 60.22 फीसदी हो गई है और प्रति हजार जीवित जन्मों में शिशु मृत्यु दर 76 से 59 तक गिर गई। वर्ष 2005 में मातृ मृत्यु दर वर्ष 2005 में 358 से घटकर 2005 में 311 हो गई है।

 

फिर भी कालाहांडी देश के बाकी हिस्सों से पीछे है। आज कलहांडी की शिशु मृत्यु दर, 39 के आंकड़ो पर  अखिल भारतीय दर से डेढ़ गुना करीब है। और मातृ मृत्यु दर 167 के अखिल भारतीय दर से दोगुनी है, जो 2016 में वैश्विक औसत 179 से कम हो गई है , जैसा कि सितंबर 2017 में इंडियास्पेंड ने अपनी रिपोर्ट में बताया है। अखिल भारतीय साक्षरता आंकड़ा 74.04 फीसदी पर है, जो कालाहांडी की तुलना में बेहतर है।

 

यहां तक ​​कि मांझी जैसी कहानियां कम हैं। उन्होंने स्थानीय एल्यूमिना रिफाइनरी से अपनी भूमि खरीदने और उसे नौकरी देने के लिए अप्रत्याशित लाभ कमाया है। आर्थिक वृद्धि का लाभ बहुत व्यापक नहीं फैला है और विकास से कालाहंडी जिला काफी हद तक अछूता है।

 

कालाहांडी को वर्ष 2015 में यूएस इंडिया पॉलिसी इन्स्टटूट एंड सेंटर फॉर रिसर्च एंड डीबेट इन डेवल्पमेंट पॉलिसी’ के डिस्ट्रिक्ट डेवलप्मेंट एंड डायवर्सिटी इंडेक्स ऑफ में 599 में से 548वां स्थान दिया गया था।

 

निरंतर गरीबी और भूख का सामना करने वाले कालहांडी को नोर्वे के स्लो विश्वविद्यालय के ‘सेंटर फॉर डेवलेप्मेंट एवं एन्वायर्नमेंट’ के एसोसिएट प्रोफेसर डेन बनिक द्वारा वर्ष 2007 में लिखी किताब ‘स्टार्वैशन एंड इंडियाज डेमोक्रेसी’ में ‘भारत में भुख की राजधानी’  कहा गया है।

 

पिछड़ी क्षेत्र अनुदान निधि के लिए 271 अन्य पिछड़े जिलों की स्थिति भी कालाहांडी से अलग नहीं। वर्ष 2014 में, एमपीआई के अनुसार, 20 देशों में भारत को सबसे बड़ी असमानता के लिए चिह्नित किया गया था। नतीजतन, 343.5 मिलियन भारतीय, आबादी का एक चौथाई (28.5 फीसदी) से अधिक, बेसहारा रहते हैं, जैसा कि तीन दशक पहले मांझी का परिवार वंचित था।

 

नए लक्ष्य

 

संयुक्त राष्ट्र के गरीबी और भूख पर स्थायी विकास लक्ष्य (एसडीजी) एमडीजी से ज्यादा महत्वाकांक्षी हैं, और इसके लिए अनुरूप नीति कार्रवाई की आवश्यकता होगी। गरीबी लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी 2030 तक प्रति दिन 1.25 डॉलर (81 रुपए) से कम पर न रहे और भूख लक्ष्य यह सुनिश्चित करने के लिए कि हर साल सुरक्षित, पौष्टिक और पर्याप्त भोजन तक पहुंच हो।

 

वर्तमान में पांच भारतीयों में से एक 1.25 डॉलर पर जीते हुए गरीबी रेखा से नीचे रहता है, और 836 मिलियन भारतीय अब भी अत्यधिक गरीबी में रहते हैं। गरीबी और भूख पर एसडीजी हासिल करने के लिए, आर्थिक विकास और पुनर्वितरण नीतियों पर ध्यान देने की जरूरत।

 

एक आदर्श दुनिया में, सामाजिक आर्थिक वर्गों में उपभोग समान होगा, जैसे कि भारत का सबसे गरीब क्वांटिल (20 फीसदी आबादी) कुल राष्ट्रीय मासिक खपत का 20 फीसदी हिस्सा होगा।

 

लेकिन आज भारत के शहरी गरीब 7.1 फीसदी खपत करते हैं, जो 1990 के शुरुआती 8 फीसदी से कम है। ग्रामीण भारत में, सबसे गरीब 20 फीसदी तक की खपत 10 फीसदी से कम रही है।जब तक लोग गरीब हैं, तब तक उनके पास आहार, पहुंच और स्वास्थ्य सेवाओं, आवास की स्थिति, स्वच्छता और ऐसी अन्य चीजों का उपयोग सीमित है  जो बदले में पोषण संबंधी स्थिति को प्रभावित करते हैं”, जैसा कि आईएफपीआरआई में वरिष्ठ शोधकर्ता पूर्णिमा मेनन ने इंडियास्पेंड को बताया है।

 

नई रणनीति

 

भारत में गरीबी का सबसे सामान्य संकेतक पोषण है।नौ उच्च फोकस वाले राज्यों में, पांच साल से कम उम्र के अल्प-पोषण वाले बच्चों के उच्चतम प्रसार वाले 100 जिलों में से 63  को ‘पिछड़े’ के रूप में वर्गीकृत किया गया और पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि के लिए पात्र बनाया गया है।

 

भूख और गरीबी के बीच यह सकारात्मक सहसंबंध 5 से 18 वर्ष के बच्चों के अल्प-पोषण के साथ जिलों के आंकड़ों के साथ 18-59 वर्षीय के सबसे कम वजन वाले जिलों के साथ स्पष्ट हैं।  ( अल्प-पोषण बच्चों और वयस्कों के लिए निम्न शरीर का वजन या बॉडी मास इंडेक्स के लिए उपयोग किया जाता है)।

 

वर्ष 1975 में, 19 वर्ष के भीतर भारत में मध्यम और गंभीर रूप से कम वजन लोगों की संख्या ज्यादा थी । 2016 में, 22.7 फीसदी लड़कियां और 30.7 फीसदी लड़के भारत में मामूली या गंभीर रूप से कम वजन वाले थे।

 

राष्ट्रीय स्तर पर मल्टीडायमेंशनल पोवर्टी इंडेक्स पर गरीबी

Source: OPHI Country Briefing 2017: India

 

मेनन कहती हैं कि, शुरुआती कुपोषण और कम आय के साथ-साथ एनीमिया और कम उत्पादकता के बीच संबंध स्थापित किए गए हैं।

 

बद्तर पोषण का एक परिणाम स्टंटिंग है जिसमें बच्चे का कद उसकी उम्र की तुलना में कम होता है। स्टंटिंग का स्कूल के प्रदर्शन पर प्रतिकूल प्रभाव देखा गया है और जिन व्यस्कों ने बचपन में स्टंटिंग का सामना किया है वे अपने साथियों से 22 फीसदी कम कमाते हैं।

 

भारत ने वर्ष 2005 और 2015 के बीच स्टंटिंग का 9.6 प्रतिशत अंक कम किया है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने सितंबर 2017 की रिपोर्ट में बताया है। “बाल पोषण में सुधार है, लेकिन एमपीआई के अन्य घटकों की तुलना में धीमी है,” मेनन कहती हैं, “भारत की खराब ग्लोबल हंगर इंडेक्स स्थिति का एक बड़ा कारण पहले भी और अब भी शिशु पोषण घटक रहा है।”

 

जब तक लोग खराब पोषण और कम आय के चक्र के भीतर ही सीमित रहते हैं, भारत गरीबी को दूर नहीं कर सकता।

 

आगे बढ़ने का रास्ता

 

न्यायसंगत, विविध विकास और रोजगार सृजन की कमी को बनाने के लिए भारत ने कल्याणकारी कार्यक्रमों पर भरोसा किया है। इनमें से सबसे प्रसिद्ध महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत आजीविका सुरक्षा कार्यक्रम है। 2006 में शुरू किया गया यह कार्यक्रम प्रत्येक ग्रामीण परिवार को हर साल गैर कृषि मौसम के दौरान 100 दिनों का अकुशल मैनुअल काम प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

 

वर्ष 2011 में, आय, रोजगार और घरेलू भलाई पर 26,000 ग्रामीण परिवारों के एक तुलनात्मक राष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया कि मनरेगा ने 14 मिलियन लोगों को उस वर्ष गरीबी में जाने से रोक दिया था और 25 फीसदी से 32 फीसदी के बीच गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या कम हुई।

 

फिर भी, मनरेगा में कमी है। ‘नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च ’(एनसीएईआर) और ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ मैरीलैंड’ के सहयोग से किए गए एक अध्ययन के सह लेखक प्रेम वशिष्ठ ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, “हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनरेगा सुधार किया, लेकिन चुनौती कमजोर शासन है।” उन्होंने कहा कि ग्राम सभाएं प्रभावी कार्यक्रम तैयार करने में असमर्थ हैं या वास्तव में जरूरतमंद लोगों को नामांकित करते हैं।

 

उदाहरण के लिए, कालाहांडी में, मनरेगा के माध्यम से काम करने की मांग करने वाले चार में से तीन घरों को काम नहीं मिला, जैसा कि भारत में पोषण के लिए क्रियाओं को सुदृढ़ और सुसंगत बनाने के लिए आईएफपीआरआई की पहल भागीदारी और अवसरों पर 2016 की रिपोर्ट में बताया गया है।

 

वशिष्ठ कहते हैं, “कृषि क्षेत्र में निरंतर संकट और ग्रामीण भारत में गैर-कृषि विकास धीमा होने के साथ काम की ग्रामीण मांग बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है और इससे मनरेगा और भी महत्वपूर्ण हो गया है। विकास दर घटकर-चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 5.7 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। पहली तिमाही में यह 6.1 फीसदी थी।” वशिष्ठ ने चेतावनी दी कि ” गरीबी और भूख को समाप्त करने के लिए लिया गया भारत का संकल्प टूट सकता है। मनरेगा पर बेहतर ढंग से ध्यान देने की जरूरत है।

 

वशिष्ठ आगे कुछ राय देते हैं, “स्थानीय सरकार के स्तर पर क्षमता वृद्धि और पारदर्शिता के माध्यम से परिणाम सुधार किया जा सकता है, और मनरेगा को लक्षित करके उत्पादकता और आय बढ़ाने वाली सामुदायिक परिसंपत्तियां बनाने या विशेष मामलों में प्रतिभागियों की भूमि पर संपत्ति बनाने के लिए काम किया जा सकता है।”

 

फिर भी, कल्याणकारी योजनाएं एक पूर्ण या टिकाऊ समाधान नहीं हैं। रोजगार कौशल का निर्माण आवश्यक है, जैसा कि ‘जामिया मिलिया इस्लामिया’ के अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख, शाहिद अहमद ने इंडियास्पेंड को बताया, “मानव संसाधन क्षमता निर्माण महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच है और भागीदारी के माध्यम से गरीबों को सशक्त बनाना है।”

 

शाहिद अहमद की राय है कि सरकारी कार्यक्रम में महिलाओं और लड़कियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। मेनन कहती हैं, “महिलाओं और लड़कियों के बीच लंबे समय तक भेदभाव भोजन, स्वच्छता, देखभाल और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को प्रभावित करता है और यह भारत में खराब पोषण परिणामों का प्रमुख कारक है। “

 

आंकड़े बताते हैं कि अमीर राज्यों ने बच्चों की देखभाल के लिए गरीब पिछड़े राज्यों को मात दे दिया है, और सबसे मजबूत विकास के साथ राज्यों में प्रजनन दर और साथ ही मातृ मृत्यु दर भी कम है। इससे पता चलता है कि लैंगिक समानता गरीबी और भूख के खिलाफ लड़ाई में बेहद है।

 

(इस आलेख में ओडिशा के कालाहांडी से शास्मिता पेट्रा की रिपोर्ट का इस्तेमाल किया गया है। बाहरी राजस्थान के माउंट आबू स्थित लेखिका हैं, और पेत्रा अडिशा में काम करने वाली एक लाभकारी संस्था, महाशक्ति इंडिया फाउंडेशन में परियोजना प्रबंधक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 14 अक्टूबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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