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उत्तर प्रदेश में स्पेन की आबादी से ज्यादा बच्चे, लेकिन कम शिक्षक और खराब नतीजे

खुशबू बलानी,

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उत्तर प्रदेश में 20 करोड़ आबादी के एक चौथाई लोगों की आयु 5 से 14 साल के बीच की है। भारत में उत्तर प्रदेश में बच्चों की  संख्या सबसे ज्यादा है, लेकिन राज्य में प्रति छात्र पर कम शिक्षक, प्राथमिक से उच्च प्राथमिक विद्यालय पहुंच पाने की दर कम और बच्चों के सीखने के नतीजे देश में सबसे कम हैं।

 

जैसा कि सर्वविदित है, देश के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं। आज हम एक नजर यहां की शिक्षा की स्थिति पर डालेंगे। यह एक ऐसा विषय है, जो किसी भी पार्टी के लिए सत्ता में आने के एजेंडे में शीर्ष पर होने चाहिए।

 

इस लेख श्रृंखला के पहले भाग में हमने बताया है कि साक्षरता दर और सीखने के परिणाम बीमारू राज्यों (बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) में सबसे कम हैं। वर्ष 2020 तक विश्व भर में भारत की कामकाजी आबादी सबसे ज्यादा होगी, करीब 86.9 करोड़,लेकिन इन चार राज्यों में साक्षरता, स्कूल में नामांकन, सीखने के परिणामों, और शिक्षा के खर्च के संकेतक पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है कि युवा आबादी को शिक्षित और प्रशिक्षित करने के लिए भारत तैयार नहीं है। हम बता दें कि इन चार राज्यों में 5 से 14 की उम्र के बीच यानी स्कूल जाने की उम्र की आबादी 43.6 फीसदी है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश की साक्षरता दर 69.72 फीसदी है, जो कि देश में नीचे से आठवें स्थान पर है।

 

वर्ष 2001 से पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश में साक्षरता दर में 13.45 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है, लेकिन यहां व्यापक क्षेत्रीय असमानताएं हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार श्रावस्ती के उत्तर-पूर्वी जिले में साक्षरता दर 49 फीसदी है, जबकि सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला जिला गाजियाबाद (उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश में) में यह 85 फीसदी है।

 

भारत में उत्तर प्रदेश का प्राथमिक स्कूल छात्र-शिक्षक अनुपात सबसे बद्तर

 

एकीकृत जिला सूचना शिक्षा प्रणाली (यू-डीआईएसई) फ्लैश सांख्यिकी 2015-16 के अनुसार, भारत के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश का शिक्षक-छात्र अनुपात (पीटीआर) भारत में सबसे बद्तर है। राज्य में प्राथमिक स्तर पर प्रति 39 छात्रों के लिए एक शिक्षक है। इस संबंध में राष्ट्रीय औसत 23:1 है।

 

सरकारी शिक्षा आंकड़ों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2015-16 में, उत्तर प्रदेश में  2.53 करोड़ छात्रों ने प्राथमिक स्कूलों में नामांकन कराया है। यह संख्या निजी और सरकारी स्कूलों को जोड़कर है।2.53 करोड़ छात्रों को 665779 शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जाता है। इसमें ऐसे स्कूल भी शामिल है, जहां प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक सह-अस्तित्व में हैं।

 

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) द्वारा प्राथमिक स्तर पर प्रति 30 छात्र पर एक शिक्षक निर्धारित किया गया है। हमारे विश्लेषण के अनुसार, इस अनुपात के साथ राज्य में 840000 शिक्षक होने चाहिए, लेकिन अब भी वहां 21 फीसदी या 176,000 शिक्षकों की कमी है।

 

लोकसभा में दिए गए एक जवाब के अनुसार, उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में सभी प्राथमिक शिक्षक पदों में से 23 फीसदी रिक्त हैं।

 

वर्ष 2014 के इस अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2010 में सर्वेक्षण किए गए 19 राज्यों में से उत्तर प्रदेश के ग्रामीण सरकारी स्कूलों में दूसरी सबसे अधिक शिक्षक अनुपस्थिति (31 फीसदी) की सूचना दी गई है।

 

भारत में, उत्तर प्रदेश का छात्र-शिक्षक अनुपात सबसे खराब

 

प्रति छात्र खर्च अधिक, लेकिन सीखने के परिणाम निम्न, खासकर सरकारी स्कूलों में

 

‘इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ में छपी इस टिप्पणी के अनुसार वर्ष 2014-15 में उत्तर प्रदेश ने प्रति प्राथमिक स्कूल छात्र पर 13,102 रुपए खर्च किए हैं। इसमें प्राथमिक विद्यालय (कक्षा 1 से 5) और उच्च प्राथमिक विद्यालय (कक्षा 6 से 8) दोनों शामिल हैं। यह आंकड़े भारत के प्रति छात्र व्यय के राष्ट्रीय औसत 11,252 रुपए के से ज्यादा है।

 

इसी तरह,  राज्य सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15 के अनुसार, वर्ष 2011 से वर्ष 2015 के बीच, प्राथमिक शिक्षा पर राज्य के व्यय में 47 फीसदी की वृद्धि हुई है, लेकिन सीखने का स्तर भारत में अब भी सबसे नीचे हैं।

 

उत्तर प्रदेश का प्राथमिक शिक्षा पर खर्च, वर्ष 2011-16

Source: Economic Survey 2012-13,  Economic Survey 2014-15; *Revised estimate **Budget estimate

 

कुल मिलाकर, कक्षा 3 के बच्चे जो कम से कम कक्षा 1 की किताबें ठीक से पढ़ सकते हैं, उनके अनुपात में सुधार हुआ है। वर्ष 2006 में जहां ये आंकड़े 31 फीसदी थे, वहीं वर्ष 2014 में ये 35 फीसदी हुए हैं। ये आंकड़े शिक्षा पर ‘वार्षिक स्थिति रिपोर्ट – समय के दौरान रुझान’ रिपोर्ट में सामने आए हैं। लेकिन यह वृद्धि केवल निजी स्कूलों में है, जहां वर्ष 2014 में कक्षा 3 के 55 फीसदी बच्चे कक्षा 1 की किताबें ठीक से पढ़ पा रहे थे। हम बता दें कि वर्ष 2006 में ये आंकड़े 50 फीसदी थे। वहीं सरकारी स्कूलों में वर्ष 2006 में यह आंकड़ा 24 फीसदी था, जो गिर कर 2010 में 13 फीसदी हुआ है।

 

अंकगणित कौशल के स्तर में, सरकारी और निजी, दोनों में गिरावट हुई है। एएसईआर के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2007 में 30 फीसदी बच्चे गणित में भाग हल करने में सक्षम थे। वर्ष 2014 में यह गिर कर 26 फीसदी हुआ है।

 

उत्तर प्रदेश में सीखने के परिणाम में गिरावट

Source: Annual Status of Education–Trends Over Time report

 

स्कूलों में बच्चों की कम उपस्थिति, 624,000 बच्चे बाल श्रम में

 

उत्तर प्रदेश में कुछ ही बच्चे ही नियमित रुप से स्कूल जाते हैं। एएसईआर के आंकड़ों के मुताबिक, नामांकन कराए गए बच्चों में से केवल 55 फीसदी बच्चे ही कक्षा में उपस्थित थे, जब एएसईआर की टीम वर्ष 2014 में प्राथमिक स्कूलों का दौरा करने गई थी।

 

इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में बच्चे, स्कूल की पूरी पढ़ाई नहीं करते हैं। देश में उत्तर प्रदेश का प्राथमिक से उच्च प्राथमिक में जाने वाले बच्चों का दर सबसे कम है। एकीकृत जिला सूचना शिक्षा प्रणाली (यू-डीआईएसई) फ्लैश सांख्यिकी 2015-16 के अनुसार, उत्तर प्रदेश के लिए ये आंकड़े 79.1 फीसदी हैं।

 

वर्ष 2011 के जनगणना के आधार पर ‘बाल अधिकार संरक्षण राष्ट्रीय आयोग’द्वारा किए गए गणना के अनुसार, किसी भी अन्य राज्य की तुलना में उत्तर प्रदेश में ज्यादा बच्चे काम करते हैं। आंकड़ों के अनुसार 5 से 14 साल के बीच 624,000 बच्चे बाल श्रम करते हैं।

 

इंडिया स्पेंड की ओर से पांच भागों वाली श्रृंखला का यह दूसरा लेख है। इस श्रृंखला में हम बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति पर चर्चा कर रहे हैं। चौथे भाग में मध्यप्रदेश में शिक्षा की स्थिति पर नजर डालेंगे।

 

(बलानी स्वतंत्र लेखक हैं और मुंबई में रहती हैं। बलानी की दिलचस्पी विकास के विभिन्न मुद्दों में है।

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 05 जनवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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