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उच्च शिक्षा सीढ़ी के सबसे निचले पायदान पर पिछड़ी जनजाति और मुस्लिम

चारु बाहरी,

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जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली में फैक्लटी ऑफ सोशल साइंस इमारत का एक दृश्य। उच्च शिक्षा में, 2010 में सकल नामांकन दर में सभी प्रमुख धर्मों में मुस्लिम (13.8 फीसदी) सबसे नीचे हैं – हिंदुओं के लिए आंकड़े 24.2 फीसदी, ईसाई 36.9 फीसदी और अन्य (जैन, सिक्ख, आदि) के लिए 28 फीसदी है

 

2010 में समाप्त हुए दशक, में आंकड़े तिगुना होने के बावजूद – 5.2 फीसदी से 13.8 फीसदी – उच्च शिक्षा में मुस्लिम नामांकन की दर, 23.6 फीसदी के राष्ट्रीय औसत, अन्य पिछड़े वर्ग (22.1 फीसदी) और अनुसूचित जाति (18.5 फीसदी) से पिछड़ा हुआ है। अनुसूचित जनजातियां, मुस्लिमों से 0.5 फीसदी से पीछे हैं।

 

नामांकन दर को दिए गए शैक्षणिक वर्ष में, जो 18- 23 वर्षीय आबादी जो उस वर्ष में उच्च शिक्षा के लिए योग्य हैं, उम्र की परवाह किए बिना, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वास्तविक नामांकन का प्रतिशत के रुप में परिभाषित किया गया है।

 

उच्च शिक्षा में आरक्षण – बड़े आंकड़े

Source: SAGE Publications, All India Survey on Higher Education, Ministry of Tribal Affairs, Sikh Institute, UNESCO, National Sample Survey Office

  

Notes:1. Gross Enrolment Ratio for Other Backward Classes and Muslims shown for 2000-01 is from 1999-2000.2. Gross Enrolment Ratio for Other Backward Classes and Muslims shown for 2014-15 is from 2009-10.3. OBC share of population: Kaka Kalelkar Commission estimate. OBC share in population has been variously reported since Independence, with no definite assessment as the last caste census in India was done in 1931.4. SC and ST literacy rates for 2014-2015 are from NSS 55th Round.5. OBC Literacy Rate: 54.8% rural, 75.3% urban6. Muslim Literacy rate: rural male 69.1%, urban male 81%, rural female 47.4%, rural male 65.5%

 
 
अपनी जनसंख्या के अनुपात में, मुस्लिमों के आंकड़े अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) से भी बदतर रहे हैं। उच्च शिक्षा पर 2014-15 अखिल भारतीय सर्वेक्षण के अनुसार, भारत की आबादी में 14 फीसदी हिस्सेदारी मुस्लिमों की है लेकिन उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नामांकित छात्रों की हिस्सेदारी 4.4 फीसदी है।   मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति की जांच के लिए नियुक्त की गई 2006 सच्चर समिति के अनुसार, पिछली आधी सदी के दौरान स्थिति अधिक खराब हुई है।  

 
रिपोर्ट के अनुसार, अधिक उम्र वाले अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति (आयु वर्ग के 51 वर्ष और उससे अधिक) की तुलना में युवा अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति (20 से 30 आयु वर्ग) में, स्नातकों के अनुपात तीन गुना अधिक है। मुस्लिमों के बीच, समिति ने पाया कि अधिक उम्र वाले मुस्लिमों की तुलना में युवा मुस्लिम स्नातकों का अनुपात दोगुना है, “’सभी अन्य ‘ की तुलना में मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं के बीच एक खाई और अगर प्रवृत्ति उलट नहीं होती है तो लगभग एक निश्चित संभावना है कि मुस्लिम भी अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के नीचे चला जाएगा।”  
 
जैसा कि, न्यायमूर्ति राजिन्दर सच्चर ने एक दशक पहले अपनी रिपोर्ट पूरी की थी, मुस्लिमों का सकल नामांकन दर दोगुना हुआ है, 6.84 फीसदी से 13.8 फीसदी हुआ है। इस के बावजूद, वे राष्ट्रीय औसत के पीछे हैं, जैसा कि हमने पहले कहा है।

 

जनसंख्या की अनुपात के रुप में स्नातक

Source: Sachar Committee Report

 

2001 से उच्च शिक्षा नामांकन में अनुसूचित जाति की 147 फीसदी वृद्धि और अनुसूचित जनजाति की 96 फीसदी वृद्धि – जो अभी भी सामान्य जनसंख्या के उनके अनुपात में पिछड़े हैं – सकारात्मक कार्रवाई का परिणाम है, जैसा कि हमने लेख के पहले भाग में बताया है। लेख के दूसरे भाग में हमने बताया कि किस प्रकार उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) का अनुपात आम जनता की उनके इसी हिस्से के रूप में लगभग बराबर है।

 

तो क्या मुस्लिमों तक बढ़ाया जाना चाहिए आरक्षण ?

 

इस सवाल का जवाब दे पाना आसान नहीं है। एक राष्ट्र में, जो अपने संविधान द्वारा धर्मनिरपेक्ष घोषित है एवं शिक्षण संस्थानों में धार्मिक आधार पर छात्रों के बीच भेदभाव करने की अनुमति नहीं है। हालांकि, “नागरिकों के किसी भी सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को उन्नति” प्रदान करने के लिए राज्यों के संवैधानिक रूप से अनिवार्य आरक्षण प्रावधानों को तोड़ सकते हैं।

 

इंडियन मुस्लिम एंड हाईयर एडुकेशन : ए स्टडी ऑफ सेलेक्ट यूनिवर्सिटीज इन नार्थ एंड साउथ इंडिया, 2013 तुलनात्मक विश्लेषण के अनुसार, जहां ऐसे आरक्षण मुस्लिमों के लिए किए गए हैं और ओबीसी सूची में कुछ मुस्लिम जातियों को शामिल किया गया है, जैसे  कि केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश, में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उत्तरी गैर अल्पसंख्यक संस्थानों में  उनका प्रतिनिधित्व तीन गुना अधिक है।

 

उत्तर और दक्षिण भारत में विश्वविद्यालयों में मुसलमानों का नामांकन

 

सकारात्मक कार्रवाई से कई परिवारों के पहली पीढ़ी के लोगों को स्नातक, स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट की अनुमति मिली है। इससे प्रगतिशील परिवारों को अपने क्षितिज का विस्तार करने की प्रेरणा मिली है।

 

23 वर्षीय रुक्कु सुम्मया, केरल विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर पत्रकारिता वर्ग में दो मस्लिम सीट में से एक पर जगह लेने वाली, कहती हैं, “पत्रकारिता पढ़ने वाली मैं अपनी परिवार की पहली लड़की हूं, जो हमारे बड़े लड़कियों के लिए कैरियर के चुनाव में एक कदम आगे मानते हैं।”

 

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Rukku Sumayya, 23, is one of two Muslims occupying reserved seats in the post-graduate journalism class of Kerala University, the outcome of Kerala redefining the other-backward-classes category to include Muslims. In Kerala, Karnataka and Andhra Pradesh, where reservation has been made for Muslims, their representation in higher education is up to three times the rate in non-minority institutions up North. In proportion to their population, Muslims were worse-off than scheduled castes and scheduled tribes in higher education enrolments in 2015. Muslims are 14% of India’s population but account for 4.4% of students enrolled in higher education.

 

23 वर्षीय रुक्कु सुमाया, केरल विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर पत्रकारिता वर्ग में दो मस्लिम सीट में से एक पर जगह लेने वाली छात्र हैं। केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में, जहां आरक्षण सूचि में मुस्लिमों को शामिल किया गया है, वहां उच्च शिक्षा में उनका प्रतिनिधित्व उत्तरी गैर अल्पसंख्यक संस्थानों दर की तुलना में तीन गुना अधिक है।

 

सुम्मया की कक्षा में 20 छात्र हैं जिनमें से 3 मुस्लिम हैं – एक को योग्यता के तहत और 2 को ओबीसी कोटा के तहत प्रवेश मिला है जो कि केरल के आरक्षित सीटों के लिए बेहतर उपयोग की अनुमति के लिए मुस्लिमों को ओबीसी की सूचि में शामिल का परिणाम है।

 

सुम्मया कहती है, “कभी कभी, मैं किसी की सीट लेने पर दोषी महसूस करती हूं। लेकिन ज्यादातर मैं विशेषाधिकार का आनंद लेती हूं और इसे यह कह कर उचित ठहराती हूं मैं ब्रेक की हकदार हूं।”

 

मुस्लिमों में, उच्च शिक्षा के लिए गरीबी मुख्य बाधा लेकिन दक्षिण भारत में नहीं यह स्थिति

 

इसमें कोई शक नहीं है कि मुसलमान भारत के सबसे आर्थिक रूप से वंचित समुदायों में से है। सच्चर समिति के अनुसार, हिंदु जो पिछड़े एवं अन्य अल्पसंख्यकों में वर्गीकृत नहीं हैं, वह मुस्लमानों से 60 फीसदी अधिक खर्च करते हैं।

 

80 फीसदी से अधिक शहरी पुरुष मुस्लिम साक्षर नहीं हैं, जो कि भारतीय धार्मिक समूहों से शहरी पुरुषों के बीच सबसे कम साक्षरता दर है – रोजगार और भारत में प्रमुख धार्मिक समूहों के बीच बेरोजगारी की स्थिति, 2010 राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) की रिपोर्ट के अनुसार, हिंदुओं के लिए यह आंकड़े 91 फीसदी, ईसाई के लिए 94 फीसदी, सिख के लिए 86 फीसदी और अन्य के लिए 95 फीसदी है।

 

उच्च शिक्षा में, मुस्लिमों (13.8 फीसदी) , 2010 में सकल नामांकन दर में सभी प्रमुख धर्मों पिछड़े हैं – इस संबंध में अन्य धर्मों के आंकड़े इस प्रकार हैं हिंदु (24.2 फीसदी), ईसाई ( 36.9 फीसदी) और अन्य (जैन, सिक्ख, आदि) (28 फीसदी)।

 

मुस्लिमों के बीच , काम की भागीदारी दर, सामाजिक-आर्थिक बेहतरी का एक और महत्वपूर्ण निर्धारक, प्रति 1000 जनसंख्या पर कर्मचारियों की संख्या का प्रतिनिधित्व करते हुए, सभी प्रमुख धर्मों में सबसे कम, 536, था – एनएसएसओ 2010 के अनुसार, अन्य धर्मों के लिए यही आंकड़े इस प्रकार थे सिख (568), ईसाई (540), हिंदुओं (563) और अन्य (573)।

 

सामाजिक- धार्मिक श्रेणी अनुसार औसत मासिक प्रति व्यक्ति खर्च, 2004-05

Source: Sachar Committee Report

 

जाबिर हसन खान, प्रोफेसर, भूगोल, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विभाग और एजुकेशन एंड डेवलप्मेंट ऑफ मुस्लिम इन इंडिया: एक तुलनात्मक अध्ययन, के सह लेखक कहते हैं, “यही कारण है कि क्यों वित्तीय प्रोत्साहन (छात्रवृत्ति) मुस्लिम उच्च शिक्षा में नामांकन को बढ़ावा देने में एक प्रमुख भूमिका निभाता है।” खान द्वारा किए गए अध्ययन में दिखाया गया है कि किस प्रकार मुसलमानों के बीच स्नातक साक्षरता में असमानता, राज्य में मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी के साथ सह-संबंध नहीं है।

 

दरअसल, उत्तर और दक्षिण भारत में चुनिंदा विश्वविद्यालयों का तुलनात्मक अध्ययन जो 2013 में साइमा इक़बाल , शहीद भगत सिंह कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के द्वारा किया गया था, जिसका ज़िक्र हमने पहले किया था, अध्ययन  में पाया गया कि कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल विश्वविद्यालय आरक्षण और वित्तीय सहायता की पेशकश के माध्यम से उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ा रहे हैं – उत्तर की तुलना में दक्षिण विश्वविद्यालय में मुसलमान छात्रों द्वारा उपयोग किया जाने वाला छात्रवृत्ति सात गुना अधिक है।

 

उत्तर में, स्कूलों की कमी के कारण उच्च शिक्षा में मुस्लमान पीछे

 

सईद इकबाल हुसैन, कालिकत विश्वविद्यालय के पूर्व उप-कुलपति और अमरिका स्टिमसन के विजिटिंग फेलो, ने 2009 में प्रकाशित हुई किताब, मुस्लिमस इन नार्थ इंडिया: फ्रोज़न इन द पास्ट, में लिखा है “शिक्षा के संदर्भ में उत्तर और दक्षिण भारत के मुस्तमानों में बहुत बड़ा अंतर है और इस प्रकार राजनीतिक सशक्तिरण में भी अंतर है।”

 

हुसैन लिखते हैं, “दक्षिण भारतीय मुस्लमान, विशेष रुप से केरल, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र में रहने वाले मुस्लमान, बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा के समकक्षों की तुलना में शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।”

 

इस विभाजन के लिए दक्षिण भारत में सकारत्मक कार्रवाई ही एकमात्र कारण है।

 

दक्षिण भारत में, शिक्षा के लिए दबाव – विशेष रुप से स्थानीय नेताओं द्वारा – से हर स्तर पर नामांकन को बढ़ावा मिला है।

 

हुसैन आगे लिखते हैं, “केरल में मुस्लिम समुदाय, राजनीतिक दृढ़ संकल्प और सशक्तिकरण का बेहतर बिंदु है।” केरल में, मुस्लिम समुदाय के स्वामित्व द्वारा चलाए उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या के विस्तार में मदद मिली है, स्वतंत्रता से लेकर अब तक 100 तक हुई है।

 

“यह ज़ाहिर है कि पांच दक्षिण राज्यों में सफल शैक्षिक संस्था आंदोलन पिरामिड के नीचे से शुरु हुआ है”, हुसैन कहते हैं। स्कूल शिक्षा का विस्तार, उच्च शिक्षा के विस्तार के पार हुआ है, जिससे उच्च शिक्षा के लिए योग्य छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई है।

 

इसके विपरीत, उत्तर भारत में स्कूल की पहुंच कम है। सच्चर समिति की रिपोर्ट कहती है, “ग्रामिण इलाकों में जवाहर नवोदय विद्यालयों जैसे अधिक गुणवत्ता वाले स्कूल की उपलब्धता से अच्छे गुणवत्ता वाली शिक्षा लाने की उम्मीद थी लेकिन इन स्कूलों में मुस्लमानों की भागीदारी संतोषजनक नहीं है।”

 

मुस्लिम स्कूल ड्रॉप आउट: जो उच्च शिक्षा की सीमा तक नहीं पहुंचता है

 

सच्चर समिति के अनुसार, भारत भर में, आधे मुस्लमान बच्चे जो मध्य स्कूल की शिक्षा पूरा करते हैं वो माध्यमिक स्कूल ड्रॉप आउट हो जाते हैं।

 

2005-06 परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस) के आंकड़ों के आधार पर 2014 की इस अध्ययन के अनुसार, सामान्य जनसंख्या की तुलना में मुस्लमानों की ड्रॉप आउट दर उच्च है: 13.2 फीसदी राष्ट्रीय औसत की तुलना में मुस्लमानों की ड्रॉप आउट दर 176 फीसदी है।

 

राज्य के शिक्षा के लिए ज़िला सूचना प्रणाली द्वारा की गई 2012-13 की इस सर्वेक्षण के अनुसार, राजस्थान में, 18.5 फीसदी प्राइमरी स्कूल के मुस्लिम छात्र स्कूल ड्रॉप आउट हैं एवं उच्च प्राइमरी के छात्रों के लिए यह आंकड़े 20.6 फीसदी है, जबकि इसी संबंध में राज्य के औसत आंकड़े 8.4 फीसदी और 6 फीसदी है।

 

राकेश बसंत, आईआईएम, अहमदाबाद में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और सच्चर समिति के सदस्य कहते हैं, “मुस्लमानों में उच्च ड्रॉप आउट दर विशेष रुप से मध्य स्कूल के बाद, समुदाय में उच्च शिक्षा की पहुंच तक बाधा का मुख्य कारण है।”

 

साथ ही बसंत, अधिक मुस्लमानों का उच्च शिक्षा जारी रखने के लिए “आपूर्ति पक्ष हस्तक्षेप, जैसे कि छात्रों के लिए छात्रवृत्ति और अच्छे पड़ोस के स्कूल” की वकालत करते हैं।

 

तीन श्रृंखला लेख का यह तीसरा और अंतिम भाग है। पहला दूसरा भाग यहां और यहां पढ़ सकते हैं।

 

(बाहरी माउंट आबू, राजस्थान स्थित स्वतंत्र पत्रकार है।)

 
यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 22 जुलाई 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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