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उत्तर प्रदेश में भ्रूण हत्या विरोधी फंड का 50% नहीं हुआ खर्च, वैश्विक रैंकिंग पर प्रभाव

एलिसन सलदनहा,

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गुजरात के आनंद शहर में अल्ट्रासाउंड कराती एक गर्भवती महिला। हाल ही में जारी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में कन्या भ्रूण हत्या पर अंकुश लगाने के लिए आवंटित राशि में से करीब आधी खर्च नहीं की गई है। जांच में पाया गया कि डाइग्नॉस्टिक सेंटर ने किसी गर्भवती महिला की जांच के लिए अल्ट्रासोनोग्राफी के दौरान लिए गए इमेज को सुरक्षित रखने या फिर डाटा बैकअप के संरक्षण के अनिवार्य नियमों का पालन नहीं किया है। 68 फीसदी मामलों में महिलाओं के पास डॉक्टर द्वारा दी गई आवश्यक रेफरल पर्ची भी नहीं थी।

 

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की हाल ही में जारी एक  रिपोर्ट के अनुसार उत्तर   प्रदेश में कन्या भ्रूण हत्या पर अंकुश लगाने के लिए आवंटित राशि में से आधी राशि खर्च नहीं की गई है। और यह इसी परिणाम है कि‘वैश्विक लिंग सूचकांक’में इसका प्रभाव भारत की स्थिति पर विपरित पड़ा है।

 

भारत में सबसे ज्यादा आबादी उत्तर प्रदेश में रहती है और देश का यह दूसरा राज्य है, जहां प्रजनन दर सबसे ज्यादा है। प्रजनन दर के मामले में बिहार उत्तर प्रदेश से आगे है।

 

2013 में जारी स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय सांख्यिकी रिपोर्ट कहती है कि ग्रामीण इलाकों में एक औसत महिला कम से कम तीन बच्चों को जन्म देती है। हालांकि, राज्य में बच्चों के लिंग अनुपात में तेजी से गिरावट देखी जा रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार 0 और 6 साल के बीच आयु वर्ग के प्रति 1,000 लड़कों पर राज्य में 902 लड़कियां है। यह आंकड़े 1991 में 927 और 2001 में 916 से कम थे। लगभग तीन दशक पहले, 1981 में उत्तर प्रदेश में 935 का अनुपात दर्ज किया गया था।

 

इसी अवधि के दौरान, 0 से 6 वर्ष के आयु वर्ग के बीच देश में बाल लिंग अनुपात 1000 लड़कों पर 962 लड़कियों का था, जबकि  2011 में यह अनुपात नीचे आकर प्रति 1,000 लड़कों पर 914 लड़कियों का हो गया।

 

तीन दशकों में बाल लिंग अनुपात

Source: Ministry of Health & Family Welfare

 

वर्ष 2015 की कैग की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के नवीनतम आंकड़े बाल लिंग अनुपात का 883 तक गिरने का संकेत देते हैं। गौर हो कि कैग रिपोर्ट स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित है।

 

प्रकृति महिलाओं से अधिक पुरुष पैदा करती है, क्योंकि लड़कियों की तुलना में लड़के शिशु रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इसलिए बाल लिंग अनुपात, जन्म के समय लिंग अनुपात को दर्शाता है। आदर्श रुप से प्रति 1000 पुरुषों पर 943 और 954 के बीच महिलाएं।

 

2001 के बाद से, सामान्य रुप से भारत और विशेष रुप से उत्तर प्रदेश में शिशु लिंग अनुपात में गिरावट हुई है। यह साफ रुप से संकेत देते हैं कि कन्या भ्रूण हत्या होना बेरोक-टोक जारी है।

 

चौंकाने वाली बात यह है कि राजनीतिक रुप से काफी ताकतवर और सक्रिय होने के बावजूद उत्तर प्रदेश राज्य में कन्या भ्रूण हत्या होना जारी है। उत्तर प्रदेश लोकसभा में संसद की 543 में से 73 सदस्यों का चुनाव करता है। 2014 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से सांसद बने, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी रायबरेली से जीतीं।

 

उत्तर प्रदेश को हमेशा राशि की मांग, मगर अधिकांश राशि रहती है अछूती

 

कैग रिपोर्ट में राज्य सरकार की गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 (पीसी-पीएनडीटी एक्ट) को लागू करने के प्रति ढीले रवैये को लेकर खिंचाई की गई है। कानून का लक्ष्य विनियमन के माध्यम से लिंग-चयनात्मक गर्भपात रोकना और अल्ट्रासाउंड उपकरण का उपयोग कर क्लीनिक की निगरानी करना है। गौर हो कि इससे पहले इस साल, राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश भर में लड़कियों की रक्षा के लिए अधिनियम का कड़ाई से पालन करने की शपथ ली थी।

 

राज्य में चुनाव में केवल पांच महीने बाकी होने के साथ कार्यताओं को इस दिशा में काम होने की काफी उम्मीद है। उम्मीद की जा रही है कि कैग की टिप्पणियां राजनीतिक अभियान में जोर-शोर से उठाई जाएंगी। कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ एक अनुभवी वकील और पीसी-पीएनडीटी एक्ट के तहत गठित राष्ट्रीय निरीक्षण के सदस्य एवं निगरानी समिति के सदस्य, साबू जॉर्ज कहते हैं, “राजनेताओं के लिए रैली और अजन्मी लड़कियों के खिलाफ अपराधों पर रोक लगाने के लिए कार्रवाई करने का बेहतर समय है। उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावों में बुनियादी मानव विकास के मुद्दों के ऊपर जाति और सांप्रदायिकता के मुद्दों पर फोकस किया गया है।”

 

2010 और 2015 के बीच उत्तर प्रदेश ने, जो सबसे कम बाल लिंग अनुपात के साथ 10 भारतीय राज्यों में से एक है, अधिनियम के कार्यान्वयन के माध्यम से लिंग-चयनात्मक गर्भपात रोकने के लिए 20.26 करोड़ रुपये की आवश्यकता का दावा किया है। इसमें से राज्य को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के माध्यम से केंद्र सरकार की ओर से 35 फीसदी यानी 7.09 करोड़ रुपए प्राप्त हुए हैं।

 

उत्तर प्रदेश में एंटी फीटिसाइड फंड, 2010-15

Source: Comptroller & Auditor General

 

‘लापता लड़कियों’  पर कैग ने कहा-शर्मनाक

 

कैग रिपोर्ट कहती है कि पिछले पांच वर्षों में प्राप्त राशि में से राज्य ने 54 फीसदी यानी लगभग 3.86 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। यह राशि राज्य के मूल आकलन का मुश्किल से 20 फीसदी है। पंजीकरण या नवीकरण शुल्क और डाइग्नॉस्टिक सेंटर पर लगाए जुर्माने माध्यम से राज्य ने अतिरिक्त 1.9 करोड़ रुपये जुटाए हैं। यह राशि बचत बैंक खाते में रखी है और इसका इस्तेमाल नहीं किया गया है।

 

‘लापता लड़कियां’ नाम से एक अध्याय में कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि “अधिकांश महिलाओं की सशक्तिकरण योजनाओं में उत्तर प्रदेश में 46 से लेकर 100 फीसदी की महत्वपूर्ण बचत दिखा है और इसका मुख्य कारण बुरा कार्यान्वयन है। धन आवंटन के बावजूद अधिकांश योजनाएं… लिंग असमानता को कम करने के अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका है। इसका कारण नियोजन की कमी और कार्यान्वयन एजेंसियों द्वारा अक्षम क्रियान्वयन और शासन संरचना द्वारा अप्रभावी निगरानी है।”

 

कैग की रिपोर्ट में दर्ज ‘लापता लड़कियां’ नाम का अध्याय दरअसलराज्य के कुल 71 जिलों में से 20 में पीसी-पीएनडीटी एक्ट के हालात पर किए गए विस्तृत अध्ययन का लेखा-जोखा है। यह लेखा-जोखा इस बात के लिए था कि जिलों में मौजूद डाइग्नॉस्टिक सेंटर गर्भवती महिलाओं को समुचित सुविधाएं उपलब्ध करा पाते हैं या नहीं।

 

ऑडिट किए गए 20 में से 13 जिलों का रिकॉर्ड बुरा

 

कैग की जांच के दौरान पाया गया कि डाइग्नॉस्टिक सेंटर जांच में पाया गया कि डाइग्नॉस्टिक सेंटर ने किसी गर्भवती महिला की जांच के लिए अल्ट्रासोनोग्राफी के दौरान लिए गए इमेज को सुरक्षित रखने या फिर डाटा बैकअप के संरक्षण के अनिवार्य नियमों का पालन नहीं किया है। 68 फीसदी मामलों में महिलाओं के पास डॉक्टर द्वारा दी गई आवश्यक रेफरल पर्ची भी नहीं थी।

 

इसके अलावा,पीसी-पीएनडीटी अधिनियम की आवश्यकता के मुताबिक एक जिला अपीलीय प्राधिकरण (डीएए) को अल्ट्रासाउंड मशीनों के विवरण सहित सभी डाइग्नॉस्टिक सेंटर्स के स्थायी रिकॉर्ड की देखरेख करनी चाहिए। हालांकि, 20 में से 13 जिलों में ऐसी कोई रिकॉर्ड उपलब्ध थे।

 

जांच में पाया गया है कि इस तरह की लापरवाही के बावजूद “सर्वेक्षण किए गए जिलों में 1,652 पंजीकृत डाइग्नॉस्टिक सेंटर्स में से 936 (लगभग 58 फीसदी) में जिला मजिस्ट्रेट द्वारा न तो कोई कार्रवाई नहीं की गई है और न ही दोषी यूएसजी केन्द्रों पर जुर्माना लगाया गया है।” पिछले पांच वर्षों में 221 केन्द्रों पर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है और इसके बाद कोई फॉलो अप नहीं किया गया है।

 

राज्य और जिला सलाहकार समितियों नियमित रुप से आपस में कोई संवाद और न ही वे अपने निर्देशों पर कार्रवाई के उचित पालन को सुनिश्चित करते हैं। कैग रिपोर्ट कहती है कि ‘पीसी-पीएनडीटी एक्ट’ के प्रावधानों के तहत बनाई गई निगरानी की यह पूरी व्यवस्था अप्रभावी और काफी हद तक बेकार है।

 

अपने आकार और जनसंख्या को देखते हुए लिंग असमानता से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश की अयोग्यता से वैश्विक मानव विकास सूचकांक में भारत की स्थिति कमजोर हुई है। हाल ही में, विश्व आर्थिक मंच की जेंडर गैप इंडेक्स में 145 देशों में से भारत का स्थान 108 वां रहा है। भारत का स्थान अपने पड़ोसी देशों, श्रीलंका (84) और चीन (91) से काफी नीचे रहा है। महिलाओं की स्थिति के मामले में बिहार और राजस्थान के साथ उत्तर प्रदेश, सबसे खराब भारतीय राज्यों में से है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जुलाई 2016 में विस्तार से बताया है।

 

हाल ही में, विश्व आर्थिक मंच की जेंडर गैप इंडेक्स में 145 देशों में से भारत का स्थान 108 वां रहा है। भारत का स्थान अपने पड़ोसी देशों, श्रीलंका (84) और चीन (91) से काफी नीचे रहा है। महिलाओं की स्थिति के मामले में बिहार और राजस्थान के साथ उत्तर प्रदेश, सबसे खराब भारतीय राज्यों में से है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जुलाई 2016 में विस्तार से बताया है।

 

जार्ज कहते हैं, “भारत में जन्में हरेक चार में से एक लड़की उत्तर प्रदेश में जन्म लेती है। इसलिए, राज्य के गिरते लिंग अनुपात का गंभीर प्रभाव भारत के कुल बाल लिंग अनुपात पर पड़ता है। और  इस बड़े में मुद्दे को गंभीरता से लिए बिना 2021 में रैंकिंग में कुछ अच्छे सुधार देखने की संभावना नहीं लगती हैं। ” उत्तर प्रदेश पर यह रिपोर्ट, यह भी दर्शाता है कि राज्यों में अधिकार अधिनियम ठीक से लागू नहीं होते हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है। हालांकि, कानून वर्ष 1996 में प्रभाव में आया है, अधिनियम के तहत केवल 350 लोगों को दोषी ठहराया गया है। इसी संबंध में इंडियास्पेंड ने अगस्त 2016 में विस्तार से बताया है।

 

(सलदनहा इंडियास्पेंड में सहायक संपादक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 5 अक्टूबर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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